रात के ग्यारह बज चुके थे। घड़ी की टिकटिक सन्नाटे को और गहरा बना रही थी। विनीता ड्राइंग रूम के सोफे पर बैठी थी, उसकी निगाहें बार-बार मुख्य दरवाजे पर जा रही थीं। सामने टेबल पर रखा खाना ठंडा हो चुका था, ठीक वैसे ही जैसे पिछले कुछ महीनों से उसके और उसके पति, आकाश के रिश्तों में ठंडक आ गई थी।
आकाश और विनीता की शादी को सात साल हो चुके थे। यह एक प्रेम विवाह था। कॉलेज की दोस्ती प्यार में बदली और फिर एक खूबसूरत रिश्ते में। शुरुआती पांच साल तो जैसे पंख लगाकर उड़ गए, लेकिन पिछले दो सालों में, और खास तौर पर पिछले छह महीनों में, सब कुछ बदल गया था। आकाश अब वह आकाश नहीं रहा था जो विनीता की एक छींक आने पर भी पूरा घर सिर पर उठा लेता था।
दरवाजे की घंटी बजी। विनीता ने एक गहरी सांस ली, अपने चेहरे पर छाई उदासी को पोंछा और दरवाजा खोला। सामने आकाश खड़ा था। चेहरे पर थकान थी, लेकिन आंखों में एक अजीब सी चमक, जो विनीता से नजरें मिलते ही गायब हो गई।
"आज फिर देर हो गई?" विनीता ने संयमित स्वर में पूछा।
"हाँ, ऑफिस में काम ज्यादा था," आकाश ने जूते उतारते हुए रूखा सा जवाब दिया और सीधे बेडरूम की ओर बढ़ गया। "मैं खाना नहीं खाऊंगा, बाहर खा लिया था।"
विनीता वहीं खड़ी रही। उसका दिल एक बार फिर टूट गया। 'बाहर खा लिया था'—यह वाक्य अब अक्सर सुनने को मिलने लगा था। विनीता ने देखा कि आकाश का फोन बजा। उसने जल्दी से फोन निकाला, स्क्रीन देखी और बाथरूम में घुस गया। अंदर से दबी हुई आवाज में बात करने की फुसफुसाहट आ रही थी।
विनीता बेडरूम के दरवाजे के पास जाकर खड़ी हो गई। उसे आकाश की पूरी बात तो सुनाई नहीं दी, लेकिन कुछ शब्द उसके कानों में पिघले सीसे की तरह उतरे— "तुम्हें पसंद आया ना? ... हाँ, हम जल्द ही मिलेंगे ... अभी विनीता जाग रही है ... लव यू।"
विनीता के पैरों तले जमीन खिसक गई। 'लव यू'? आकाश ने किसी और को 'लव यू' कहा? उसका सिर चकराने लगा। वह धम्म से बिस्तर पर बैठ गई। जिस शक को वह पिछले कई हफ्तों से अपने दिल के कोने में दबाए बैठी थी, आज वह हकीकत बनकर उसके सामने खड़ा था।
आकाश बाथरूम से निकला तो उसने देखा विनीता गुमसुम बैठी है। उसने कोई सफाई नहीं दी, बस कंबल ओढ़कर दूसरी तरफ करवट लेकर लेट गया। विनीता पूरी रात छत को घूरती रही। उसकी आंखों से आंसू बहते रहे, लेकिन सिसकियां उसने घुटकर पी लीं। उसे अपने कॉलेज का वह आकाश याद आ रहा था जिसने घुटनों पर बैठकर कहा था, "विनीता, तुम मेरी दुनिया हो। तुम्हारे सिवा मेरी जिंदगी में कोई नहीं आ सकता।"
अगले दिन विनीता ने जासूसी करने का फैसला किया। यह फैसला उसके आत्मसम्मान के खिलाफ था, लेकिन अपने घर को बचाने के लिए, या शायद सच जानने के लिए यह जरूरी था।
आकाश के नहाने जाने के बाद विनीता ने उसका फोन चेक किया। फोन में पासवर्ड लगा था, जो पहले कभी नहीं होता था। लेकिन विनीता को आकाश का पुराना पैटर्न पता था, उसने कोशिश की, पर वह गलत था। तभी स्क्रीन पर एक नोटिफिकेशन आया। 'प्रिया' का मैसेज था— *"आज शाम 5 बजे, ब्लू डायमंड कैफे में। मैं इंतजार करूँगी।"*
