सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

व्यापार सिर्फ मुनाफे का नाम नहीं है

 कांच के विशाल केबिन के बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी, लेकिन केबिन के अंदर का माहौल बाहर के तूफ़ान से कहीं ज्यादा भयानक था। मेज़ पर रखी 'प्रोजेक्ट विहान' की फाइल हवा के झोंके से फड़फड़ा रही थी, जिसे अभी-अभी कमरे में दाखिल हुए बुजुर्ग चेयरमैन, मिस्टर दीनानाथ खन्ना ने ज़ोर से मेज़ पर पटका था। उनकी आँखों में वही आग थी जो चालीस साल पहले हुआ करती थी, जब उन्होंने इस 'खन्ना टेक्सटाइल्स' की नींव रखी थी। लेकिन आज वह आग अपनी ही खून, अपनी ही बेटी के खिलाफ़ भड़क रही थी।

"तुम्हारे पैरों के नीचे ज़मीन होनी चाहिए थी, पर लगता है कि सीईओ की कुर्सी ने तुम्हें हवा में उड़ा दिया है। मुझसे सलाह किए बिना तुमने 'रॉयल हेरिटेज' मिल को बेचने का फैसला कैसे ले लिया? जिन बुनकरों ने मेरे साथ मिलकर इस कंपनी को खड़ा किया, उनके पेट पर लात मारने से पहले तुम्हारे हाथ नहीं कांपे?"

दीनानाथ की आवाज़ इतनी गूँजदार थी कि बाहर बैठे स्टाफ ने अपनी सांसें थाम लीं। सामने खड़ी थी तान्या, जो अब कंपनी की कमान संभाल रही थी। उसके चेहरे पर डर नहीं, बल्कि एक अजीब सी थकान और दृढ़ता का मिला-जुला भाव था। उसने अपने पिता की आँखों में आँखें डालकर देखने की हिम्मत जुटाई।

"पापा, इसमें इतना भावुक होने की क्या बात है? यह एक बिज़नेस डिसीजन है। वह मिल अब सिर्फ़ घाटा दे रही है। पिछले तीन साल की बैलेंस शीट देखिए। हम पुरानी मशीनों और पुराने तरीकों को कब तक ढोते रहेंगे? हमें मार्केट में बने रहने के लिए ऑटोमेशन की ज़रूरत है, और उसके लिए फंड्स चाहिए। हेरिटेज मिल को बेचकर जो पैसा आएगा, उससे हम नई यूनिट लगा सकते हैं। मैंने वही किया जो कंपनी के भविष्य के लिए सही था।"

तान्या ने अपनी बात सधे हुए शब्दों में कही, लेकिन उसकी आवाज़ में वह अपनापन नदारद था जो एक बेटी का पिता के लिए होता है; वहाँ सिर्फ़ एक कॉर्पोरेट लीडर की ठंडी दलीलें थीं।

"भविष्य?" दीनानाथ ने व्यंग्य से दोहराया। "तुम इसे भविष्य कहती हो? अपनी जड़ों को काटकर कोई पेड़ कभी हरा नहीं रह सकता, तान्या। वह मिल सिर्फ़ ईंट-पत्थर नहीं है, वह इस कंपनी की आत्मा है। वहाँ काम करने वाले रघुकका, शंभू... उन्होंने तुम्हें गोद में खिलाया है। आज तुम विदेश से एमबीए करके आ गई हो, तो तुम्हें उनका पसीना बदबूदार लगता है? तुम्हें लगता है कि तुम मुझसे ज़्यादा समझदार हो गई हो?"

दीनानाथ का चेहरा गुस्से से लाल पड़ गया था। उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि जिस बेटी को उन्होंने उंगली पकड़कर चलना सिखाया, आज वह उन्हें ही व्यापार का ककहरा पढ़ा रही है। उनके लिए यह सिर्फ़ एक सौदा नहीं था, यह उनके अस्तित्व पर हमला था। उन्हें लगा कि उनकी बेटी ने उनकी विरासत का नहीं, बल्कि उनके विश्वास का सौदा कर दिया है।

"पापा, प्लीज़! यह 1980 का दशक नहीं है," तान्या अब थोड़ा ऊँची आवाज़ में बोली, उसका धैर्य जवाब दे रहा था। "आप जज़्बातों से बिज़नेस चलाते थे, मैं आंकड़ों से चलाती हूँ। और हाँ, मैंने आपसे इसलिए नहीं पूछा क्योंकि मुझे पता था कि आप कभी राज़ी नहीं होंगे। आप अतीत में जी रहे हैं, और मैं कंपनी को डूबते हुए नहीं देख सकती। मुझे बोर्ड ने अथॉरिटी दी है फैसले लेने की।"

"अपनी हद मत भूलो, तान्या!"

