पिताजी की बात सुनकर रवि किचन से ठंडे पानी से भरी कटोरी तथा रूमाल लाकर मां के सिर पर पट्टी रखते हुए बोला—"आप सबसे मैं कितनी बार बोल चुका हूँ कि—आप दोनों अब गांव को छोड़कर हमारे साथ शहर रहने चलिए। पर आप लोग मेरी सुनते कहां हो? देखिए माँ का शरीर अब तप रहा है। यहाँ न कोई ढंग का डॉक्टर है, न दवाई। अगर रात-बेरात कुछ हो गया तो?"
रवि की आवाज़ में गुस्सा कम और बेबसी ज़्यादा थी। सामने चारपाई पर लेटी उसकी माँ, सुमित्रा देवी, बुखार से तप रही थीं। उनके बगल में बैठे उसके पिता, मास्टर दीनानाथ, चुपचाप अपनी पत्नी के हाथ को थामे बैठे थे। उनके चेहरे पर एक अजीब सा ठहराव था, जो रवि को और ज़्यादा परेशान कर रहा था।
"बेटा रवि," दीनानाथ जी ने बहुत धीमे स्वर में कहा, "यह बुखार मौसमी है, काढ़ा पिला दिया है, सुबह तक उतर जाएगा। तू नाहक ही परेशान हो रहा है।"
"परेशान न होूँ तो क्या करूँ बाबूजी?" रवि झुंझलाकर खड़ा हो गया। वह कमरे में इधर-उधर टहलने लगा। कमरे की दीवारों से चूना झड़ रहा था। छत की कड़ियाँ पुरानी हो चुकी थीं। "मैं वहाँ शहर में पचास लाख के फ्लैट में रहता हूँ। हर कमरे में एसी है, 24 घंटे बिजली-पानी है, नीचे ही मल्टी-स्पेशलिटी हॉस्पिटल है। और आप लोग? आप लोग इस खंडहर में अपनी ज़िंदगी काट रहे हैं। मुझे शर्म आती है बाबूजी। मेरे दोस्त पूछते हैं कि तेरे माँ-बाप कहाँ रहते हैं, तो मुझे झूठ बोलना पड़ता है। मैं यह नहीं कह सकता कि वे एक टूटे हुए गाँव के मकान में रहते हैं जबकि उनका बेटा लाखों कमाता है।"
दीनानाथ जी ने चश्मा उतारा और उसे अपनी धोती के पल्लू से पोंछते हुए बोले, "बेटा, यह खंडहर नहीं, हमारा 'घर' है। इसमें तुम्हारे दादा-परदादा की सांसें बसी हैं। और रही बात शहर की, तो वहाँ की हवा में वो अपनापन नहीं है जो यहाँ की धूल में है।"
"फिर वही जज़्बाती बातें!" रवि ने माथा पीट लिया। "बाबूजी, जज़्बातों से इलाज नहीं होता। प्रैक्टिकल बनिए। आपकी उम्र 75 हो गई है, माँ 70 की हैं। कब तक कुएं का पानी भरेंगे और लालटेन में जिएंगे?"
उस रात रवि ने खाना नहीं खाया। वह बाहर ओसारे में पड़ी खाट पर लेटा आकाश के तारों को घूरता रहा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसके माता-पिता इतने जिद्दी क्यों हैं। वह तो बस उन्हें सुख देना चाहता था। वह उन्हें उस 'गोल्डन केज' (सोने के पिंजरे) में ले जाना चाहता था जिसे उसने अपनी मेहनत से बनाया था, लेकिन वे इस खुले आसमान को छोड़ने को तैयार ही नहीं थे।
अगली सुबह, रवि की नींद पक्षियों की चहचहाहट और एक समवेत स्वर से खुली।
"अ, आ, इ, ई..."
