सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

मेरी सासु माँ को खाना बनाना पसंद है

 कमरे में ठहाकों की हल्की-हल्की गूंज थी। हाथ में मोबाइल, चेहरे पर खिलखिलाहट और आवाज़ में बेपरवाही—मेघना अपनी सहेली टिया से बात कर रही थी।

“अरे यार, सच बोलूँ… मैं कोई उम्रभर सेवा करने थोड़ी बैठी हूँ। बच्चे छोटे हैं, ऑफिस का काम अलग, और ऊपर से खाना बनाने वाली का खर्चा! अब सासु माँ को खाना बनाने का शौक है, तो मेरे पाँच हज़ार बच जाते हैं… और ये सोसायटी में तो कम में कोई आती ही नहीं। मैंने अगर थोड़ा रो-धोकर इन्हें यहाँ न बुलाया होता ना, तो मेरी जेठानी अपने घर में इनसे पूरा काम करवाती और खुद रानी बनकर बैठी रहती।”

टिया की हँसी फोन के उस पार से भी सुनाई दे रही थी। मेघना का सुर और खुल गया।
“और सुन, पापा जी तो रहे नहीं… अच्छा हुआ। वरना दोनों रहते तो सासु माँ उनका ही ध्यान रखती रहती। अब अकेली है तो चुपचाप हमारे घर के लिए सब कर देती है—सब्ज़ी काटना, दाल छौंकना, बच्चों का टिफ़िन… छोटे-छोटे काम अपने आप हो जाते हैं। मेरी तो मौज है!”

वो हँसते हुए बोली, “चल, किटी में आ रही हूँ। अभी रखती हूँ। बूढ़ी… मतलब… मम्मी जी नहाने गई हैं, आते ही होंगी।”

मेघना ने फोन कट किया और पीछे मुड़ी… तो जैसे जमीन खिसक गई।
दरवाज़े के पास सरोजिनी खड़ी थीं। नहाने के लिए बालों में तौलिया लपेटे, आँखें लाल, चेहरा पत्थर-सा। मेघना की जीभ जैसे तालू से चिपक गई। उसने एक कदम आगे बढ़कर कहना चाहा—“मम्मी जी…” मगर शब्द गले में ही अटक गए।

अब बोलने की बारी सरोजिनी की थी। उनकी आवाज़ काँप रही थी, पर शब्द धारदार थे।
“बहू… बाथरूम में गीजर से गरम पानी नहीं आ रहा था। मैं मशीन के बारे में पूछने आई थी… और अच्छा हुआ, नहीं आया। वरना आज तुम्हारी ‘हकीकत’ सुनने से रह जाती।”

मेघना का चेहरा पीला पड़ गया। सरोजिनी ने एक गहरी सांस ली।
“तुम्हारे मन में मेरे लिए क्या है… आज साफ़ हो गया। मैं तुम्हारे लिए माँ नहीं, रिश्ते की इज़्ज़त नहीं… बस ‘खाना बनाने वाली’ हूँ। तुमने मुझे बाई का विकल्प समझ लिया।”

मेघना फुसफुसाई, “ऐसा नहीं है मम्मी जी… वो तो मैं… मज़ाक…”

“मज़ाक?” सरोजिनी की आँखें भर आईं। “मज़ाक तब होता है जब दोनों तरफ़ हँसी हो। यहाँ तो सिर्फ तुम हँस रही थीं… और मैं… मैं तो एक ज़रूरत थी। जिसे जब चाहो इस्तेमाल कर लो।”

सरोजिनी ने धीरे-धीरे कहा, “मुझे खाना बनाने का शौक है, यह सच है। लेकिन शौक तब तक शौक है जब तक उसके साथ सम्मान हो। तुम बस इतना कह देती—‘मम्मी जी अच्छा खाना बनाती हैं, उनसे घर में सुकून है।’ दो प्यार भरे शब्द… इंसान को जिंदा रख देते हैं, मेघना। मुझे भी सिर्फ प्यार और आदर चाहिए था। वरना खाना तो वृद्धाश्रम में भी मिल जाता है।”

