हॉल में हंसी-ठिठोली का शोर गूंज रहा था। घर की छोटी बहू, रिया की गोदभराई की रस्म चल रही थी। पूरा परिवार और रिश्तेदार जमा थे। बनारसी साड़ियों की सरसराहट और सोने के गहनों की चमक से कमरा दमक रहा था। एक कोने में, फीके रंग की सूती साड़ी पहने, 35 वर्षीय वंदना मेहमानों के लिए शर्बत के गिलास ट्रे में सजा रही थी।
तभी बुआ सास की तेज़ आवाज़ ने वंदना के कदमों को रोक दिया।
"अरे वंदना बहू! आज तो रिया का इतना बड़ा दिन है, और तुम ऐसे सादे कपड़ों में घूम रही हो? कम से कम वो वाला हार तो पहन लेती जो तुम्हारी सास ने तुम्हें मुंह दिखाई में दिया था। या फिर तिजोरी में रखकर उसे दोगुना करने का इरादा है?"
कमरे में मौजूद सभी औरतें खिलखिलाकर हंस पड़ीं। वंदना की जेठानी, शिखा, ने तंज कसते हुए जोड़ा, "अरे बुआ जी, वंदना का तो आपको पता ही है। कंजूसी इनके खून में है। पति लाखों कमाते हैं, पर मजाल है जो मैडम एक रुपया भी खर्च कर दें। अब देखिए ना, रिया के लिए गिफ्ट भी लाई हैं तो क्या... बच्चों वाले ऊनी कपड़े। अरे, कुछ सोने-चांदी का शगुन देतीं तो घर की नाक रहती।"
वंदना के हाथ में पकड़ी ट्रे हल्की सी कांपी, लेकिन उसके चेहरे की मुस्कान अपनी जगह से नहीं हिली। उसने सिर झुकाकर बुआ जी को शर्बत दिया और चुपचाप रसोई की ओर बढ़ गई।
किसी को नहीं पता था कि वंदना के कानों में गूंजती वो हंसी, पिघले हुए सीसे की तरह चुभ रही थी।
रसोई में जाकर उसने नल तेज़ खोल दिया ताकि पानी के शोर में उसकी सिसकियों की आवाज़ दब जाए। उसने बेसिन के ऊपर लगे आईने में अपना चेहरा देखा। आँखों में सैलाब उमड़ रहा था, लेकिन उसने उसे बहने नहीं दिया। उसे अपने पिता की कही बात याद आ गई—"बेटा, दुख अपना हो या पराया, अगर उसे बांटने जाओगी तो लोग हमदर्दी कम और चर्चा ज़्यादा करेंगे।"
सच्चाई वो नहीं थी जो बाहर बैठे लोग सोच रहे थे। सच्चाई यह थी कि वंदना के पति, आलोक, का बिजनेस पिछले एक साल से पूरी तरह डूब चुका था। आलोक ने अपनी सारी जमा पूंजी, यहाँ तक कि वंदना के गहने भी गिरवी रख दिए थे ताकि लेनदारों का मुंह बंद किया जा सके और घर में किसी को इस दिवालियापन की भनक न लगे।
आलोक ने वंदना से कहा था, "वंदना, अगर घर वालों को पता चला, तो वे मदद तो शायद ही करें, लेकिन ताने मारकर मेरा जीना दुश्वार कर देंगे। मेरी इज़्ज़त तुम्हारे हाथ में है।"
उस दिन के बाद से वंदना ने एक खामोश समझौता कर लिया था। उसने अपनी ज़रूरतें मार दी थीं। नए कपड़े, गहने, बाहर घूमना—सब बंद हो गया था। जो रिश्तेदार उसे 'कंजूस' और 'मक्खीचूस' कहते थे, उन्हें क्या पता था कि वंदना रात को सूखी रोटी और अचार खाकर सोती है ताकि घर के राशन का पैसा बचाकर आलोक की दवाइयां लाई जा सकें।
रस्म खत्म होने के बाद, मेहमान खाना खाने लगे। वंदना सबको परोस रही थी। तभी आलोक घर में दाखिल हुआ। उसका चेहरा उतरा हुआ था। उसे देखते ही शिखा भाभी ने फिर ताना मारा, "लो, आ गए हमारे बिज़नेसमैन देवर जी। वंदना, अब तो अपने पति से कहो कि नई गाड़ी ले ले। वो पुरानी खटारा स्कूटर पर आते हुए शर्म नहीं आती?"
