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नाराज़गी का ताला और अपनेपन की चाबी

 बनारस की तंग गलियों में दीनानाथ जी की 'साड़ियों की दुकान' थी। यह दुकान सिर्फ ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि उनके पूर्वजों की निशानी थी। दीनानाथ जी पुराने ख्यालात के, वसूलों वाले आदमी थे। उनका बेटा, रोहन, एमबीए करके नए ज़माने की उड़ान भरना चाहता था।


रोज़ शाम को दुकान बंद करने के बाद घर में एक ही बहस होती।

"पापा, इस दुकान को बेचकर मॉल में शोरूम लेते हैं। ऑनलाइन बिज़नेस शुरू करते हैं। यहाँ गलियों में सड़ने से कुछ नहीं होगा," रोहन खीझते हुए कहता।


"खबरदार जो इस दुकान को बेचने की बात की! यह मेरे बाप-दादा की अमानत है। मैं इसे तुम्हारे मॉडर्न चोचलों के लिए नीलाम नहीं होने दूंगा," दीनानाथ जी का चेहरा गुस्से से लाल हो जाता।


एक रात, बहस बहुत बढ़ गई। रोहन ने आवेश में आकर वो कह दिया जो उसे नहीं कहना चाहिए था।

"आपकी यही पिछड़ी सोच हमें कभी आगे नहीं बढ़ने देगी! आप अपनी ये खटारा दुकान और अपनी ये झूठी शान अपने पास रखिये। मैं जा रहा हूँ, और अब तभी लौटूंगा जब कुछ बन जाऊंगा। आज से समझ लीजियेगा कि आपका कोई बेटा नहीं है।"


दीनानाथ जी सन्न रह गए। उन्होंने कांपती आवाज़ में कहा, "जा! निकल जा! अगर तू मेरा बेटा होता तो मेरी जड़ों की इज़्ज़त करता। जा, आज से मेरे लिए भी तू मर गया।"


माँ, सुमित्रा देवी, रोती रहीं, पल्लू से मुंह छिपाए दोनों को रोकने की कोशिश करती रहीं, लेकिन मर्दों के अहंकार के आगे एक माँ की ममता हार गई। रोहन उसी रात घर छोड़कर चला गया।


तीन साल बीत गए।


इन तीन सालों में न रोहन ने मुड़कर देखा, न दीनानाथ जी ने उसका नाम लिया। सुमित्रा जी छुप-छुप कर बेटे को फोन करती थीं, लेकिन बाप-बेटे के बीच 'अहंकार' की दीवार अंबुजा सीमेंट से भी पक्की हो चुकी थी। रोहन बैंगलोर में एक अच्छी कंपनी में सेटल हो गया था, लेकिन उसके दिल के एक कोने में बनारस की वो गली हमेशा चुभती रहती थी।


उधर, बनारस में हालात बदल रहे थे। शहर में एक बाहुबली बिल्डर की नज़र दीनानाथ जी की पुश्तैनी दुकान पर थी। वह पूरी मार्केट को तोड़कर वहां कॉम्प्लेक्स बनाना चाहता था। आस-पास के कई दुकानदारों ने डर के मारे दुकानें बेच दी थीं, लेकिन दीनानाथ जी अडिग थे।


एक दिन, बिल्डर के गुंडे दुकान पर आए। उन्होंने दीनानाथ जी को धमकाया, "चाचा, प्यार से मान जाओ। साइन कर दो, वरना दुकान भी जाएगी और जान भी।"


दीनानाथ जी ने अपनी लाठी उठाई, "जब तक ज़िंदा हूँ, यह शटर नहीं गिरेगा।"

गुंडों ने धक्का-मुक्की की। दीनानाथ जी गिर पड़े। उनके सिर पर चोट लगी। आस-पास के लोग तमाशबीन बने खड़े रहे, कोई आगे नहीं आया।


अस्पताल के बिस्तर पर पड़े दीनानाथ जी की हालत नाजुक थी। सिर पर पट्टियां बंधी थीं। सुमित्रा जी का रो-रोकर बुरा हाल था। उन्होंने छुपकर रोहन को फोन किया।

"बेटा... तेरे पापा... उन्हें गुंडों ने मारा है। दुकान हड़पना चाहते हैं। डॉक्टर कह रहे हैं कि वो डिप्रेशन में हैं, जीने की इच्छा छोड़ चुके हैं। अब तो आजा..."


रोहन उस वक्त मीटिंग में था। माँ की आवाज़ सुनते ही उसके हाथ से पेन गिर गया। जिस पिता को उसने 'मरा हुआ' घोषित कर दिया था, आज उसके सचमुच मरने की खबर ने रोहन के अंदर के बेटे को झकझोर दिया। उसका सारा अहंकार, सारी जिद्द, कांच की तरह चकनाचूर हो गई।


वह अगली ही फ्लाइट पकड़कर बनारस पहुंचा।


जब वह अस्पताल के कमरे में दाखिल हुआ, तो दीनानाथ जी सो रहे थे। चेहरे पर झुर्रियां बढ़ गई थीं, शरीर कमज़ोर हो गया था। रोहन की आँखों से आंसू बह निकले। उसने धीरे से पिता का हाथ पकड़ा। वो हाथ, जिसने बचपन में उसे उंगली पकड़कर चलना सिखाया था, आज कितना बेजान लग रहा था।


दीनानाथ जी ने आँखें खोलीं। धुंधली नज़रों से सामने देखा। रोहन? या भ्रम?

