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प्रतिष्ठा की चादर

 पिताजी के अचानक चले जाने के बाद घर में जैसे एक अजीब सा और कभी न खत्म होने वाला सन्नाटा पसर गया था। शहर की एक जानी-मानी और बेहद व्यस्त हृदय रोग विशेषज्ञ (कार्डियोलॉजिस्ट) होने के बावजूद, डॉ. मेघा को अपने ही घर का यह सूनापन काटने को दौड़ता था। पिछले एक महीने से मेघा अपने मायके में ही थी। पिताजी के अंतिम संस्कार से लेकर तेरहवीं तक के सारे कर्मकांड पूरे हो चुके थे। उसकी माँ, यशोदा देवी, जो कभी पूरे घर को अपनी चहचहाहट और ऊर्जा से बांध कर रखती थीं, अब पूरी तरह से खामोश हो गई थीं। उम्र के सत्तरवें पड़ाव पर अपने जीवनसाथी को खो देने का दुख उनके चेहरे की झुर्रियों में और गहरा हो गया था। वे सारा दिन अपने कमरे में गुमसुम बैठी रहतीं और उन्होंने अच्छे कपड़े पहनना या खुद पर ध्यान देना बिल्कुल छोड़ दिया था। 


मेघा की छुट्टियां अब खत्म होने को थीं और उसे वापस शहर लौटना था। लेकिन जाने से पहले एक सबसे जरूरी काम निपटाना बाकी था—पिताजी की पेंशन और उनके पुश्तैनी मकान के कागजात माँ के नाम पर ट्रांसफर करवाना। आज के समय में सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटना कोई आसान काम नहीं था। मेघा ने एक वकील के माध्यम से सारे जरूरी दस्तावेज, हलफनामा, मृत्यु प्रमाण पत्र, और पहचान के सारे कागजात (पैन कार्ड, आधार आदि) की फाइल तैयार कर ली थी। वकील ने फोन पर साफ कह दिया था कि आखिरी हस्ताक्षर और तस्वीर के लिए यशोदा जी को खुद सब-रजिस्ट्रार के दफ्तर आना ही पड़ेगा। 


मेघा जानती थी कि उसकी माँ के घुटनों में गठिया का दर्द रहता है और पिताजी के जाने के बाद से उनकी शारीरिक और मानसिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वे दफ्तरों के धक्के खा सकें। फिर भी, यह एक कानूनी मजबूरी थी जिसे टाला नहीं जा सकता था। 


सुबह के दस बज रहे थे। मेघा ने अपने ड्राइवर को बुलाकर अपनी बड़ी सी एसयूवी कार घर के दरवाजे पर लगवा दी ताकि माँ को बैठने में कोई तकलीफ न हो। उसने अपनी फाइल उठाई और अपनी माँ के कमरे के बाहर से ही आवाज लगाई, "माँ! चलिए, मैंने गाड़ी दरवाजे पर लगवा दी है। वकील साहब दफ्तर में हमारा ही इंतजार कर रहे हैं। थोड़ा जल्दी चलेंगे तो भीड़ से बच जाएंगे और आपको ज्यादा देर वहां बैठना नहीं पड़ेगा।"


अंदर से यशोदा जी की धीमी सी आवाज आई, "हां बिटिया, बस दो मिनट रुक जा, मैं आती हूं।"


मेघा बाहर दालान में टहलने लगी। जब दस मिनट बीत गए और माँ बाहर नहीं आईं, तो मेघा को थोड़ी चिंता हुई। उसे लगा कि शायद माँ को चलने में कोई तकलीफ हो रही है या वे पिताजी को याद करके फिर से रोने लगी हैं। वह तेज कदमों से भीतर गई और दरवाजे का पर्दा हटाते ही ठिठक गई। 


उसने जो देखा, वह उसकी उम्मीद से बिल्कुल अलग था। मेघा को लगा था कि माँ उसी फीकी और पुरानी सूती साड़ी में बाहर आ जाएंगी जिसे वे पिछले कई दिनों से पहने हुए थीं। लेकिन यशोदा जी अपने पुराने लोहे के बक्से के सामने खड़ी थीं। उन्होंने एक बहुत ही साफ-सुथरी, हल्के क्रीम रंग की रेशमी किनारे वाली साड़ी पहनी हुई थी—वह साड़ी जो पिताजी ने उन्हें पिछले साल दिवाली पर दिलवाई थी और जिसे वे सिर्फ खास मौकों पर ही पहनती थीं। उन्होंने अपने सफेद बालों को बहुत सलीके से संवारा था और कंधों पर एक शॉल बहुत ही करीने से ओढ़ रखा था। 


