“अरे मीरा, कितनी देर और लगेगी? मैं तो कब से चाय लेकर बैठा हूँ!”
राहुल ने अखबार मोड़ते हुए आवाज़ लगाई।
“बस आ रही हूँ… ये पल्लू बार-बार हाथ से फिसल रहा है,” कहते हुए मीरा ने जल्दी से साड़ी ठीक की और बाहर आ गई।
राहुल और मीरा की एक ही बेटी थी—अनन्या, जो एक एमएनसी में सीनियर एग्ज़िक्यूटिव थी। बेटा नहीं था, लेकिन उन्होंने अनन्या को कभी किसी चीज़ की कमी नहीं होने दी। अब अनन्या शादी योग्य उम्र में आ चुकी थी, और राहुल को उसकी शादी की चिंता सता रही थी।
आज वे एक लड़के—आरव—के घर पहली बार जा रहे थे। आरव दिल्ली में एक बड़ी मेडिकल कंपनी में डेटा एनालिस्ट था। अनन्या और आरव की एक बार फोन पर बात भी करवायी गई थी, और दोनों ने एक-दूसरे को पसंद बताया था।
राहुल, मीरा और अनन्या तय समय पर लड़के वालों के घर पहुंच गए।
आवभगत बहुत ही अच्छी हुई। आरव का घर, परिवार, व्यवहार—सबमें सादगी थी, जो मीरा को बहुत भा गई। बातचीत के बाद आरव और अनन्या को अलग कमरे में भेज दिया गया ताकि वे खुलकर बात कर सकें।
करीब आधे घंटे बाद दोनों मुस्कुराते हुए बाहर आए। राहुल के मन में खुशी की चमक दिखने लगी—रिश्ता संभव लगा।
लेकिन रिश्ते में एक बात थी जो जल्द ही खुलकर सामने आने वाली थी।
आरव की माँ, सविता ने हिचकिचाते हुए कहा—
“देखिए, हम तो अनन्या को बहुत पसंद करते हैं। लड़की पढ़ी-लिखी, समझदार, सब कुछ ठीक है। पर एक बात है… आरव की नौकरी दिल्ली में है और हमने अपना पूरा जीवन यहीं लखनऊ में बिताया है। पढ़े-लिखे बेटे हैं, कल को प्रमोशन हुआ तो शहर बदल भी सकता है।”
राहुल को आश्चर्य हुआ, “तो… आप क्या कहना चाहती हैं?”
सविता धीरे से बोलीं, “हम चाहते हैं कि अनन्या शादी के बाद हमारे साथ यहीं लखनऊ में रहे। आरव चाहे तो दिल्ली-जैसे शहरों में काम करे, लेकिन बहू घर की ज़िम्मेदारी संभाले। बेटे की नौकरी कभी यहाँ, कभी वहाँ… लड़की ऐसे कैसे भटकेगी? हमारा तो बस यही अनुरोध है।”
मीरा ने तुरंत पूछा—
“लेकिन बहू और बेटा साथ नहीं रहेंगे तो रिश्ते का आधार क्या रह जाएगा?”
सविता बोलीं, “हम यह नहीं कह रहे कि वह आरव के पास ना जाए, पर घर की व्यवस्था, बड़ों की देखभाल… यह कौन करेगा? हमारे एक ही बेटा है।”
अनन्या चुप बैठी थी। वह हर साल प्रमोशन के साथ शहर दर शहर घूमने की संभावना वाले अपने करियर को लेकर भी चिंतित थी। लेकिन उससे ज़्यादा उसे यह बात अखर रही थी कि शादी के तुरंत बाद दांपत्य जीवन ‘लॉन्ग डिस्टेंस’ जैसा हो जाएगा।
राहुल ने विनम्रता से कहा—
“हम आपकी बात समझते हैं, लेकिन शादी में लड़का-लड़की का साथ ज़रूरी है। वरना रिश्ता शादी जैसा नहीं, समझौता जैसा हो जाएगा। हम सोचकर बताते हैं।”
घर लौटते ही मीरा ने राहत की सांस ली।
“अच्छे लोग थे, लेकिन बहू को बेटे से अलग कैसे रखेंगे? यह कैसी शर्त है!”
अनन्या भी परेशान थी, “माँ, अगर मैं लखनऊ में रहूँगी और आरव दिल्ली या किसी और शहर में—तो हम शादी ही किससे कर रहे हैं? दूरियाँ रिश्ता कमजोर कर देती हैं।”
राहुल ने धीमे स्वर में कहा—
“शायद उन्हें अपने बेटे के जाने का डर है। लेकिन… जीवन तो तुम्हें दोनों को बिताना है। हम तुम्हें किसी बंधन में नहीं डाल सकते।”
लौटते समय घर में मौसी, मामा और पड़ोसी सब इकट्ठा थे—क्योंकि घर में शादी की चर्चा हमेशा ही सबको उत्साह देती है।
राहुल की बहन, सुजाता बोलीं—
“भैया, लड़का तो बहुत अच्छा लगा था, है ना?”
