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सोने के कंगन और पीतल के रिश्ते

 सबकुछ जानने के बाद सुमन चुप रही। ननद वंदना की सब बातें सुमन के कानों में गूंजने लगीं... "भाभी, वो जो सेट है ना, वो तो माँ ने मुझे दे दिया, कहा कि अब तुम्हारी भाभी को इसकी क्या ज़रूरत, वो तो वैसे भी पुराने फैशन का है।"


सुमन के सिर में दर्द होने लगा। ट्रेन की पटरियों की खट-खट आवाज़ उसके दिमाग की नसों को और भी ज्यादा कस रही थी। वह अपनी ननद वंदना के घर से वापस अपने शहर लौट रही थी। वंदना के घर गृह-प्रवेश की पूजा थी। नया फ्लैट, नई सजावट और वंदना का खिला हुआ चेहरा। सब कुछ बहुत सुंदर था, लेकिन उस सुंदरता के पीछे का सच सुमन को अंदर ही अंदर खाए जा रहा था।


जब वह वंदना के बेडरूम में तैयार हो रही थी, तभी उसने वंदना को फोन पर अपनी माँ (सुमन की सास, निर्मला जी) से बात करते हुए सुन लिया था। वंदना कह रही थी, "माँ, आपने सही किया जो वो कंगन और हार बेचकर कैश भिजवा दिया, वरना फ्लैट की डाउन पेमेंट कम पड़ रही थी। भाभी को पता तो नहीं चला ना?"


सुमन उस वक्त तो चुप रह गई थी। उसने वंदना से कुछ नहीं कहा, बस एक फीकी मुस्कान ओढ़कर पूरा फंक्शन अटेंड किया। लेकिन अब, जब वह वापस अपने घर जा रही थी, तो उसका सब्र जवाब दे रहा था।


सुमन अब अपने घर वापस आ चुकी थी। दरवाजा उसकी सास निर्मला जी ने खोला।

"अरे आ गई बहू? कैसी रही वंदना की पूजा? घर कैसा लगा उसका? बहुत आलीशान है ना?" निर्मला जी के चेहरे पर एक अजीब सी चमक और उत्साह था।


सुमन ने उनके पैर छुए और धीमे स्वर में कहा, "हाँ माँ जी, घर बहुत सुंदर है। बिल्कुल सपनों के महल जैसा।"

उसने अपनी सास की आँखों में झाँका। वही वात्सल्य, वही अपनापन... क्या यह सब झूठ था? सुमन को चक्कर आने लगा। वह बहाना बनाकर अपने कमरे में चली गई।


कमरे में आते ही उसने सबसे पहले अलमारी खोली। सबसे ऊपर वाले लॉकर की चाबी उसके पास ही रहती थी, लेकिन एक डुप्लीकेट चाबी सास के पास भी थी, 'आपातकाल' के नाम पर। सुमन ने कांपते हाथों से लॉकर खोला। लाल रंग का मखमली डिब्बा वहीं रखा था। उसने राहत की सांस ली। शायद उसने गलत सुना होगा। शायद वंदना किसी और हार की बात कर रही होगी।


उसने डिब्बा खोला।

डिब्बा खाली था।

उसके पिता द्वारा शादी में दिया गया भारी कुंदन का सेट और उसकी दादी के ज़माने के दो मोटे सोने के कंगन गायब थे। बस डिब्बा रखा था, ताकि वजन से लगे कि अंदर कुछ है।


सुमन के पैरों तले जमीन खिसक गई। यह सिर्फ सोना नहीं था, यह उसके दिवंगत पिता का आशीर्वाद था, जो उन्होंने अपनी पीएफ की सारी जमा पूंजी लगाकर अपनी बेटी को दिया था। और निर्मला जी ने? उन्होंने अपनी बेटी का घर बसाने के लिए, बहू की पिता की निशानी को मिट्टी के भाव बेच दिया? और सबसे बड़ी बात—चोरी? बिना पूछे?


