शर्मा जी बिस्तर पर लेटे थे। उनकी आंखों में पश्चाताप के आंसू थे। उन्होंने धीरे से सुलोचना का हाथ अपने हाथों में लिया और रुंधे हुए गले से बोले, "मुझे माफ कर दो सुलोचना। मैं जिंदगी भर रुपयों का हिसाब लगाता रहा, लेकिन तुम्हारी उस परवाह का मोल कभी नहीं समझ पाया जो तुम हर पल इस परिवार के लिए करती हो। आज अगर तुमने वो ढाई सौ रुपये खर्च न किए होते, तो शायद मैं ज़िंदा नहीं बचता।"
शर्मा जी और सुलोचना की शादी को पैंतीस साल हो चुके थे। इन पैंतीस सालों में दुनिया बदल गई, बच्चे बड़े होकर अपने-अपने घरों के हो गए, लेकिन शर्मा जी की एक आदत कभी नहीं बदली—सुलोचना की हर छोटी-बड़ी खरीदारी पर मीन-मेख निकालना। आज भी कुछ ऐसा ही हो रहा था। दोनों अपनी बड़ी बेटी के घर जाने के लिए रेलवे स्टेशन की ओर जा रहे थे। गर्मी का मौसम था और चिलचिलाती धूप में स्टेशन तक पहुंचने के लिए शर्मा जी ने ऑटो करने के बजाय ई-रिक्शा लेना बेहतर समझा, ताकि बीस रुपये बच सकें। सुलोचना चुपचाप भारी बैग लिए उनके पीछे-पीछे चल रही थी।
स्टेशन के बाहर पहुंचते ही सुलोचना की नज़र एक मेडिकल और जनरल स्टोर पर पड़ी। उसने शर्मा जी से दो मिनट रुकने को कहा और दुकान से एक इलेक्ट्रोलाइट पाउडर का डिब्बा, ग्लूकोज बिस्कुट का एक पैकेट और एक छोटी सी बैटरी वाली पंखी खरीद ली। कुल बिल हुआ ढाई सौ रुपये। यह देखते ही शर्मा जी की भृकुटी तन गई। जैसे ही सुलोचना वापस आई, उनका पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया।
"तुम्हारे हाथ में पैसे टिकते नहीं हैं क्या?" शर्मा जी ने भीड़-भाड़ की परवाह किए बिना बड़बड़ाना शुरू कर दिया। "घर से पानी की बोतलें भरी तो हैं। रास्ते के लिए नमकीन और रोटियां भी रखी हैं। फिर ये फालतू का कचरा खरीदने की क्या जरूरत थी? बिना सोचे-समझे ढाई सौ रुपये पानी में बहा दिए। तुम्हारी इसी फिजूलखर्ची की आदत की वजह से मैं हमेशा परेशान रहता हूं।"
सुलोचना बिना कोई जवाब दिए उनके साथ चलती रही। ट्रेन में अपनी सीट पर बैठने के बाद भी शर्मा जी का व्याख्यान जारी रहा। उन्होंने अपनी थकान और चिड़चिड़ाहट का सारा दोष सुलोचना पर मढ़ दिया। "मैंने जिंदगी भर अपनी इच्छाएं मारकर, पाई-पाई जोड़कर ये घर बनाया, बच्चों को पढ़ाया, और एक तुम हो कि कभी मेरी मेहनत की कद्र नहीं की। बस जो मन में आया, खरीद लिया। तुम जैसी खर्चीली औरत से पाला पड़ना मेरी सबसे बड़ी भूल थी।"
अब सुलोचना के सब्र का बांध टूट गया। उसने एक ठंडी सांस ली और शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा, "क्या सच में मैं सिर्फ पैसे लुटाती हूं? इन पैंतीस सालों में मैंने कभी अपने लिए कोई महंगी साड़ी नहीं मांगी। बच्चों के छोटे हो चुके कपड़ों को जोड़कर मैंने घर के पायदान बनाए। रसोई के हर राशन को इस तरह सहेजा कि कभी एक दाना बर्बाद न हो। क्या मेरी इन बचतों की कोई कीमत नहीं? मैंने हमेशा घर को सहेजा है, लेकिन आपके लिए मैं सिर्फ एक फालतू इंसान हूं जो पैसे बर्बाद करती है? कभी दो मीठे बोल तो आप बोल नहीं सके, बस हमेशा कमियां ही निकालते रहे।"
शर्मा जी ने मुंह फेर लिया। उन्हें सुलोचना का यह जवाब अखर रहा था। "तुमसे तो बात करना ही बेकार है," यह कहकर उन्होंने आंखें मूंद लीं और सोने का नाटक करने लगे।
दोपहर के तीन बज रहे थे। ट्रेन एक आउटर सिग्नल पर अचानक रुक गई। डिब्बे का एसी पहले से ही खराब था और अब ट्रेन रुकने से उमस जानलेवा होने लगी। आधा घंटा बीत गया, लेकिन ट्रेन टस से मस नहीं हुई। बाहर लू के थपेड़े चल रहे थे और अंदर घुटन बढ़ती जा रही थी। शर्मा जी, जिन्हें शुगर और ब्लड प्रेशर दोनों की शिकायत थी, अचानक बेचैन होने लगे। उनके माथे पर पसीने की मोटी-मोटी बूंदें छलकने लगीं। उन्होंने सीने पर हाथ रखा और उनका चेहरा पीला पड़ने लगा।
सुलोचना ने घबराकर उनकी तरफ देखा। "क्या हो रहा है आपको? जी घबरा रहा है क्या?"
