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अकेलेपन का सौदा

 रघुनाथ जी की काँपती उंगलियाँ उस वसीयत के पन्नों को पलट रही थीं। सामने उनका इकलौता बेटा, विकास, और बहू, सीमा, बेसब्री से खड़े थे। कमरे में एसी चल रहा था, लेकिन रघुनाथ जी के माथे पर पसीना था।

"बाबूजी, अब सोच क्या रहे हैं? साइन कर दीजिये ना," विकास ने झुंझलाते हुए कहा, "वो बिल्डर कल तक का ही समय दिया है। अगर हमने यह पुराना पुस्तैनी मकान बेचने की एनओसी (NOC) नहीं दी, तो वो डील कैंसिल कर देगा। पाँच करोड़ का सवाल है बाबूजी!"

रघुनाथ जी ने चश्मा उतारा और अपनी धुंधली आँखों से बेटे को देखा। "बेटा, यह सिर्फ ईंट-पत्थर का मकान नहीं है। इसमें तुम्हारे दादाजी की यादें हैं, तुम्हारी माँ की सांसें बसी हैं। और फिर, मैं कहाँ जाऊँगा? इस उम्र में मुझे अपने इस कमरे, अपनी इस तुलसी की क्यारी से बहुत लगाव है।"

सीमा ने तुरंत बात काटते हुए कहा, "बाबूजी, आप चिंता क्यों करते हैं? हम जो नया पेंटहाउस ले रहे हैं, वहाँ आपके लिए एक अलग कमरा होगा। बिलकुल फाइव स्टार जैसा। यहाँ तो हर वक्त धूल-मिट्टी और शोर रहता है। वहाँ शांति होगी।"

विकास ने पिता के हाथ में पेन थमा दिया। "बाबूजी, मेरे भविष्य का सवाल है। मुझे बिज़नेस बढ़ाने के लिए पैसे चाहिए। क्या आप मेरी तरक्की नहीं चाहते?"

'तरक्की' शब्द ने रघुनाथ जी को निरुत्तर कर दिया। एक पिता अपने बेटे की राह का कांटा कैसे बन सकता था? उन्होंने भारी मन से, अपनी आत्मा को मारकर उन कागज़ों पर हस्ताक्षर कर दिए।

हस्ताक्षर होते ही विकास और सीमा के चेहरों पर चमक आ गई। मानो लॉटरी लग गई हो।

मकान बिका। पाँच करोड़ रुपये विकास के खाते में आए। शहर के पॉश इलाके में एक आलीशान फ्लैट लिया गया।

सामान शिफ्ट हुआ। रघुनाथ जी भी नई गाड़ी में बैठकर नए घर पहुँचे। लिफ्ट से 15वीं मंज़िल पर जाकर जब दरवाजा खुला, तो घर वाकई खूबसूरत था। इटालियन मार्बल, झूमर, और महँगे सोफे।

"बाबूजी, आपका कमरा वो कोने वाला है," सीमा ने इशारा किया।

रघुनाथ जी उस कमरे में गए। वह कमरा नौकरों के कमरे (Servant Quarter) से थोड़ा ही बड़ा था। उसमें न कोई खिड़की थी जिससे बाहर का आसमान दिखे, और न ही कोई बालकनी। बस एक बिस्तर और एक अलमारी। उनका पुराना बड़ा हवादार कमरा, जहाँ से वो पूरा मोहल्ला देखते थे, अब एक याद बन चुका था।

शुरुआत के कुछ दिन ठीक बीते। फिर धीरे-धीरे विकास और सीमा का व्यवहार बदलने लगा।

"बाबूजी, आज हमारे दोस्त आने वाले हैं, आप अपने कमरे में ही रहिएगा, बाहर मत आइएगा। उन्हें ओल्ड एज लोगों की खाँसी से दिक्कत होती है," एक दिन सीमा ने कहा।

रघुनाथ जी चुपचाप अंदर चले गए। उन्हें प्यास लगी थी, लेकिन वो पानी लेने बाहर नहीं जा सके।

वक्त बीतता गया। विकास अपने बिज़नेस और पार्टियों में व्यस्त हो गया। रघुनाथ जी के पास करोड़ों का बेटा था, लेकिन बात करने के लिए कोई नहीं। वो उस बंद कमरे में घुटते रहते।

एक दिन रघुनाथ जी की तबीयत बहुत खराब हो गई। सीने में तेज दर्द हो रहा था। उन्होंने इंटरकॉम से विकास को फोन किया।

"क्या है बाबूजी? मैं अभी मीटिंग में हूँ," विकास ने फोन पर कहा।

"बेटा, दर्द हो रहा है... डॉक्टर..."

