सहारनपुर रेलवे स्टेशन के बाहर की वह धूल भरी हवा आज भी वैसी ही थी, जैसी पच्चीस साल पहले थी। बस फर्क इतना था कि तब असीम जी एक युवा दूल्हे के रूप में यहाँ आए थे, आँखों में नए सपने और चेहरे पर एक अजीब सी झिझक लिए। और आज, उनके बालों की सफेदी और चश्मे के मोटे लेंस उनकी उम्र की गवाही दे रहे थे।
असीम जी ने टैक्सी के शीशे से बाहर देखते हुए एक गहरी सांस ली। उनके बगल में बैठीं उनकी पत्नी, अवंतिका, की नज़रों में एक अजीब सी बेचैनी और ख़ुशी का मिला-जुला भाव था। अवंतिका बार-बार अपनी साड़ी के पल्लू को ठीक करतीं और फिर बाहर देखने लगतीं।
"अवंतिका, क्या सोच रही हो?" असीम जी ने धीरे से पूछा।
अवंतिका मुस्कुराईं, पर उनकी आँखों में नमी थी। "यही, कि अगर आज भैया और भाभी का फ़ोन नहीं आया होता, तो क्या हम कभी यहाँ वापस आते? पच्चीस साल... असीम जी, पच्चीस साल बहुत होते हैं एक ज़िद के लिए।"
असीम जी खामोश रहे। वह 'ज़िद' पच्चीस साल पुरानी थी। शादी के कुछ सालों बाद एक पारिवारिक ज़मीन के बंटवारे को लेकर असीम जी की अपने साले, राघव, से ऐसी अनबन हुई कि उन्होंने कसम खा ली थी कि वे दोबारा कभी इस ससुराल की दहलीज़ पर कदम नहीं रखेंगे। अवंतिका ने बहुत कोशिश की, बहुत रोई-धोई, लेकिन असीम जी अपने स्वाभिमान के आगे झुकने को तैयार नहीं थे। यहाँ तक कि बच्चों की शादियों में भी उन्होंने ससुराल वालों को आमंत्रित तो किया, पर खुद कभी वहां नहीं गए।
टैक्सी जैसे ही पुरानी हवेली के सामने रुकी, असीम जी का दिल धड़कने लगा। हवेली का दरवाज़ा फूलों से सजा हुआ था। जैसे ही वे गाड़ी से उतरे, शंख की ध्वनि गूँज उठी।
हवेली के बाहर पूरा खानदान खड़ा था। राघव, जो अब खुद एक बुजुर्ग हो चुके थे, हाथ में फूलों का हार लिए आगे बढ़े। उनकी आँखों से आंसू बह रहे थे। जैसे ही असीम जी सामने आए, राघव ने बिना कुछ कहे उनके गले लगकर छोटे बच्चे की तरह रोना शुरू कर दिया।
"जीजा जी... माफ़ कर दीजिये। बहुत देर कर दी आपने आने में।"
असीम जी का सारा गुस्सा, सारी अकड़ उस एक गले मिलने में पिघल गई। उन्होंने भी राघव की पीठ थपथपाई। तभी घर की महिलाएं आरती की थाली लेकर आईं। अवंतिका की भाभी और ननदों ने उन्हें ऐसे घेरा जैसे आज ही उनकी विदाई होकर आई हो।
भीतर कदम रखते ही नज़ारा किसी उत्सव जैसा था। असीम जी के लिए यह सब बिल्कुल नया था। कोई युवक आकर उनके पैर छूता और कहता, "फूफाजी, मैंने आपकी फोटो देखी थी, आज मिलकर धन्य हो गया।" तो कोई छोटी बच्ची उनका हाथ पकड़कर कहती, "दादाजी, आप हमारे लिए क्या लाए हो?"
