सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

असली सुकून

 शाम के 6 बज रहे थे, लेकिन सूरज की गर्मी अभी भी महसूस की जा सकती थी। कानपुर के सिविल लाइन्स में बने ‘शांति कुंज’ के बरामदे में 65 साल के रिटायर्ड कर्नल रघुवीर सिंह अपनी आराम कुर्सी पर बैठे थे। उनकी निगाहें बार-बार गेट की तरफ जा रही थीं। रघुवीर सिंह एक अनुशासनप्रिय व्यक्ति थे। सेना की नौकरी ने उनके रग-रग में वक्त की पाबंदी और नियम-कायदे भर दिए थे। घर में भी उनका वही ‘कर्नल’ वाला रौब कायम था।

रघुवीर जी का बेटा, अभिनव, बैंगलोर में एक सॉफ्टवेयर कंपनी में मैनेजर था। अभिनव की शादी दो साल पहले ही रिया से हुई थी। रिया एक फ्रीलांस फैशन डिज़ाइनर थी, जिसका काम करने का तरीका और जीवन जीने का नज़रिया रघुवीर जी के नियमों से बिल्कुल उलट था। अभिनव और रिया कुछ दिनों की छुट्टियों पर घर आए हुए थे।

रघुवीर जी ने अपनी कलाई घड़ी देखी। 6:15 हो चुके थे। उनका नियम था कि शाम की चाय ठीक 6 बजे होनी चाहिए। रसोई से बर्तनों की खनक तो आ रही थी, लेकिन चाय अब तक नहीं आई थी।

“सुमित्रा!” उन्होंने अपनी पत्नी को तेज़ आवाज़ दी। “आज क्या घड़ी की सुई अटक गई है या चाय बनाने का मुहूर्त नहीं निकला?”

सुमित्रा जी ट्रे लेकर बाहर आईं, उनके चेहरे पर एक हल्की मुस्कान थी। “अरे, आ तो रही हूँ। रिया ने आज कुछ नया स्नैक बनाया है, उसी की प्लेटिंग कर रही थी।”

“प्लेटिंग?” रघुवीर जी ने भहें सिकोड़ीं। “चाय के साथ बिस्कुट या नमकीन काफी होती है। ये सजावट में वक्त बर्बाद करने की क्या ज़रूरत?”

तभी रिया चहकते हुए बाहर आई। उसके हाथ में एक प्लेट थी जिस पर बहुत ही खूबसूरती से सैंडविच सजाए गए थे। “पापा, प्लीज़ ट्राई कीजिए। ये एवोकाडो टोस्ट हैं, बहुत हेल्दी होते हैं।”

रघुवीर जी ने सैंडविच को ऐसे देखा जैसे कोई दुश्मन का टैंक हो। “बेटा, हमारे ज़माने में इसे ब्रेड पर चटनी लगाना कहते थे। और ये... ये हरा-हरा क्या है? घास-फूस?”

अभिनव भी बाहर आ गया, “पापा, इसे एवोकाडो कहते हैं। खाइए तो सही।”

रघुवीर जी ने बेमन से एक टुकड़ा उठाया और खाया। स्वाद बुरा नहीं था, लेकिन उनकी ईगो को यह स्वीकार करना मंज़ूर नहीं था कि बिना उनके नियमित समय और तरीके के भी चीजें अच्छी हो सकती हैं।

अगले कुछ दिन रघुवीर जी के लिए किसी इम्तिहान से कम नहीं थे। रिया की आदतें उन्हें हर कदम पर चुनौती दे रही थीं। रघुवीर जी सुबह 5 बजे उठ जाते और उम्मीद करते कि पूरा घर 6 बजे तक तैयार हो जाए। लेकिन रिया आराम से 9 बजे उठती और फिर अपने लैपटॉप पर काम करती। रघुवीर जी को यह ‘आलस’ लगता, जबकि रिया के लिए यह उसका ‘क्रिएटिव स्पेस’ था।

सबसे बड़ा क्लेश तब हुआ जब रघुवीर जी ने देखा कि रिया ने ड्राइंग रूम का पूरा नक्शा बदल दिया है। उनका सोफा, जो पिछले दस साल से एक ही जगह पर था, अब खिड़की के पास रखा था और पुरानी पेंटिंग्स की जगह मॉर्डन आर्ट ने ले ली थी।

“यह क्या तमाशा है?” रघुवीर जी गरजे। “मेरे घर में मेरी इजाज़त के बिना चीज़ें अपनी जगह से कैसे हिल गईं?”

