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जहाज़ का कप्तान

 जानकी देवी अपनी पुरानी आराम कुर्सी पर बैठीं, बरामदे में चल रही बहस को सुन रही थीं। सामने उनके तीनों बेटे—राकेश, मुकेश और सुरेश—खड़े थे। आवाज़ें ऊँची थीं, और तर्कों में वो धार थी जो लोहे को नहीं, बल्कि रिश्तों को काट रही थी।

"अम्मा, अब हम बच्चे नहीं हैं," सबसे बड़े बेटे राकेश ने झुंझलाते हुए कहा, "मैं पचास का होने को आया हूँ। क्या अब भी घर का एक-एक पैसा आपके हाथ में ही रहेगा? हमें अपनी ज़रूरत के लिए आपसे माँगना पड़ता है, यह अब अच्छा नहीं लगता।"

"हाँ अम्मा," मंझले मुकेश ने सुर मिलाया, "बाज़ार बदल गया है, ज़माना बदल गया है। आपके पुराने तरीके अब नहीं चलते। हम अपना-अपना कमाते हैं, तो अपना-अपना खर्च भी खुद देख सकते हैं।"

जानकी देवी ने अपनी चश्मे को नाक पर ठीक किया। सत्तर साल की उम्र में भी उनकी नज़र तेज़ थी। यह घर उनके पति ने बनाया था, लेकिन इसे 'घर' जानकी देवी ने बनाए रखा था। उन्होंने कभी किसी बेटे में फर्क नहीं किया। सबकी कमाई एक जगह आती थी, और ज़रूरत के हिसाब से सबको मिलती थी। इसी नियम ने आज तक इस बड़े परिवार को टूटने नहीं दिया था।

"तो तुम लोग क्या चाहते हो?" जानकी देवी ने बहुत शांत स्वर में पूछा।

"हम चाहते हैं कि अब सब कुछ अलग-अलग हो जाए," सबसे छोटे सुरेश की पत्नी ने पीछे से कहा, "रसोई अलग, खर्चा अलग। जिसे जो खाना है बनाए, जहाँ खर्च करना है करे। रोज़-रोज़ की किचकिच से तो बेहतर है।"

जानकी देवी उठीं। उन्होंने अपनी कमर में बंधा चाबियों का गुच्छा निकाला—वो गुच्छा जो पिछले चालीस सालों से उनकी कमर की शोभा था, जो इस घर की सत्ता और ज़िम्मेदारी का प्रतीक था।

उन्होंने गुच्छा मेज़ पर रख दिया। उसकी खनखनाहट पूरे बरामदे में गूंज गई।

"ठीक है," जानकी देवी ने कहा, "आज से इस घर में कोई बड़ा नहीं है। तुम सब बड़े हो। तुम सब समझदार हो। आज से अपनी-अपनी नाव के खेवैया तुम खुद हो।"

बेटों के चेहरों पर एक विजयी मुस्कान आ गई। उन्हें लगा कि उन्हें आज़ादी मिल गई है।

अगले ही दिन से घर का नक्शा बदल गया। आँगन में तीन चूल्हे जलने लगे। पहले जिस घर में 2 किलो दूध आता था और सब मिल बाँट कर पी लेते थे, अब तीन अलग-अलग पैकेट आने लगे। कभी किसी के घर पनीर बनता, तो दूसरे के घर दाल, और इस तुलना में बच्चों के बीच झगड़े शुरू हो गए।

दो महीने बीते। आज़ादी का नशा अब उतरने लगा था। बिजली का बिल, जो पहले इकट्ठा जाता था और कम लगता था, अब तीन अलग-अलग मीटरों के कारण बढ़ गया था। राशन का खर्चा दोगुना हो गया था क्योंकि 'थोक' में आने वाला सामान अब 'फुटकर' में आ रहा था।

लेकिन असली इम्तेहान आना बाकी था।

दिवाली का त्यौहार सिर पर था। हर साल जानकी देवी एक महीने पहले से ही घर की पुताई और सजावट शुरू करवा देती थीं। पूरा घर एक रंग में रंगा जाता था। पर इस बार सन्नाटा था।

राकेश सोच रहा था कि मुकेश पुताई करवाएगा, मुकेश सोच रहा था कि सुरेश करवाएगा, और सुरेश को लग रहा था कि वो सबसे छोटा है तो वो क्यों खर्चा करे?

