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झूठी ममता की दीवार

 रात के करीब दो बज रहे थे। बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी, लेकिन 'शर्मा विला' के दीवानखाने में जो तूफ़ान उठा था, वह बाहर की बारिश से कहीं ज्यादा भयानक था। कमरे के बीचों-बीच खड़ी अनन्या की आँखों में डर नहीं, बल्कि एक अजीब सी आग थी। उसके सामने उसका पति, कबीर, सिर झुकाए सोफे पर बैठा था। उसके हाथ कांप रहे थे और माथे पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं।


अनन्या के हाथ में एक टूटी हुई नंबर प्लेट थी। उसने उसे टेबल पर पटकते हुए कबीर से पूछा, "कबीर, मेरी आँखों में देखकर सच बताओ। वह एक्सीडेंट तुमसे हुआ है न? न्यूज़ चैनल पर जिस कार का ज़िक्र हो रहा है, वो हमारी ही कार है न?"


कबीर कुछ बोलने ही वाला था कि तभी सीढ़ियों से उतरते हुए गायत्री देवी की भारी आवाज़ गूँजी। वह कबीर की माँ थीं और इस घर की असली मुखिया। उनके चेहरे पर एक सख्त भाव था, जिसे देखकर अच्छे-अच्छों की बोलती बंद हो जाती थी।


"हाँ, हुआ है उससे एक्सीडेंट," गायत्री देवी ने बेरुखी से कहा, जैसे यह कोई मामूली बात हो कि दूध का गिलास गिर गया हो। "रात का अंधेरा था, कबीर को दिखाई नहीं दिया। वो आदमी अचानक सामने आ गया। इसमें मेरे बेटे की क्या गलती?"


अनन्या सन्न रह गई। उसे अपनी सास से ममता की उम्मीद तो थी, लेकिन नैतिकता के इस स्तर तक गिर जाने की उम्मीद नहीं थी।


"माँ जी!" अनन्या की आवाज़ कांपी, "वो आदमी अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा है। और कबीर... कबीर उसे वहीं सड़क पर तड़पता छोड़कर भाग आया? यह गलती नहीं, यह गुनाह है। हमें अभी पुलिस को फोन करना चाहिए।"


अनन्या ने जैसे ही अपना मोबाइल उठाया, गायत्री देवी ने झपट्टा मारकर फोन छीन लिया और उसे सोफे पर फेंक दिया। उनकी आँखों में अंगारे दहक रहे थे।


उन्होंने कबीर के सामने ढाल बनकर खड़े होते हुए अनन्या की ओर उंगली उठाई और वही शब्द कहे जो किसी भी स्वाभिमानी औरत का दिल छलनी कर सकते थे— **"बहु, बेमतलब की जुबान लड़ा रही हो तुम मेरे बेटे से।** वो डरा हुआ है, देख नहीं रही? तुम पत्नी हो उसकी, उसका संबल बनना चाहिए, और तुम उसे जेल भेजने की तैयारी कर रही हो?"


अनन्या ने अविश्वास से अपनी सास को देखा। "माँ जी, मैं जुबान नहीं लड़ा रही, मैं उसे इंसान बनाने की कोशिश कर रही हूँ। आज अगर हमने इसे छुपा लिया, तो कल कबीर की अंतरात्मा मर जाएगी। उस गरीब रिक्शेवाले का क्या कसूर था? उसके भी बच्चे होंगे, उसका भी परिवार होगा।"


"परिवार उसका होगा, लेकिन मुझे अपने परिवार की चिंता है," गायत्री देवी ने कबीर के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा। "कबीर का करियर, हमारी इज्जत, सब मिट्टी में मिल जाएगा। पैसे भिजवा देंगे उस आदमी के घर। बात यहीं खत्म करो। खबरदार जो इस घर की बात बाहर गई।"


कबीर ने धीरे से सिर उठाया। उसकी आँखों में एक पल के लिए पछतावा दिखा, लेकिन माँ का समर्थन पाकर वह फिर से कमजोर पड़ गया। "अनन्या, माँ सही कह रही हैं। पुलिस केस हुआ तो मेरा वीज़ा कैंसिल हो जाएगा। मैं बर्बाद हो जाऊंगा।"


अनन्या को लगा जैसे वह इन दोनों को पहचानती ही नहीं। यह वो कबीर नहीं था जिससे उसने प्यार किया था। यह तो अपनी माँ के पल्लू में छिपा एक कायर इंसान था।


"कबीर," अनन्या ने गहरी सांस ली, "बर्बाद तुम तब नहीं होगे जब तुम सजा काटोगे, बर्बाद तुम आज हो गए हो क्योंकि तुम अपनी गलती मानने से डर रहे हो। और माँ जी, आप... आप अपने बेटे को बचा नहीं रहीं, आप उसे अपाहिज बना रही हैं। ऐसी परवरिश उसे कभी मर्द नहीं बनने देगी।"