मेघना की आँखों में पानी उतर आया। उसे लगा जैसे कमरे की सारी हवा खत्म हो गई हो।

सरोजिनी ने बात आगे बढ़ाई—“और तुमने अपने ससुर… मेरे पति के बारे में भी… जिस तरह कहा… वो मुझे भीतर तक चीर गया। तुम्हें क्या पता, मैं उनके जाने के बाद किस तरह टूट गई थी। मैं अकेली रह गई… और तुमने उस अकेलेपन को अपने आराम का जरिया बना लिया।”

मेघना कांपते स्वर में बोली, “मम्मी जी, मुझे माफ…”

“माफ़ी?” सरोजिनी ने सिर हिलाया। “माफ़ी से हर जख्म नहीं भरता। कुछ जख्मों में नमक पड़ जाए तो वो सीधे आत्मा तक उतर जाते हैं।”

वो कुछ पल चुप रहीं, फिर बोलीं—“तुम्हारी जेठानी किरण… उसने कभी मेरे सामने मीठे बोल नहीं बिखेरे, पर उसने मुझे कभी नौकरानी भी नहीं समझा। उसने हमेशा ‘सास’ की मर्यादा दी। उसके तो अभी जुड़वाँ बच्चे हुए हैं, फिर भी उसने मुझे रोका नहीं। उल्टा कहा—‘मम्मी जी, आपके दो बेटे हैं। आप जहाँ मन करे, वहाँ रहिए। आप किसी की संपत्ति नहीं हैं कि बाँटी जाएँ।’”

मेघना को याद आया—किरण सच में कभी मीठी बात नहीं करती थी, पर उसकी आँखों में अहंकार भी नहीं था।
सरोजिनी ने एक बैग निकाला। “मैं अब यहाँ नहीं रहूँगी। मैं तुम्हारे पति अद्वैत को कहकर जा रही हूँ—अगर उसे मुझसे मिलना हो, तो बड़े बेटे के घर आ जाए। इस घर में अब मेरे लिए जगह नहीं।”

मेघना ने हाथ जोड़ दिए। “मम्मी जी, मत जाइए… बच्चों का क्या… अद्वैत का क्या…”

सरोजिनी ने बहुत धीमे से कहा—“बच्चे माँ की इज़्ज़त देखकर बड़े होते हैं। और पति… पति वही होता है जो बीच में पुल बनकर खड़ा हो। अगर वह पुल भी सिर्फ एक तरफ झुका रहेगा, तो रिश्ते टूटेंगे।”

उस रात सरोजिनी चुपचाप निकल गईं। मेघना दरवाज़े के पास बैठकर देर तक रोती रही। उसे पहली बार एहसास हुआ कि जो “मौज” वह कह रही थी, वह किसी की मजबूरी पर बैठा मज़ाक था।

अगली सुबह अद्वैत ऑफिस से पहले माँ के कमरे में गया। कमरे का पंखा चल रहा था, पर पलंग खाली। अलमारी के ऊपर रखा उनका छोटा-सा ट्रंक भी गायब था। किचन में भी सन्नाटा था—न चाय की खनक, न कटोरी की आवाज़। बस गैस पर रखे बर्तन की ठंडी-सी चुप्पी।

अद्वैत ने मेघना को देखा। “माँ कहाँ हैं?”

मेघना फूट पड़ी। “मैंने… मैंने बहुत गलत किया… वो चली गईं…”

अद्वैत का चेहरा सख्त हुआ, “क्यों?”

मेघना ने पूरी बात बता दी। एक-एक शब्द उसके गले से काँटों की तरह निकला। अद्वैत की आँखों में गुस्सा उभर आया, पर वह गुस्सा मेघना पर कम और खुद पर ज्यादा था।
“तुम्हें लगता है माँ सिर्फ काम करने आई थीं? वो अपना घर छोड़कर आई थीं… अपने पति के बाद जो उनके पास बचा था, वो सम्मान… वो सुकून… वो यहाँ ढूँढने आई थीं।”

मेघना ने हाथ जोड़कर कहा, “मैंने उन्हें सिर्फ… सुविधा समझ लिया… मुझे समझ नहीं आया…”