रिया थोड़ी सहम गई, “पापा, वो वहाँ रोशनी कम थी, और खिड़की के पास बैठने से आपको सुबह की धूप मिलेगी। मैंने सोचा आपको अच्छा लगेगा।”

“मुझे क्या अच्छा लगेगा, यह मैं तय करूँगा,” रघुवीर जी ने कड़े शब्दों में कहा। “तुम लोग चार दिन के लिए आए हो, मेहमान की तरह रहो। मेरे घर का अनुशासन मत बिगाड़ो।”

रिया की आँखों में आँसू आ गए। वह बिना कुछ कहे अपने कमरे में चली गई। सुमित्रा जी ने रघुवीर जी को घूरकर देखा, “क्या ज़रूरत थी इतना चिल्लाने की? बच्ची प्यार से ही तो कर रही थी।”

“प्यार और अनुशासन में फर्क होता है सुमित्रा,” रघुवीर जी ने अखबार उठाते हुए कहा, लेकिन उनका मन अखबार में नहीं लग रहा था।

अगले दिन रविवार था। रघुवीर जी का नियम था कि रविवार को दोपहर का खाना ठीक 1 बजे होगा और मेनू में राजमा-चावल फिक्स था। लेकिन आज रिया और अभिनव ने प्लान बनाया कि वे सब बाहर लंच पर जाएंगे।

“मैं बाहर का खाना नहीं खाता,” रघुवीर जी ने साफ मना कर दिया।

“पापा, प्लीज़ चलिए न। वहाँ का एंबियंस बहुत अच्छा है,” अभिनव ने ज़िद की।

रघुवीर जी नहीं माने। आखिरकार, अभिनव, रिया और सुमित्रा जी चले गए। रघुवीर जी घर पर अकेले रह गए। उन्होंने सोचा था कि वे शांति से अपना पसंदीदा न्यूज़ चैनल देखेंगे और आराम करेंगे। लेकिन जैसे ही वे सोफे पर बैठे, उन्हें एहसास हुआ कि घर कितना खाली लग रहा है। दीवारें उन्हें घूरती हुई महसूस हुईं।

दोपहर के 2 बज गए। भूख लग रही थी। उन्होंने फ्रिज खोला, तो देखा कि कल रात की बची हुई सब्जी रखी है। उसे गर्म करते हुए उन्हें रिया की याद आई। वह होती तो शायद कुछ नया, कुछ गरम बनाकर खिलाती। वह ड्राइंग रूम में आए और खिड़की के पास रखे उस सोफे पर बैठ गए जिसे रिया ने वहां शिफ्ट किया था। हल्की धूप आ रही थी और बागीचे के फूल साफ दिखाई दे रहे थे। सचमुच, यहाँ बैठना पहले वाली जगह से ज्यादा सुकून भरा था। उन्हें अपनी गलती का हल्का सा एहसास हुआ, लेकिन फौजी अहंकार आड़े आ गया।

शाम को जब सब लौटे, तो रिया के हाथ में एक पार्सल था। “पापा, हम आपके लिए आपकी पसंद की ‘दाल मखनी’ पैक करा लाए हैं। उस रेस्टोरेंट की स्पेशलिटी है।”

रघुवीर जी का दिल पिघला, लेकिन चेहरे पर सख्ती बनाए रखी। “हम्म, रख दो।”

रात को खाने की मेज पर सन्नाटा था। रिया चुपचाप खा रही थी। रघुवीर जी ने दाल मखनी चखी। स्वाद वाकई बेहतरीन था। उन्होंने कनखियों से रिया को देखा। वह उदास लग रही थी।

“दाल... ठीक बनी है,” रघुवीर जी ने धीरे से कहा।

रिया का चेहरा खिल उठा। “सच पापा? आपको पसंद आई?”

“हाँ, लेकिन इसमें थोड़ा नमक कम है,” रघुवीर जी ने अपनी आदत के अनुसार नुक्ताचीनी की, लेकिन इस बार उनकी आवाज़ में वो कड़वाहट नहीं थी।

दो दिन बाद अभिनव और रिया की वापसी की फ्लाइट थी। रिया पैकिंग कर रही थी। रघुवीर जी अपने कमरे में थे, लेकिन उनका ध्यान रिया की गतिविधियों पर था। उन्हें अचानक महसूस हुआ कि इस ‘अव्यवस्था’ और ‘नियमों के उल्लंघन’ के बीच घर में एक नई जान आ गई थी। रिया की हंसी, उसका बेधड़क होकर घर को सजाना, नई-नई डिशेस ट्राई करना—इन सबने उनके नीरस जीवन में रंग भर दिए थे।

सुबह फ्लाइट के लिए निकलते वक्त रघुवीर जी बरामदे में खड़े थे। अभिनव और रिया ने पैर छुए।

