सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

हम तो पराये ही हैं

 सुबह के आठ बजे थे। ऑफिस से वर्क फ्रॉम होम करने वाली निधि लैपटॉप खोलकर बैठी ही थी कि सास की आवाज़ आई—

“निधि, ज़रा नीचे आओ बेटा, चाय बनी है, सब साथ में पी लेते हैं।”

अंदर ही अंदर चिढ़ते हुए भी निधि ने जवाब दिया—“हाँ, माँ जी, आती हूँ,” और अनमने मन से नीचे चली गई।

नीचे हॉल में उसके पति आरव, ससुर नरेंद्र जी और सास सुशीला जी बैठे थे। चाय के साथ मठरी रखी हुई थी।

सुशीला जी ने अपने हाथ से कप निधि की तरफ़ बढ़ाते हुए कहा,
“ले बेटा, तू रोज़ लैपटॉप में आँखें गड़ा कर बैठी रहती है, दो घूँट ये अदरक की चाय पी ले, ताकत रहेगी।”

निधि ने चाय तो ले ली, पर मन में फिर वही खटका—
“हर बात में कितना हस्तक्षेप करती हैं… ये मत पहन, ये मत खा, इतनी देर तक मत जागो… मेरी ज़िंदगी है या इनकी?”

कुछ ही देर बाद सुशीला जी ने फिर आवाज़ दी,
“निधि, आज शाम को ज़रा जल्दी फ्री हो जाना, तेरी ननद दिव्या आने वाली है बच्चों के साथ। तीन महीने बाद आ रही है, कुछ अच्छा सा बना लेंगे सब मिलकर।”

निधि के चेहरे पर एकदम से कसैलापन आ गया।
दिव्या आती तो घर में जैसे छोटे-मोटे मेले लग जाते।
सबका ध्यान बस उसी पर और उसके बच्चों पर—
“क्योंकि वो बेटी है इस घर की,”
और निधि के मन में कहीं न कहीं ये भावना बैठ गई थी कि सास-ससुर के लिए वह केवल “बहू” है, उतनी अपनी नहीं।

शाम को दिव्या आई तो सचमुच घर गूँज उठा।
दिव्या ने आते ही माँ के गले लगकर पूछा,
“मम्मी, आपने दवाई ली ना? पापा, प्रेशर चेक किया क्या?”

फिर निधि की तरफ़ मुड़कर बोली,
“अरे भाभी, आप तो और पतली हो गई हो, काम थोड़ा कम करो, खुद का भी ख्याल रखा करो।”

निधि मुस्कुरा तो दी, पर दिल में लगा—
“सबके सामने कितनी अपनी बनती है, पर आखिर में तो मम्मी-पापा की असली बेटी वही है। जो भी होगा, इन्हीं को मिलेगा, हम तो पराये ही हैं।”

दूसरे दिन सुबह की चाय पर बात चली कि नरेंद्र जी ने रिटायरमेंट की फाइल जमा कर दी है।
अब उन्हें हर महीने पेंशन मिलेगी, पर एकमुश्त ग्रेच्युटी और पीएफ के अच्छे खासे पैसे भी आने वाले थे।

दिव्या के जाते ही मोहल्ले की एक पड़ोसन, शांता aunty, सुशीला जी के पास आई और हँसते-हँसते बोली,
“देखो भाभी, बेटा तो है ही हाथ का, पर बेटी के लिए भी कुछ ज़रूर रखना। आखिरकार बेटी ही तो असली सहारा बनती है बुढ़ापे में।”

निधि वहीं पास में चाय बना रही थी।
उसके कानों में ये बात चुभ गई।
उसे लगा जैसे शांता आंटी की बात सीधे उसे ही पीछे ढकेल रही हो।

रात को कमरे में निधि ने आरव से कह ही दिया—

“तुम देखना, ज़्यादातर पैसा दिव्या दीदी के नाम हो जाएगा। मम्मी-पापा को बेटियाँ ही ज़्यादा प्यारी लगती हैं, बहू की कौन परवाह करता है।”

आरव ने हैरानी से पूछा,
“तुम्हें ये सब कैसे लग रहा है? पापा ने तो कुछ कहा ही नहीं।”

“कहना क्या है?”
निधि तुनककर बोली,
“वो सब तुम्हें नहीं बताएंगे। और दिव्या दीदी… वो तो हमेशा ही मम्मी-पापा की प्यारी रही हैं। मैं तो बस काम करने वाली मशीन हूँ इस घर में।”