दीनानाथ चिल्लाए। उनका हाथ हवा में लहराया और मेज़ पर रखा क्रिस्टल का भारी पेपरवेट उन्होंने पूरी ताकत से दीवार की तरफ दे मारा। कांच के टकराने और टूटने की तेज़ आवाज़ ने कमरे में सन्नाटा खींच दिया। पेपरवेट दीवार से टकराकर चकनाचूर हो गया था, ठीक वैसे ही जैसे उस पल दीनानाथ का दिल हुआ था। यह हिंसा शारीरिक नहीं थी, लेकिन उस वार की गूँज तान्या के आत्मसम्मान पर किसी थप्पड़ से कम नहीं थी।

कमरे के कोने में कंपनी के पुराने वफादार मैनेजर, मिस्टर गुप्ता खड़े थे। उनके हाथ में पानी की बोतल थी, जो अब कांप रही थी। वह इस परिवार को टूटते हुए देख रहे थे, लेकिन उनके मुँह से एक शब्द नहीं निकला। गुप्ता जी जानते थे कि आज जो हो रहा है, वह सिर्फ़ एक मिल का सौदा नहीं, बल्कि दो पीढ़ियों की सोच का टकराव है। उनके चेहरे पर एक असहायता थी, लेकिन आँखों में एक चमक भी थी—शायद वह जानते थे कि जो होने वाला है, वह अनिवार्य था।

तान्या अपनी जगह से हिली नहीं। पेपरवेट का एक छोटा सा टुकड़ा छिटककर उसके पैरों के पास आ गिरा था। उसने उस टुकड़े को देखा, फिर धीरे से नज़रें ऊपर उठाईं। उसकी आँखों में अब नमी थी, लेकिन उसने उसे बहने नहीं दिया।

"आप सही कह रहे हैं पापा," तान्या ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा। "मैंने हद पार कर दी। शायद मुझे आपको सब कुछ पहले ही बता देना चाहिए था।"

दीनानाथ अभी भी अपनी सांसों को काबू करने की कोशिश कर रहे थे। उन्हें लगा कि तान्या अब माफ़ी मांगेगी, सौदा रद्द करेगी। उन्हें अपनी जीत का अहसास होने लगा था। आखिर पिता तो पिता होता है।

तान्या अपनी मेज़ की दराज़ की तरफ बढ़ी। उसने एक पुरानी, पीली पड़ चुकी फाइल निकाली और दीनानाथ के सामने रख दी।

"यह क्या है?" दीनानाथ ने रूखेपन से पूछा।

"यह उस कर्ज के कागज़ात हैं जो आपने 'रॉयल हेरिटेज' मिल को गिरवी रखकर लिया था, पापा। दस साल पहले," तान्या की आवाज़ अब पत्थर की तरह सख्त थी। "जिसे आपने कभी किसी को नहीं बताया। न माँ को, न मुझे, न बोर्ड को। उस समय जुए में हारी गई रकम चुकाने के लिए आपने मिल के कागज़ बाज़ार में रख दिए थे।"

दीनानाथ के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। उनका गुस्सा, उनका अहंकार, सब एक पल में धुएं की तरह उड़ने लगा। वह फाइल को अविश्वास से देख रहे थे।

तान्या ने जारी रखा, "अगले हफ्ते बैंक नीलामी करने वाला था, पापा। वे सिर्फ़ मिल नहीं बेचते, वे आपकी साख, आपका नाम और यह पूरी कंपनी ले लेते। मैंने जिस 'सौदा' की बात की, वह मिल को बेचना नहीं था। मैंने अपनी पर्सनल सेविंग्स और कुछ इनवेस्टर्स से उधार लेकर उस कर्ज को चुकाया है। मैंने मिल को 'बेचा' नहीं, बल्कि उसे दोबारा 'खरीदा' है, ताकि आपके वो रघुकका और शंभू सड़क पर न आ जाएं।"

