गाड़ी का हॉर्न बजते ही रिया की धड़कनें तेज हो गईं। खिड़की से बाहर का जाना-पहचाना मंज़र उसे बता रहा था कि उसका स्टेशन आने वाला है। 'कानपुर सेंट्रल'—यह सिर्फ एक स्टेशन नहीं था, यह उसके बचपन, उसकी जवानी और उसकी सबसे खूबसूरत यादों का प्रवेश द्वार था। यह उसका मायका था।
शादी के तीन साल बाद रिया आज पहली बार अकेले अपने मायके आ रही थी। इससे पहले जब भी आई, पति के साथ आई, तो रस्मो-रिवाज़ और मेहमाननवाजी में वक्त कैसे बीत जाता, पता ही नहीं चलता था। लेकिन इस बार वह 'छुट्टी' मनाने आई थी। वह फिर से वही पुरानी रिया बनना चाहती थी जो पूरे घर में धमाचौकड़ी मचाती थी।
सबसे ज्यादा उसे इंतज़ार था अपनी भाभी, 'सुमन' से मिलने का। सुमन और रिया का रिश्ता ननद-भाभी का कम और सहेलियों का ज्यादा था। रिया की शादी से दो साल पहले भैया की शादी हुई थी। उन दो सालों में रिया और सुमन ने एक ही कमरे में न जाने कितनी रातें जागकर बिताई थीं। मैगी बनाना, छत पर जाकर पापड़ सुखाना, और मम्मी की डांट से एक-दूसरे को बचाना—यह सब उनकी रोजमर्रा की जिंदगी थी।
रिया ने अपना बैग उठाया और ऑटो कर लिया। घर की गली में घुसते ही उसका मन मयूर नाचने लगा। वही पुराना नीम का पेड़, वही गुप्ता अंकल की दुकान। ऑटो घर के गेट पर रुका।
रिया ने घंटी बजाई।
दरवाजा खुला। सामने सुमन खड़ी थी।
"अरे रिया दीदी! नमस्ते!" सुमन ने झुककर रिया के पैर छुए।
रिया ठिठक गई। पैर छुए? शादी के बाद जब वह पति के साथ आती थी, तब यह रस्म समझ आती थी। पर आज? आज तो वह अकेले आई थी, अपनी सखी के पास। रिया ने उसे गले लगाना चाहा, लेकिन सुमन ने बड़ी विनम्रता से उसका बैग अपने हाथ में ले लिया।
"दीदी, आप थक गई होंगी। आइए, अंदर आइए। मम्मी जी! देखिए रिया दीदी आ गई हैं," सुमन ने आवाज लगाई।
रिया अंदर दाखिल हुई। घर वही था, दीवारें वही थीं, लेकिन हवा में कुछ बदला-बदला सा था। माँ ने आकर उसे गले लगाया और प्यार किया।
"जा सुमन, दीदी के लिए ठंडा पानी और शर्बत ले आ। बेचारी धूप से आई है," माँ ने कहा।
रिया सोफे पर बैठ गई। उसे उम्मीद थी कि सुमन उसके बगल में धम्म से बैठेगी और पूछेगी, "कैसा रहा सफर? और जीजा जी ने आने कैसे दिया?" जैसा वो पहले फोन पर पूछा करती थी।
लेकिन सुमन ट्रे लेकर आई। उसने ट्रे टेबल पर रखी और बहुत सलीके से पानी का गिलास रिया की तरफ बढ़ाया।
"लीजिए दीदी, पानी पीजिए। मैं आपके लिए नाश्ता लगाती हूँ। आप फ्रेश हो जाइए, गेस्ट रूम तैयार कर दिया है।"
'गेस्ट रूम?'