अद्वैत ने कठोर स्वर में कहा, “समझने की जरूरत तुम्हें तब थी जब माँ बच्चों को अपने हाथ से रोटी खिलाती थीं और तुम हँसते हुए कहती थीं—‘मम्मी जी, आप तो मेरी किस्मत हो।’ तुम्हारे शब्दों में मिठास थी, पर इरादे में… आज पता चला क्या था।”

उसने वहीं से अपने बड़े भाई समर को फोन किया।
“भैया… माँ आपके पास हैं?”
उधर से समर की आवाज़ आई, “हाँ, रात को आई थीं। बहुत चुप हैं… बस बच्चों को देख-देखकर रो देती हैं।”

अद्वैत ने गला साफ किया। “मैं आ रहा हूँ।”

दोपहर में अद्वैत अकेला ही समर के घर पहुँचा। दरवाज़ा किरन ने खोला। चेहरा थका हुआ था, पर उसकी आँखों में नरमी थी।
“अद्वैत… माँ अंदर हैं।”

अद्वैत कमरे में गया। सरोजिनी खिड़की के पास बैठी थीं। उनकी गोद में पोती की छोटी-सी फ्रॉक थी, जिसे वे तह करके बार-बार सीधा कर रही थीं, जैसे मन को भी सीधा कर रही हों।

अद्वैत ने धीरे से कहा, “माँ…”

सरोजिनी ने देखा—बस देखा। आँखों में शिकायत नहीं थी, सिर्फ थकान थी।
“आ गया मेरा छोटा बेटा?” उन्होंने कहा, “अच्छा है।”

अद्वैत घुटनों के बल बैठ गया। “माँ, मुझे माफ कर दीजिए। मैंने घर में किसी को समझाया नहीं। मैं सोचता रहा—सब ठीक है।”

सरोजिनी की आवाज़ धीमी थी। “गलती बहू की थी, पर जिम्मेदारी तुम्हारी भी थी। तुमने कभी नहीं पूछा—माँ खुश है या बस काम में लगी है?”

अद्वैत ने सिर झुका लिया। “मैं माँ को वापस ले जाना चाहता हूँ।”

सरोजिनी ने सीधा जवाब दिया, “मैं वापस उसी घर में जाऊँ जहाँ मुझे ‘बाई’ समझा गया?”

अद्वैत ने रुंधे गले से कहा, “मेघना शर्मिंदा है। वह रो रही है। उसे अपनी गलती समझ में आ गई है।”

सरोजिनी ने एक पल सोचा। “शर्मिंदगी और बदलाव में फर्क होता है। शर्मिंदगी कुछ दिन रहती है, बदलाव… आदत बनता है। मैं लौटूँगी, पर एक शर्त पर।”

अद्वैत ने तुरंत कहा, “जो कहें माँ।”

सरोजिनी ने कहा, “पहली—अब घर में मेरे रहने का मतलब ‘काम’ नहीं होगा। मैं चाहूँगी तो खाना बनाऊँगी, नहीं चाहूँगी तो नहीं। दूसरी—मेघना को यह समझना होगा कि सास को घर में लाना ‘बचत’ नहीं, ‘संबंध’ है। तीसरी—जब तुम्हारी पत्नी किसी सहेली से बात करे, तो मेरा सम्मान उसके शब्दों में दिखना चाहिए, वरना मैं नहीं रहूँगी।”

अद्वैत की आँखें भर आईं। “ठीक है माँ।”

शाम तक अद्वैत के साथ मेघना भी आई। वह दरवाज़े पर ही रुक गई, जैसे भीतर जाने का अधिकार खो बैठी हो। उसने सरोजिनी के पैर छुए।
“मम्मी जी… मैं गलत थी। मुझे लगा मैं स्मार्ट बन रही हूँ… पर मैं स्वार्थी बन गई। आपको मेरे शब्दों ने जो चोट दी… उसका दुख मुझे समझ आ गया है। मुझे एक मौका दे दीजिए।”