“अपना ख्याल रखना,” रघुवीर जी ने रस्मी तौर पर कहा।

रिया ने मुस्कुराते हुए कहा, “पापा, आपकी दवाइयां मैंने बेडसाइड टेबल पर रख दी हैं। और हाँ, वो सोफा वापस पुरानी जगह कर दिया है, ताकि आपको परेशानी न हो।”

रघुवीर जी चौंक गए। उन्होंने ड्राइंग रूम में झांककर देखा। सोफा वापस अंधेरे कोने में रखा था। एक अजीब सी खालीपन की लहर उनके अंदर दौड़ गई।

गाड़ी धूल उड़ाती हुई निकल गई। रघुवीर जी अंदर आए और सोफे को देखा। वह जगह अब उन्हें बहुत अजीब लग रही थी। उन्होंने सुमित्रा जी को आवाज़ दी।

“सुमित्रा, ज़रा इधर आना।”

“क्या हुआ?” सुमित्रा जी आईं।

“इस सोफे को... वापस खिड़की के पास कर दो।”

सुमित्रा जी हैरान रह गईं। “लेकिन आपने ही तो कहा था...”

“कहा था, लेकिन अब मुझे लगता है कि धूप वहाँ ज्यादा अच्छी आती है,” रघुवीर जी ने नज़रे चुराते हुए कहा।

सुमित्रा जी मुस्कुरा दीं। उन्होंने सोफे को सरकाने में रघुवीर जी की मदद की। सोफा खिड़की के पास सेट हो गया। रघुवीर जी उस पर बैठे और बाहर देखा। धूप उनके चेहरे पर पड़ रही थी, ठीक वैसे ही जैसे रिया ने चाहा था।

शाम को रघुवीर जी ने अपना फोन उठाया और रिया को वीडियो कॉल किया।

“पापा?” रिया का चेहरा स्क्रीन पर आया, वह हैरान थी। रघुवीर जी कभी खुद वीडियो कॉल नहीं करते थे।

“हम्म... पहुँच गए तुम लोग?” रघुवीर जी ने पूछा।

“हाँ पापा, बस अभी घर में एंटर हुए हैं।”

“वो... मैंने सोचा बता दूँ कि सोफा मैंने वापस खिड़की के पास रखवा दिया है,” रघुवीर जी ने इधर-उधर देखते हुए कहा।

रिया की आँखों में चमक आ गई। “सच पापा?”

“हाँ, और सुन... अगली बार जब आओ, तो वो... क्या था वो घास-फूस वाला सैंडविच... एवोकाडो... वो लेते आना। यहाँ कानपुर में अच्छा नहीं मिलता।”

रिया की हंसी गूंज उठी, “बिल्कुल पापा! ढेर सारे लाऊँगी।”

फोन कटने के बाद रघुवीर जी ने एक गहरी सांस ली। उन्हें समझ आ गया था कि अनुशासन का मतलब सिर्फ नियमों का पालन करना नहीं होता, बल्कि वक्त के साथ खुद को ढालना भी होता है। जीवन सिर्फ ‘अटेंशन’ और ‘स्टैंड एट ईज़’ के बीच का खेल नहीं है, कभी-कभी ‘विश्राम’ की अवस्था में भी ज़िंदगी का असली मज़ा आता है।

उस शाम, कर्नल रघुवीर सिंह ने अपनी चाय 6:15 पर पी, और उन्हें ज़रा भी अफ़सोस नहीं हुआ। खिड़की से आती धूप ने न केवल उनके शरीर को, बल्कि उनके जिद्दी मन को भी गर्माहट दी थी। वे समझ गए थे कि बच्चों का प्यार उनके बनाए नियमों से कहीं ज्यादा कीमती है। और शायद, थोड़ी सी अव्यवस्था में ही असली सुकून छिपा होता है।