आरव ने ग़ुस्से से नहीं, शांत होकर जवाब दिया,
“तुम बेवजह सोच रही हो। पापा न्यायप्रिय इंसान हैं। और मम्मी तुम्हें सच में बेटी मानती हैं, चाहे तुम मानो या नहीं। सब अपने मन से कहानी मत बना लो।”

निधि चुप हो गई, पर उसका संदेह कम नहीं हुआ।

कुछ दिन बाद रविवार था।
घर में सब मौजूद थे।
नरेंद्र जी ने सबको हॉल में बुलाया—
“आज हमें एक ज़रूरी बात करनी है।”

सामने मेज पर कुछ काग़ज़ रखे थे।
दिव्या भी बच्चों के साथ आ गई थी।
सुशीला जी चुपचाप पास की कुर्सी पर बैठ गईं।

“देखो,” नरेंद्र जी बोले,
“मेरी नौकरी पूरी हो चुकी है। अब जो भी हमारे पास है, उसे खुले मन से, सबके सामने तय करना चाहता हूँ, ताकि बाद में कोई उलझन न रहे।”

निधि के दिल की धड़कन तेज़ होने लगी।
उसे लगा—“लो, वही समय आ गया।”

नरेंद्र जी आगे बोले,
“ये जो हमारा मकान है, ये हमने सालों की मेहनत से बनाया है। मेरी इच्छा है कि ये घर आरव के नाम हो। बेटा यहाँ रहता है, ये घर इसकी ज़िम्मेदारी भी है।”

दिव्या शांत भाव से सुन रही थी।
उसके चेहरे पर कोई शिकायत नहीं थी।

फिर नरेंद्र जी ने काग़ज़ का दूसरा पन्ना उठाया,
“ये मेरी रिटायरमेंट की रकम, बैंक बैलेंस और एफडी के काग़ज़ हैं। इनमें से कुछ हिस्सा हमने अपने लिए रखा है, ताकि किसी पर बोझ न बनें। कुछ हिस्सा दिव्या और उसके बच्चों के लिए है, आखिर वह भी हमारी है।”

निधि का संदेह जैसे सच होता दिखा।
होंठ अनायास सिकुड़ गए।

तभी नरेंद्र जी ने एक तीसरा फोल्डर उठाया और सीधे निधि की तरफ़ बढ़ा दिया।

“और ये… तुम्हारे लिए है, निधि।”

निधि सकपका गई,
“मेरे लिए?”

सुशीला जी ने मुस्कुराकर कहा,
“हाँ बहू, तुम्हारे लिए। खोलकर देखो।”

निधि ने काँपते हाथों से फाइल खोली।
उसमें तीन एफडी के काग़ज़ थे, जिनका नाम था—
“निधि स्वयं सहायता कोष”

राशि देखकर उसका मुँह खुला रह गया।
ये कोई छोटी रकम नहीं थी।

नरेंद्र जी बोले,
“जब तुम इस घर में आई थीं, तब हमें पता चला कि तुम्हारे माँ-बाप जल्दी चले गए थे,
और चाचा के घर में तुमने हमेशा दूसरों को प्राथमिकता दी।
तुम्हारे नाम पर कुछ नहीं था।
हम नहीं चाहते कि तुम कभी भी अपने आपको इस घर में केवल ‘रोहन की पत्नी’ मानकर रहो।
तुम अपने नाम से भी, अपने दम पर खड़ी हो सको, ये हमारी इच्छा है।”

निधि अवाक रह गई।
उसने कभी सोचा भी नहीं था कि ये दोनों इतने गहराई से उसके बारे में सोचते हैं।

सुशीला जी ने आगे कहा,
“बहू, हम दिल से चाहते हैं कि तुम्हारे सपने केवल रसोई तक सीमित न रहें।
तुम नौकरी करती हो, हुनरमंद हो।
कल को अगर तुम अपना कोई काम शुरू करना चाहो,
या अपनी किसी छोटी सी हॉबी को बिज़नेस बनाना चाहो,
तो तुम्हें किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े।
ये राशि उसी दिन के लिए रखी है।”

दिव्या हँसते हुए बोली,
“भाभी, मैंने ही मम्मी-पापा को कहा था—‘निधि भाभी बहुत टैलेंटेड हैं। उन्हें हमेशा दूसरों के लिए ही मत सोचो, उनके लिए अलग से सोचो।’
मुझे तो मम्मी-पापा का प्यार मिला है बचपन से,
अब तुमको भी बेटी वाला हक मिलना चाहिए।”

निधि की आँखें भर आईं।
वह हकलाते हुए बोली,
“पर… पर इतना सब… मेरे लिए?
मैं तो… मैं तो सोचती थी कि आप लोग सिर्फ दिव्या दीदी के बारे में ही सोचते हैं…”