सरोजिनी ने हाथ रखा उसके सिर पर, पर चेहरे पर मुस्कान नहीं आई।
“मौका देना आसान है, निभाना मुश्किल। मैं तुम्हें मौका दे रही हूँ, पर खुद को भी मौका दे रही हूँ—कि मैं अपने जीवन के इस पड़ाव पर अपमान के साथ नहीं, सम्मान के साथ जी सकूँ।”

मेघना ने रोते हुए कहा, “मैं आपको ‘माँ’ बनकर रखूँगी… सिर्फ ‘सास’ बनकर नहीं।”

सरोजिनी ने धीमे से कहा, “बनकर नहीं, होकर।”

कुछ दिन बाद जब सरोजिनी वापस आईं, घर में पहली सुबह अजीब थी। मेघना उठी, किचन में गई और बोली, “मम्मी जी… आज आप मत बनाइए। आज मैं बनाऊँगी। आप बस बैठिए, बच्चों के साथ। और अगर आप चाहें तो मुझे बताइए… मैं सीख भी लूँगी।”

सरोजिनी ने पहली बार उस दिन हल्की मुस्कान दी।
“ठीक है… पर चाय में अदरक थोड़ा ज्यादा, और चीनी कम।”

मेघना हँसी—“जी, माँ।”

रात में जब अद्वैत घर लौटा, तो उसने देखा—डाइनिंग टेबल पर सब साथ बैठे हैं। बच्चे अपनी दादी को कहानी सुना रहे हैं। और मेघना उनके पास बैठकर उनके बालों में कंघी कर रही है। किसी ने किसी पर एहसान नहीं जताया। कोई “बचत” नहीं गिन रहा था। बस घर… घर जैसा लग रहा था।

उसी रात मेघना ने टिया का फोन काटते हुए कहा—“हाँ यार, किटी में नहीं आ पाऊँगी… माँ के साथ बैठकर बात करनी है। और सुन… रिश्तों में खर्चा नहीं बचत देखोगी ना, तो एक दिन घर खाली हो जाता है।”

फोन रखकर उसने सरोजिनी के पास जाकर धीरे से कहा, “माँ… आज आपसे एक बात पूछूं? जब आपने वो सब सुना… तब सबसे ज्यादा क्या दुख हुआ?”

सरोजिनी ने शांत स्वर में कहा, “दुख इस बात का नहीं कि तुमने मुझे काम करने वाला समझा… दुख इस बात का था कि तुमने मुझे इंसान नहीं समझा।”

मेघना की आँखें भर आईं। उसने दादी की तरह सिर अपनी सास की गोद में रख दिया।
सरोजिनी ने उसके बालों पर हाथ फेरते हुए बस इतना कहा—“अब आगे कभी किसी के भरोसे को ‘सुविधा’ मत समझना। प्यार मुफ्त होता है… लेकिन उसका कर्ज़ बहुत भारी होता है।”

और मेघना को पहली बार लगा—आज सच में उसके घर में “मौज” नहीं, “सुकून” आया है।

लेखिका : रंजना पटेल 


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

विरासत का सौदा और एक बेटे का फर्ज

  "बहु अभी तक वापस नहीं आई? सुबह के दस बज रहे हैं और घर में नाश्ते का कोई अता-पता नहीं है। उसे मायके गए हुए दो दिन हो गए, क्या उसे याद नहीं कि उसका एक ससुराल भी है?" दीनानाथ जी ने अखबार को सोफे पर पटकते हुए अपनी पत्नी सरोज से कहा। उनकी आवाज में जो तल्खी थी, वह भूख से ज्यादा अहम की थी। सरोज जी ने रसोई से झांकते हुए दबी जुबान में कहा, "अजी सुनिए, वो कल रात ही आने वाली थी, लेकिन उसकी माँ की तबीयत अचानक ज्यादा खराब हो गई। इसलिए रुक गई। अभी सुमित गया है उसे लेने।" "तबीयत! अरे, यह अमीरों की बीमारियां कभी खत्म नहीं होतीं। जब देखो बीपी, शुगर, घबराहट... यह सब बहाने हैं। असली बात यह है कि उस लड़की का मन इस घर में लगता ही नहीं। उसे अपने बाप के उस आलीशान बंगले की आदत जो पड़ी है," दीनानाथ जी बड़बड़ाए। तभी दरवाजे पर गाड़ी रुकने की आवाज आई। सुमित और उसकी पत्नी, मेधा, घर में दाखिल हुए। मेधा की आँखें सूजी हुई थीं, जैसे वह बहुत रोई हो। सुमित का चेहरा भी गंभीर था। दीनानाथ जी ने मेधा को देखते ही ताना मारा, "आ गई महारानी? चलो शुक्र है, दो दिन बाद ही सही, ससुराल की याद तो ...

