शहर के पॉश इलाके 'सिविल लाइन्स' में बनी कोठी नंबर 45, जिसे लोग 'व्हाइट हाउस' कहते थे, अपनी भव्यता और ख़ामोशी के लिए मशहूर थी। रिटायर्ड कर्नल विक्रमजीत सिंह अपनी इस कोठी को किसी मंदिर से कम नहीं मानते थे। फर्श इतना चमकदार कि आप अपना चेहरा देख लें, सोफे ऐसे सजे हुए जैसे अभी शोरूम से आए हों, और बगीचे की घास ऐसी कटी हुई जैसे नापकर कैंची चलाई गई हो।
कर्नल साहब का एक ही नियम था—'अनुशासन'। घर में कोई भी चीज़ अपनी जगह से एक इंच भी नहीं हिलनी चाहिए। उनकी पत्नी के गुज़र जाने के बाद, यह सन्नाटा और भी गहरा हो गया था। उनका बेटा, रोहन, अपनी नौकरी के सिलसिले में दूसरे शहर में रहता था। कर्नल साहब को अपने अकेलेपन से कोई शिकायत नहीं थी; उन्हें गर्व था कि उनका घर शहर का सबसे व्यवस्थित और साफ़-सुथरा घर है।
एक दिन रोहन का फोन आया।
"पापा, मेरा ट्रांसफर वापस अपने शहर में हो गया है। कंपनी का फ्लैट मिलने में अभी एक महीना लगेगा। क्या मैं, सुप्रिया (पत्नी) और आरुषि (5 साल की पोती) कुछ दिनों के लिए आपके पास आ सकते हैं?"
कर्नल साहब को थोड़ी झिझक हुई। उनकी दिनचर्या बिगड़ जाएगी। लेकिन बेटा था, मना कैसे करते? उन्होंने हाँ कर दी, लेकिन साथ ही हिदायतों की एक लंबी सूची भी तैयार कर ली।
जिस दिन रोहन अपने परिवार के साथ आया, 'व्हाइट हाउस' का माहौल बदल गया। सामान के बैग, जूतों की खट-खट और नन्हीं आरुषि की चहचहाहट ने घर के सन्नाटे को तोड़ दिया।
शाम को चाय के वक़्त कर्नल साहब ने अपनी शर्तें रख दीं।
"देखो रोहन, सुप्रिया... मुझे शोर-शराबा पसंद नहीं है। आरुषि को समझा देना कि ड्राइंग रूम में खेलना मना है। वहां एंटीक वास (Vase) रखे हैं। खाना सिर्फ़ डाइनिंग टेबल पर खाया जाएगा, और रात को 9 बजे के बाद घर की बत्तियां बुझ जानी चाहिए। मुझे बिजली की बर्बादी बिल्कुल बर्दाश्त नहीं।"
रोहन और सुप्रिया ने एक-दूसरे को देखा और सिर हिला दिया।
अगले कुछ दिन किसी जेल में रहने जैसे बीते। सुप्रिया सुबह जल्दी उठकर नाश्ता बनाती, लेकिन कर्नल साहब को मसालों की महक से चिढ़ थी।
"सुप्रिया, एग्जॉस्ट फैन नहीं चलाया क्या? पूरे घर में तड़के की बदबू फैल गई है। मेरे सोफों में यह गंध घुस जाएगी," कर्नल साहब नाक सिकोड़ते हुए कहते।
सुप्रिया बेचारी चुपचाप खिड़कियां खोल देती।
सबसे ज़्यादा मुसीबत नन्हीं आरुषि की थी। वह जहाँ भी हाथ लगाती, कर्नल साहब टोक देते।
"आरुषि, दीवार पर हाथ मत लगाओ, निशान पड़ जाएंगे।"
"आरुषि, कालीन पर जूतों के साथ मत चलो, यह पर्शियन है।"
"आरुषि, टी.वी. की आवाज़ कम करो।"