नरेंद्र जी हल्के से मुस्कुराए,
“बेटा, प्यार बाँटने से कम नहीं होता।
दिव्या हमारी बेटी है, हमेशा रहेगी।
तुम भी हमारी बेटी हो, बस घर बदलकर आई हो।
मकान बेटे के नाम किया है, क्योंकि जिम्मेदारी उसकी है।
रिटायरमेंट के पैसे बेटा-बेटी दोनों में बाँटे हैं,
और ये जो फाइल है, ये तुम्हारे अपने आत्मसम्मान और सुरक्षा के लिए है।
ताकि कल को कोई ये न कह सके कि ‘बहू तो खाली हाथ आई थी, खाली हाथ जाएगी।’
नहीं, हमारे रहते ऐसा नहीं होगा।”

निधि के भीतर जो दीवार बनी थी, वह धीरे-धीरे टूटने लगी।
वह रो पड़ी।
“माँ… पापा… मैंने आपको कभी इस नज़र से समझा ही नहीं।
हमेशा लगा कि आप मुझे सिर्फ बहू मानते हैं, इसलिए आपकी हर बात मुझे बंधन लगती थी।
आज लग रहा है, मैं ही आपको गलत समझती रही।”

सुशीला जी उसके पास आकर बैठ गईं।
उसके आँसू पोंछते हुए बोलीं,
“बहू, बड़ों की बातें हमेशा सही नहीं होतीं, पर हमेशा बुरी भी नहीं होतीं।
हमारे पास जितना अनुभव है, उतना ही हम नियमों में बँधे हैं।
तुम्हें जहाँ लगे कि हम पुराना सोच रही हैं,
उसे प्यार से बदल देना,
पर पहले ये मानकर चलना कि हम तुम्हारे लिए ही सोच रहे हैं, तुम्हारे खिलाफ़ नहीं।”

दिव्या ने मज़ाक में कहा,
“और हाँ, अब से जब मैं मायके आऊँगी,
तो तुम्हें भी मेरे साथ मम्मी-पापा पर हक जताना होगा,
सिर्फ काम में नहीं, प्यार में भी साझेदारी करनी होगी।”

सभी हँस पड़े।
हॉल का माहौल हल्का हो गया।

उस रात निधि अपने कमरे में बैठी उस फाइल को बार-बार देखती रही।
उसे पता था, पैसा सब कुछ नहीं होता,
पर इस फाइल के काग़ज़ों पर सिर्फ़ रकम नहीं,
विश्वास, अपनापन और बराबरी की मुहर लगी थी।

वह मन ही मन सोचने लगी—

“कई बार हम अपनी ही सोच के दायरे में घिरकर
दिल से सच्चे लोगों को गलत समझ बैठते हैं।
किसी के मुँह से ‘तुम हमारी बेटी जैसी हो’ सुनकर
हम उसे औपचारिक वाक्य मान लेते हैं,
पर जब वही लोग हमारी सुरक्षा के लिए
चुपचाप दीवार बनकर खड़े होते हैं,
तब समझ आता है कि रिश्तों की गहराई
शब्दों से नहीं, कर्मों से मापी जाती है।”

निधि ने फाइल बंद की,
और अगले ही पल उठकर बाहर गई।
डाइनिंग टेबल पर सुशीला जी अगली सुबह के लिए दाल भिगो रही थीं।

निधि ने पीछे से आकर उन्हें गले लगा लिया—
“माँ… चाय मैं बनाऊँ?”

सुशीला जी ने हल्का सा चौंककर उसे देखा,
फिर मुस्कुराकर बोलीं—
“हाँ बेटी, आज मेरी बहू नहीं, मेरी बेटी चाय बनाएगी।”

