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अहंकार की ओट और संस्कारों की रोशनी

 ड्राइंग रूम के बेशकीमती सोफे पर बैठी सुलेखा जी के चेहरे पर गुस्से की सुर्खियां साफ देखी जा सकती थीं। हाथ में पकड़ा चाय का कप मेज पर इतनी जोर से रखा गया कि चीनी मिट्टी की उस प्याली में हल्की सी दरार आ गई। सामने खड़े मणिकांत जी थोड़े असहज थे, लेकिन उनके चेहरे पर एक स्थिर शांति थी।


"बस! बहुत हुआ मणिकांत जी। आपने मेरी इकलौती बेटी ईशा की जिंदगी का फैसला इतनी आसानी से ले लिया?" सुलेखा जी ने तल्ख लहजे में कहा। "क्या कमी है मेरी ईशा में? शहर के नामी स्कूल से पढ़ी है, हमारा अपना करोड़ों का कारोबार है, और आपने उसकी शादी किससे तय कर दी? एक मामूली कॉलेज लेक्चरर से! आपको पता भी है मेरी सहेलियों के दामाद क्या करते हैं? किसी का दामाद दुबई में बिजनेस हेड है, तो किसी का अमेरिका में सॉफ्टवेयर इंजीनियर। मैं किटी पार्टी में क्या बताऊंगी कि मेरा दामाद सरकारी कॉलेज में चौक-डस्टर घिसता है?"


मणिकांत जी ने एक गहरी सांस ली। वे अपनी पत्नी के स्वभाव से वाकिफ थे। सुलेखा के लिए दुनिया सिर्फ दिखावे, रुतबे और पैसों के इर्द-गिर्द घूमती थी। उन्होंने आगे बढ़कर सुलेखा के कंधे पर हाथ रखा और बेहद शांत स्वर में बोले, "भाग्यवान... तूने सिर्फ उसकी तनख्वाह देखी है, मैंने उसका वजूद देखा है। लड़का हीरा है, बस अभी जौहरी की नजर से देखना बाकी है तुझे।"


"रखिये अपना दर्शन अपने पास!" सुलेखा जी ने झटक कर हाथ हटा दिया। "शादी तभी होगी जब मैं लड़के से मिल लूंगी और मुझे लगेगा कि वो हमारे स्टैंडर्ड का है।"


शादी की बात आगे बढ़ी। लड़के का नाम था 'आलोक'। आलोक एक मध्यमवर्गीय परिवार से था, सादगी पसंद और अपने सिद्धांतों पर चलने वाला। सुलेखा जी ने मिलने के लिए शहर के सबसे महंगे होटल का चयन किया, ताकि आलोक को उसकी 'औकात' का अहसास कराया जा सके।


आलोक अपनी पुरानी सफेद शर्ट और साधारण पैंट में वहां पहुंचा। सुलेखा जी ने उसे ऊपर से नीचे तक ऐसे देखा जैसे कोई ग्राहक खराब माल को देखता है। पूरे वक्त वे उसे नीचा दिखाने की कोशिश करती रहीं। "मिस्टर आलोक, हमारे घर में नौकरों की भी तनख्वाह शायद आपकी सैलरी से ज्यादा होगी। क्या आप ईशा को वो लाइफस्टाइल दे पाएंगे जो उसे यहाँ मिली है?"


आलोक मुस्कुराया और बहुत ही विनम्रता से बोला, "सुलेखा जी, मैं ईशा को शायद वो सोने के पालने न दे पाऊं, लेकिन मैं उसे वो सुकून और सम्मान जरूर दूंगा जो किसी भी कीमत से नहीं खरीदा जा सकता। बाकी, मणिकांत जी ने मुझ पर भरोसा किया है, मैं उसे कभी टूटने नहीं दूंगा।"


सुलेखा जी को यह सादगी 'गंवारपन' लगी, लेकिन मणिकांत जी की ज़िद के आगे उन्हें झुकना पड़ा। शादी सादगी से तय हुई। सुलेखा जी ने ईशा को बहुत समझाया, "देख लेना ईशा, पछताएगी तू। पैसे के बिना प्यार का चूल्हा नहीं जलता।" पर ईशा अपने पिता की पसंद पर भरोसा कर आलोक के घर चली गई।


शादी के कुछ महीनों बाद तक सुलेखा जी अपनी बेटी के ससुराल नहीं गईं। वे इसे अपनी शान के खिलाफ मानती थीं। लेकिन एक दिन अचानक कुछ ऐसा हुआ जिसने 'आनंद विला' की नींव हिला दी।