रवि ने घड़ी देखी। सुबह के छः बजे थे। वह आँखें मलते हुए उठा और बाहर आया। जो नज़ारा उसने देखा, वह उसके लिए नया नहीं था, पर आज नज़रिया अलग था।
ओसारे (वरामदे) में करीब बीस-पच्चीस बच्चे ज़मीन पर टाट-पट्टी बिछाकर बैठे थे। उनके सामने मास्टर दीनानाथ एक ब्लैकबोर्ड पर चाक से कुछ लिख रहे थे। वे बच्चे गाँव के सबसे गरीब तबके के थे—मजदूरों के, किसानों के बच्चे, जिनके कपड़े भले ही मैले थे, पर आँखों में सीखने की चमक थी।
दीनानाथ जी पूरी ऊर्जा के साथ पढ़ा रहे थे। उनकी आवाज़ में वो खनक थी जो रात को रवि से बात करते वक्त गायब थी। माँ, जिनका बुखार अब उतर चुका था, अंदर से स्टील के गिलासों में उन बच्चों के लिए छाछ और भुने हुए चने लेकर आ रही थीं।
"मास्टर जी, नमस्ते!" एक राहगीर ने साइकिल रोककर दीनानाथ जी को प्रणाम किया।
"जीते रहो भइया," दीनानाथ जी ने मुस्कुराकर हाथ उठाया।
रवि एक खंभे की ओट में खड़ा होकर यह सब देख रहा था। उसे याद आया, बचपन में भी बाबूजी ऐसे ही थे। रिटायरमेंट के बाद भी उन्होंने पढ़ाना नहीं छोड़ा था।
तभी सुमित्रा देवी ने रवि को देख लिया। "अरे लल्ला, तू उठ गया? जा दातुन कर ले, मैं चाय चढ़ाती हूँ।"
रवि पास आया। "माँ, तुम ठीक हो अब?"
"हाँ बेटा, मैंने कहा था न, यह अपने घर की हवा है, इसमें बीमारी टिकती नहीं," माँ ने हँसते हुए कहा।
दोपहर को जब बच्चे चले गए, तो रवि ने फिर वही राग छेड़ा।
"बाबूजी, मैंने वापसी की टिकट बुक कर ली है परसों की। आप दोनों का सामान भी पैक कर रहा हूँ। मुझे कोई बहाना नहीं सुनना।"
दीनानाथ जी गंभीर हो गए। "रवि, हम नहीं जा सकते।"
"क्यों नहीं जा सकते? आखिर क्या रखा है यहाँ?" रवि चिल्ला पड़ा। "इन बच्चों को पढ़ाने के लिए? अरे, सरकार ने स्कूल खोले तो हैं। आपको क्या पड़ी है बुढ़ापे में माथापच्ची करने की? वहाँ शहर में चलिए, पार्क में घूमिए, टीवी देखिए, आराम की ज़िंदगी जिएं।"
दीनानाथ जी ने एक गहरा सांस लिया और बोले, "रवि, तुझे लगता है कि शहर में फ्लैट की चारदीवारी में बंद होकर टीवी देखना 'ज़िंदगी' है? बेटा, यहाँ मैं 'मास्टर दीनानाथ' हूँ। जब मैं सड़क से निकलता हूँ, तो दस लोग आदर से सिर झुकाते हैं। किसी के घर में दुःख हो तो वे सलाह लेने मेरे पास आते हैं। किसी के घर में खुशी हो तो पहला न्योता मुझे मिलता है। शहर में मैं क्या हूँ? तुम्हारे फ्लैट नंबर 402 का एक 'बुज़ुर्ग पिता'। लिफ्ट में कोई मिलेगा तो शायद एक झूठी मुस्कान दे देगा, बस। वहाँ मैं भीड़ में खोया हुआ एक चेहरा बन जाऊंगा। यहाँ मैं इस मिट्टी का हिस्सा हूँ।"
"लेकिन बाबूजी, सुविधाओं का क्या? अगर कल को हार्ट अटैक आ गया तो?" रवि ने अपना सबसे बड़ा डर सामने रखा।
"मौत तो बेटा, आईसीयू में भी आती है," दीनानाथ जी ने शांत स्वर में कहा। "लेकिन यहाँ अगर मैं मरूँगा, तो मेरे जनाज़े में पूरा गाँव रोएगा। और वहाँ? वहाँ शायद पड़ोसी को भी पता न चले कि बगल वाले फ्लैट में कोई मर गया है जब तक कि बदबू न आने लगे।"
रवि निरुत्तर हो गया, लेकिन उसका मन नहीं माना। उसे लगा बाबूजी भावुकता में अपने स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं।
शाम को मौसम अचानक बदल गया। तेज आंधी के साथ मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। बिजली कड़कने लगी और देखते ही देखते पूरे गाँव की बत्ती गुल हो गई। रवि का मोबाइल नेटवर्क भी चला गया।
रवि को घबराहट होने लगी। "देखा बाबूजी? यही मैं कह रहा था। अब अंधेरे में बैठिए। मच्छर काटेंगे, गर्मी लगेगी। इन्वर्टर भी कब तक चलेगा?"
