हमने इस घर को वापस खरीद लिया है पापा," आलोक ने पिता को गले लगा लिया। "और रश्मि ने पिछले एक महीने में यहाँ के ठेकेदार से बात करके इसे रेनोवेट भी करवा दिया। यह आपका रिटायरमेंट गिफ्ट है। अब आपको मुंबई के प्रदूषण में घुटने की ज़रूरत नहीं। आप अपनी नीम की छाँव में रहिए।"
मुंबई के पॉश इलाके 'जुहू' की 25वीं मंजिल पर बने उस आलीशान फ्लैट की बालकनी में खड़े होकर दीनानाथ जी नीचे आती-जाती गाड़ियों की कतार और समुद्र की लहरों को देख रहे थे। उनके हाथ में अदरक वाली चाय का कप था, लेकिन उनका मन कहीं और ही भटक रहा था।
दीनानाथ जी और उनकी पत्नी, सावित्री देवी, दो महीने पहले ही अपने बेटे आलोक और बहू रश्मि के पास रहने आए थे। आलोक एक मल्टीनेशनल कंपनी में वीपी (Vice President) था और रश्मि खुद एक सफल इंटीरियर डिज़ाइनर थी। दोनों ने प्रेम विवाह किया था और अपने करियर में बहुत ऊंचाइयों पर थे।
दीनानाथ जी ने अपनी पूरी ज़िंदगी बनारस के पास एक छोटे से कस्बे में गुज़ारी थी। वहाँ उनका एक पुश्तैनी मकान था—कच्ची ईंटों और गारे से बना, लेकिन बड़ा सा आंगन वाला घर। उस घर के बीचों-बीच एक नीम का पेड़ था और तुलसी का चौरा। दीनानाथ जी एक साधारण स्कूल शिक्षक थे। उनकी तनख्वाह बहुत कम थी, लेकिन सपनों की उड़ान बहुत ऊंची थी। आलोक को पढ़ाने के लिए, उसे इंजीनियरिंग कराने के लिए और फिर उसे विदेश भेजने के लिए, दीनानाथ जी ने अपनी एक-एक इच्छा का गला घोंटा था।
यहाँ तक कि जब आलोक को अमेरिका में मास्टर्स करने के लिए बड़ी रकम की ज़रूरत पड़ी थी, तो दीनानाथ जी ने दिल पर पत्थर रखकर अपना वह पुश्तैनी मकान, जिसे वो अपनी जान से ज्यादा चाहते थे, गिरवी रख दिया था। बाद में कर्ज़ न चुका पाने के कारण वह मकान हाथ से निकल गया और उन्हें एक छोटे से किराए के मकान में शिफ्ट होना पड़ा। लेकिन उन्होंने आलोक को कभी इस बात की भनक नहीं लगने दी कि उसकी 'डिग्री' की कीमत उनके 'आशियाने' ने चुकाई है।
आज आलोक सब कुछ था। दौलत, शोहरत, इज़्ज़त।
शाम का वक़्त था। आलोक और रश्मि ऑफिस से लौटे थे और बहुत उत्साहित लग रहे थे।
"पापा, मम्मी! आज एक बहुत बड़ी खुशखबरी है," आलोक ने सोफे पर बैठते हुए टाई ढीली की और रश्मि की तरफ मुस्कुराया।
सावित्री देवी रसोई से पानी लेकर आईं। "क्या हुआ बेटा? प्रमोशन मिला क्या?"
"उससे भी बड़ी बात है माँ," रश्मि ने चहकते हुए कहा। "हम पिछले छह महीने से जिस 'पेंटहाउस' (Penthouse) को खरीदने की कोशिश कर रहे थे, आज उसकी डील फाइनल हो गई है! लोखंडवाला में 4000 स्क्वायर फीट का डुप्लेक्स। बिल्कुल सपनों जैसा घर। उसमें स्विमिंग पूल भी है और पर्सनल जिम भी।"
दीनानाथ जी और सावित्री देवी के चेहरों पर एक फीकी सी मुस्कान आ गई।
"बहुत बधाई हो बेटा," दीनानाथ जी ने कहा, "तुम दोनों की मेहनत रंग लाई। भगवान तुम्हें और तरक्की दे।"
"पापा, अगले हफ्ते हम रजिस्ट्री के लिए जा रहे हैं। आपको और मम्मी को भी चलना होगा। आखिर गृह-प्रवेश तो आप ही करेंगे," आलोक ने उत्साह से कहा।
उस रात खाने की मेज़ पर चर्चा सिर्फ़ नए पेंटहाउस की हो रही थी। रश्मि बता रही थी कि वो दीवारों पर कौन सा इटैलियन मार्बल लगवाएगी और आलोक होम-थिएटर की प्लानिंग कर रहा था। दीनानाथ जी चुपचाप खाना खा रहे थे।
देर रात, जब सब सोने चले गए, तो रश्मि पानी पीने के लिए उठी। उसने देखा कि दीनानाथ जी बालकनी में अकेले बैठे हैं। वह दबे पांव उनके पास गई।
"पापा? आप सोए नहीं?"
