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एक हारा हुआ पिता

 भारतीय स्टेट बैंक की पुरानी शाखा में दोपहर की उमस भरी गर्मी थी, लेकिन मैनेजर विनोद भार्गव के केबिन में एसी की ठंडक और सन्नाटा, दोनों ही गहरे थे। उनके सामने बैठे बुजुर्ग, दीनानाथ जी, बार-बार अपने कुर्ते की जेब से रूमाल निकालकर माथे का पसीना पोंछ रहे थे। मेज पर रखी पानी की बोतल को उन्होंने छुआ तक नहीं था, जैसे डर हो कि पानी पीने से कहीं लोन की फाइल खारिज न हो जाए।

"दीनानाथ जी," विनोद ने फाइल पर से नज़रें हटाकर चश्मा उतारा और मेज पर रखा। "आप रिटायर्ड टीचर हैं। आपकी पेंशन आती है, इज्जतदार आदमी हैं। लेकिन आप जिस लोन के लिए आवेदन कर रहे हैं, वह बहुत बड़ा है। पच्चीस लाख रुपये। और इसके लिए आप अपना यह पुश्तैनी मकान गिरवी रख रहे हैं? इस उम्र में?"

दीनानाथ जी की आँखों में एक अजीब सी बेबसी थी। उन्होंने कांपते हाथों को आपस में जोड़ा। "साहब, मजबूरी है। मेरी बिटिया, 'अवनि', की शादी तय हुई है। लड़का बहुत अच्छा है, आईटी कंपनी में मैनेजर है। परिवार भी ऊँचा है। लेकिन..."

"लेकिन क्या?" विनोद ने नरमी से पूछा।

"लेकिन उनकी मांगें... वो कहते हैं कि हम दहेज नहीं मांग रहे, बस शादी 'स्टैंडर्ड' की होनी चाहिए। डेस्टिनेशन वेडिंग चाहते हैं वो लोग। कहते हैं कि समाज में नाक का सवाल है। होटल की बुकिंग, जेवर, गाड़ियाँ... सब जोड़कर पच्चीस-तीस लाख का खर्चा आ रहा है। मेरे पास जो जमा पूंजी थी, वो तो रिटायरमेंट के बाद पत्नी की बीमारी में लग गई। अब बस यह मकान ही बचा है। इसे गिरवी रखकर ही बिटिया के हाथ पीले कर पाऊंगा।"

विनोद भार्गव ने गहरी सांस ली। उन्हें अपने सामने बैठा यह शख्स कोई ग्राहक नहीं, बल्कि एक हारा हुआ पिता लग रहा था। विनोद खुद एक बेटी और एक बेटे के पिता थे। वे जानते थे कि एक पिता के लिए बेटी की शादी का क्या मतलब होता है, लेकिन एक मकान—जो बुढ़ापे की लाठी होता है—उसे दांव पर लगाना उन्हें अंदर तक कचोट गया।

"दीनानाथ जी, अगर आप यह लोन नहीं चुका पाए तो? बैंक तो मकान नीलाम कर देगा। फिर आप और आपकी पत्नी कहाँ जाएंगे?" विनोद ने कड़वा सच सामने रखा।

दीनानाथ जी की आँखें डबडबा गईं। "साहब, बिटिया ससुराल में खुश रहे, तो हम किसी वृद्धाश्रम में भी काट लेंगे। बस आप यह लोन पास कर दीजिये। मेरी इज्जत का सवाल है।"

विनोद ने फाइल बंद कर दी। "देखिये, नियम के मुताबिक मुझे प्रॉपर्टी वेरिफिकेशन (जांच) के लिए आपके घर आना होगा। मैं कल शाम को आऊंगा। उसके बाद ही फैसला करूँगा।"

दीनानाथ जी ने राहत की सांस ली, जैसे डूबते को तिनका मिल गया हो। "जी ज़रूर आइये। आपका स्वागत है।"

अगली शाम, विनोद भार्गव अपनी कार से शहर के पुराने मोहल्ले 'चांदनी चौक' की तंग गलियों में पहुंचे। दीनानाथ जी का मकान पुराना था, ईंटें कहीं-कहीं से दिख रही थीं, लेकिन घर के बाहर लगे मोगरे के पौधे और धुला हुआ आंगन बता रहा था कि वहां रहने वाले लोग सलीकेदार हैं।