'प्रिया'। तो उस औरत का नाम प्रिया है। विनीता के हाथों से फोन छूटते-छूटते बचा। उसने मैसेज डिलीट नहीं किया, बस फोन वैसे ही रख दिया।
पूरा दिन विनीता के लिए काटना मुश्किल हो गया। वह घर के कामों में खुद को उलझाने की कोशिश करती, लेकिन दिमाग उसी 'ब्लू डायमंड कैफे' में अटका था। शाम के 4 बजे विनीता ने तैयार होना शुरू किया। उसने अपनी सबसे साधारण साड़ी पहनी, चेहरा दुपट्टे से ढका और घर से निकल गई।
5 बजने में 10 मिनट थे जब वह कैफे के बाहर पहुंची। उसने एक कोने वाली टेबल चुनी जहां से वह छुपकर सब देख सके। ठीक 5 बजे आकाश वहां आया। उसने आज वह नीली शर्ट पहनी थी जो विनीता ने उसे पिछले जन्मदिन पर दी थी और जिसे पहनना उसने बंद कर दिया था। आकाश बार-बार घड़ी देख रहा था, उसके चेहरे पर एक बेचैनी और उत्साह था।
थोड़ी देर बाद एक लड़की वहां आई। मॉडर्न, छोटे बाल, जींस और टॉप में। वह बेहद खूबसूरत थी। आकाश उसे देखते ही खड़ा हो गया। उसने आगे बढ़कर उसे गले लगाया। विनीता का कलेजा मुंह को आ गया। वह 'प्रिया' थी।
दोनों बैठ गए। आकाश उसके हाथ को अपने हाथ में लेकर कुछ बातें कर रहा था। दोनों हंस रहे थे। आकाश इतना खुश दिख रहा था जितना वह विनीता के साथ पिछले एक साल में कभी नहीं दिखा। वेटर आया, उन्होंने कॉफी और कुछ खाने का ऑर्डर दिया। फिर आकाश ने अपनी जेब से एक छोटा सा मखमली डिब्बा निकाला और प्रिया की तरफ बढ़ाया।
विनीता की आंखों के आगे अंधेरा छा गया। उसे लगा अब उसकी सांसें रुक जाएंगी। वह वहां एक पल भी और नहीं रुक सकती थी। वह वहां से भाग खड़ी हुई। घर आकर वह फूट-फूट कर रोई। सब खत्म हो गया था। सात साल का रिश्ता, सात जन्मों के वादे—सब एक पल में झूठे साबित हो गए। आकाश ने उसे धोखा दिया था, वह भी इतनी सफाई से।
उस रात विनीता ने फैसला कर लिया। वह इस रिश्ते में घुट-घुट कर नहीं जिएगी। वह भीख नहीं मांगेगी।
रात को आकाश घर आया। वह बहुत खुश लग रहा था। वह सीटी बजा रहा था।
"विनीता! विनीता, कहाँ हो?" उसने आवाज लगाई।
विनीता बेडरूम में अपना सूटकेस पैक कर रही थी। आकाश कमरे में आया और सूटकेस देखकर ठिठक गया।
"यह क्या हो रहा है? कहीं जा रही हो क्या?" आकाश ने हैरानी से पूछा।
विनीता ने पलटकर आकाश को देखा। उसकी आंखें लाल थीं और सूजी हुई थीं।
"हाँ, जा रही हूँ। हमेशा के लिए। ताकि तुम अपनी उस 'प्रिया' के साथ खुश रह सको।"
आकाश का चेहरा फक पड़ गया। "प्रिया? तुम्हें प्रिया के बारे में कैसे पता?"
"तुम्हें क्या लगा आकाश? मैं बेवकूफ हूँ? मुझे कुछ पता नहीं चलेगा?" विनीता चिल्लाई। "मैं पिछले कई महीनों से देख रही हूँ, तुम बदल गए हो। मुझसे दूर भागते हो, फोन पर छुपकर बातें करते हो। और आज... आज मैंने तुम्हें उस कैफे में देख लिया। तुम उसे अंगूठी दे रहे थे, उसके हाथ चूम रहे थे। शर्म नहीं आई तुम्हें? मेरे प्यार का यह सिला दिया तुमने?"