आलोक की नज़रें झुक गईं। वंदना ने तुरंत बात काटी, "भाभी, आलोक को वो स्कूटर बहुत पसंद है। लकी है उनके लिए। और वैसे भी, सादगी में जो सुकून है, वो दिखावे में कहाँ?"
वंदना ने मुस्कुराते हुए आलोक के हाथ से बैग लिया और उसे कमरे में ले गई। दरवाजा बंद होते ही आलोक सोफे पर गिर पड़ा और अपना सिर हाथों में छिपा लिया।
"वंदना, मैं टूट गया हूँ। आज फिर एक ऑर्डर कैंसिल हो गया। लोग मेरा मज़ाक उड़ा रहे हैं और मैं तुम्हें दो वक्त की खुशियाँ भी नहीं दे पा रहा। सब तुम्हें ताने मारते हैं और मैं बुत बना सुनता रहता हूँ। बता क्यों नहीं देती सबको कि मैं कंगाल हो चुका हूँ?" आलोक की आवाज़ भरा गई थी।
वंदना ने आलोक के पास बैठकर उसके सिर पर हाथ फेरा। "और बताकर क्या मिलेगा आलोक? अभी वो मुझे 'कंजूस' कहते हैं, सच जानने के बाद वो हमें 'बेचारा' कहेंगे। कंजूसी का ताना सहा जा सकता है, पर दया की भीख नहीं। आप चिंता मत कीजिए। ये वक्त है, गुजर जाएगा। मैंने अपनी शिकायतें ईश्वर से की हैं, इंसानों से नहीं। क्योंकि इंसान घाव कुरेदना जानते हैं, मरहम लगाना नहीं।"
आलोक ने वंदना को देखा। उस साधारण सी सूती साड़ी में लिपटी वो औरत उसे दुनिया की सबसे अमीर और ताकतवर स्त्री लग रही थी।
रात के सन्नाटे में, जब सब सो गए, वंदना अपने कमरे के एक कोने में बने छोटे से मंदिर के सामने बैठी। वहाँ कोई नहीं था—न ताने मारने वाले रिश्तेदार, न लाचार पति। सिर्फ वो थी और उसका ईश्वर। तब जाकर उसकी आँखों से वो आंसुओं का बांध टूटा जिसे उसने दिन भर अपनी मुस्कान के पीछे रोके रखा था। उसने जी भरकर रोया, अपने मन का सारा गुबार, सारी अपमानजनक बातें, सारी चिंताएं आंसुओं के जरिए बहा दीं।
उसने किसी सहेली को फोन नहीं किया, मायके में माँ को बताकर दुखी नहीं किया। उसने बस उस अदृश्य शक्ति से कहा, "मुझे शक्ति देना कि मैं यह नाटक तब तक कर सकूँ जब तक मेरा पति फिर से अपने पैरों पर खड़ा न हो जाए।"
कुछ महीनों बाद, वंदना की तपस्या रंग लाई। आलोक को एक बड़ी कंपनी के साथ साझेदारी मिल गई। धीरे-धीरे हालात सुधरने लगे। गिरवी रखे गहने वापस आ गए।
अगली दिवाली पर जब वंदना ने वही भारी हार पहनकर घर की पूजा की, तो शिखा भाभी और बुआ जी की आँखें फटी रह गईं।
"अरे वंदना, बड़ी चमक रही हो। लगता है अक्ल आ गई, कंजूसी छोड़ दी?" बुआ जी ने फिर तंज कसा।
वंदना सिर्फ मुस्कुरा दी। उसने आलोक की तरफ देखा, जो गर्व से उसे देख रहा था। दोनों की आँखों में एक समझदारी थी। उन्होंने कभी किसी को नहीं बताया कि पिछले दो साल उन्होंने किस नर्क में गुजारे थे।
उस दिन वंदना को समझ आ गया था कि उसने जो चुप्पी साधी थी, उसी ने उसके घर के सम्मान को कवच बनकर बचाया था। अगर वह उस दिन रो-धोकर सबको सच बता देती, तो आज लोग उसकी सफलता पर ताली बजाने के बजाय, उसके बुरे वक्त के किस्से चटकारे लेकर सुना रहे होते।
दर्द का सबसे अच्छा साथी एकांत होता है। जब आप अपनी लड़ाई अकेले लड़ते हैं और जीतते हैं, तो वो जीत शोर मचाती है, आपको शोर मचाने की ज़रूरत नहीं पड़ती। वंदना ने सीख लिया था कि दुनिया के सामने आंसू बहाने से आप 'कमज़ोर' कहलाते हैं, और अकेले में आंसू बहाकर दुनिया के सामने मुस्कुराने से आप 'अपराजेय' बन जाते हैं।
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