दीनानाथ जी ने गेट पर ही विनोद का स्वागत किया। "आइये मैनेजर साहब, आइये।"

विनोद अंदर दाखिल हुए। घर छोटा था, लेकिन बेहद व्यवस्थित। दीवारों पर मधुबनी पेंटिंग टंगी थीं, जो शायद हाथ से बनाई गई थीं। पुराने सोफे पर साफ़-सुथरे कवर चढ़े थे।

"अवनि! बेटा, पानी लाओ। बैंक से मैनेजर साहब आए हैं," दीनानाथ जी ने आवाज़ दी।

रसोई के परदे के पीछे से एक युवती ट्रे लेकर निकली। साधारण सा सूती कुर्ता पहने, बालों को एक चोटी में बांधे, अवनि के चेहरे पर कोई मेकअप नहीं था, लेकिन उसकी सादगी में एक अलग ही गरिमा थी। उसने झुककर विनोद को नमस्ते किया और पानी का गिलास मेज पर रखा।

विनोद की नज़रें अवनि पर टिक गईं। वह डरी हुई नहीं लग रही थी, बल्कि उसकी आँखों में एक चिंता थी—अपने पिता के लिए।

"बेटा, तुम क्या करती हो?" विनोद ने पानी पीते हुए पूछा।

"जी, मैं पास के ही एक सरकारी स्कूल में गेस्ट टीचर हूँ और शाम को बच्चों को पेंटिंग सिखाती हूँ," अवनि ने विनम्रता से जवाब दिया। उसकी आवाज़ में ठहराव था।

विनोद ने दीवारों पर लगी पेंटिंग्स की ओर इशारा किया। "ये तुमने बनाई हैं?"

"जी," अवनि ने संक्षिप्त उत्तर दिया।

तभी दीनानाथ जी बोल पड़े, "बहुत होनहार है साहब। एम.ए. किया है इसने। पूरा घर यही संभालती है। मेरी पत्नी को गठिया है, चल नहीं पातीं। अवनि ही उनकी सेवा करती है, नौकरी करती है और घर का खर्च भी चलाती है। लेकिन क्या करें साहब, समाज को गुण नहीं, गांधी (पैसा) दिखता है।"

अवनि के चेहरे पर दुख की एक लकीर खिंच गई। "पापा, आप प्लीज़ इन सब बातों से परेशान न हों। मैं चाय लाती हूँ।" वह मुड़कर जाने लगी।

विनोद ने उसे जाते हुए देखा। उन्हें उसमें अपनी दिवंगत माँ की झलक दिखी—वही धैर्य, वही संस्कार।

चाय पीते वक़्त विनोद ने घर का मुआयना करने का नाटक किया। उन्होंने देखा कि घर की छत कई जगह से मरम्मत मांग रही है। जिस पिता के पास छत ठीक कराने के पैसे नहीं हैं, वह बेटी की शादी में लाखों उड़ाने को तैयार है, सिर्फ़ 'समाज' के डर से।

"दीनानाथ जी," विनोद ने चाय का कप रखते हुए गंभीर स्वर में कहा।

दीनानाथ जी का दिल धक-धक करने लगा। "जी साहब? मकान... मकान की वैल्यू कम तो नहीं लगेगी न?"

विनोद ने एक पल के लिए खिड़की से बाहर देखा, फिर दीनानाथ जी की आँखों में देखा।

"दीनानाथ जी, मैं आपका यह लोन पास नहीं कर सकता।"

दीनानाथ जी के हाथ से रुमाल गिर गया। "क्या? लेकिन साहब... कागज़ तो पूरे हैं। मकान भी मेरे नाम है। आप ऐसा मत कीजिये साहब, मेरी बिटिया की शादी टूट जाएगी। लड़के वाले इंतज़ार नहीं करेंगे। मेरे पास और कोई रास्ता नहीं है।" वे लगभग गिड़गिड़ाने लगे।

