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बेटी का नमक और रिश्तों की नई रसीद

 अस्पताल के आईसीयू के बाहर लगी लाल बत्ती जितनी बार जलती-बुझती, रमेश बाबू का दिल उतनी ही जोर से धड़कता। माथे पर पसीना और हाथों में बैंक की पासबुक भींचे वो कोने वाली बेंच पर सुन्न बैठे थे। डॉक्टर ने साफ कह दिया था—ओपन हार्ट सर्जरी करनी होगी, और खर्चा कम से कम पाँच लाख आएगा।

रमेश बाबू एक रिटायर्ड क्लर्क थे। जीवन भर की जमा-पूंजी इकलौती बेटी, सुप्रिया की शादी में धूमधाम से खर्च कर दी थी। जो थोड़ा बहुत बचा था, वो रिटायरमेंट के बाद के छोटे-मोटे खर्चों में निकल गया। अब पासबुक में मात्र पचास हजार रुपये थे।

तभी उनका दामाद, विवेक, कॉफी के दो कप लेकर आया और उनके बगल में बैठ गया।

"बाबूजी, आप चिंता मत कीजिये। मैंने ऑफिस में लोन के लिए बात कर ली है, और बाकी क्रेडिट कार्ड से हो जाएगा। आप बस डॉक्टर से सर्जरी की तारीख पक्की कीजिये," विवेक ने बहुत सहजता से कहा।

रमेश बाबू ने विवेक के हाथ को धीरे से हटा दिया। उनकी आँखों में एक अजीब सी तड़प थी।

"नहीं बेटा। यह नहीं हो सकता। शास्त्रों में लिखा है, बेटी के घर का पानी भी नहीं पीना चाहिए, और मैं तुमसे अपने इलाज के लिए लाखों रुपये ले लूं? यह पाप मैं मरते दम तक अपने सिर नहीं ले सकता। मेरी आत्मा को शांति नहीं मिलेगी विवेक। मैं गाँव वाली ज़मीन बेचने की बात करता हूँ किसी दलाल से।"

"लेकिन बाबूजी, ज़मीन बिकने में महीनों लग जाएंगे, और डॉक्टर ने कहा है समय कम है," विवेक ने झुंझलाते हुए समझाया।

"तो फिर जो मंजूर-ए-खुदा होगा, वही सही। पर मैं दामाद के पैसों से अपनी सांसें नहीं खरीदूंगा," रमेश बाबू अपनी पुरानी मान्यताओं और स्वाभिमान की ज़िद पर अड़े थे। सुप्रिया दूर खड़ी रो रही थी, उसे अपने पिता का जिद्दी स्वभाव पता था। वह जानती थी कि उसके पिता उस पुरानी पीढ़ी के हैं जहाँ 'लड़की वाले' होना मतलब हमेशा झुके रहना और 'देने वाला' हाथ रखना होता है, 'लेने वाला' नहीं।

अगली सुबह, अस्पताल के गलियारे में एक जानी-पहचानी आवाज़ गूंजी।

"अरे समधी जी! बीमारी में तो इंसान भगवान का नाम लेता है, और आप यहाँ बैठकर हिसाब-किताब लगा रहे हैं?"

रमेश बाबू ने सिर उठाकर देखा। सामने विवेक की माँ, यानी सुप्रिया की सास, कमला देवी खड़ी थीं। साधारण सी सूती साड़ी में भी उनके चेहरे पर एक अलग ही रोब था। उनके पीछे ड्राइवर एक फलों की टोकरी और कुछ कागज़ात लेकर खड़ा था।

रमेश बाबू सकपका गए। "अरे समधिन जी, आप? यहाँ तकलीफ क्यों की? मैं ठीक हूँ, बस थोड़ी घबराहट थी।"

कमला देवी ने पास आकर बेंच पर जगह बनाई और बैठ गईं। उन्होंने ड्राइवर से वो कागज़ात लिए और रमेश बाबू की गोद में रख दिए।

"यह लीजिये। यह अस्पताल का बिल है। जमा हो गया है। सर्जरी कल सुबह की है।"

रमेश बाबू को जैसे करंट लग गया। वे झटके से खड़े हो गए।

"यह क्या अनर्थ कर दिया आपने? आप लड़के वाले हैं, हम लड़की वाले। हमारा फर्ज आपको देना है, आपसे लेना नहीं। यह तो घोर पाप है। समाज क्या कहेगा कि रमेश ने बेटी बेचकर अपना इलाज कराया? मैं यह पैसे आपको अभी तो नहीं, पर ज़मीन बेचकर पाई-पाई लौटा दूंगा।" उनका चेहरा शर्म और गुस्से से लाल हो रहा था।

कमला देवी ने शांत भाव से पानी की बोतल खोली और रमेश बाबू की ओर बढ़ाई। "पहले पानी पीजिये।"

"मैंने कहा न, मैं बेटी के ससुराल का..."

"चुपचाप पी लीजिये!" कमला देवी की आवाज़ में एक माँ वाली डांट थी। रमेश बाबू सहम गए और दो घूंट पानी पी लिया।

कमला देवी ने एक गहरी सांस ली और रमेश बाबू की आँखों में आँखें डालकर बोलीं, "रमेश भाई साहब, एक बात बताइए। पिछले साल जब मुझे टाइफाइड हुआ था, तो आपकी बेटी सुप्रिया ने मेरी दिन-रात सेवा की थी। मेरे गंदे कपड़े धोए, मुझे अपने हाथों से खिचड़ी खिलाई, रात-रात भर जागी। वो किसकी बेटी है?"