मेघा अपनी हैरानी छुपा नहीं पाई। उसने कमरे में कदम रखते हुए पूछा, "अरे माँ! यह क्या? आप इतनी तैयार क्यों हो रही हैं? हमें किसी शादी-ब्याह या रिश्तेदारी में थोड़ी न जाना है। हम तो बस एक सरकारी दफ्तर जा रहे हैं एक छोटे से काम के लिए। आप वैसे ही चल लेतीं, ये सब करने की क्या जरूरत थी?"


यशोदा जी ने बक्से का ढक्कन बंद किया और धीरे से मुड़कर अपनी बेटी की तरफ देखा। उनकी आंखों में अभी भी वो नमी थी जो पिताजी के जाने के बाद से कभी सूखी नहीं थी, लेकिन उनके चेहरे पर एक अजीब सी गंभीरता थी। उन्होंने मेघा के सिर पर हाथ फेरते हुए एक ऐसी बात कही, जिसने मेघा के अस्तित्व को झकझोर कर रख दिया। 


"बेटा, तू इस शहर की कोई आम लड़की नहीं है। तू एक बहुत बड़ी डॉक्टर है। अखबारों में तेरा नाम आता है। उस सरकारी दफ्तर में, वहां के अफसरों में, या वहां आने-जाने वाले सैकड़ों लोगों में न जाने कितने ऐसे होंगे जो तुझे पहचानते होंगे या जिनके परिवार का तूने इलाज किया होगा। अगर मैं ऐसे ही फटे-पुराने कपड़ों में, बिखरे हुए बालों के साथ और एक लाचार बुढ़िया की तरह तेरे साथ उस दफ्तर में उतरूंगी, तो लोग क्या कहेंगे?"


यशोदा जी थोड़ी देर के लिए रुकीं, उन्होंने एक गहरी सांस ली और फिर कहा, "लोग यही कहेंगे ना कि इतनी बड़ी और मशहूर डॉक्टर होकर भी यह अपनी बूढ़ी माँ को ढंग के कपड़े नहीं पहना सकती! उनका ख्याल नहीं रख सकती! देख बिटिया, मेरा दुख, मेरा अकेलापन और मेरी उदासी मेरे इस मन के भीतर है, और वो मेरे साथ ही जाएगी। लेकिन जब मैं अपनी इतनी काबिल बेटी के साथ घर की दहलीज से बाहर कदम रखूंगी, तो दुनिया की नजरों में मेरी बेटी का रुतबा, उसकी इज्जत और उसकी प्रतिष्ठा कम नहीं होनी चाहिए। मेरी वजह से कोई तुझ पर उंगली उठाए, यह तेरी माँ जीते जी कभी बर्दाश्त नहीं कर सकती।"


मेघा अपनी जगह पर बुत बनकर खड़ी रह गई। उसकी आंखों से आंसुओं की एक गर्म धार बह निकली। वह हमेशा सोचती थी कि वह बड़ी होकर अपने माता-पिता का सहारा बनेगी, उनके रुतबे को बढ़ाएगी। लेकिन आज उसे समझ आ रहा था कि एक संतान चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो जाए, एक माँ के सामने उसका रुतबा हमेशा एक छोटे बच्चे जैसा ही रहता है। माँ अपने आँसुओं को, अपने गहरे दुख को एक तरफ रखकर भी सिर्फ इसलिए संवर रही थी ताकि समाज में उसकी बेटी के सम्मान पर कोई आंच न आए। 


मेघा ने आगे बढ़कर अपनी माँ को कसकर अपने गले से लगा लिया। वह रोते हुए बस इतना ही कह पाई, "माँ, आप भी न... आपके इस अनकहे प्यार और इस रुतबे के सामने दुनिया की हर शोहरत छोटी है।" उस दिन दफ्तर जाते हुए मेघा को अपनी उस एसयूवी से ज्यादा गर्व अपनी माँ के साथ बैठे होने पर हो रहा था। 


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