अवनि, जो दरवाज़े पर खड़ी थी, दौड़कर पिता के पास आई और उनके कंधे पर हाथ रख दिया। "पापा, शांत हो जाइये। अगर लोन नहीं मिल रहा तो हम शादी टाल देंगे। या कोई और रास्ता निकालेंगे। आप अपनी तबीयत ख़राब मत कीजिये।" उसने विनोद की ओर एक सख्त नज़र से देखा, जैसे कह रही हो कि 'मेरे पिता को और दुखी मत करो'।

विनोद ने हाथ उठाया। "पूरी बात सुनिए दीनानाथ जी। मैं यह लोन इसलिए पास नहीं कर सकता क्योंकि एक बैंकर के तौर पर मुझे यह 'सौदा' बहुत घाटे का लग रहा है।"

"घाटे का?" दीनानाथ जी समझ नहीं पाए।

"हाँ," विनोद ने मुस्कुराते हुए कहा। "आप एक ऐसे लड़के के लिए अपना घर बेच रहे हैं जिसकी नज़र आपकी बेटी के गुणों पर नहीं, आपकी जेब पर है। जो इंसान शादी के लिए 'डेस्टिनेशन वेडिंग' की शर्त रखे, जबकि उसे पता है कि लड़की का पिता एक रिटायर्ड टीचर है, वो इंसान आपकी बेटी को कभी खुश नहीं रख पाएगा। आज शादी का खर्चा मांग रहा है, कल को बिजनेस के लिए मांगेगा। यह मकान तो जाएगा ही, आपकी बेटी का सुख भी चला जाएगा।"

दीनानाथ जी सिर झुकाकर बैठ गए। "आप सच कह रहे हैं साहब। मैं भी यह जानता हूँ। पर मजबूर हूँ। अवनि 26 की हो गई है। रिश्ते मिलते नहीं। क्या करूँ?"

विनोद ने अपनी जेब से मोबाइल निकाला और गैलरी खोलकर एक तस्वीर दीनानाथ जी के सामने कर दी।

"यह मेरा बेटा है, 'विहान'। सिविल इंजीनियर है। अपनी कंस्ट्रक्शन कंपनी चलाता है। कमाता अच्छा है, पर स्वभाव से फकीर है। उसे दिखावे से सख्त नफरत है। पिछले दो साल से मैं उसके लिए लड़की ढूंढ रहा हूँ। जो भी मिलती है, उसे या तो महंगा हनीमून पैकेज चाहिए या फिर वो पूछती है कि आपके पास कितनी गाड़ियाँ हैं।"

दीनानाथ जी और अवनि, दोनों हैरान होकर विनोद को देख रहे थे।

विनोद ने आगे कहा, "विहान हमेशा कहता है—'पापा, मुझे ऐसी जीवनसंगिनी चाहिए जिसे घर बनाना आता हो, घर सजाना नहीं। जो मेरे माता-पिता की इज़्ज़त करे और जिसका अपना कोई वजूद हो।' आज जब मैंने अवनि बिटिया को देखा, उसकी पेंटिंग्स देखीं, और यह देखा कि कैसे उसने आपको संभाला... मुझे लगा कि मेरी तलाश खत्म हो गई।"

कमरे में सन्नाटा छा गया। दीनानाथ जी को लगा जैसे उनके कानों ने धोखा दिया हो।

"साहब... आप... आप क्या कह रहे हैं?" दीनानाथ जी हकलाए।

"मैं यह कह रहा हूँ दीनानाथ जी," विनोद खड़े हो गए। "कि आप यह पच्चीस लाख का लोन मत लीजिये। यह मकान आपका है, इसे अपने बुढ़ापे के लिए रखिये। मेरी झोली में अपनी बेटी डाल दीजिये। मुझे न दहेज चाहिए, न डेस्टिनेशन वेडिंग। बस एक जोड़ी कपड़े में अवनि चाहिए। हम शादी मंदिर में करेंगे और कोर्ट में रजिस्टर करवाएंगे। जो पैसा आप शादी में फूंकने वाले थे, उसे अवनि के नाम से फिक्स डिपाजिट कर दीजिये, ताकि कल को उसे किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े—मेरे बेटे के आगे भी नहीं।"

अवनि की आँखों में आंसू आ गए। उसने जल्दी से अपना चेहरा फेर लिया। दीनानाथ जी के हाथ जुड़ गए और आँखों से झर-झर आंसू बहने लगे।

