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वो मीठा सा झूठ

 


बेंगलुरु की 24वीं मंज़िल पर बने उस आलीशान फ्लैट में सब कुछ था। इम्पोर्टेड इटालियन मार्बल का फर्श, दीवारों पर महंगी पेंटिंग्स, और लिविंग रूम के कोने में रखा वो पियानो जिसे बजाने का वक़्त कबीर को पिछले तीन सालों में कभी नहीं मिला था। कबीर, एक मल्टीनेशनल कंपनी का वाइस प्रेसिडेंट, जिसकी एक हस्ताक्षर पर करोड़ों के डील फाइनल होते थे, आज अपने किंग साइज़ बेड पर लेटा छत को घूर रहा था। सन्नाटा इतना गहरा था कि एसी की हल्की घरघराहट भी शोर लग रही थी।


भूख लगी थी, लेकिन उठकर खाना गरम करने की हिम्मत नहीं थी। ऐप से खाना मंगाने का मन नहीं था। उसे याद आया, कल रात जब उसे हल्का बुखार था, तो उसे अपनी माँ की बहुत याद आई थी। बनारस में रहने वाली उसकी माँ, सुमित्रा देवी। कबीर ने करवट बदली। उसे याद आया कि कैसे बचपन में जरा सी खरोंच लगने पर माँ पूरा घर सिर पर उठा लेती थीं। और आज? आज वो बीमार पड़ जाए तो पानी पूछने वाला भी कोई नहीं था। यह अकेलापन उसकी अपनी ही महत्त्वाकांक्षाओं की कीमत थी।


अचानक उसके दिमाग में एक ख्याल आया। एक ऐसा ख्याल जो बचकाना था, शायद स्वार्थी भी, लेकिन उस पल उसे वही एक डूबते को तिनके का सहारा लगा। उसने अपना फोन उठाया और कांपते हाथों से माँ का नंबर मिलाया।


"हेलो, कबीर? बेटा, इतनी रात को फोन? सब ठीक तो है?" उधर से माँ की घबराई हुई आवाज़ आई। उनकी आवाज़ सुनते ही कबीर की आँखों में नमी आ गई। उसने खुद को संभाला और अपनी आवाज़ में दर्द घोलते हुए बोला, "माँ... वो... मैं गिर गया हूँ।"


"क्या? कैसे गिर गया? कहाँ चोट लगी? तू ठीक है ना?" माँ के सवालों की झड़ी लग गई।


"माँ, बाथरूम में पैर फिसल गया। डॉक्टर ने कहा है कि एड़ी की हड्डी में क्रैक है। प्लास्टर चढ़ा है। तीन हफ्ते तक बिस्तर से नहीं उठ सकता। यहाँ कोई नहीं है माँ, मुझे पानी लेने के लिए भी घिसट कर जाना पड़ रहा है..." कबीर ने झूठ की एक पूरी इमारत खड़ी कर दी। उसे पता था कि 'कोई नहीं है' वाला तीर सीधा माँ के कलेजे पर लगेगा।


और वही हुआ। सुमित्रा देवी रो पड़ीं। "तू चिंता मत कर लल्ला, मैं कल की ही फ्लाइट पकड़ कर आ रही हूँ। तू बस हिम्मत रख।"


अगले ही दिन, सुमित्रा देवी कबीर के दरवाज़े पर थीं। उनके हाथ में दो बड़े झोले थे और आँखों में बेइंतहा चिंता। कबीर ने लंगड़ाते हुए दरवाज़ा खोला। उसने जानबूझकर अपने पैर पर एक क्रेप बैंडेज बांध रखा था। माँ ने उसे देखते ही गले लगा लिया। उस एक पल में, कबीर को लगा कि उसकी सारी थकान, सारा अकेलापन उस आलिंगन में पिघल गया है।


माँ ने आते ही घर का नक्शा बदल दिया। वो किचन जो कल तक सिर्फ़ चाय और मैगी बनाने के काम आता था, अब वहाँ से हींग और जीरे की छौंक की महक आने लगी। डाइनिंग टेबल पर लैपटॉप और फाइलों की जगह अचार की बरनी और गरम रोटियों ने ले ली। कबीर सोफे पर लेटा रहता और माँ उसके आगे-पीछे घूमती रहतीं।