गायत्री देवी चिल्लाईं, "बस! बहुत हो गया तुम्हारा भाषण। अगर तुम्हें इस घर में रहना है, तो वही करना होगा जो मैं कहूँगी। वरना यह दरवाजा खुला है।"


कमरे में सन्नाटा छा गया। सिर्फ दीवार घड़ी की टिक-टिक और बाहर बारिश का शोर सुनाई दे रहा था। यह एक फैसला लेने का पल था। एक तरफ ऐशो-आराम की जिंदगी, पति का घर और समाज का दिखावा था। दूसरी तरफ एक गरीब का खून और उसका अपना जमीर था।


अनन्या अपने कमरे में गई। गायत्री देवी के चेहरे पर एक विजयी मुस्कान आ गई। उन्हें लगा कि बहू डर गई, समझ गई कि यहाँ किसकी चलती है। कबीर ने राहत की सांस ली।


लेकिन दस मिनट बाद, अनन्या एक छोटा बैग लेकर नीचे उतरी। उसने न कबीर की तरफ देखा, न गायत्री देवी की तरफ। वह सीधे लैंडलाइन फोन के पास गई।


"क्या कर रही हो?" गायत्री देवी ने चीखकर पूछा।


अनन्या ने रिसीवर उठाया और 100 नंबर डायल किया। "हेलो, पुलिस स्टेशन? मैं अनन्या बोल रही हूँ... सेक्टर 4 से। यहाँ एक हिट-एंड-रन केस की जानकारी देनी है। गाड़ी मेरे घर के गैराज में खड़ी है।"


फोन रखते ही उसने देखा कि कबीर जमीन पर बैठ गया था और गायत्री देवी पत्थर की मूरत बन गई थीं।


अनन्या दरवाजे की ओर बढ़ी। गायत्री देवी ने पीछे से दहाड़ा, "अगर आज तुमने यह चौखट पार की, तो इस घर के लिए तुम मर गई हो। सोच लेना, सड़क पर आ जाओगी।"


अनन्या रुकी। उसने मुड़कर अपनी सास की आँखों में देखा और शांत स्वर में कहा, "माँ जी, सड़क पर तो मैं तब आ गई थी जब मैंने देखा कि इस आलीशान घर में इंसान नहीं, बुजदिल रहते हैं। मैं उस घर में नहीं रह सकती जहाँ की दीवारों में किसी के खून की गंध हो। आप अपने बेटे को बचा लीजिए, मैं अपने जमीर को बचाना चाहती हूँ।"


अनन्या बारिश में बाहर निकल गई। पीछे 'शर्मा विला' अपनी तमाम भव्यता के साथ खड़ा था, लेकिन उसके अंदर का सम्मान आज ढह चुका था।


अगले दिन अखबारों में कबीर की गिरफ्तारी की खबर थी। समाज ने थू-थू की, लेकिन अनन्या ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उसने एक छोटे से स्कूल में नौकरी की, अकेले दम पर जिंदगी शुरू की।


सालों बाद, जब कबीर जेल से रिहा होकर घर आया, तो उसने देखा कि घर वीरान पड़ा था। गायत्री देवी अब बहुत बूढ़ी और कमजोर हो चुकी थीं। वह अपने बेटे को देखकर रो पड़ीं। "मैंने तुझे बचाने की कोशिश की थी बेटा।"


कबीर ने कड़वाहट से कहा, "नहीं माँ, आपने मुझे बचाया नहीं। अगर उस रात अनन्या ने मुझे नहीं रोका होता, या आपने मुझे सही रास्ता दिखाया होता, तो शायद मैं कुछ साल जेल में रहता लेकिन खुद की नज़रों में नहीं गिरता। आज मैं आजाद हूँ, लेकिन मेरे पास न पत्नी है, न इज्जत, और न ही खुद पर भरोसा। आपकी उस झूठी ममता ने मेरा सब कुछ छीन लिया।"


कबीर की बात सुनकर गायत्री देवी को उस तूफानी रात की याद आ गई। उन्हें अनन्या के शब्द याद आए— *'आप उसे अपाहिज बना रही हैं।'* आज उन्हें समझ आया कि बेटे के गुनाह पर पर्दा डालना ममता नहीं, बल्कि उसके भविष्य की हत्या थी।


दूर कहीं अनन्या अपनी बेटी को पढ़ा रही थी, "बेटा, गलती करना बुरा नहीं है, लेकिन गलती को न मानना सबसे बड़ी बुराई है।"


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**क्या आपको लगता है कि एक माँ होने के नाते गायत्री देवी का फर्ज अपने बेटे को बचाना था, या उसे सही रास्ते पर लाना? क्या अनन्या ने परिवार तोड़कर सही किया? अपने विचार कमेंट में जरूर लिखें।**


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