"साहब... आप... आप भगवान बनकर आए हैं," दीनानाथ जी रो पड़े।

"अरे नहीं दीनानाथ जी, मैं तो बस एक पिता हूँ जो अपने बेटे के लिए सोना ढूंढ रहा था। और आज मुझे हीरा मिल गया," विनोद ने हंसते हुए कहा। "लेकिन फैसला आपका और अवनि का होगा। मैं विहान को कल भेजूंगा। बच्चे आपस में बात कर लें, एक-दूसरे को समझ लें। अगर अवनि की रज़ामंदी होगी, तभी हम आगे बढ़ेंगे। कोई दबाव नहीं है।"

दीनानाथ जी ने अवनि की तरफ देखा। अवनि ने नजरें झुका लीं, लेकिन उसके चेहरे पर एक सुकून और हल्की सी लाली थी जो अब तक के तनाव को धो चुकी थी।

अगले दिन शाम को विहान आया। वह साधारण जींस और शर्ट में था। उसने दीनानाथ जी और उनकी पत्नी के पैर छुए। फिर अवनि और विहान ने छत पर जाकर थोड़ी देर बात की।

जब वे नीचे आए, तो विहान के चेहरे पर मुस्कान थी। उसने अपने पिता विनोद की ओर देखा और पलकें झपका दीं—इशारा साफ़ था, 'हाँ'।

अवनि भी रसोई में चली गई, लेकिन जाते-जाते उसने अपने पिता को देखकर जो मुस्कान दी, उसने दीनानाथ जी के सीने से पहाड़ जैसा बोझ हटा दिया।

दो हफ़्तों बाद।

शहर के प्राचीन शिव मंदिर में शहनाई नहीं बज रही थी, लेकिन वैदिक मंत्रोच्चार गूंज रहा था। गेंदे के फूलों से सजे मंडप में अवनि और विहान फेरे ले रहे थे। अवनि ने कोई महंगा लहँगा नहीं, बल्कि अपनी माँ की दी हुई एक पुरानी बनारसी साड़ी पहनी थी, और विहान साधारण कुर्ते-पायजामे में था।

दीनानाथ जी कन्यादान कर रहे थे। उनकी जेब में कोई कर्ज़ का बोझ नहीं था, गिरवी रखे मकान के कागज़ नहीं थे। उनके पास सिर्फ गर्व और संतोष था।

विदाई के समय विनोद भार्गव ने दीनानाथ जी को गले लगाया।

"समधी जी," विनोद ने कहा, "आपने मुझे बेटी दी है, अब यह मेरी ज़िम्मेदारी है। आप और भाभी जी अब चैन से इस मकान में रहिये। और हाँ, जब भी मन करे, हमारी कार हाज़िर है, अवनि से मिलने आ जाइयेगा।"

कार जब अवनि को लेकर चली गई, तो दीनानाथ जी अपने घर के आंगन में वापस आए। उन्होंने उस तुलसी के पौधे को देखा जिसे अवनि रोज जल देती थी। आज घर खाली ज़रूर था, लेकिन 'खोखला' नहीं था।

पड़ोसी शर्मा जी, जो छत से सब देख रहे थे, नीचे आए।

"अरे मास्टर साहब, सुना है लड़का बड़ा इंजीनियर है? फिर इतनी सादी शादी क्यों? कुछ कमी थी क्या?"

दीनानाथ जी ने अपनी छाती चौड़ी की और मुस्कुराए।

"शर्मा जी, कमी नहीं, 'समझ' थी। मैंने अपनी बेटी का सौदा नहीं किया, उसका 'कन्यादान' किया है। और मुझे दामाद नहीं, एक बेटा मिला है। मेरा मकान भी बच गया और मेरा मान भी।"

उस रात दीनानाथ जी और उनकी पत्नी ने वर्षों बाद चैन की नींद सोई। उन्हें समझ आ गया था कि असली अमीरी बैंक बैलेंस में नहीं, बल्कि सही रिश्तों और संस्कारों में होती है। और कभी-कभी, जब एक दरवाजा (लोन का) बंद होता है, तो ईश्वर दूसरा दरवाजा (रिश्ते का) खोल देता है, बस नीयत साफ़ होनी चाहिए।

लेखिका : मीना सहाय


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