शाम को पति, राजat, ऑफिस से आए। वे भी बहुत खुश थे कि बहन का नया घर बन गया। सुमन ने उन्हें कुछ नहीं बताया। वह जानती थी कि रजत अपनी माँ के खिलाफ एक शब्द नहीं सुनेंगे। बिना सबूत के बात करना घर में महाभारत छेड़ना होगा। उसे पक्का यकीन करना था।


सुमन सामान्य रहने का नाटक करने लगी, लेकिन अंदर ही अंदर वह सुलग रही थी। उसे इंतज़ार था सही वक्त का।


कुछ दिनों बाद बड़े नन्दोई (वंदना के पति, मुकेश जी) सुमन के घर आए। वे शहर में किसी काम से आए थे और रात को रुकने वाले थे। मुकेश जी एक सीधे-सादे और साफ़ दिल के इंसान थे। उन्हें इन चालबाजियों का ज्यादा इल्म नहीं था।


रात को खाने की मेज सजी थी। निर्मला जी ने तरह-तरह के पकवान बनाए थे—दमाद जी जो आए थे। रजत और मुकेश जी बातें कर रहे थे। सुमन रसोई से रोटियां ला रही थी।

"और बताओ मुकेश, कैसा लग रहा है नया घर?" रजत ने पूछा।

"बहुत बढ़िया रजत भाई। सच कहूँ तो हमें उम्मीद नहीं थी कि इतनी जल्दी इतना बड़ा फ्लैट ले पाएंगे। वो तो बस भगवान की कृपा और बड़ों का आशीर्वाद है," मुकेश जी ने हाथ जोड़ते हुए कहा।


निर्मला जी ने तुरंत बात बदली, "अरे दामाद जी, ये कोफ्ता लीजिये ना, मैंने ख़ास आपके लिए बनाया है।" वह शायद डर रही थीं कि कहीं मुकेश जी कुछ बोल न दें।


सुमन सब देख रही थी।

नन्दोई के खाना खाने के बाद, जब वे ड्राइंग रूम में हाथ पोंछ रहे थे और निर्मला जी रसोई में बर्तन समेटने गई थीं, सुमन ने मौका देखा। रजत भी फ़ोन पर किसी क्लाइंट से बात करने बालकनी में चले गए थे।


सुमन पानी का गिलास लेकर मुकेश जी के पास गई।

"जीजा जी, पानी," सुमन ने गिलास बढ़ाया।

"शुक्रिया सुमन भाभी," मुकेश जी ने मुस्कुराते हुए कहा।


सुमन पास वाले सोफे पर बैठ गई और बहुत ही मासूमियत से पूछा, "जीजा जी, वंदना बता रही थी कि फ्लैट की पेमेंट में एंड मोमेंट पर कुछ दिक्कत आ गई थी। फिर अचानक सब कैसे मैनेज हुआ? मुझे बड़ी चिंता हो रही थी। कहीं आपने बाज़ार से ऊँचे ब्याज पर तो पैसा नहीं उठाया?"


मुकेश जी ने पानी का घूंट भरा और बोले, "नहीं-नहीं भाभी, बाज़ार से क्यों उठाएंगे? वो तो माता जी (निर्मला जी) ने समय पर मदद कर दी। सच में, उनका यह उपकार मैं कभी नहीं भूलूँगा।"


सुमन का दिल धड़कने लगा। उसने तीर अंधेरे में चलाया था, और वो निशाने पर लगा था। उसने अपनी आवाज़ को संयत रखते हुए, धीरे से जेवर के बारे में पूछा, "माँ जी ने? पर उनके पास तो इतना कैश नहीं था... उन्होंने तो कहा था कि एफ.डी. तुड़वाई है। पर एफ.डी. तो अभी पूरी नहीं हुई थी।"


मुकेश जी ने अचरज से सुमन को देखा। "एफ.डी.? नहीं भाभी, एफ.डी. नहीं। माता जी ने तो वो आपके वाले पुराने कंगन और वो कुंदन का सेट... क्या कहते हैं उसे... हां, वो जड़ाऊ हार। वो देकर पैसे का इंतज़ाम किया था। उन्होंने कहा कि सुमन ने खुद कहा है कि ये पुराना डिज़ाइन है, इसे बेचकर वंदना के काम लगा दो। मैं तो मना कर रहा था, पर वंदना और माता जी ने कहा कि भाभी ने जिद्द की है।"


सुमन के कानों में सन्नाटा छा गया। तो यह कहानी रची गई थी! उसे 'दानी' बनाकर उसका ही सब कुछ लूट लिया गया, और उसे खबर तक नहीं? जीजा जी को यह बताया गया कि सुमन ने अपनी मर्जी से दिया है, ताकि उनकी नज़रों में भी इज़्ज़त बनी रहे और चोरी भी न कहलाए।


"सुमन भाभी? क्या हुआ?" मुकेश जी ने उसे सुन्न देखकर पूछा।


तभी निर्मला जी रसोई से बाहर आईं, हाथ में मिठाई की प्लेट लिए। "अरे, क्या बातें हो रही हैं जीजा-साली में?" उनकी आवाज़ में एक घबराहट थी।


सुमन खड़ी हो गई। उसकी आँखों में अब आंसू नहीं, अंगारे थे।

"जीजा जी," सुमन ने निर्मला जी की आँखों में देखते हुए कहा, "क्या आप एक मिनट रुकेंगे? मुझे आपको और रजत को कुछ दिखाना है।"


सुमन तेज़ कदमों से अपने कमरे में गई और वो खाली मखमली डिब्बा लेकर बाहर आई। रजत भी बालकनी से अंदर आ चुके थे।

"क्या हुआ सुमन?" रजत ने पूछा।


सुमन ने वो खाली डिब्बा निर्मला जी के सामने टेबल पर पटक दिया।

"माँ जी," सुमन की आवाज़ कांप रही थी, पर उसमें डर नहीं था, "मेरे पिता की आखिरी निशानी कहाँ है?"