घर के आंगन में बिछी सफेद चादरों पर असीम जी को बिठाया गया। छोटे-छोटे बच्चे उनके कुर्ते को खींच रहे थे, कोई उनकी छड़ी लेकर भाग रहा था, तो कोई उनके चश्मे को छूकर देख रहा था। असीम जी, जो शहर के अपने फ्लैट में अक्सर अकेलेपन और सन्नाटे के आदी हो चुके थे, इस शोर में खुद को फिर से ज़िंदा महसूस कर रहे थे।
दोपहर के भोजन का समय हुआ। मेज़ पर सहारनपुर के मशहूर पकवान सजे थे—आम का आचार, उड़द की दाल की कचौड़ियां और गरमा-गरम जलेबियाँ।
राघव ने अपने हाथों से असीम जी की थाली में खाना परोसा। "जीजा जी, याद है आपको? जब आप पहली बार आए थे, तो आपने कहा था कि यहाँ की कचौड़ियां बेमिसाल हैं। आज फिर वही स्वाद है, चखकर देखिये।"
असीम जी ने एक निवाला लिया। स्वाद वैसा ही था, बस उसमें आज 'अपनेपन' का तड़का थोड़ा ज्यादा था।
शाम को जब सूरज ढल रहा था और हवेली के आंगन में मोगरे की खुशबू फैल रही थी, असीम जी बरामदे में एक आराम कुर्सी पर बैठे थे। अवंतिका पास ही खड़ी थीं। उन्होंने देखा कि असीम जी के सिर और कंधों पर कुछ गुलाब की पत्तियां गिरी हुई थीं, जो स्वागत के दौरान उन पर बरसाई गई थीं।
अवंतिका धीरे से पास आईं और बड़े प्यार से उनके सिर से वो पत्तियां हटाने लगीं। असीम जी ने अचानक उनका हाथ पकड़ लिया और अपनी आँखों में एक शरारती चमक लाते हुए बोले, "अवंतिका, अगर मुझे पहले पता होता कि इतने साल नाराज़ रहने के बाद ससुराल में ऐसा भव्य स्वागत होता है, तो मैं पच्चीस साल पहले ही नाराज़ हो गया होता।"
अवंतिका ने पहले तो उन्हें चौंक कर देखा, फिर उनकी आँखों में शरारत समझकर उन्हें कृत्रिम गुस्से से घूरा। "तो क्या... आप फिर से नाराज़ होने का इरादा रखते हैं?"
असीम जी ज़ोर से हँस पड़े। "अरे नहीं बाबा! अब तो यहाँ की मिट्टी की खुशबू ने मुझे कैद कर लिया है।" उनकी हंसी में अवंतिका भी शामिल हो गई। पूरा आंगन उनकी हंसी से गूँज उठा।
रात को जब सब सो गए, असीम जी और राघव देर तक आंगन में बैठकर बातें करते रहे।
"राघव," असीम जी ने कहा, "मैं सालों तक एक झूठे अहंकार की चादर ओढ़े रहा। मुझे लगा कि दूर रहकर मैंने अपनी इज़्ज़त बचा ली, पर सच तो यह है कि मैंने अपनी खुशियाँ खो दी थीं।"
राघव ने उनका हाथ दबाया। "जीजा जी, परिवार में खटास तो आती रहती है, पर उसे सालों तक पालना घाव को नासूर बना देता है। अच्छा हुआ आपने पहल की। देखिये न, आज हमारे बच्चे एक-दूसरे को जान पाए।"
असीम जी ने आसमान की तरफ देखा। चाँद अपनी पूरी चांदनी बिखेर रहा था। उन्हें अहसास हुआ कि रिश्ते कांच के नहीं, बल्कि मिट्टी के घड़े जैसे होते हैं। अगर टूट भी जाएं, तो मेहनत और प्यार के पानी से उन्हें फिर से गढ़ा जा सकता है।
अगले दिन जब उनके वापस जाने का समय आया, तो पूरा घर उदास था। बच्चों ने असीम जी का सामान छिपा दिया था ताकि वे न जा सकें। राघव की पत्नी ने पोटलियों में घर का बना सामान भर-भर कर गाड़ी में रख दिया।
अवंतिका जब अपनी माँ की तस्वीर के सामने खड़ी होकर विदा ले रही थीं, तो उन्हें लगा जैसे वह तस्वीर मुस्कुरा रही हो। असीम जी ने राघव के गले लगकर वादा किया कि अब हर साल यह 'ससुराल यात्रा' ज़रूर होगी।
गाड़ी जैसे ही मुख्य सड़क पर आई, असीम जी ने पीछे मुड़कर उस धुंधली होती हवेली को देखा। उनके दिल का बोझ अब पूरी तरह उतर चुका था। उन्होंने अवंतिका का हाथ थामा और बोले, "घर पहुँचकर सबसे पहले सबको डिनर पर बुलाना है। अब दूरियों का अंत हो गया है।"
अवंतिका ने मुस्कुराकर सिर हिलाया। सहारनपुर की वो गलियां अब उनके लिए सिर्फ़ एक याद नहीं, बल्कि एक नया सवेरा बन चुकी थीं।
प्रिय पाठकों,
अक्सर हमारे परिवारों में भी ऐसी छोटी-छोटी बातें बड़ी दीवारें खड़ी कर देती हैं। हम 'ईगो' और 'स्वाभिमान' के चक्कर में अपनों से दूर हो जाते हैं। लेकिन सच तो यही है कि जब हम झुकते हैं, तभी रिश्तों की ऊँचाई बढ़ती है। असीम जी ने पच्चीस साल बाद जो कदम उठाया, क्या वह हम आज नहीं उठा सकते?
सवाल: क्या आपको भी लगता है कि रिश्तों में 'सॉरी' कहना या झुकना कमज़ोरी नहीं, बल्कि बड़प्पन है? क्या आपके परिवार में भी कोई ऐसी 'ज़िद' है जो दूरियों की वजह बनी हुई है? अपने विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।
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