रिया के कान खड़े हो गए। "सुमन, गेस्ट रूम क्यों? मैं तो अपने कमरे में ही रुकूँगी ना। वही मेरा और तुम्हारा पुराना अड्डा।"
सुमन ने एक औपचारिक मुस्कान दी। "अरे नहीं दीदी, उस कमरे में अब बच्चों का सामान रहता है और एसी भी ठीक से काम नहीं कर रहा। गेस्ट रूम में सब नया लगवाया है, आपको आराम रहेगा। आप मेहमान हैं, आपको तकलीफ थोड़ी न होने देंगे।"
'मेहमान'।
यह शब्द रिया के दिल में किसी काँटे की तरह चुभ गया। वह चुपचाप उठकर गेस्ट रूम में चली गई। कमरा वाकई बहुत सुंदर सजाया गया था। नए परदे, नई चादरें, फूलों का गुलदस्ता। बिल्कुल किसी होटल जैसा। लेकिन उसमें रिया की वो पुरानी किताबें, वो दीवार पर चिपकाए हुए पोस्टर्स नहीं थे। सब कुछ इतना व्यवस्थित था कि रिया को अपना सामान रखने में भी डर लग रहा था कि कहीं तह न बिगड़ जाए।
दोपहर के खाने पर मेज तरह-तरह के पकवानों से भरी थी। शाही पनीर, दाल मखनी, रायता, पुलाव, दो तरह की मिठाइयां। रिया को याद आया कि उसे तो बस अरहर की दाल और आलू की भुजिया पसंद थी।
"अरे भाभी, इतना सब बनाने की क्या जरूरत थी? मैं तो बस खिचड़ी खा लेती," रिया ने कहा।
सुमन, जो खुद खाने नहीं बैठी थी बल्कि रिया को परोस रही थी, बोली, "ऐसे कैसे दीदी? आप इतने दिन बाद आई हैं। ससुराल में जाकर क्या कहेंगी कि मायके वालों ने सूखी दाल खिला दी? आप खाइए ना, ये पनीर लीजिए।"
रिया खाना खा रही थी, लेकिन उसे स्वाद नहीं आ रहा था। उसे वो दिन याद आ रहे थे जब वह और सुमन एक ही थाली में खाना खाते थे और आखिरी गुलाब जामुन के लिए लड़ते थे। आज सुमन उसके पास कुर्सी खींचकर बैठी भी नहीं थी, बस एक कुशल वेटर की तरह खड़ी थी कि कहीं किसी चीज़ की कमी न हो जाए।
शाम को रिया ने सोचा कि किचन में जाकर चाय बनाती है। उसे सुमन के हाथ की अदरक वाली चाय की बहुत तलब थी, लेकिन वह चाहती थी कि दोनों मिल कर बनाएं।
जैसे ही रिया ने किचन में कदम रखा, सुमन दौड़ती हुई आई।
"अरे दीदी! आप यहाँ क्या कर रही हैं? हटिए, हटिए। आपके कपड़े गंदे हो जाएंगे। आप जाकर हॉल में टीवी देखिए, मैं अभी चाय-नाश्ता लेकर आती हूँ।"
"सुमन, मैं बस मदद..."
"नहीं-नहीं दीदी, आप मेहमान हैं। अब आप इस घर की बेटी से ज्यादा 'दामाद जी की अमानत' हैं। अगर आपको काम करते हुए देख लिया तो मम्मी जी मुझे डांटेंगी और समाज वाले कहेंगे कि ननद से काम करवा रही है। प्लीज, आप बाहर बैठिए।"
रिया को किचन से बाहर लगभग धकेल दिया गया। वह हॉल में आकर बैठ गई। उसका मन भारी हो रहा था। यह वही घर था जहाँ उसने झाड़ू-पोछा किया था, जहाँ उसने रोटियां बेलना सीखा था। आज उसे पानी की बोतल उठाने के लिए भी मना किया जा रहा था।
दो दिन बीत गए।
इन दो दिनों में रिया को 'राजकुमारी' की तरह रखा गया। उसे सुबह बेड टी मिलती, नहाने के लिए गरम पानी तैयार मिलता, उसके मैले कपड़े तुरंत धो दिए जाते। लेकिन इन सब सुविधाओं के बीच रिया का दम घुट रहा था।
वह सुमन से बात करने के लिए तरस गई थी। जब भी वह सुमन से बात करने की कोशिश करती, सुमन बहुत ही नपी-तुली बातें करती—"ससुराल में सब कैसे हैं?", "मौसम कैसा है?", "आपको और कुछ चाहिए तो नहीं?"
वह हंसी-मजाक, वह बेबाकी, वह चुगली... सब गायब था। सुमन अब एक 'आदर्श भाभी' बन चुकी थी, जिसने अपनी 'ननद' को सिर आँखों पर बिठा रखा था, लेकिन अपनी 'सहेली' को कहीं दफना दिया था।
तीसरे दिन की बात है। दोपहर का समय था। माँ मंदिर गई हुई थीं और भैया ऑफिस में थे। रिया को अपने पुराने ट्रंक की याद आई जो स्टोर रूम में रखा था। उसमें उसकी पुरानी डायरी और कुछ खिलौने थे।
रिया स्टोर रूम की तरफ बढ़ी। वहां धूल काफी थी। उसने अपना ट्रंक खोला और पुरानी यादों में खो गई। उसके हाथ धूल से सन गए।
तभी सुमन वहां आ गई। रिया को धूल में बैठा देख वह घबरा गई।
"हे भगवान! दीदी, ये आप क्या कर रही हैं? यह गंदी जगह है। देखिए आपके हाथ कितने काले हो गए। चलिए बाहर चलिए, मैं यह सब साफ़ करवा दूंगी।"
सुमन ने रिया के हाथ से पुरानी गुड़िया लेने की कोशिश की।
रिया का सब्र अब टूट गया। उसने झटके से अपना हाथ खींच लिया।
"बस करो सुमन! बस करो!" रिया चिल्लाई। उसकी आँखों से आंसू बह निकले।
सुमन सन्न रह गई। "क्या हुआ दीदी? मैंने कुछ गलत कह दिया क्या?"