"जी... मेरी," रमेश बाबू ने धीमे स्वर में कहा।

"तो जब आपकी बेटी मेरी सेवा करती है, तब आपको पाप नहीं लगता? तब आपको नहीं लगता कि आप हम पर एहसान कर रहे हैं? जब वो हमारे घर को स्वर्ग बनाती है, तब आपको अपना पलड़ा भारी नहीं लगता?"

रमेश बाबू चुप रहे।

कमला देवी ने अपनी बात जारी रखी, "देखिए समधी जी, यह जो 'लड़की वाले' और 'लड़के वाले' की दीवार है न, यह हमने बनाई है। जब सुप्रिया मेरे घर आई, तो वो मेरी बेटी बन गई। तो जब आप मुसीबत में हैं, तो क्या विवेक आपका बेटा नहीं बन सकता? अगर आज आपका अपना सगा बेटा होता और वो इलाज कराता, तो क्या आप उसे मना करते? क्या तब भी आप ज़मीन बेचने जाते?"

"बेटा तो अपना होता है, वो तो खून है," रमेश बाबू बुदबुदाए।

"यही तो आपकी भूल है," कमला देवी ने स्नेह से उनके कंधे पर हाथ रखा। "आपने अपनी जिगर का टुकड़ा, अपना खून हमें सौंपा है। सुप्रिया से बड़ा धन और क्या हो सकता है हमारे लिए? उस धन के आगे इन कागज़ के नोटों की क्या औकात? और सुनिए, यह पैसे विवेक ने नहीं दिए हैं। यह पैसे मैंने दिए हैं—अपनी पेंशन से। और मैं आपकी समधिन के हक़ से नहीं, आपकी 'बड़ी बहन' के हक़ से आदेश दे रही हूँ कि चुपचाप इलाज करवाइये।"

रमेश बाबू की आँखों से झर-झर आंसू बहने लगे। उनका बरसों पुराना अहंकार, जिसे वो स्वाभिमान समझते थे, कमला देवी की ममता और तर्कों के आगे पिघल गया था।

"पर समाज..." रमेश बाबू ने आखिरी दलील दी।

"समाज गया तेल लेने!" कमला देवी ने हंसते हुए कहा। "अगर समाज रोटी देने नहीं आता, तो समाज को ताने देने का भी हक़ नहीं है। और वैसे भी, अब ज़माना बदल गया है भाई साहब। अब रिश्ते बराबरी के हैं। अगर बेटी के मां-बाप बुढ़ापे में अकेले होंगे, तो क्या दामाद का फर्ज नहीं बनता कि वो लाठी बने? या सिर्फ इसलिए कि उसने उस घर की बेटी से शादी की है, वो उस घर की जिम्मेदारियों से मुक्त हो गया? नहीं। अब 'कन्यादान' के साथ-साथ 'पुत्र-प्राप्ति' का भी रिवाज शुरू करना होगा हम जैसे बुजुर्गों को।"

रमेश बाबू ने कांपते हाथों से कमला देवी के हाथ जोड़ लिए। "आपने आज मेरी आँखें खोल दीं कमला जी। मैं डर रहा था कि दामाद का पैसा लेकर मैं छोटा हो जाऊंगा, पर आपने तो मुझे बेटा देकर मेरा कद और बढ़ा दिया।"

सुप्रिया और विवेक, जो दूर खड़े यह सब सुन रहे थे, दौड़कर आए। सुप्रिया ने अपनी सास को गले लगा लिया।

"माँ, आप सच में ग्रेट हो।"

कमला देवी ने सुप्रिया के आंसू पोंछे और रमेश बाबू की तरफ इशारा करते हुए बोलीं, "चलो अब, ऑपरेशन की तैयारी करो। और हाँ समधी जी, ठीक होने के बाद वो ज़मीन मत बेचना, उस पर एक छोटा सा फार्महाउस बनाना। हम दोनों परिवार वहीं छुट्टियां मनाने चलेंगे। आखिर बुढ़ापा काटने के लिए एक-दूसरे का सहारा ही तो काम आता है।"

अस्पताल का वो ठंडा गलियारा अचानक रिश्तों की गर्माहट से भर गया था। उस दिन रमेश बाबू का सिर्फ दिल का ऑपरेशन नहीं हुआ था, बल्कि उनकी सोच का भी सफल ऑपरेशन हो गया था। उन्होंने जान लिया था कि बेटी के घर का पानी पीने से पाप नहीं लगता, बल्कि अगर रिश्तों में प्यार और अपनापन हो, तो वो पानी अमृत बन जाता है।

निष्कर्ष:

रिश्ते खून से नहीं, एहसास से बनते हैं। 'लड़की वाला' होना कोई दंड नहीं है और 'लड़के वाला' होना कोई विशेषाधिकार नहीं। जब दो परिवार मिलते हैं, तो सुख और दुख दोनों साँझा होने चाहिए। यही सच्चे परिवार की परिभाषा है।


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