दीनानाथ जी चौंक गए। उन्होंने जल्दी से अपनी आँखें पोंछीं। "अरे नहीं बहू, बस... नींद नहीं आ रही थी। शहर की हवा में वो ठंडक नहीं है जो हमारे कस्बे की रातों में होती थी।"
रश्मि ने गौर किया कि उनकी आँखों में आंसू थे।
"आप रो रहे थे पापा?" रश्मि ने उनके पास घुटनों पर बैठकर पूछा।
दीनानाथ जी ने एक गहरी सांस ली। "नहीं बेटा, बस पुरानी यादें हैं। आज तुम लोग नया घर ले रहे हो, तो मुझे अपना पुराना घर याद आ गया। वो नीम का पेड़, वो आंगन... पता है रश्मि, जब हमने वो घर बेचा था, तो ऐसा लगा था जैसे मैंने अपना शरीर बेच दिया हो ताकि मेरी आत्मा (आलोक) बच सके। इंसान ईंट-पत्थर जोड़कर घर बनाता है, पर उसे छोड़ते वक़्त जान निकल जाती है। पर ख़ैर... आलोक का भविष्य बन गया, घर की कुर्बानी वसूल हो गई।"
रश्मि चुपचाप सुनती रही। उसने कुछ नहीं कहा, बस दीनानाथ जी का हाथ थामे रखा।
अगले एक हफ्ते तक घर में नए पेंटहाउस की तैयारियाँ चलती रहीं। आलोक बहुत व्यस्त था, बैंक के पेपर्स, लोन की फॉर्मेलिटीज़। रश्मि भी अपने काम में लगी थी, लेकिन वह आलोक से कुछ अलग तरह की बातें कर रही थी, जो दीनानाथ जी और सावित्री देवी को समझ नहीं आ रही थीं। रश्मि अक्सर फ़ोन पर किसी 'पांडे जी' से बात करती थी और नक्शों पर चर्चा करती थी।
रजिस्ट्री का दिन आ गया।
आलोक ने अपने माता-पिता को तैयार होने के लिए कहा। "पापा, सबसे अच्छे वाले कपड़े पहनना। आज हमारे जीवन का सबसे बड़ा इन्वेस्टमेंट होने जा रहा है।"
दीनानाथ जी ने अपना पुराना, सहेज कर रखा हुआ सूट पहना और सावित्री देवी ने अपनी बनारसी साड़ी। वे दोनों बेटे की खुशी में खुश थे, लेकिन उनके दिलों में एक कसक थी—अपने घर की।
गाड़ी चल पड़ी। लेकिन आधे घंटे बाद दीनानाथ जी ने महसूस किया कि गाड़ी लोखंडवाला की तरफ नहीं, बल्कि एयरपोर्ट की तरफ जा रही है।
"अरे बेटा, हम कहाँ जा रहे हैं? रजिस्ट्रार का ऑफिस तो शहर में है न?" दीनानाथ जी ने घबराते हुए पूछा।
आलोक ड्राइविंग सीट से मुस्कुराया। "पापा, वो... दरअसल जिस प्रॉपर्टी की रजिस्ट्री होनी है, वो मुंबई में नहीं है। हमें फ्लाइट लेनी पड़ेगी।"
दीनानाथ जी और सावित्री देवी हैरान थे। "फ्लाइट? पर तुमने तो कहा था लोखंडवाला में..."
"सरप्राइज़ है पापा, चलिए तो सही," रश्मि ने पीछे की सीट से उनका कंधा दबाते हुए कहा।
हवाई जहाज़ का सफर, फिर दो घंटे की टैक्सी की यात्रा। जैसे-जैसे रास्ता आगे बढ़ रहा था, दीनानाथ जी की धड़कनें तेज़ हो रही थीं। यह रास्ता जाना-पहचाना था। यह वही कच्ची सड़क, वही पुराने पेड़, वही नहर... यह तो उनके कस्बे का रास्ता था!