"उफ्फ! आप भी ना, हर वक्त कुछ न कुछ लगा रहता है। मैं ड्राइवर को भेजता हूँ, वो ले जाएगा।"

ड्राइवर उन्हें अस्पताल ले गया। डॉक्टर ने कहा कि माइनर हार्ट अटैक था। देखभाल की ज़रूरत है।

जब रघुनाथ जी वापस घर आए, तो विकास ने डाइनिंग टेबल पर एक ब्रोशर (पर्चा) उनके सामने रख दिया।

"बाबूजी, डॉक्टर ने कहा है आपको 24 घंटे देखभाल की ज़रूरत है। हम दोनों जॉब और बिज़नेस में बिजी रहते हैं। यह शहर का सबसे महंगा 'वृद्धाश्रम' (Care Home) है। वहाँ डॉक्टर, नर्स सब हैं। मैंने बात कर ली है। आप वहाँ खुश रहेंगे।"

रघुनाथ जी सन्न रह गए। "बेटा, मैं तुम लोगों के साथ रहना चाहता हूँ। मुझे नर्स नहीं, अपनों का साथ चाहिए।"

"बाबूजी, ज़िद मत कीजिये। प्रैक्टिकल बनिए। हमारे पास वक्त नहीं है," विकास ने बेरुखी से कहा और अपने कमरे में चला गया।

रघुनाथ जी की आँखों से आँसू बह निकले। उन्हें वो पुराना मकान याद आया। अगर उन्होंने वो मकान न बेचा होता, तो आज वो अपने घर के राजा होते, किसी की दया के मोहताज नहीं। उन्होंने अपने बेटे के लोभ को पूरा करने के लिए अपनी जड़े काट दी थीं, और अब वही बेटा उन्हें सूखा पेड़ समझकर फेंक रहा था।

रघुनाथ जी वृद्धाश्रम चले गए। वहाँ सुविधाएं तो बहुत थीं, पर अपनापन शून्य था।

दो साल बाद।

विकास का बिज़नेस एक बड़े घोटाले में फँस गया। उसके पार्टनर ने उसे धोखा दिया और सारे पैसे लेकर भाग गया। पुलिस केस हुआ, बैंक ने फ्लैट सील कर दिया। सीमा, जो ऐशो-आराम की साथी थी, गरीबी आते ही विकास को छोड़कर अपने मायके चली गई।

विकास सड़क पर आ गया। उसकी जेब खाली थी और दिल भारी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो कहाँ जाए। भटकते-भटकते उसके कदम शहर के बाहर उसी वृद्धाश्रम की ओर मुड़ गए। उसे उम्मीद थी कि शायद बाबूजी के पास कुछ बचत होगी या वो कोई सहारा देंगे।

रिसेप्शन पर पहुँचकर उसने पूछा, "रघुनाथ जी किस कमरे में हैं?"

रिसेप्शनिस्ट ने रजिस्टर चेक किया और अफसोस से उसे देखा। "सर, रघुनाथ जी का तो पिछले हफ्ते देहांत हो गया।"

विकास के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। "क्या? और मुझे बताया भी नहीं?"

"हमने आपके नंबर पर कई बार फोन किया था सर, लेकिन आपका फोन बंद था। वो आखिरी वक्त तक आपका नाम ले रहे थे। उन्होंने आपके लिए एक लिफाफा छोड़ा है।"

विकास ने काँपते हाथों से वो लिफाफा लिया। उसमें एक चिट्ठी और एक चाबी थी।

"बेटा विकास,

मुझे पता था कि एक दिन तुम पर मुसीबत आएगी। लोभ की नींव पर बने महल ज्यादा दिन नहीं टिकते। जब तुम यह चिट्ठी पढ़ रहे होगे, शायद मैं नहीं हूँगा। यह चाबी मेरे बैंक लॉकर की है। उसमें मेरी पेंशन के कुछ जमा पैसे हैं। उनसे अपना कर्ज़ चुका देना। और बेटा, एक नसीहत - मैंने तुम्हें सब कुछ दिया, पर संस्कार नहीं दे पाया। पैसा तो फिर कमा लोगे, लेकिन जो सुकून तुमने खोया है, वो बाज़ार में नहीं मिलता। कभी किसी अपने को पैसे के लिए मत छोड़ना, क्योंकि अंत में इंसान को कंधा नोटों की गड्डियाँ नहीं, अपने ही देते हैं।"

विकास वहीं फर्श पर बैठकर फूट-फूट कर रोने लगा। आज उसके पास न पिता थे, न पत्नी, न घर, और न ही वो पैसा जिसके लिए उसने सब कुछ दांव पर लगा दिया था। उसके पास बचा था तो सिर्फ पछतावा, जो अब ताउम्र उसके साथ रहने वाला था।


दोस्तों, यह कहानी हमें सिखाती है कि स्वार्थ की दौड़ में हम अक्सर उन लोगों को पीछे छोड़ देते हैं जो हमारी रीढ़ की हड्डी होते हैं। माता-पिता और परिवार का साथ वो अनमोल खजाना है जिसे दुनिया की कोई दौलत नहीं खरीद सकती। अपनी महत्वाकांक्षाओं के लिए रिश्तों की बलि मत चढ़ाइये, वरना एक दिन आप उस मुकाम पर होंगे जहाँ भीड़ तो होगी, पर आपका 'अपना' कोई नहीं होगा।

क्या आपके विचार में आज की पीढ़ी पैसों को रिश्तों से ज़्यादा अहमियत देने लगी है? अपनी राय कमेंट बॉक्स में ज़रूर लिखें।

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