तभी दरवाजे पर ज़ोर-ज़ोर से दस्तक हुई।
"मास्टर जी! ओ मास्टर जी!" किसी के घबराए हुए चिल्लाने की आवाज़ आई।
रवि ने दरवाज़ा खोला। बाहर भीगता हुआ गाँव का एक आदमी खड़ा था—रामू काका।
"क्या हुआ रामू काका?" रवि ने पूछा।
"रवि भैया, मास्टर जी को बुलाओ। गज़ब हो गया। मेरे पोते को सांप ने काट लिया है। बारिश में गाड़ी नहीं मिल रही, अस्पताल बहुत दूर है। मास्टर जी को जड़ी-बूटियों का पता है, वही कुछ कर सकते हैं।"
दीनानाथ जी तुरंत अपनी छड़ी और एक पुराना थैला लेकर बाहर आए। "चलो रामू, घबराओ मत।"
"बाबूजी, आप कहाँ जा रहे हैं इस बारिश में? आप गिर जाएंगे!" रवि ने रोकना चाहा।
"हट जा रवि, किसी की जान का सवाल है," दीनानाथ जी ने उसे धक्का दिया और रामू के साथ अंधेरे में निकल गए।
रवि हक्का-बक्का खड़ा रहा। सुमित्रा देवी ने पीछे से कहा, "जा बेटा, छाता लेकर जा। तेरे बाबूजी को दिखाई कम देता है।"
रवि टॉर्च और छाता लेकर उनके पीछे भागा।
रामू काका की झोपड़ी में कोहराम मचा था। बच्चा बेहोश पड़ा था। दीनानाथ जी ने तुरंत मोर्चा संभाला। उन्होंने बच्चे के पैर को एक रस्सी से बांधा, अपने थैले से कुछ पत्तियां निकालीं, उन्हें पत्थर पर पीसा और घाव पर लगाया। वे लगातार बच्चे से बात करते रहे, उसे सोने नहीं दिया।
रवि ने देखा कि उसका पिता, जो घर में चलने के लिए सहारे की मांग करता था, आज किसी योद्धा की तरह काम कर रहा था। उसके चेहरे पर एक अलौकिक तेज था।
करीब एक घंटे बाद, बच्चे ने आँखें खोलीं और रोने लगा।
"जान बच गई! भगवान का लाख-लाख शुक्र है!" रामू काका और उनका परिवार दीनानाथ जी के पैरों में गिर पड़ा।
"मास्टर जी, आप न होते तो आज हमारा चिराग बुझ जाता। आप साक्षात् भगवान हैं हमारे लिए।"
दीनानाथ जी ने उन्हें उठाया और गले लगाया। "भगवान तो ऊपर वाला है रामू, हम तो बस जरिया हैं।"
वापसी में बारिश थम चुकी थी। रवि चुपचाप पिता के पीछे चल रहा था। कीचड़ भरे रास्ते पर दीनानाथ जी के कदम लड़खड़ाए, तो रवि ने तुरंत उन्हें थाम लिया।
"बाबूजी, आपको ठंड लग जाएगी," रवि ने अपनी जैकेट उतारकर पिता को ओढ़ा दी।
घर पहुँचकर, दीनानाथ जी ने कपड़े बदले और गर्म चाय पी।
रवि उनके पास ज़मीन पर बैठ गया। आज उसकी आँखों में वो जिद नहीं थी, बल्कि एक समझ थी जो शायद पिछले तीस सालों में नहीं आई थी।
"बाबूजी," रवि ने धीरे से कहा।
"हम्म," दीनानाथ जी ने अखबार से नज़र हटाए बिना जवाब दिया।
"आज मैंने देखा... वहाँ रामू काका के घर में।"
"क्या देखा?"