कमरे में एकदम सन्नाटा छा गया। मुकेश जी हैरान होकर कभी डिब्बे को तो कभी निर्मला जी को देख रहे थे।

"ये... ये क्या तरीका है बहू?" निर्मला जी हकलाने लगीं। "मेहमान के सामने तमाशा कर रही हो?"


"तमाशा मैंने नहीं, आपने किया है माँ जी," सुमन चिल्लाई। "जीजा जी कह रहे हैं कि मैंने अपनी मर्जी से अपने कंगन और हार उन्हें दिए। और मुझे आज पता चल रहा है कि मेरी तिजोरी साफ हो चुकी है। रजत, क्या आपको पता था इसके बारे में?"


रजत भौचक्के थे। "क्या बकवास है ये? माँ, सुमन का जेवर कहाँ है?"


निर्मला जी पल्लू को मुट्ठी में भींचने लगीं। "वो... वो तो... अरे, बेटी का घर बन रहा था। मुसीबत में थी वो। घर की लक्ष्मी ही तो घर के काम आती है। मैंने सोचा बाद में बनवा देंगे। बहू तो घर की ही है, कहाँ जा रही है।"


"बाद में बनवा देंगे?" सुमन हंसी, एक दर्द भरी हंसी। "बिना मुझसे पूछे? मेरी पीठ पीछे मेरी तिजोरी खोलकर? इसे मदद नहीं कहते माँ जी, इसे चोरी कहते हैं। और वो भी उस पिता की कमाई की चोरी जो अब इस दुनिया में नहीं हैं। आपने मुकेश जी से झूठ बोला कि मैंने दिया है। क्यों? ताकि आपकी बेटी के घर में आपकी नाक ऊंची रहे?"


मुकेश जी का चेहरा शर्म से लाल हो गया। वे अपनी जगह से खड़े हो गए। "माता जी, क्या यह सच है? भाभी को नहीं पता था?"


निर्मला जी चुप रहीं, बस नज़रें झुका लीं।


मुकेश जी ने हाथ जोड़ लिए। "छिः! मुझे लगा था कि यह एक परिवार का प्यार है। मुझे नहीं पता था कि मैं अपनी साली के आंसुओं की नींव पर अपना घर खड़ा कर रहा हूँ। अगर मुझे पता होता कि यह जेवर चोरी करके या बिना रज़ामंदी के बेचे गए हैं, तो मैं सड़क पर रहना पसंद करता, पर इस पैसे को हाथ नहीं लगाता।"


"जीजा जी, इसमें आपकी गलती नहीं है," सुमन ने कहा। "आप भी उसी झूठ के शिकार हुए जिसके हम हुए। वंदना जानती थी, माँ जी जानती थीं। बस मैं और रजत अनजान थे।"


रजत का चेहरा गुस्से से तमतमा गया। वह अपनी माँ के पास गया। "माँ, मुझे यकीन नहीं हो रहा। आपने सुमन के वो कंगन बेच दिए जो उसके पापा ने अपनी बीमारी के दौरान बचाए पैसों से बनवाए थे? आपको पता है ना वो उसके लिए कितने इमोशनल थे? आपने वंदना के लिए सुमन का दिल तोड़ दिया?"


"तो क्या करती?" निर्मला जी रोने लगीं, "मेरी बेटी का घर अटक रहा था। तुम लोग तो अपनी-अपनी दुनिया में मस्त हो। वंदना ने रो-रोकर फोन किया था। मैं माँ हूँ, उसका दुःख नहीं देखा गया।"


"आप माँ हैं, तो क्या मैं किसी की बेटी नहीं?" सुमन ने पूछा। "जब मैं इस घर में आई थी, तो आपने कहा था कि बहू नहीं बेटी ला रही हूँ। क्या आप अपनी बेटी वंदना का जेवर उसकी भाभी के लिए बिना पूछे चोरी कर सकती थीं? नहीं ना? क्योंकि बेटी, बेटी होती है और बहू, बस एक ज़ जरिया।"