आकाश हक्का-बक्का खड़ा था। वह कुछ बोलने की कोशिश कर रहा था, लेकिन विनीता का गुस्सा ज्वालामुखी की तरह फट पड़ा था।
"मैंने अपना घर, अपने सपने, अपनी नौकरी—सब छोड़ दिया तुम्हारे लिए। और तुमने क्या किया? बाहर मुंह काला करते रहे? मुझे तुमसे घिन आती है आकाश। मुझे तलाक चाहिए। अब मैं एक पल भी तुम्हारे साथ नहीं रह सकती।"
विनीता ने अपना बैग उठाया और दरवाजे की तरफ बढ़ी।
"विनीता, रुको! एक मिनट मेरी बात तो सुनो!" आकाश ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"मुझे हाथ मत लगाओ!" विनीता ने झटके से हाथ छुड़ाया।
आकाश तेजी से अपनी अलमारी की तरफ गया और वहां से एक फाइल और वही मखमली डिब्बा निकाला जो उसने कैफे में प्रिया को दिया था (या शायद वैसा ही दूसरा)।
"ठीक है, जाना चाहती हो तो चली जाना," आकाश ने वह फाइल और डिब्बा विनीता के सामने बिस्तर पर फेंक दिया। "लेकिन जाने से पहले एक बार यह देख लो कि मैं और प्रिया क्या 'गुल' खिला रहे थे।"
विनीता रुक गई। उसने कांपते हाथों से वह फाइल उठाई। फाइल के ऊपर लिखा था— *"जीवन ज्योति कैंसर अस्पताल - मेडिकल रिपोर्ट्स"*।
विनीता का माथा ठनका। उसने पन्ने पलटे। उसमें किसी मरीज की रिपोर्ट्स थीं, जिसका नाम था— *'स्मिता देसाई'*।
"स्मिता देसाई?" विनीता ने सवालिया नजरों से आकाश को देखा। "यह कौन है? और इसका हमसे क्या लेना-देना?"
आकाश की आंखों में अब आंसू थे। वह बिस्तर के किनारे बैठ गया और सिर झुका लिया।
"विनीता, तुम्हें याद है हमारी शादी से पहले तुम अक्सर अपनी एक सहेली स्मिता का जिक्र करती थी? वह अनाथ थी, तुम्हारे साथ हॉस्टल में रहती थी। जिसकी शादी के बाद तुम उससे संपर्क खो बैठी थी?"
विनीता को याद आया। स्मिता उसकी जिगरी दोस्त थी, लेकिन स्मिता के पति ने उसे विनीता से बात करने से मना कर दिया था।
"हाँ, लेकिन उसका यहाँ क्या काम?"
आकाश ने गहरी सांस ली। "छह महीने पहले, मुझे ऑफिस जाते वक्त सड़क पर एक एक्सीडेंट दिखा। मैं मदद करने रुका। वह औरत स्मिता थी। उसके पति ने उसे छोड़ दिया था। वह एक छोटी सी नौकरी करके अपना पेट पाल रही थी। और उसे... उसे लास्ट स्टेज का ब्लड कैंसर है, विनीता।"
विनीता के हाथ से फाइल छूट गई।
"मैंने उसे पहचान लिया। उसकी हालत बहुत खराब थी। उसके पास इलाज के पैसे नहीं थे, न ही कोई अपना। मैंने उसे अस्पताल में भर्ती कराया। डॉक्टर ने कहा उसके पास ज्यादा वक्त नहीं है। स्मिता ने मुझसे कसम ली थी कि मैं तुम्हें यह न बताऊं। वह नहीं चाहती थी कि तुम उसे उस हालत में देखो और दुखी हो। वह चाहती थी कि तुम उसे उसी हंसती-खेलती स्मिता के रूप में याद रखो।"
"और प्रिया?" विनीता की आवाज अब फुसफुसाहट बन गई थी।
"प्रिया... प्रिया उस अस्पताल की सीनियर ऑन्कोलॉजिस्ट (कैंसर विशेषज्ञ) है," आकाश ने बताया। "मैं पिछले छह महीनों से ऑफिस के बाद रोज अस्पताल जाता था। स्मिता की कीमोथेरेपी, दवाइयाँ, उसका अकेलापन... मैं बस वही बांटने जाता था। मेरे पैसे, मेरा वक्त, सब वहां लग रहा था। इसलिए मैं तुम्हें समय नहीं दे पा रहा था। मैं मानसिक रूप से थक चुका था विनीता, अपनी पत्नी की सहेली को मरते हुए देखकर।"