"हाय मेरा बच्चा, कितना दुबला हो गया है। वहाँ होटल का कूड़ा-कचरा खाकर पेट ख़राब कर लिया है," माँ बड़बड़ातीं और जबरदस्ती उसके मुंह में घी से लबालब मूंग की दाल का हलवा ठूंस देतीं। कबीर चुपचाप खाता। उसे वो हलवा दुनिया की सबसे लजीज डिश लग रही थी।


दिन बीतने लगे। कबीर का "झूठा दर्द" अब उसके लिए एक मीठी कैद बन गया था। उसे ऑफिस से 'वर्क फ्रॉम होम' मिल गया था। मीटिंग्स के बीच में माँ का आना, "बेटा, हल्दी वाला दूध पी ले," कहना, और कबीर का कैमरा बंद करके जल्दी से दूध पीना—यह सब उसे एक अजीब सा सुकून दे रहा था। वह भूल चुका था कि वह एक बड़ी कंपनी का बॉस है। वह फिर से बनारस का वो छोटा कबीर बन गया था।


लेकिन झूठ के पाँव नहीं होते, और कबीर यह बात भूल रहा था।


एक दोपहर, माँ पास की मार्केट में सब्जी लेने गई थीं। कबीर घर पर अकेला था। टीवी पर उसका पसंदीदा क्रिकेट मैच आ रहा था। भारत को जीत के लिए आखिरी गेंद पर चार रन चाहिए थे। कबीर रोमांच में अपनी सुध-बुध खो बैठा। जैसे ही बल्लेबाज ने चौका मारा, कबीर सोफे से उछल पड़ा और "येस्स!" चिल्लाते हुए हवा में मुक्का लहराया। वह खुशी से झूमते हुए किचन की तरफ भागा पानी लेने के लिए। उसकी चाल में न कोई लंगड़ाहट थी, न दर्द।


वह पानी की बोतल निकालकर मुड़ा ही था कि उसके हाथ से बोतल छूट कर गिर गई।


दरवाज़े पर माँ खड़ी थीं।


उनके हाथ में सब्जी का थैला था। उनकी नज़र कबीर के पैरों पर थी, जो बिल्कुल मजबूती से ज़मीन पर टिके थे। कबीर का चेहरा फक पड़ गया। सन्नाटा छा गया। वह सन्नाटा जो पहले दिन के सन्नाटे से भी ज्यादा भारी था। कबीर को लगा कि अब माँ चिल्लाएंगी, रोएंगी, कहेंगी कि तूने अपनी माँ को धोखा दिया? उसे इतनी दूर से परेशान करके बुलाया?


कबीर ने हकलाते हुए सफाई देनी चाही, "माँ... वो... दरअसल..."


सुमित्रा देवी ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने चुपचाप दरवाज़ा बंद किया, सब्जी का थैला किचन के प्लेटफॉर्म पर रखा और कमरे में चली गईं। कबीर की जान हलक में थी। वह लंगड़ाने का नाटक भी नहीं कर सकता था और सच बोलने की हिम्मत नहीं थी।


शाम हो गई। घर में अजीब सी खामोशी थी। माँ ने रात का खाना बनाया। थाली कबीर के सामने रखी। कबीर की नज़रें झुकी हुई थीं। उसने हिम्मत करके कहा, "माँ, आप नाराज़ हैं?"


सुमित्रा देवी ने कबीर के सामने वाली कुर्सी खींची और बैठ गईं। उन्होंने कबीर के चेहरे को गौर से देखा। उनकी आँखों में गुस्सा नहीं, बल्कि एक गहरी समझ थी।


"तुझे क्या लगा कबीर? कि तेरी माँ इतनी भोली है?" सुमित्रा देवी ने शांत स्वर में पूछा।


कबीर ने चौंका कर ऊपर देखा।


"जब मैं पहले दिन आई थी," माँ ने मुस्कुराते हुए कहा, "तब मैंने देखा था कि जिस पैर में तूने पट्टी बांधी थी, तूने गलती से चप्पल दूसरे पैर की बजाय उसी पैर में पहनी थी। और परसों, जब तू सो रहा था, तो मैंने देखा तूने नींद में आराम से करवट ली और उस 'टूटे हुए' पैर को मोड़कर सोया था।"


कबीर अवाक रह गया। "तो... तो आपको पता था?"