दीनानाथ का शरीर सुन्न पड़ गया। वह कुर्सी पर धम्म से बैठ गए। जिस बेटी पर उन्होंने अभी-अभी स्वार्थी होने और जड़ें काटने का आरोप लगाया था, असल में वही उन जड़ों को सींच रही थी। जिसे वह 'आधुनिकता की आंधी' समझ रहे थे, वह असल में उनकी विरासत को बचाने के लिए ढाल बनकर खड़ी थी।

मिस्टर गुप्ता ने धीरे से सिर झुकाया और कमरे से बाहर निकल गए, मानो वह इस पिता-पुत्री के बीच के इस नग्न सत्य के साक्षी अब और नहीं बन सकते थे।

दीनानाथ की नज़रें तान्या से मिल नहीं पा रही थीं। उन्हें वह कांच का पेपरवेट याद आया जिसे उन्होंने अभी तोड़ा था। वह पेपरवेट नहीं था, वह उनका अपना भ्रम था जो चकनाचूर हो गया था।

"तुमने... तुमने मुझे बताया क्यों नहीं?" दीनानाथ की आवाज़ अब कांप रही थी, उसमें गुस्सा नहीं, एक पराजित पिता का स्वर था।

"क्योंकि मैं आपकी नज़रों में वह हीरो बना रहना देना चाहती थी, जो आप मेरे बचपन में थे," तान्या ने रुंधे गले से कहा। "मैं नहीं चाहती थी कि आपको यह लगे कि आप फेल हो गए। आपने कहा न, मैं अपनी हद भूल गई हूँ? शायद मैं भूल गई थी कि एक बेटी का फ़र्ज़ सिर्फ़ आज्ञा मानना नहीं, बल्कि कभी-कभी पिता के सम्मान को बचाने के लिए कड़वे घूँट पीना भी होता है।"

कमरे में अब सिर्फ़ एसी की सनसनाहट और बाहर गिरती बारिश की आवाज़ थी। दीनानाथ ने कांपते हाथों से पानी का गिलास उठाया, लेकिन वह उनके होठों तक पहुँचने से पहले ही छलक गया। उन्हें समझ आ गया था कि आज इस कमरे में कद किसका बड़ा था। उम्र और तजुर्बे का नहीं, बल्कि त्याग और समझदारी का।

उन्होंने उठकर तान्या के पास जाने की कोशिश की, उसे गले लगाना चाहा, माफ़ी मांगनी चाही, लेकिन शब्द हलक में अटक गए। तान्या ने अपनी फाइल उठाई, अपने आंसू पोंछे और बिना कुछ कहे केबिन के दरवाज़े की ओर बढ़ गई।

जाते-जाते वह रुकी नहीं, उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

दीनानाथ उस खाली कुर्सी को देखते रह गए जहाँ अभी वह बैठी थी। उन्हें एहसास हुआ कि आज उन्होंने अपनी बेटी को नहीं, बल्कि अपने उस अहंकार को खो दिया है जिसने उन्हें सालों से अंधा कर रखा था। बाहर बिजली कड़की, और उस चमक में उन्हें मेज़ पर बिखरे कांच के टुकड़े नज़र आए। हर टुकड़ा चीख-चीख कर कह रहा था कि कभी-कभी जो हमें 'विद्रोह' लगता है, वह असल में 'बलिदान' होता है।

कमरे में गहरा सन्नाटा पसर गया, एक ऐसा सन्नाटा जो शोर से ज़्यादा भारी था, जिसमें अफ़सोस की गूंज अनंत थी।


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

विरासत का सौदा और एक बेटे का फर्ज

  "बहु अभी तक वापस नहीं आई? सुबह के दस बज रहे हैं और घर में नाश्ते का कोई अता-पता नहीं है। उसे मायके गए हुए दो दिन हो गए, क्या उसे याद नहीं कि उसका एक ससुराल भी है?" दीनानाथ जी ने अखबार को सोफे पर पटकते हुए अपनी पत्नी सरोज से कहा। उनकी आवाज में जो तल्खी थी, वह भूख से ज्यादा अहम की थी। सरोज जी ने रसोई से झांकते हुए दबी जुबान में कहा, "अजी सुनिए, वो कल रात ही आने वाली थी, लेकिन उसकी माँ की तबीयत अचानक ज्यादा खराब हो गई। इसलिए रुक गई। अभी सुमित गया है उसे लेने।" "तबीयत! अरे, यह अमीरों की बीमारियां कभी खत्म नहीं होतीं। जब देखो बीपी, शुगर, घबराहट... यह सब बहाने हैं। असली बात यह है कि उस लड़की का मन इस घर में लगता ही नहीं। उसे अपने बाप के उस आलीशान बंगले की आदत जो पड़ी है," दीनानाथ जी बड़बड़ाए। तभी दरवाजे पर गाड़ी रुकने की आवाज आई। सुमित और उसकी पत्नी, मेधा, घर में दाखिल हुए। मेधा की आँखें सूजी हुई थीं, जैसे वह बहुत रोई हो। सुमित का चेहरा भी गंभीर था। दीनानाथ जी ने मेधा को देखते ही ताना मारा, "आ गई महारानी? चलो शुक्र है, दो दिन बाद ही सही, ससुराल की याद तो ...