बच्ची सहम गई। वह अपने दादाजी के पास जाने से भी डरने लगी। जो घर उसे 'परियों का महल' लगता था, अब उसे वो किसी 'भूतिया किले' जैसा लगने लगा जहाँ हंसना मना था।
एक रविवार की दोपहर थी। रोहन और सुप्रिया बाज़ार गए हुए थे। कर्नल साहब अपनी आरामकुर्सी पर बैठकर अखबार पढ़ रहे थे। आरुषि बोर हो रही थी। उसने अपना ड्राइंग पैड निकाला और रंगों से खेलने लगी। खेलते-खेलते उसका ध्यान भटका और गलती से पानी का गिलास मेज़ पर रखे कर्नल साहब के चश्मे और कुछ ज़रूरी कागज़ात पर गिर गया।
"धत् तेरे की!" आरुषि घबरा गई। उसने डरते-डरते उसे पोंछने की कोशिश की, लेकिन हड़बड़ाहट में उसके रंगीन हाथ कर्नल साहब की सफ़ेद शर्ट पर लग गए।
कर्नल साहब की नींद टूटी। उन्होंने अपनी गीली शर्ट और भीगे कागज़ देखे, तो उनका पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया।
"यह क्या बदतमीज़ी है!" कर्नल साहब इतनी ज़ोर से चिल्लाए कि आरुषि कांप उठी और रोने लगी।
"तुम्हें तमीज़ नहीं है? मैंने कहा था न कि यहाँ मत खेलना! मेरे ज़रूरी पेपर्स ख़राब कर दिए! जाओ यहाँ से! अपनी माँ के आने तक अपने कमरे से बाहर मत निकलना!"
आरुषि रोते हुए कमरे में भाग गई।
शाम को जब रोहन और सुप्रिया लौटे, तो घर में मरघट जैसा सन्नाटा था। आरुषि रजाई में मुंह छिपाकर सिसक रही थी। उसने रोते-रोते सारी बात बताई।
रोहन का सब्र अब टूट गया। वह सीधे पिता के पास गया।
"पापा, वह बच्ची है। उससे गलती हो गई, तो क्या आप इतना चिल्लाएंगे? वह डर के मारे कांप रही है।"
कर्नल साहब ने अखबार नीचे किया। "रोहन, गलती उसकी नहीं, तुम लोगों की है। मैंने पहले ही कहा था कि मुझे अनुशासन चाहिए। मेरा घर कोई धर्मशाला या प्ले-स्कूल नहीं है। अगर यहाँ रहना है, तो कायदे से रहना होगा। मेरे घर का नक्शा बिगाड़ कर रख दिया है तुम लोगों ने।"
रोहन ने गहरी सांस ली। उसकी आँखों में एक दृढ़ता थी जो पहले कभी नहीं दिखी थी।
"आप सही कह रहे हैं पापा। यह घर नहीं है। यह एक म्यूज़ियम (संग्रहालय) है, जहाँ चीज़ें तो सुरक्षित हैं, पर इंसान नहीं। इंसान गलतियां करते हैं, बच्चे शोर मचाते हैं, मसाले महकते हैं... यही तो जीवन है। पर आपको जीवन से ज़्यादा अपनी इन बेजान दीवारों और कालीनों से प्यार है।"
"क्या बकवास कर रहे हो?" कर्नल साहब खड़े हो गए।
"मैं सच कह रहा हूँ। मुझे लगा था कि माँ के जाने के बाद आप अकेले होंगे, आपको अपनों की ज़रूरत होगी। पर आपको तो सिर्फ अपनी 'शांति' प्यारी है। ठीक है पापा, आपको आपकी शांति मुबारक।"
रोहन ने उसी वक़्त सुप्रिया से कहा, "सामान पैक करो। हम आज रात ही होटल में रुकेंगे और कल किराए का मकान ले लेंगे।"