"मैं माँ हूँ कबीर," सुमित्रा देवी की आवाज़ भर्रा गई। "एक्स-रे मशीन से पहले माँ की आँखें बता देती हैं कि बच्चे को दर्द कहाँ है। मैंने देखा था कि तेरे पैर में नहीं, तेरे मन में मोच आई है। मैंने तेरी आँखों में वो खालीपन देखा था बेटा। मुझे पता था कि तूने झूठ बोला है, लेकिन मुझे यह भी पता था कि मेरा बेटा इतना मजबूर हो गया होगा कि उसे अपनी माँ को बुलाने के लिए बीमारी का बहाना बनाना पड़ा।"


कबीर की आँखों से आंसू बह निकले। वह अपनी कुर्सी छोड़कर ज़मीन पर माँ के पैरों में बैठ गया और अपना सिर उनकी गोद में रख दिया। वह फूट-फूट कर रोया। वह वाइस प्रेसिडेंट, जो सैकड़ों लोगों को कमांड देता था, आज एक बच्चे की तरह रो रहा था।


"मुझे माफ़ कर दो माँ। मैं अकेला पड़ गया था। मुझे आपकी ज़रूरत थी। मुझे आपके हाथ का खाना, आपकी डांट, आपकी मौजूदगी चाहिए थी। मुझे डर था कि अगर मैं सीधे-सीधे कहता कि 'माँ आ जाओ, मन नहीं लग रहा', तो आप कहतीं कि काम पर ध्यान दे, या बनारस में काम है... इसलिए मैंने..."


सुमित्रा देवी ने उसके बालों में उंगलियां फेरते हुए कहा, "पगले, तू एक बार कह कर तो देखता। माँ-बाप को बच्चों के पास आने के लिए बहानों की नहीं, बस एक पुकार की ज़रूरत होती है। हम तो इंतज़ार में बैठे होते हैं कि कब बच्चे हमें याद करें।"


उस रात कबीर ने कोई पट्टी नहीं बांधी। उस रात उसने कोई दिखावा नहीं किया। माँ और बेटे देर रात तक बातें करते रहे। कबीर ने बताया कि शहर की भीड़ में वह कितना अकेला है, और माँ ने बताया कि खाली पड़े पुश्तैनी घर में उनकी आवाज़ कैसे गूंजती है।


अगले दिन सुबह कबीर ने ऑफिस में मेल डाल दिया—एक हफ्ते की छुट्टी। कोई बहाना नहीं, कोई बीमारी नहीं। बस "फैमली टाइम"।


जब एक हफ्ते बाद माँ जाने लगीं, तो कबीर उन्हें एयरपोर्ट छोड़ने गया। चेक-इन गेट पर माँ ने मुड़कर देखा और हंसते हुए बोलीं, "अगली बार जब मन घबराए, तो हड्डी मत तोड़ना, बस दिल का दरवाज़ा खटखटा देना। मैं चली आऊंगी।"


कबीर मुस्कुराया। उसने जाते हुए माँ को हाथ हिलाया। घर लौटते वक़्त बेंगलुरु का वो ही ट्रैफिक था, वो ही शोर था, लेकिन आज कबीर को वो अकेलापन महसूस नहीं हो रहा था। उसे पता था कि उसके एक कॉल पर, बिना किसी झूठे प्लास्टर के भी, कोई है जो उसके लिए दौड़ा चला आएगा। रिश्तों को जोड़ने के लिए कभी-कभी तर्कों की नहीं, बस थोड़े से समर्पण की ज़रूरत होती है। कबीर ने सीख लिया था कि सफलता का असली मतलब एसी कमरों में नहीं, बल्कि अपनों के साथ बांटे गए सुकून के पलों में है।


गाड़ी के शीशे से बाहर देखते हुए उसने सोचा, कभी-कभी एक छोटा सा, मासूम झूठ सच के सबसे बड़े दरवाज़े खोल देता है।


**सवाल:** क्या आपने भी कभी अपने माता-पिता को अपने पास बुलाने के लिए या उनसे मिलने जाने के लिए कोई मासूम सा झूठ बोला है? अपने अनुभव कमेंट में जरूर शेयर करें।


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