"हाँ! सब कुछ गलत है," रिया सिसकते हुए बोली। "मैं यहाँ अपनी माँ और अपनी दोस्त से मिलने आई थी, किसी फाइव स्टार होटल में रुकने नहीं आई थी। जब से आई हूँ, देख रही हूँ कि तुम मेरे आगे-पीछे घूम रही हो। 'दीदी ये लीजिए', 'दीदी वो मत कीजिए'। क्यों सुमन? मैं मेहमान हूँ क्या?"
सुमन ने अपनी नज़रें झुका लीं। "दीदी, आप शादीशुदा हैं। अब यह आपका घर नहीं रहा, आपका घर वो है। यहाँ तो हमारा फर्ज़ है कि आपकी खातिरदारी करें।"
रिया आगे बढ़ी और उसने सुमन के कंधे पकड़कर उसे झकझोरा।
"किसने कहा यह मेरा घर नहीं है? क्या शादी होते ही लड़कियों का डीएनए बदल जाता है? क्या सात फेरे लेते ही इस घर की ईंटों से मेरा नाम मिट गया? सुमन, तुम तो मेरी सबसे अच्छी दोस्त थी। हम घंटों बातें करते थे। आज तुम मुझसे ऐसे बात कर रही हो जैसे मैं कोई इनकम टैक्स ऑफिसर हूँ जो रेड मारने आई है।"
सुमन की आँखों में भी नमी आ गई, लेकिन वह चुप रही।
रिया ने आगे कहा, "मुझे वो शाही पनीर नहीं चाहिए सुमन, मुझे वो जली हुई रोटियां चाहिए जो तुम पहली बार खाना बनाते वक्त बनाती थी और हम दोनों हंस-हंस कर खाते थे। मुझे यह गेस्ट रूम का एसी नहीं चाहिए, मुझे उस उमस भरे कमरे में तुम्हारे साथ लेटकर बातें करनी हैं। तुमने मुझे इतना सम्मान देकर मुझसे मेरा 'अधिकार' छीन लिया है। मैं ननद बाद में हूँ, पहले इस घर की बेटी और तुम्हारी सहेली हूँ। क्या भाभी बनते ही तुमने मुझे पराया कर दिया?"
कमरे में सन्नाटा छा गया। सिर्फ रिया की सिसकियों की आवाज आ रही थी।
सुमन धीरे से जमीन पर बैठ गई। उसने अपना पल्लू मुंह पर रखा और रोने लगी।
"दीदी, मैं पराया नहीं करना चाहती थी," सुमन ने रोते हुए कहा। "पर मुझे डर लगता है।"
"डर? किस बात का डर?" रिया ने भी उसके पास जमीन पर बैठते हुए पूछा।
सुमन ने आंसू पोंछते हुए कहा, "जब मेरी शादी हुई थी, तो मेरी ननद जब घर आई थीं, तो मैंने उनसे वैसे ही बात की जैसे मैं अपनी बहन से करती थी। मैंने उनसे कह दिया था कि 'दीदी पानी खुद ले लीजिए'। इस बात पर मेरी सास ने मुझे बहुत डांटा था। उन्होंने कहा था कि भाभी कामचोर है, ननद से काम करवाती है। समाज वाले ताने मारते हैं कि भाभी आते ही ननद की कद्र कम हो गई। मुझे लगा... अगर आपसे काम करवाया या आपको वो वी.आई.पी. ट्रीटमेंट नहीं दिया, तो आपको लगेगा कि भाभी बदल गई है। आपको लगेगा कि अब मेरी इस घर में नहीं चलती। मैं बस... मैं बस एक 'अच्छी भाभी' बनने की कोशिश कर रही थी।"
रिया अवाक रह गई। उसे एहसास हुआ कि सुमन की यह औपचारिकता उसके अहंकार की वजह से नहीं, बल्कि उसके डर और समाज के बनाए खोखले नियमों की वजह से थी। सुमन अपने रिश्ते को बचाने के लिए ही यह दीवार खड़ी कर रही थी।
रिया ने सुमन को गले लगा लिया। दोनों सहेलियां उस धूल भरे स्टोर रूम में बैठकर रोती रहीं। उन आंसुओं ने उनके बीच जमी 'रिश्तेदारी' की धूल को धो दिया।
"सुमन," रिया ने आंसू पोंछते हुए कहा, "भाड़ में गया समाज और भाड़ में गए नियम। मैं तुम्हारी सास नहीं हूँ जो तुम्हें जज करूँगी। और तुम मेरी नौकरानी नहीं हो जो मेरी सेवा करोगी। आज के बाद अगर तुमने मुझे 'आप' कहा या पानी का गिलास ट्रे में लाकर दिया, तो मैं सच में कभी वापस नहीं आऊंगी।"
सुमन के चेहरे पर एक हल्की मुस्कान आई। "तो क्या करूँ?"