आधे घंटे के अंदर घर फिर से खाली हो गया। जाते वक़्त आरुषि ने दादाजी की तरफ देखा भी नहीं। कार स्टार्ट हुई और गेट से बाहर निकल गई।
कर्नल साहब ड्राइंग रूम में अकेले खड़े रह गए।
उन्होंने राहत की सांस ली। "चलो, बला टली। फिर से सब व्यवस्थित हो गया।"
उन्होंने सोफे के कुशन ठीक किए, कालीन को सीधा किया और मेज़ को कपड़े से पोंछा। अब घर बिल्कुल वैसा ही था जैसा उन्हें पसंद था—साफ़, चमकदार और... खामोश।
लेकिन उस रात कर्नल साहब को नींद नहीं आई।
घड़ी की टिक-टिक, जो पहले उन्हें सुकून देती थी, आज हथौड़े की तरह कानों में बज रही थी। उन्हें प्यास लगी। वे किचन में गए। वहां मसालों की वो महक अब नहीं थी, सब कुछ साफ़ था, लेकिन उन्हें अचानक सुप्रिया के हाथ की बनी अदरक वाली चाय की तलब लगी।
अगले दो दिन ऐसे ही बीते।
तीसरे दिन शाम को, कर्नल साहब अपनी बालकनी में बैठे थे। सामने पार्क में कुछ बच्चे खेल रहे थे। उनकी नज़र अपने बगीचे पर पड़ी। वहां एक छोटी सी प्लास्टिक की गुड़िया घास में पड़ी थी—शायद आरुषि की थी जो जाते वक़्त गिर गई होगी।
कर्नल साहब धीरे-धीरे नीचे उतरे और उस गुड़िया को उठाया। उस पर थोड़ी धूल लगी थी। उन्होंने उसे साफ़ किया। अचानक उन्हें याद आया कि आरुषि कैसे डरते-डरते उस गुड़िया से बातें करती थी।
"दादाजी को गुस्सा आएगा, चुप रह डॉली," आरुषि अपनी गुड़िया से कहती थी।
कर्नल साहब की आँखों में आंसू आ गए।
उन्होंने पलटकर अपने आलीशान 'व्हाइट हाउस' को देखा। संगमरमर का फर्श चमक रहा था, लेकिन वह ठंडा था। दीवारें बेदाग़ थीं, लेकिन गूँगी थीं। एंटीक वास अपनी जगह पर था, लेकिन उसे देखने वाला कोई नहीं था।
"यह मैं क्या कर बैठा?" कर्नल साहब बुदबुदाए। "मैंने अपने 'मकान' को बचाने के लिए अपने 'घर' को निकाल दिया?"
उन्हें एहसास हुआ कि जिस सन्नाटे को वो 'शांति' समझ रहे थे, वह असल में 'मातम' था। वह घर, जिसमें बच्चों की किलकारियां न हों, जिसमें अपनों की खटर-पटर न हो, वो घर नहीं, सिर्फ़ ईंटों का ढेर होता है। वह अपनी ज़िद और अहंकार के किले में अकेले कैदी बनकर रह गए थे।
उसी वक़्त आसमान में बादल गरजे और तेज़ बारिश शुरू हो गई। कर्नल साहब भीगते रहे, लेकिन अंदर नहीं गए। उन्हें लगा कि शायद यह बारिश उनके अंदर के जमे हुए अहंकार को धो रही है।
उन्होंने कांपते हाथों से अपनी जेब से फोन निकाला और रोहन का नंबर मिलाया।
फोन नहीं उठा। उन्होंने फिर मिलाया।
तीसरी बार में सुप्रिया ने उठाया। "हेलो? पापाजी?"
"सुप्रिया..." कर्नल साहब की आवाज़ भर्राई हुई थी। "रोहन कहाँ है?"