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

विरासत का सौदा और एक बेटे का फर्ज

  "बहु अभी तक वापस नहीं आई? सुबह के दस बज रहे हैं और घर में नाश्ते का कोई अता-पता नहीं है। उसे मायके गए हुए दो दिन हो गए, क्या उसे याद नहीं कि उसका एक ससुराल भी है?" दीनानाथ जी ने अखबार को सोफे पर पटकते हुए अपनी पत्नी सरोज से कहा। उनकी आवाज में जो तल्खी थी, वह भूख से ज्यादा अहम की थी। सरोज जी ने रसोई से झांकते हुए दबी जुबान में कहा, "अजी सुनिए, वो कल रात ही आने वाली थी, लेकिन उसकी माँ की तबीयत अचानक ज्यादा खराब हो गई। इसलिए रुक गई। अभी सुमित गया है उसे लेने।" "तबीयत! अरे, यह अमीरों की बीमारियां कभी खत्म नहीं होतीं। जब देखो बीपी, शुगर, घबराहट... यह सब बहाने हैं। असली बात यह है कि उस लड़की का मन इस घर में लगता ही नहीं। उसे अपने बाप के उस आलीशान बंगले की आदत जो पड़ी है," दीनानाथ जी बड़बड़ाए। तभी दरवाजे पर गाड़ी रुकने की आवाज आई। सुमित और उसकी पत्नी, मेधा, घर में दाखिल हुए। मेधा की आँखें सूजी हुई थीं, जैसे वह बहुत रोई हो। सुमित का चेहरा भी गंभीर था। दीनानाथ जी ने मेधा को देखते ही ताना मारा, "आ गई महारानी? चलो शुक्र है, दो दिन बाद ही सही, ससुराल की याद तो ...

गृह प्रवेश

  “मैं मम्मी को नहीं बताऊंगी… मैं खुद ही सामना करूंगी।” यह सोचकर स्नेहा ने अपने आंसू पोंछे। चेहरे पर मजबूती का नकाब चढ़ाया और मां के घर की तरफ निकल गई। पिता के बरसी-पूजन का काम था। रिश्तेदार आए हुए थे, घर में भीड़ थी, और हर चेहरे पर सहानुभूति—लेकिन स्नेहा के भीतर एक और ही उथल-पुथल चल रही थी। पूजा में बैठी वह मंत्र तो सुन रही थी, पर कान बार-बार पिछले दो दिनों की उन बातों पर अटक जाते—जिन्होंने उसे अंदर से तोड़ दिया था। उसकी सास विमला और पति अभिषेक … दोनों ने इतनी सहजता से उसे “अलग” कर दिया था, मानो वह घर की सदस्य नहीं, किसी काम की सुविधा भर हो। दो दिन पहले जब वह मायके जाने लगी थी, तब विमला जी ने ताना कस दिया था— “हर छोटी बात पर मायके भागना तुम्हारी आदत बन गई है, स्नेहा। शादी के बाद भी मां-बाप की छाया नहीं छोड़ पाई?” और अभिषेक… जिसने हमेशा कहा था “मैं तुम्हारे साथ हूं”—वह भी उस दिन बस इतना बोलकर रह गया था— “मां सही कह रही हैं, स्नेहा… तुम हर चीज़ को दिल पर ले लेती हो।” स्नेहा ने बहस नहीं की थी। बस चुपचाप निकल गई थी। क्योंकि उस वक्त बोलने पर शब्द नहीं, आँसू निकलते। और आँसू उसे कमज़ोर...

सात दिन

“पापा… आज फिर बस छूट गई।”  कृतिका ने बैग फर्श पर पटक दिया। अनिकेत घड़ी की तरफ़ देख कर झल्ला उठा, “अब क्या करूँ मैं? स्कूटर उड़ाकर स्कूल छोड़ूँ तुम्हें? तुम्हारी मम्मी को ही समझ नहीं, टाइम पर तैयार क्यों नहीं करती बच्चों को!” किचन से आती हुई भाप में भी सुमेधा की थकान साफ़ दिख रही थी। गैस पर दाल चढ़ी थी, दूसरे बर्नर पर पराठा, तीसरे पर दूध। टिफ़िन खुले पड़े थे, बोतलें आधी भरी… और बीच में खड़ी वो — एक हाथ से सब्ज़ी हिला रही, दूसरे से रसोई का टाइम पे चलने वाला छोटा अलार्म बंद कर रही थी। “अनिकेत, मैंने तो सब रात में ही सेट कर दिया था,” वो धीमे से बोली, “कृतिका खुद टाइम पर नहीं उठी, तीन बार बुलाया था मैंने…” “अरे, अब सब मेरी बेटी की गलती!” अनिकेत ने ऊँची आवाज़ में कहा, “तुम्हें तो बस बहाना चाहिए। टीचर हो गई हो न, बहुत अक्ल है तुम्हें। पर घर चलाने की अक्ल ज़रा भी नहीं।” बरामदे में बैठे हुए बाबूजी ने चश्मा उतारकर इन्हीं आवाज़ों की तरफ़ देखा। माँ — सुशीला — चौके के दरवाज़े पर आकर खड़ी हो गईं। “रोज़-रोज़ झगड़ा… पड़ोसी क्या सोचते होंगे,” सुशीला बड़बड़ाईं, “पहले के ज़माने में औरतें पाँच-पाँच ब...