मुकेश जी ने अपना फ़ोन निकाला। "मैं अभी वंदना को फोन करता हूँ। और कल ही वो फ्लैट बेचने की प्रक्रिया शुरू करूँगा। मुझे ऐसा घर नहीं चाहिए।"


"नहीं जीजा जी," सुमन ने उन्हें रोका। "घर मत बेचिये। वंदना का सपना है वो। और अब जो हो गया, उसे बदला नहीं जा सकता। जेवर तो गल चुके होंगे, वो वापस नहीं आएंगे।"


सुमन ने एक गहरी सांस ली और निर्मला जी की तरफ देखा।

"लेकिन आज एक और चीज़ टूट गई है माँ जी, जो सोने से भी ज्यादा कीमती थी। मेरा आप पर विश्वास। आज के बाद मैं इस घर में रहूँगी, आपकी सेवा भी करूँगी, क्योंकि वो मेरे संस्कार हैं। लेकिन मैं आपको कभी 'माँ' नहीं कह पाऊंगी। वो हक़ आपने आज उस खाली डिब्बे के साथ बेच दिया।"


सुमन ने वो खाली डिब्बा उठाया और अलमारी में वापस रखने चली गई। उसे खाली ही रखना था, ताकि ज़िंदगी भर याद रहे कि अपनों पर आँख मूंदकर भरोसा करने की कीमत क्या होती है।


ड्राइंग रूम में सन्नाटा पसरा था। निर्मला जी सोफे पर बैठकर रो रही थीं, लेकिन अब उन आंसुओं का कोई मोल नहीं था। रजत शर्मिंदा थे, और मुकेश जी आत्मग्लानि से भरे हुए।


उस रात घर में खाना नहीं बना। लेकिन सुमन को आज बहुत हल्की नींद आई। उसने सच का सामना कर लिया था। उसके कंगन गए थे, लेकिन उसका आत्मसम्मान जाग गया था। उसे समझ आ गया था कि इस दुनिया में 'अपना' वही है जो आपके मान-सम्मान की रक्षा करे, न कि वो जो आपके अपनेपन का फायदा उठाए।


अगले दिन सुबह, मुकेश जी जाने से पहले सुमन के पास आए। उन्होंने एक चेक सुमन के हाथ में थमाया।

"भाभी, मैं जानता हूँ कि बाऊजी की निशानी की कोई कीमत नहीं लगा सकता। पर यह वो रकम है जो उस जेवर को बेचकर मिली थी। मैंने अपनी कुछ सेविंग्स और दोस्त से उधार लेकर यह इंतज़ाम किया है। यह लीजिये, और अपना जेवर दोबारा बनवा लीजियेगा। और हाँ, वंदना की तरफ से मैं माफ़ी मांगता हूँ।"


सुमन ने चेक लिया। "जीजा जी, आप बहुत अच्छे इंसान हैं। पर यह चेक आप माँ जी को दीजिये। उनसे कहियेगा कि जब उनका मन साफ़ हो जाए, तो वो खुद मुझे यह दें। तब तक, यह उधार उन पर और उनकी बेटी पर रहेगा।"


सुमन ने वह चेक वापस कर दिया। वह जानती थी कि पैसे से जेवर आ जाएगा, पर सबक नहीं। वह चाहती थी कि उसकी सास और ननद को हर पल यह एहसास हो कि उन्होंने क्या खोया है।


रिश्ते कांच की तरह होते हैं, एक बार चटक जाएं तो जोड़े जा सकते हैं, पर दरार हमेशा दिखती रहती है। उस घर में भी अब सब साथ थे, पर उस 'दरार' के साथ।


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**कहानी का निष्कर्ष:**

परिवार में प्यार और त्याग दोनों जरुरी हैं, लेकिन जब त्याग केवल एक तरफ से हो और वह भी छल से लिया गया हो, तो वह शोषण कहलाता है। एक बहू भी इंसान होती है, उसकी भावनाओं और उसकी पैतृक निशानियों का सम्मान करना ससुराल का फर्ज़ है। चोरी और झूठ से बनाए गए महलों में कभी सुकून की नींद नहीं आती।


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**एक सवाल आप सभी से:**

क्या सुमन ने चेक वापस करके सही किया? या उसे पैसे ले लेने चाहिए थे? अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं।


**"अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ और आपकी आँखों को नम किया, तो इसे लाइक, कमेंट और शेयर जरूर करें। रिश्तों की सच्चाई और ऐसे ही मार्मिक किस्से पढ़ने के लिए हमारे पेज को फ़ॉलो करें। धन्यवाद!"**


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