"तो यह करो," रिया ने अपनी पुरानी गुड़िया उठाई, "कि अभी चलो किचन में। तुम चाय बनाओगी और मैं पकौड़े तलूँगी। और हाँ, आज रात का खाना भी हम दोनों मिलकर बनाएंगे। और वो गेस्ट रूम में मैं नहीं सोने वाली। आज गद्दे ज़मीन पर लगेंगे और पूरी रात बातें होंगी। मंजूर?"
सुमन खिलखिलाकर हंस पड़ी। "मंजूर!"
तभी दरवाज़े पर माँ खड़ी दिखाई दीं। उन्होंने शायद उनकी बातें सुन ली थीं। उनकी आँखों में भी संतोष के आंसू थे।
"चलो, अच्छा हुआ। मुझे तो लगा था कि मेरी बेटी मेहमान बनकर आई है, पर अब लग रहा है कि मेरी 'पागल' बेटी वापस आ गई है," माँ ने हंसते हुए कहा।
उस शाम घर का नज़ारा बदल गया था।
डाइनिंग टेबल पर अब सलीके से सजी प्लेटें नहीं थीं। रिया और सुमन किचन के स्लैब पर ही बैठकर चाय पी रही थीं और पकौड़े खा रही थीं। रिया ने अपने हाथ से सुमन को खिलाया और सुमन ने रिया की झूठी चाय पी।
भैया जब ऑफिस से आए, तो उन्होंने देखा कि हॉल में सोफे के कुशन बिखरे पड़े हैं और रिया-सुमन ज़ोर-जोर से हंस रही हैं।
"अरे, क्या हो गया? आज घर में भूकंप आया है क्या?" भैया ने पूछा।
रिया ने तनकर कहा, "हाँ, भूकंप ही समझो। आज मैंने इस घर से एक 'रिश्तेदार' को बाहर निकाल दिया और अपनी 'बहन' को वापस बुला लिया।"
सुमन ने भैया की तरफ देखकर आँख मारी। "और भैया, आज खाने में शाही पनीर नहीं है। आज रिया दीदी ने आलू की भुजिया और परांठे बनाए हैं। खुद खाइए और अपनी प्लेट खुद धोइए, क्योंकि हम दोनों अब लूडो खेलने जा रहे हैं।"
भैया मुस्कुरा दिए। उन्हें भी अपना वो पुराना, हंसता-खेलता घर वापस मिल गया था।
रिया की छुट्टियां खत्म हुईं। वापसी के वक्त जब वह ऑटो में बैठ रही थी, तो सुमन ने इस बार उसके पैर नहीं छुए। उसने रिया को कसकर गले लगाया।
"जल्दी आना रिया," सुमन ने कहा। "दीदी" नहीं, सिर्फ "रिया"।
रिया ने मुस्कुराते हुए कहा, "अब आऊंगी नहीं, धमकूंगी। और अगली बार मेरे लिए वो गेस्ट रूम मत सजाना, वरना वहीं से वापस चली जाऊंगी।"
गाड़ी चल पड़ी। रिया के बैग में अब सिर्फ कपड़े नहीं थे, बल्कि एक सुकून था। उसे पता चल गया था कि रिश्ते खून से नहीं, बल्कि अहसास से बनते हैं। औपचारिकता की दीवारें चाहे कितनी भी ऊँची क्यों न हों, प्यार की एक हथौड़ी उन्हें तोड़ने के लिए काफी है। वह अब मायके की मेहमान नहीं, बल्कि उसी घर की धड़कन थी, और उसकी भाभी, उसकी सबसे प्यारी दोस्त।
**कहानी का संदेश:**
अक्सर हम सम्मान और प्यार के बीच की महीन रेखा को भूल जाते हैं। ननद-भाभी का रिश्ता औपचारिकता का मोहताज नहीं होना चाहिए। भाभी को चाहिए कि ननद को मेहमान नहीं, घर का हिस्सा समझे, और ननद को चाहिए कि वह भाभी के मन में छिपे डर को समझे और उसे दोस्त बनाए। ज्यादा औपचारिकता अक्सर आत्मीयता को मार देती है।
**पाठकों के लिए:**
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