गृह प्रवेश

  “मैं मम्मी को नहीं बताऊंगी… मैं खुद ही सामना करूंगी।” यह सोचकर स्नेहा ने अपने आंसू पोंछे। चेहरे पर मजबूती का नकाब चढ़ाया और मां के घर की तरफ निकल गई। पिता के बरसी-पूजन का काम था। रिश्तेदार आए हुए थे, घर में भीड़ थी, और हर चेहरे पर सहानुभूति—लेकिन स्नेहा के भीतर एक और ही उथल-पुथल चल रही थी। पूजा में बैठी वह मंत्र तो सुन रही थी, पर कान बार-बार पिछले दो दिनों की उन बातों पर अटक जाते—जिन्होंने उसे अंदर से तोड़ दिया था। उसकी सास विमला और पति अभिषेक … दोनों ने इतनी सहजता से उसे “अलग” कर दिया था, मानो वह घर की सदस्य नहीं, किसी काम की सुविधा भर हो। दो दिन पहले जब वह मायके जाने लगी थी, तब विमला जी ने ताना कस दिया था— “हर छोटी बात पर मायके भागना तुम्हारी आदत बन गई है, स्नेहा। शादी के बाद भी मां-बाप की छाया नहीं छोड़ पाई?” और अभिषेक… जिसने हमेशा कहा था “मैं तुम्हारे साथ हूं”—वह भी उस दिन बस इतना बोलकर रह गया था— “मां सही कह रही हैं, स्नेहा… तुम हर चीज़ को दिल पर ले लेती हो।” स्नेहा ने बहस नहीं की थी। बस चुपचाप निकल गई थी। क्योंकि उस वक्त बोलने पर शब्द नहीं, आँसू निकलते। और आँसू उसे कमज़ोर...

सात दिन

“पापा… आज फिर बस छूट गई।”  कृतिका ने बैग फर्श पर पटक दिया। अनिकेत घड़ी की तरफ़ देख कर झल्ला उठा, “अब क्या करूँ मैं? स्कूटर उड़ाकर स्कूल छोड़ूँ तुम्हें? तुम्हारी मम्मी को ही समझ नहीं, टाइम पर तैयार क्यों नहीं करती बच्चों को!” किचन से आती हुई भाप में भी सुमेधा की थकान साफ़ दिख रही थी। गैस पर दाल चढ़ी थी, दूसरे बर्नर पर पराठा, तीसरे पर दूध। टिफ़िन खुले पड़े थे, बोतलें आधी भरी… और बीच में खड़ी वो — एक हाथ से सब्ज़ी हिला रही, दूसरे से रसोई का टाइम पे चलने वाला छोटा अलार्म बंद कर रही थी। “अनिकेत, मैंने तो सब रात में ही सेट कर दिया था,” वो धीमे से बोली, “कृतिका खुद टाइम पर नहीं उठी, तीन बार बुलाया था मैंने…” “अरे, अब सब मेरी बेटी की गलती!” अनिकेत ने ऊँची आवाज़ में कहा, “तुम्हें तो बस बहाना चाहिए। टीचर हो गई हो न, बहुत अक्ल है तुम्हें। पर घर चलाने की अक्ल ज़रा भी नहीं।” बरामदे में बैठे हुए बाबूजी ने चश्मा उतारकर इन्हीं आवाज़ों की तरफ़ देखा। माँ — सुशीला — चौके के दरवाज़े पर आकर खड़ी हो गईं। “रोज़-रोज़ झगड़ा… पड़ोसी क्या सोचते होंगे,” सुशीला बड़बड़ाईं, “पहले के ज़माने में औरतें पाँच-पाँच ब...