"वो ऑफिस में हैं पापाजी। कोई काम था?" सुप्रिया ने रूखेपन से पूछा।
"सुप्रिया बेटा... क्या तुम लोग वापस आ सकते हो?" कर्नल साहब ने जैसे ही यह कहा, उनकी आँखों से झर-झर आंसू बहने लगे। "यह घर मुझे खा रहा है बेटा। यह बहुत बड़ा है, और मैं बहुत छोटा पड़ गया हूँ। मुझे माफ़ कर दो।"
दूसरी तरफ सन्नाटा था।
"पापाजी, आप रो रहे हैं?" सुप्रिया की आवाज़ नरम हो गई।
"हाँ बहु... मुझे मेरे पोते-पोती का शोर चाहिए। मुझे तुम्हारी तड़के वाली दाल की महक चाहिए। मुझे आरुषि के हाथ के निशान चाहिए इन दीवारों पर। यह दीवारें बेदाग़ रहकर क्या करेंगी जब इन्हें छूने वाला ही कोई न हो? प्लीज... वापस आ जाओ। मैं वादा करता हूँ, अब यह म्यूज़ियम नहीं रहेगा।"
एक घंटे बाद, बारिश के बीच एक टैक्सी गेट पर रुकी।
रोहन, सुप्रिया और आरुषि बाहर निकले। कर्नल साहब बरामदे में खड़े उनका इंतज़ार कर रहे थे। उन्होंने अपनी मिलिट्री अकड़ छोड़कर बाहें फैला दीं।
आरुषि पहले तो झिझकी, पर दादाजी की भीगी हुई आँखें देखकर वह दौड़कर उनके पैरों से लिपट गई।
"दादू! आप भीग गए!"
कर्नल साहब ने उसे गोद में उठा लिया। "कोई बात नहीं बेटा। आज से तुम इस घर में जहाँ चाहे खेलो, जो चाहे तोड़ो। यह सोफे, यह कालीन, यह सब तुम्हारे लिए है। तुम हो, तो यह घर है।"
रोहन और सुप्रिया भी पास आ गए। रोहन ने पिता को गले लगाया।
"सॉरी पापा, हम आपको छोड़कर गए।"
"नहीं रोहन, तुमने सही किया। तुमने मुझे आईना दिखा दिया," कर्नल साहब ने कहा। "आओ, अंदर चलो।"
उस रात 'व्हाइट हाउस' का नियम बदल गया।
डाइनिंग टेबल पर खाना खाते वक़्त आरुषि ने गलती से दाल गिरा दी। सुप्रिया डर गई, लेकिन कर्नल साहब ने ज़ोर से ठहाका लगाया।
"अरे वाह! आज तो मेज़पोश पर डिज़ाइन बन गया। इसे ऐसे ही रहने दो।"
घर में हंसी गूंज उठी।
दीवारों पर अब भी महंगे पेंटिंग थे, लेकिन अब उनके साथ आरुषि की बनाई हुई टेढ़ी-मेढ़ी ड्राइंग्स भी टेप से चिपकाई गई थीं। फर्श पर खिलौने बिखरे थे, और किचन से पकौड़ों की खुशबू आ रही थी।
कर्नल साहब अपनी आरामकुर्सी पर बैठे यह सब देख रहे थे। घर गंदा था, अव्यवस्थित था, शोरगुल से भरा था... लेकिन अब वह सचमुच 'सुंदर' लग रहा था। उन्हें समझ आ गया था कि 'मकान' आर्किटेक्ट बनाते हैं, लेकिन 'घर' परिवार बनाता है।
उन्होंने डायरी में लिखा: *"सफाई से घर चमकता है, लेकिन अपनों से घर दमकता है। धूल तो साफ़ हो जाती है, लेकिन अकेलेपन की धूल आत्मा को मैला कर देती है। आज मेरा सफर पूरा हुआ—मकान से घर तक का।"*
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दोस्तों, हम अक्सर अपने घरों को सजाने-संवारने में इतना खो जाते हैं कि उन लोगों को ही भूल जाते हैं जिनके लिए हम यह घर बनाते हैं। घर की शोभा महंगी चीज़ों से नहीं, बल्कि बुजुर्गों के आशीर्वाद और बच्चों की हंसी से होती है। याद रखिये, चीज़ें इस्तेमाल करने के लिए होती हैं और लोग प्यार करने के लिए... इसे उल्टा मत कीजिये।
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