शर्मा जी के होंठ सूख चुके थे। वो ठीक से बोल भी नहीं पा रहे थे। "सांस... सांस लेने में तकलीफ हो रही है... चक्कर आ रहा है।" इतना कहते-कहते उनकी आंखें उलटने लगीं और वे सीट पर ही एक तरफ लुढ़क गए। उनकी शुगर अचानक बहुत तेजी से गिर गई थी और भीषण गर्मी के कारण उन्हें हीट स्ट्रोक का असर हो रहा था।
डिब्बे में अफरा-तफरी मच गई। लोग इधर-उधर देखने लगे, लेकिन किसी के पास तुरंत मदद का कोई साधन नहीं था। सुलोचना ने बिना एक पल गंवाए अपना झोला खोला। उसने तुरंत वह छोटी बैटरी वाली 'फालतू' पंखी निकाली और शर्मा जी के चेहरे के पास चालू कर दी ताकि उन्हें ताजी हवा मिल सके। फिर उसने पानी की बोतल में वह इलेक्ट्रोलाइट और ग्लूकोज का पाउडर घोला। शर्मा जी का मुंह खोलकर धीरे-धीरे वह पानी उनके गले के नीचे उतारा। शुगर लेवल एकदम से गिर जाने की वजह से वो बेहोशी की हालत में जा रहे थे, लेकिन ग्लूकोज का पानी अंदर जाते ही और पंखे की सीधी हवा से उन्हें कुछ राहत मिली। सुलोचना उनके सीने को हल्के हाथों से सहलाने लगी और लगातार मदद के लिए पुकारती रही।
उसी डिब्बे में सफर कर रहा एक डॉक्टर दौड़कर वहां पहुंचा। उसने शर्मा जी की नब्ज जांची और गहरी सांस लेते हुए सुलोचना से कहा, "माता जी, आपने बिल्कुल सही समय पर इन्हें ग्लूकोज दे दिया। शुगर लेवल क्रैश होने और इस भीषण गर्मी की वजह से इन्हें गहरा कार्डियक अरेस्ट आ सकता था। आपकी इस छोटी सी तैयारी ने आज इनकी जान बचा ली।"
करीब एक घंटे बाद ट्रेन अगले स्टेशन पर पहुंची, जहां रेलवे के डॉक्टरों ने शर्मा जी की जांच की और उन्हें खतरे से बाहर बताया। रात को जब दोनों अपनी बेटी के घर सुरक्षित पहुंच गए, तो कमरे में एक अजीब सी भावुक खामोशी थी।
शर्मा जी बिस्तर पर लेटे थे। उनकी आंखों में पश्चाताप के आंसू थे। उन्होंने धीरे से सुलोचना का हाथ अपने हाथों में लिया और रुंधे हुए गले से बोले, "मुझे माफ कर दो सुलोचना। मैं जिंदगी भर रुपयों का हिसाब लगाता रहा, लेकिन तुम्हारी उस परवाह का मोल कभी नहीं समझ पाया जो तुम हर पल इस परिवार के लिए करती हो। आज अगर तुमने वो ढाई सौ रुपये खर्च न किए होते, तो शायद मैं ज़िंदा नहीं बचता।"
सुलोचना ने उनके मुंह पर हाथ रख दिया और एक हल्की सी मुस्कान के साथ बोली, "देखा न? मेरी हर खरीदारी फालतू नहीं होती। कुछ सौदे अपनों की सांसों को बांधे रखने के लिए भी किए जाते हैं।" शर्मा जी अब समझ चुके थे कि एक पत्नी की बचत सिर्फ पैसों की नहीं होती, बल्कि वह अपने परिवार की खुशियों और सेहत को भी सहेज कर रखती है।
दोस्तों, क्या आपको भी लगता है कि हमारे समाज में अक्सर महिलाओं की दूरदर्शिता और उनके द्वारा परिवार के लिए की गई छोटी-छोटी तैयारियों को नजरअंदाज कर दिया जाता है? क्या हमेशा आर्थिक बचत के तराजू पर रिश्तों को तौलना सही है? अपने विचार हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।
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