विनीता सुन्न खड़ी थी।
"और वह अंगूठी..." आकाश ने उस मखमली डिब्बे को उठाया और खोला। उसमें एक पुरानी, साधारण सी सोने की अंगूठी थी।
"यह अंगूठी प्रिया को नहीं, प्रिया ने मुझे दी थी। यह स्मिता की अंगूठी है। आज... आज दोपहर को स्मिता हम सबको छोड़कर चली गई विनीता। मरने से पहले उसने यह अंगूठी डॉक्टर प्रिया को दी और कहा कि यह मैं तुम्हें दे दूँ। यह उसकी तरफ से तुम्हारे लिए आखिरी निशानी है।"
आकाश की आंखों से आंसू बहकर उसके गालों पर गिर रहे थे।
"कैफे में मैं प्रिया से स्मिता की डेथ सर्टिफिकेट और बाकी कागजी कार्यवाही पूरी करने के लिए मिला था। और जब मैंने कहा 'लव यू'... तो वह फोन पर मैं अपनी बहन से बात कर रहा था, जिससे मैंने कुछ पैसे उधार लिए थे स्मिता के अंतिम संस्कार के लिए।"
विनीता के पैरों में अब खड़े रहने की ताकत नहीं थी। वह जमीन पर गिर पड़ी और दहाड़ें मारकर रोने लगी। उसे अपने शक पर, अपनी छोटी सोच पर और अपने पति पर लगाए गए इल्जामों पर इतनी शर्मिंदगी महसूस हो रही थी कि वह मर जाना चाहती थी।
जिस पति को वह धोखेबाज समझ रही थी, वह असल में एक मसीहा बनकर उसकी ही सहेली की सेवा कर रहा था। वह छुप-छुपकर बातें किसी दूसरी औरत से नहीं, बल्कि उसकी सहेली की जिंदगी बचाने के लिए कर रहा था।
"मुझे माफ कर दो आकाश... मुझे माफ कर दो," विनीता ने आकाश के पैर पकड़ लिए। "मैं बहुत बुरी हूँ। मैंने तुम पर शक किया। मैंने तुम्हारी खामोशी को बेवफाई समझ लिया।"
आकाश भी जमीन पर बैठ गया और विनीता को गले लगा लिया। दोनों देर तक रोते रहे। उस रात उनके बीच के सारे गिले-शिकवे आंसुओं में बह गए।
आकाश ने विनीता का चेहरा ऊपर उठाया और उसके आंसू पोंछे। "गलती तुम्हारी नहीं है विनीता। गलती मेरी भी है। मुझे तुमसे सच नहीं छुपाना चाहिए था। मैंने सोचा मैं तुम्हें दुख से बचा लूँगा, पर मैंने तुम्हें उससे भी बड़े दुख—'शक' की आग में धकेल दिया। रिश्ते में पारदर्शिता होनी चाहिए, चाहे सच कितना भी कड़वा क्यों न हो।"
विनीता ने वह पुरानी अंगूठी अपनी उंगली में पहन ली। उसे लगा जैसे स्मिता उसे आशीर्वाद दे रही है। उसने आकाश का हाथ अपने हाथों में लिया और कहा, "आकाश, आज तुमने मुझे सिर्फ प्यार का मतलब नहीं, बल्कि इंसानियत का मतलब भी सिखाया है। मैं वादा करती हूँ, आज के बाद हमारे बीच कोई दीवार नहीं होगी, कोई शक नहीं होगा। हम हर सुख, हर दुख साथ बांटेंगे।"
अगले दिन, विनीता और आकाश ने मिलकर स्मिता का अंतिम संस्कार किया। विनीता ने अपनी सहेली को खो दिया था, लेकिन उसने अपने पति को एक नए रूप में पा लिया था—एक ऐसा पति, जिसकी पूजा की जा सकती थी।
उस दिन के बाद, उनके घर में कभी सन्नाटा नहीं रहा। वहां सिर्फ प्यार और विश्वास की गूंज थी। क्योंकि अब वे जान गए थे कि कभी-कभी आंखों देखा भी सच नहीं होता, और हर खामोशी के पीछे कोई बेवफाई नहीं, बल्कि कोई गहरी मजबूरी या त्याग भी हो सकता है।
**लेखक का संदेश:**
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