गृह प्रवेश

  “मैं मम्मी को नहीं बताऊंगी… मैं खुद ही सामना करूंगी।” यह सोचकर स्नेहा ने अपने आंसू पोंछे। चेहरे पर मजबूती का नकाब चढ़ाया और मां के घर की तरफ निकल गई। पिता के बरसी-पूजन का काम था। रिश्तेदार आए हुए थे, घर में भीड़ थी, और हर चेहरे पर सहानुभूति—लेकिन स्नेहा के भीतर एक और ही उथल-पुथल चल रही थी। पूजा में बैठी वह मंत्र तो सुन रही थी, पर कान बार-बार पिछले दो दिनों की उन बातों पर अटक जाते—जिन्होंने उसे अंदर से तोड़ दिया था। उसकी सास विमला और पति अभिषेक … दोनों ने इतनी सहजता से उसे “अलग” कर दिया था, मानो वह घर की सदस्य नहीं, किसी काम की सुविधा भर हो। दो दिन पहले जब वह मायके जाने लगी थी, तब विमला जी ने ताना कस दिया था— “हर छोटी बात पर मायके भागना तुम्हारी आदत बन गई है, स्नेहा। शादी के बाद भी मां-बाप की छाया नहीं छोड़ पाई?” और अभिषेक… जिसने हमेशा कहा था “मैं तुम्हारे साथ हूं”—वह भी उस दिन बस इतना बोलकर रह गया था— “मां सही कह रही हैं, स्नेहा… तुम हर चीज़ को दिल पर ले लेती हो।” स्नेहा ने बहस नहीं की थी। बस चुपचाप निकल गई थी। क्योंकि उस वक्त बोलने पर शब्द नहीं, आँसू निकलते। और आँसू उसे कमज़ोर...

सात दिन

“पापा… आज फिर बस छूट गई।”  कृतिका ने बैग फर्श पर पटक दिया। अनिकेत घड़ी की तरफ़ देख कर झल्ला उठा, “अब क्या करूँ मैं? स्कूटर उड़ाकर स्कूल छोड़ूँ तुम्हें? तुम्हारी मम्मी को ही समझ नहीं, टाइम पर तैयार क्यों नहीं करती बच्चों को!” किचन से आती हुई भाप में भी सुमेधा की थकान साफ़ दिख रही थी। गैस पर दाल चढ़ी थी, दूसरे बर्नर पर पराठा, तीसरे पर दूध। टिफ़िन खुले पड़े थे, बोतलें आधी भरी… और बीच में खड़ी वो — एक हाथ से सब्ज़ी हिला रही, दूसरे से रसोई का टाइम पे चलने वाला छोटा अलार्म बंद कर रही थी। “अनिकेत, मैंने तो सब रात में ही सेट कर दिया था,” वो धीमे से बोली, “कृतिका खुद टाइम पर नहीं उठी, तीन बार बुलाया था मैंने…” “अरे, अब सब मेरी बेटी की गलती!” अनिकेत ने ऊँची आवाज़ में कहा, “तुम्हें तो बस बहाना चाहिए। टीचर हो गई हो न, बहुत अक्ल है तुम्हें। पर घर चलाने की अक्ल ज़रा भी नहीं।” बरामदे में बैठे हुए बाबूजी ने चश्मा उतारकर इन्हीं आवाज़ों की तरफ़ देखा। माँ — सुशीला — चौके के दरवाज़े पर आकर खड़ी हो गईं। “रोज़-रोज़ झगड़ा… पड़ोसी क्या सोचते होंगे,” सुशीला बड़बड़ाईं, “पहले के ज़माने में औरतें पाँच-पाँच ब...