लेखिका : कविया गोयल


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

विरासत का सौदा और एक बेटे का फर्ज

  "बहु अभी तक वापस नहीं आई? सुबह के दस बज रहे हैं और घर में नाश्ते का कोई अता-पता नहीं है। उसे मायके गए हुए दो दिन हो गए, क्या उसे याद नहीं कि उसका एक ससुराल भी है?" दीनानाथ जी ने अखबार को सोफे पर पटकते हुए अपनी पत्नी सरोज से कहा। उनकी आवाज में जो तल्खी थी, वह भूख से ज्यादा अहम की थी। सरोज जी ने रसोई से झांकते हुए दबी जुबान में कहा, "अजी सुनिए, वो कल रात ही आने वाली थी, लेकिन उसकी माँ की तबीयत अचानक ज्यादा खराब हो गई। इसलिए रुक गई। अभी सुमित गया है उसे लेने।" "तबीयत! अरे, यह अमीरों की बीमारियां कभी खत्म नहीं होतीं। जब देखो बीपी, शुगर, घबराहट... यह सब बहाने हैं। असली बात यह है कि उस लड़की का मन इस घर में लगता ही नहीं। उसे अपने बाप के उस आलीशान बंगले की आदत जो पड़ी है," दीनानाथ जी बड़बड़ाए। तभी दरवाजे पर गाड़ी रुकने की आवाज आई। सुमित और उसकी पत्नी, मेधा, घर में दाखिल हुए। मेधा की आँखें सूजी हुई थीं, जैसे वह बहुत रोई हो। सुमित का चेहरा भी गंभीर था। दीनानाथ जी ने मेधा को देखते ही ताना मारा, "आ गई महारानी? चलो शुक्र है, दो दिन बाद ही सही, ससुराल की याद तो ...

गृह प्रवेश

  “मैं मम्मी को नहीं बताऊंगी… मैं खुद ही सामना करूंगी।” यह सोचकर स्नेहा ने अपने आंसू पोंछे। चेहरे पर मजबूती का नकाब चढ़ाया और मां के घर की तरफ निकल गई। पिता के बरसी-पूजन का काम था। रिश्तेदार आए हुए थे, घर में भीड़ थी, और हर चेहरे पर सहानुभूति—लेकिन स्नेहा के भीतर एक और ही उथल-पुथल चल रही थी। पूजा में बैठी वह मंत्र तो सुन रही थी, पर कान बार-बार पिछले दो दिनों की उन बातों पर अटक जाते—जिन्होंने उसे अंदर से तोड़ दिया था। उसकी सास विमला और पति अभिषेक … दोनों ने इतनी सहजता से उसे “अलग” कर दिया था, मानो वह घर की सदस्य नहीं, किसी काम की सुविधा भर हो। दो दिन पहले जब वह मायके जाने लगी थी, तब विमला जी ने ताना कस दिया था— “हर छोटी बात पर मायके भागना तुम्हारी आदत बन गई है, स्नेहा। शादी के बाद भी मां-बाप की छाया नहीं छोड़ पाई?” और अभिषेक… जिसने हमेशा कहा था “मैं तुम्हारे साथ हूं”—वह भी उस दिन बस इतना बोलकर रह गया था— “मां सही कह रही हैं, स्नेहा… तुम हर चीज़ को दिल पर ले लेती हो।” स्नेहा ने बहस नहीं की थी। बस चुपचाप निकल गई थी। क्योंकि उस वक्त बोलने पर शब्द नहीं, आँसू निकलते। और आँसू उसे कमज़ोर...

सात दिन

“पापा… आज फिर बस छूट गई।”  कृतिका ने बैग फर्श पर पटक दिया। अनिकेत घड़ी की तरफ़ देख कर झल्ला उठा, “अब क्या करूँ मैं? स्कूटर उड़ाकर स्कूल छोड़ूँ तुम्हें? तुम्हारी मम्मी को ही समझ नहीं, टाइम पर तैयार क्यों नहीं करती बच्चों को!” किचन से आती हुई भाप में भी सुमेधा की थकान साफ़ दिख रही थी। गैस पर दाल चढ़ी थी, दूसरे बर्नर पर पराठा, तीसरे पर दूध। टिफ़िन खुले पड़े थे, बोतलें आधी भरी… और बीच में खड़ी वो — एक हाथ से सब्ज़ी हिला रही, दूसरे से रसोई का टाइम पे चलने वाला छोटा अलार्म बंद कर रही थी। “अनिकेत, मैंने तो सब रात में ही सेट कर दिया था,” वो धीमे से बोली, “कृतिका खुद टाइम पर नहीं उठी, तीन बार बुलाया था मैंने…” “अरे, अब सब मेरी बेटी की गलती!” अनिकेत ने ऊँची आवाज़ में कहा, “तुम्हें तो बस बहाना चाहिए। टीचर हो गई हो न, बहुत अक्ल है तुम्हें। पर घर चलाने की अक्ल ज़रा भी नहीं।” बरामदे में बैठे हुए बाबूजी ने चश्मा उतारकर इन्हीं आवाज़ों की तरफ़ देखा। माँ — सुशीला — चौके के दरवाज़े पर आकर खड़ी हो गईं। “रोज़-रोज़ झगड़ा… पड़ोसी क्या सोचते होंगे,” सुशीला बड़बड़ाईं, “पहले के ज़माने में औरतें पाँच-पाँच ब...