"यही कि आप सही कह रहे थे। शहर में आप सिर्फ एक 'रिटायर्ड इंसान' होते, लेकिन यहाँ आप 'जीवनदाता' हैं। मैंने आज तक पैसे को ही सबसे बड़ी ताकत समझा था। मुझे लगता था कि मेरा बैंक बैलेंस और मेरा बड़ा घर ही सब कुछ है। लेकिन आज जब रामू काका आपके पैरों में गिरे थे, तो मुझे अहसास हुआ कि इज़्ज़त और ज़रूरत किसी बैंक खाते में जमा नहीं होती।"
दीनानाथ जी ने चश्मा उतारा और बेटे के सिर पर हाथ रखा। "बेटा, पेड़ को गमले में लगाकर ड्राइंग रूम में सजाया जा सकता है, पर वो पेड़ कभी छांव नहीं दे सकता। छांव देने के लिए उसे धरती की छाती में अपनी जड़ें गड़ानी पड़ती हैं, धूप और बारिश सहनी पड़ती है। हम वटवृक्ष हैं रवि, हमें गमले में मत ले जा। हम वहाँ सूख जाएंगे।"
रवि की आँखों में आंसू आ गए। उसने अपना सिर पिता की गोद में रख दिया। "मैं समझ गया बाबूजी। मैं आपको काटूँगा नहीं। मैं अब आपको जाने के लिए नहीं कहूँगा।"
अगले दो दिन रवि ने अपनी छुट्टियों का अलग तरह से इस्तेमाल किया।
उसने गाँव से जाने की ज़िद छोड़ दी। इसके बजाय, उसने शहर से एक मिस्त्री और इलेक्ट्रिशियन को बुलाया।
उसने घर की छत की मरम्मत करवाई। पूरे घर में इन्वर्टर और सोलर पैनल लगवाया ताकि बिजली जाने पर माँ-बाबूजी को अंधेरे में न रहना पड़े।
उसने बाथरूम को मॉडर्न स्टाइल में रेनोवेट करवाया ताकि घुटनों के दर्द से परेशान माँ को दिक्कत न हो।
जाने वाले दिन, रवि ने दीनानाथ जी के हाथ में एक नया स्मार्टफोन थमाया।
"बाबूजी, इसमें वीडियो कॉलिंग है। रोज़ शाम को मैं आपको देखूँगा। और हाँ, मैंने गाँव के डिस्पेंसरी में बात कर ली है, हर हफ्ते एक डॉक्टर घर आकर आपका चेकअप करेगा। अब आप यहाँ के 'राजा' बनकर रहेंगे, जैसे आप हैं।"
सुमित्रा देवी ने नम आँखों से बेटे की बलाएं लीं। "जुग-जुग जियो मेरे लाल। तूने हमें हमारा बुढ़ापा वापस दे दिया।"
रवि जब अपनी कार में बैठ रहा था, तो उसने देखा कि ओसारे में फिर से बच्चों की क्लास शुरू हो गई है। बच्चे एक सुर में पहाड़े गा रहे थे। मास्टर दीनानाथ अपनी छड़ी घुमाते हुए उन्हें पढ़ा रहे थे।
रवि ने कार का शीशा नीचे किया और उस पुराने, जर्जर लेकिन सुकून से भरे घर को एक आखिरी बार देखा। उसे अब वो घर खंडहर नहीं, बल्कि एक मंदिर लग रहा था।
उसने मन ही मन सोचा—"सचमुच, सोने के पिंजरे में पंछी सुरक्षित तो रह सकता है, पर उड़ नहीं सकता। और मेरे माता-पिता को उड़ान प्यारी है, सुरक्षा नहीं।"
कार धूल उड़ाती हुई शहर की तरफ बढ़ गई, लेकिन रवि का एक हिस्सा हमेशा के लिए उस गाँव की मिट्टी में, उस ओसारे में छूट गया था।
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**कहानी का निष्कर्ष:**
जीवन की गुणवत्ता (Quality of Life) सिर्फ सुख-सुविधाओं से नहीं मापी जाती। इसका असली पैमाना यह है कि आप अपने आस-पास के लोगों के लिए कितने मायने रखते हैं। रवि ने समझा कि माता-पिता को शहर ले जाकर वह उन्हें 'सुविधा' तो दे सकता था, लेकिन उनका 'उद्देश्य' (Purpose) छीन लेता। और जिस इंसान के जीवन में कोई उद्देश्य न हो, उसका अंत बहुत जल्दी हो जाता है।
**कहानी के अंत में आपसे एक सवाल:**
क्या आप भी अपने माता-पिता को गाँव से शहर लाने की जिद्द कर रहे हैं? एक बार उनसे पूछिए कि उनकी खुशी किसमें है—आलीशान फ्लैट की तनहाई में या गाँव के चबूतरे की बतकही में?
**"अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ और आपकी आँखों को नम किया, तो लाइक, कमेंट और शेयर जरूर करें। रिश्तों की अहमियत समझने और ऐसी ही मार्मिक पारिवारिक कहानियाँ पढ़ने के लिए इस पेज को फ़ॉलो करें। धन्यवाद!"**
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