दिवाली की रात आ गई। पूरा मोहल्ला दीयों की रोशनी से जगमगा रहा था, लेकिन जानकी देवी का वो विशाल पुश्तैनी मकान अंधेरे में डूबा था। सिर्फ तीनों भाइयों के कमरों के बाहर दो-दो लधियाँ टंगी थीं, लेकिन वो साझा आँगन, जहाँ लक्ष्मी का स्वागत होना था, वो घुप अंधेरे में था।

जानकी देवी अपनी कुर्सी पर बैठीं उस अंधेरे को देख रही थीं। तभी उनके पास राकेश आया। उसके पीछे मुकेश और सुरेश भी थे। तीनों के चेहरे उतरे हुए थे।

"क्या हुआ? आज तो तुम सब मालिक हो, फिर ये अंधेरा क्यों?" जानकी देवी ने पूछा।

"अम्मा," राकेश की आवाज़ भर्राई हुई थी, "हमसे गलती हो गई। हमने सोचा था कि हम घर चला लेंगे। पर हम तो सिर्फ अपना-अपना स्वार्थ देख रहे थे। घर चलाने के लिए 'मैं' नहीं, 'हम' चाहिए होता है।"

मुकेश ने कहा, "अम्मा, पिछले महीने मेरी बेटी बीमार पड़ी, तो मुझे पड़ोसी से पैसे माँगने पड़े क्योंकि मेरी सैलरी खत्म हो चुकी थी। जब सब कुछ आपके हाथ में था, तो हमें कभी पता ही नहीं चला कि मुसीबत कब आई और कब चली गई।"

सुरेश ने घुटनों के बल बैठकर जानकी देवी के पैर पकड़ लिए। "अम्मा, हमें लगा था कि फैसला लेने की ताकत ही बड़प्पन है। पर आज समझ आया कि सबको साथ लेकर चलने की ताकत ही असली बड़प्पन है। जब घर का हर कोई कप्तान बन जाता है, तो जहाज़ डूब जाता है।"

जानकी देवी ने सुरेश को उठाया। उनकी आँखों में आँसू थे।

"बेटा, चाबियों का वो गुच्छा सिर्फ अधिकार नहीं था, वो एक धागा था जिसने तुम सब मोतियों को बांध रखा था। जब धागा टूटता है, तो मोती आज़ाद तो हो जाते हैं, पर उनकी कीमत गिर जाती है और वो यहाँ-वहाँ बिखर कर खो जाते हैं।"

तीनों भाइयों ने वो चाबियों का गुच्छा उठाया और वापस जानकी देवी के हाथों में रख दिया।

"ये आपकी जगह है अम्मा, और हमेशा रहेगी। हम कमा सकते हैं, पर घर सिर्फ आप ही चला सकती हैं।"

उस रात, थोड़ी देर से ही सही, पर उस आँगन में फिर से एक साथ दीये जले। रोशनी वही थी, पर आज उसकी चमक अलग थी, क्योंकि उस रोशनी में अहंकार की राख नहीं, बल्कि एकता का तेल जल रहा था। घर बच गया था, क्योंकि 'बड़ों' ने अपनी हार मान ली थी और 'बुजुर्ग' को उनकी गद्दी वापस मिल गई थी।


दोस्तों, परिवार एक शरीर की तरह होता है। अगर हाथ, पैर और आँखें सब दिमाग बनने की कोशिश करेंगे, तो शरीर काम करना बंद कर देगा। बड़ों का नियंत्रण कोई बेड़ियां नहीं, बल्कि वो सुरक्षा कवच है जो हमें दुनिया की धूप से बचाता है। अपनी थोड़ी सी स्वतंत्रता के लिए घर की शांति को दांव पर मत लगाइए। जहाँ बड़ों का सम्मान है, वहीं ईश्वर का वास है।

क्या आपके घर में भी बड़े-बुजुर्ग फैसले लेते हैं? अपनी राय हमें कमेंट में जरूर बताएं।

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