मीरा बोलीं—
“हाँ अच्छा है, लेकिन उनकी शर्त अजीब है। शादी के बाद लड़की लड़के के साथ नहीं रहेगी, बल्कि घर पर बैठेगी। हम अनन्या को ऐसा जीवन कैसे दे दें?”
सुजाता ने गहरी साँस लेते हुए कहा—
“भाभी, एक बात बोलूँ बुरा ना मानियेगा?”
मीरा ने कहा—
“हाँ हाँ, कहो न सुजाता।”
सुजाता बोली—
“कुछ दिन पहले तो आपने मुझसे कहा था कि अगर अनन्या की शादी दिल्ली में होती है और उसके पति को विदेश में नौकरी मिल जाए, तो अनन्या को भी वह दौर निभाना चाहिए। तब आपने कहा था—‘जहाँ पति रहेगा, पत्नी भी वहीं रहेगी।’ अब वही बात माया के… मतलब आरव के घर वाले कह रहे हैं, तो आपको गलत क्यों लग रहा है?”
मीरा कुछ पल के लिए शांत हो गईं।
सुजाता फिर बोली,
“भाभी, हर माँ-बाप अपने बच्चे की खुशी चाहते हैं। जैसे आप अनन्या को अकेले नहीं छोड़ना चाहती, वैसे ही वे अपने बेटे को अकेले नहीं छोड़ना चाहते। डर सबके मन में एक जैसा होता है—चाहे बेटा हो या बेटी।”
मीरा की आँखों में हल्की नमी आ गई।
यह वही बात थी जो वह दूसरों को सिखाती थीं—लेकिन खुद जब स्थिति आई तो उन्होंने अपनी ही सीख को भुला दिया।
राहुल ने मीरा का हाथ दबाकर कहा—
“हमारी बेटी की ज़िंदगी उसकी है, डर हमारा नहीं होना चाहिए। हमें अनन्या का भविष्य देखना है, खुद की सुविधा नहीं।”
अनन्या भावुक हो उठी—
“पापा… मैं चाहती हूँ कि मेरा रिश्ता बराबरी पर बने। जहाँ हमें कोई पक्ष भारी या हल्का न लगे। मैं घर भी संभाल सकती हूँ, नौकरी भी, लेकिन पति से अलग रहकर शादी नहीं करूंगी।”
मीरा ने उसे गले लगाकर कहा—
“बिल्कुल नहीं, मेरी बच्ची। गलती हमारी सोच की थी—तुम्हारी नहीं। माँ-बाप अपने बच्चों को ढालना चाहते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि पहले उन्हें खुद बदलना पड़ता है।”
अगले दिन राहुल ने आरव के परिवार को फोन किया।
“भाईसाहब,” राहुल ने विनम्रता से कहा, “हमने आपकी बात समझी, पर बच्चों का साथ सबसे महत्वपूर्ण है। हम रिश्ता तभी करेंगे जब दोनों एक साथ रहेंगे, चाहे शहर कोई भी हो। बाकी आपके बेटे को हमारी अनन्या बहुत पसंद आई है। यदि आप भी यही चाहें तो हम आगे बढ़ेंगे।”
कुछ क्षण की चुप्पी के बाद आरव के पिता बोले—
“राहुल जी, कल रात हमने भी काफी सोचा। असल में डर था कि हमारे बुढ़ापे में कौन रहेगा। लेकिन बेटे की खुशी इससे बड़ी नहीं हो सकती।
हम आपकी बात मानते हैं।
बच्चे जहाँ रहना चाहें, रहें—हम बस उनकी खुशियाँ देखना चाहते हैं।”
फोन रखते ही मीरा की आँखें चमक उठीं—
“राहुल! सुना आपने? वे भी मान गए!”
अनन्या खुशी से उछल पड़ी।
“मतलब…?”
“मतलब,” राहुल मुस्कुराए, “तुम्हारा रिश्ता पक्का समझो!”
मीरा ने कहा—
“आज समझ आया… रिश्ते शर्तों से नहीं, समझ से चलते हैं।”
और उसी क्षण, तीनों के चेहरों पर एक जैसी मुस्कान थी—
समझ, परिवर्तन और एक नए भविष्य की मुस्कान।
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