मणिकांत जी के बिजनेस पार्टनर ने उनके साथ एक बड़ी धोखाधड़ी की। रातों-रात मणिकांत जी के बैंक खाते फ्रीज हो गए, फैक्टरी पर ताला लग गया और जो आलीशान बंगला सुलेखा जी का गुरूर था, वह नीलामी की कगार पर पहुँच गया। वह 'स्टेटस' जिसे सुलेखा जी ने जीवन भर संजोया था, कांच के महल की तरह बिखर गया।


जिन सहेलियों के सामने सुलेखा जी अपनी रईसी के कसीदे पढ़ती थीं, उनमें से एक भी मदद के लिए आगे नहीं आई। सबके फोन 'बिजी' आने लगे। मणिकांत जी को सदमे के कारण दिल का दौरा पड़ा और वे अस्पताल में भर्ती हो गए। सुलेखा जी के पास अस्पताल का बिल भरने तक के पैसे नहीं थे। वे लाचार खड़ी थीं, उनका अहंकार उनके आंसुओं में बह रहा था।


तभी अस्पताल के गलियारे में आलोक और ईशा दिखाई दिए। आलोक दौड़ता हुआ आया और उसने सुलेखा जी को संभाला।


"माँ जी, आप घबराइए मत। बाबूजी ठीक हो जाएंगे। मैंने डॉक्टर से बात कर ली है," आलोक ने कहा।


सुलेखा जी ने रुंधे गले से कहा, "बेटा, बहुत बड़ा बिल है। मेरी सारी साख खत्म हो गई है। मैं कहाँ से पैसे लाऊंगी?"


आलोक ने बिना कुछ कहे अपने बैग से कुछ कागज़ निकाले। "माँ जी, ये मेरी पाँच साल की सेविंग्स और मेरे गाँव की पुश्तैनी ज़मीन बेचने के पैसे हैं। मैंने ये ईशा के भविष्य के लिए रखे थे, पर बाबूजी की जान से बढ़कर कुछ नहीं है। आप चिंता मत कीजिये, सब ठीक हो जाएगा।"


अगले सात दिनों तक आलोक अस्पताल में ही रहा। उसने न केवल पैसे दिए, बल्कि रात-रात भर जागकर मणिकांत जी की तीमारदारी की। वह लेक्चरर था, इसलिए अस्पताल के कई बड़े डॉक्टर उसके पुराने छात्र निकले। आलोक के सम्मान में उन डॉक्टरों ने मणिकांत जी का विशेष ख्याल रखा।


जब मणिकांत जी होश में आए, तो उन्होंने देखा कि सुलेखा आलोक के पास बैठी रो रही है। सुलेखा जी ने आलोक का हाथ थाम रखा था।


"आलोक... मुझे माफ कर दे बेटा। मैं अंधी हो गई थी पैसों की चमक में। मुझे लगा था कि मेरा रुतबा ही मेरा सब कुछ है। पर आज समझ आया कि असली रुतबा पैसों से नहीं, बल्कि इंसान के उन रिश्तों से होता है जो मुसीबत में साथ खड़े हों।" सुलेखा जी ने सिसकते हुए कहा।


मणिकांत जी मुस्कुराए और बोले, "कहा था ना सुलेखा, लड़का हीरा है। पद और पैसा तो आते-जाते रहते हैं, पर संस्कार अमर होते हैं।"


मणिकांत जी ठीक होकर घर लौटे। बंगला बिक गया था, पर आलोक ने अपने छोटे से घर में उनके लिए एक कमरा पहले ही सजा दिया था। सुलेखा जी अब किसी पॉश किटी पार्टी में नहीं जाती थीं, लेकिन अब उनके चेहरे पर एक सच्चा सुकून था। अब उन्हें अपनी सहेलियों को बताने की ज़रूरत नहीं थी कि उनका दामाद क्या करता है, क्योंकि पूरा मोहल्ला मिसाल देता था कि "दामाद हो तो आलोक जैसा।"


सुलेखा जी को अहसास हुआ कि जिस 'बराबरी' की वे बात करती थीं, वह बैंक बैलेंस में नहीं, बल्कि विचारों और संस्कारों में होती है। आलोक की सादगी ने सुलेखा के अहंकार को उस दिन हमेशा के लिए जला दिया था।


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**निष्कर्ष:**

रिश्ता कभी भी पैसों की तराजू पर नहीं तौलना चाहिए। इंसान की शिक्षा, उसका स्वभाव और दूसरों के प्रति उसका सम्मान ही उसकी असली पूंजी होती है। सुख में तो पूरी दुनिया साथ होती है, पर जो दुःख में हाथ थाम ले, वही सबसे बड़ा अमीर है।


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**एक विचार:**

दोस्तों, क्या आपको भी लगता है कि आज के दौर में हम रिश्तों से ज्यादा हैसियत को अहमियत देने लगे हैं? क्या आलोक ने जो किया, वह आज के समय में मुमकिन है? अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं।


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