उन्होंने मुंह फेर लिया। "क्यों आया है? मैं तो मर गया था न तेरे लिए?" उनकी आवाज़ में कंपन था, गुस्सा था, पर दर्द ज्यादा था।


रोहन ने उनके पैर पकड़ लिए। "पापा, आप मार लीजिये, घर से निकाल दीजिये, पर मुंह मत फेरिये। मैं गलत था। मैं बहुत गलत था।"


दीनानाथ जी ने कुछ नहीं कहा, बस आँखें बंद कर लीं। आंसू उनकी कनपटी से ढुलक कर तकिये में समा गए।


अगले दिन, रोहन दुकान पर गया। वहां बिल्डर के आदमी फिर से हंगामा कर रहे थे। दुकान का ताला तोड़ने की कोशिश हो रही थी।

"ए बुड्ढे! आज तो साइन करके ही जाएगा..." एक गुंडा चिल्लाया।


तभी एक मजबूत हाथ ने गुंडे की कलाई पकड़ी। गुंडे ने मुड़कर देखा। सामने रोहन खड़ा था—आंखों में अंगारे लिए।

"हाथ छोड़," गुंडा गुर्राया।


रोहन ने एक जोरदार तमाचा गुंडे के गाल पर रसीद किया। "वो 'बुड्ढा' नहीं, मेरा बाप है। और यह दुकान ईंट-पत्थर नहीं, मेरे पिता की पगड़ी है। अगर किसी ने इस शटर को हाथ भी लगाया, तो हाथ उखाड़ कर गंगा में बहा दूंगा।"


रोहन ने अपनी शर्ट की आस्तीन ऊपर चढ़ाई। वह एमबीए वाला सॉफ्ट लड़का नहीं लग रहा था, वह बनारस का देसी छोरा लग रहा था। उसकी दहाड़ सुनकर आस-पास के जो दुकानदार डर कर छुपे थे, वो भी बाहर निकल आए। भीड़ जमा हो गई। गुंडों को भागना पड़ा।


शाम को रोहन घर लौटा। दीनानाथ जी को अस्पताल से छुट्टी मिल गई थी। वे घर के आंगन में कुर्सी पर बैठे थे। सुमित्रा जी उनके पैरों में दवा लगा रही थीं।

रोहन आया और चुपचाप उनके सामने खड़ा हो गया।


"दुकान के कागज़..." रोहन ने जेब से कुछ कागज़ निकालकर मेज पर रखे।

दीनानाथ जी ने सोचा कि बेटा दुकान बेचने के पेपर्स लाया है। उनका दिल बैठ गया। उन्होंने नफरत से रोहन को देखा। "तू फिर वही करने आया है? बेच दी दुकान?"


"नहीं पापा," रोहन ने घुटनों के बल बैठकर पिता के घुटने पर सिर रख दिया। "ये स्टे-ऑर्डर (Stay Order) के कागज़ हैं। मैंने अपने वकील दोस्तों से बात करके कोर्ट से स्टे ले लिया है। अब कोई माई का लाल आपकी दुकान को हाथ नहीं लगा सकता। और मैंने अपनी बैंगलोर वाली जॉब छोड़ दी है।"


दीनानाथ जी चौंक गए। "क्या? क्यों?"


"क्योंकि मुझे समझ आ गया है पापा," रोहन का गला भर आया। "दुनिया में नौकरियां बहुत मिलेंगी, पैसा बहुत मिलेगा। लेकिन बाप नहीं मिलेगा। मैंने तीन साल आपको छोड़कर देख लिया। एसी केबिन में बैठकर भी मुझे वो सुकून नहीं मिला जो आपकी डांट खाकर मिलता था। मैं दुकान नहीं बेचूंगा, मैं आपके साथ दुकान पर बैठूंगा। हम मिलकर इसे बड़ा बनाएंगे, आपके तरीके से भी और मेरे तरीके से भी।"


दीनानाथ जी का कठोर आवरण पिघल गया। उनका कांपता हुआ हाथ उठा और रोहन के सिर पर जा टिका। वे फूट-फूट कर रो पड़े। उन्होंने झुककर रोहन को गले लगा लिया।


"पगले... तू गया ही कहाँ था? तू तो यहीं मेरे सीने में धड़क रहा था। मैं रोज़ दुकान पर तेरा इंतज़ार करता था। मुझे पता था मेरा खून गद्दारी नहीं करेगा।"


सुमित्रा जी यह मिलन देखकर खुशी से रो पड़ीं।


उस रात घर में फिर से वही बहस नहीं हुई, बल्कि हंसी-ठिठोली हुई। दीनानाथ जी ने कहा, "वैसे तेरी वो ऑनलाइन वाली बात... क्या कहते हैं उसे? वेबसाइट? वो बना सकते हैं क्या अपनी साड़ियों की?"

रोहन हंस पड़ा, "हाँ पापा, बिल्कुल बना सकते हैं।"


दोनों हंस पड़े।

झगड़ा हुआ था। कड़वा हुआ था। बातें दिल को चीरने वाली हुई थीं। लेकिन रिश्ता नहीं टूटा। क्योंकि **रिश्ता वो धागा नहीं जो ज़रा से तनाव से टूट जाए, यह वो जंजीर है जो आग में तपकर और मजबूत होती है।**


रोहन और दीनानाथ जी ने साबित कर दिया कि विचारों में मतभेद हो सकता है, लेकिन मनभेद नहीं होना चाहिए। जब मुसीबत आती है, तो दुनिया तमाशा देखती है, सिर्फ़ अपना खून ही ढाल बनकर खड़ा होता है।


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