गाड़ी एक पुरानी, लेकिन नई रंगी-पुती हवेली के सामने आकर रुकी।
दीनानाथ जी और सावित्री देवी को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। यह उनका ही घर था! वही 'शांति-कुंज' जिसे उन्होंने पंद्रह साल पहले आंसुओं के साथ अलविदा कहा था। लेकिन अब यह घर खंडहर नहीं था। इसकी दीवारों पर नया पीला पेंट था, नीम का पेड़ हरा-भरा था और आंगन में नई तुलसी लगी थी।
दीनानाथ जी लड़खड़ाते कदमों से गाड़ी से उतरे। उन्होंने गेट पर हाथ रखा। लोहे का गेट ठंडा था, लेकिन उनके दिल को जो गर्माहट मिली, वो बयां नहीं की जा सकती थी।
"यह... यह कैसे?" दीनानाथ जी की आवाज़ भर्रा गई।
आलोक उनके पास आया और चाबियों का एक गुच्छा उनकी हथेली पर रख दिया।
"पापा," आलोक ने नम आँखों से कहा, "हम पेंटहाउस लेने ही वाले थे। लेकिन पिछले हफ्ते रश्मि ने मुझसे कहा कि हम कांच के महलों में रहकर क्या करेंगे अगर हमारे 'जड़ों' को सींचने वाले माली (आप दोनों) ही उदास रहें। रश्मि ने मुझे बताया कि आप बालकनी में बैठकर रो रहे थे।"
रश्मि आगे आई। "पापा, आप कहते थे न कि घर की कुर्बानी आलोक के भविष्य के लिए थी। तो अब जब भविष्य बन गया है, तो क्या उस भूतकाल को वापस लाने का हक़ हमें नहीं है? हमने पता किया, जिस सेठ ने यह घर खरीदा था, वो इसे बेचना चाहता था। मैंने और आलोक ने फैसला किया कि हमें मुंबई में दूसरा घर नहीं चाहिए। हमारे पास एक घर है। हमें 'आपका' घर वापस चाहिए।"
"हमने इस घर को वापस खरीद लिया है पापा," आलोक ने पिता को गले लगा लिया। "और रश्मि ने पिछले एक महीने में यहाँ के ठेकेदार से बात करके इसे रेनोवेट भी करवा दिया। यह आपका रिटायरमेंट गिफ्ट है। अब आपको मुंबई के प्रदूषण में घुटने की ज़रूरत नहीं। आप अपनी नीम की छाँव में रहिए।"
सावित्री देवी दौड़कर आंगन में गईं और तुलसी के पौधे के पास बैठकर रोने लगीं। यह खुशी के आंसू थे। उन्होंने उस ज़मीन को चूमा जहाँ उन्होंने अपने बेटे का बचपन देखा था।
दीनानाथ जी ने कांपते हाथों से रश्मि के सिर पर हाथ रखा।
"बहू... लोग कहते हैं कि बेटा कुल का दीपक होता है। पर आज मुझे समझ आया कि बेटियाँ और बहुएं उस दीपक की लौ होती हैं जो घर को रोशन करती हैं। अगर तू न होती, तो आलोक शायद यह कभी न समझ पाता। तूने मुझे मेरी ज़िंदगी वापस लौटा दी।"
"पापा," रश्मि मुस्कुराई, "पेंटहाउस तो हम दस साल बाद भी खरीद सकते हैं। लेकिन आपकी यह मुस्कान... यह किसी भी प्रॉपर्टी से महंगी है। और वैसे भी, मुझे छुट्टियों में आने के लिए एक 'देसी' जगह चाहिए थी न!"
तभी पड़ोस के शर्मा जी और मिश्रा जी आ गए। पूरा मोहल्ला इकट्ठा हो गया। ढोल बजने लगे। पता चला कि आलोक ने पूरे मोहल्ले के लिए दावत रखी है।
उस शाम, दीनानाथ जी अपनी पुरानी खाट पर आंगन में बैठे थे। ठंडी हवा चल रही थी और नीम के पत्ते झर रहे थे। आलोक और रश्मि उनके पास नीचे दरी पर बैठे थे।
दीनानाथ जी ने कहा, "बेटा, आज तक मैंने सोचा था कि मैं सबसे अमीर आदमी तब बनूँगा जब तुम्हारे पास बड़ी गाड़ियाँ और बंगला होगा। पर आज मुझे लग रहा है कि मैं अमीर अब हुआ हूँ, क्योंकि मेरे पास ऐसी औलाद है जिसने मेरी 'खोई हुई वसीयत' मुझे वापस लौटा दी।"
आलोक ने रश्मि का हाथ थाम लिया। उसे गर्व था अपनी पत्नी पर। उसने सोचा था कि रश्मि, जो इतनी मॉडर्न है, शायद गांव के घर के लिए कभी राज़ी न होती। लेकिन रश्मि ने उसे सिखा दिया था कि मॉडर्न होने का मतलब जड़ों को काटना नहीं, बल्कि उन्हें और मजबूती से थामना होता है।
उस रात उस पुराने घर की दीवारों ने एक नई कहानी सुनी। यह कहानी सिर्फ़ ईंट-गारे की नहीं थी, यह कहानी थी 'वापसी' की। एक बेटे की अपने पिता के स्वाभिमान की वापसी, और एक बहू की अपने सास-ससुर के खोए हुए सुकून की वापसी।
दीनानाथ जी चैन की नींद सोए, और उस नींद में कोई सपना नहीं था, क्योंकि हकीकत अब किसी भी सपने से ज़्यादा खूबसूरत थी।
लेखिका : प्रियंका नाथ
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