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एक अनकहा इश्क

 दोपहर की चिलचिलाती धूप में हमारी कार स्टेट हाइवे से होते हुए एक छोटे से कस्बे की संकरी और धूल भरी सड़क पर मुड़ गई। मैं और मेरा बचपन का दोस्त अनिरुद्ध एक साइट विजिट से वापस अपने शहर लौट रहे थे। सफर अभी तीन घंटे का और बाकी था, लेकिन अनिरुद्ध ने अचानक एक पुरानी सी कॉलोनी के बाहर एक चाय की टपरी के पास मुझे गाड़ी रोकने का इशारा किया। 


"अरे भाई! यहाँ क्यों रुकवा रहा है? ना यहाँ कोई ढंग का ढाबा है, ना कोई छाँव। ऊपर से ये धूल... सीधे शहर पहुँच कर ही रुकेंगे ना," मैंने गाड़ी का इंजन बंद करते हुए थोड़ी झुंझलाहट के साथ कहा। 


अनिरुद्ध ने गाड़ी का शीशा नीचे किया और बाहर एकटक देखते हुए बड़ी ही शांत और फुसफुसाती हुई आवाज़ में बोला, "बस पंद्रह मिनट रुक जा समीर। मुझे यहाँ किसी को देखना है। एक बार उसे देख लूँ, फिर चुपचाप यहाँ से चलेंगे।"


मैं हैरान रह गया। अनिरुद्ध शहर का एक बहुत ही कामयाब और अमीर आर्किटेक्ट था। पैंतालीस साल की उम्र हो चुकी थी, लेकिन उसने आज तक शादी नहीं की थी। उसके इस अविवाहित रहने के पीछे का राज़ मैं भी पूरी तरह से नहीं जानता था। और आज, इस अनजान सी जगह पर चिलचिलाती धूप में वह किसका इंतज़ार कर रहा था? मेरी जिज्ञासा बढ़ गई।


"कौन रहता है यहाँ? कोई पुराना क्लाइंट है या कोई दूर का रिश्तेदार? बुला ले उसे चाय की दुकान पर," मैंने सवाल दागा।


अनिरुद्ध की नज़रें सड़क के उस पार एक पुराने से प्राथमिक विद्यालय (स्कूल) के लोहे वाले गेट पर टिकी थीं। उसने बिना मेरी तरफ देखे कहा, "नीलाक्षी... मेरी नीलाक्षी यहीं आती है रोज़ दोपहर को।"


'नीलाक्षी' यह नाम सुनते ही मेरे दिमाग के तार झनझना गए। यह वही लड़की थी जिसके साथ अनिरुद्ध कॉलेज के दिनों में अपनी पूरी दुनिया बसाने के सपने देखा करता था। वे दोनों एक-दूसरे को बेइंतहा चाहते थे। लेकिन नीलाक्षी एक बहुत ही रसूखदार और अमीर परिवार से थी, जबकि उन दिनों अनिरुद्ध अपने पिता के निधन के बाद पाई-पाई को मोहताज था। नीलाक्षी के पिता ने अनिरुद्ध का बहुत अपमान किया था और उसकी गरीबी का ताना मारते हुए अपनी बेटी की शादी रातों-रात एक बड़े सरकारी अधिकारी से कर दी थी। अनिरुद्ध ने नीलाक्षी की खातिर कोई तमाशा नहीं किया। वह खामोशी से पीछे हट गया, ताकि नीलाक्षी को अपने परिवार के आगे जलील न होना पड़े। उसके बाद अनिरुद्ध ने सिर्फ और सिर्फ अपने करियर पर ध्यान दिया, शोहरत कमाई, लेकिन अपने दिल के दरवाज़े हमेशा के लिए बंद कर लिए। 


"तू पागल हो गया है अनिरुद्ध? बीस साल बीत गए उस बात को। वो अपनी दुनिया में खुश है, उसके बच्चे होंगे। तू आज भी उसके पीछे यहाँ इस धूल-मिट्टी में खड़ा है? भूल जा उसे यार," मुझे अनिरुद्ध की इस दीवानगी पर थोड़ा गुस्सा भी आ रहा था और तरस भी।


अनिरुद्ध के होंठों पर एक बहुत ही सूनी लेकिन सुकून भरी मुस्कान तैर गई। "मैंने उसे पाने की ज़िद कब की समीर? प्यार सिर्फ हासिल करने का नाम तो नहीं है। मुझे बस उसे देखना है। मुझे पता चला था कि उसका पति अब इस कस्बे में तैनात है और उसके बच्चे इसी स्कूल में पढ़ते हैं।"


इतने में स्कूल की छुट्टी की घंटी बजी। गेट से बच्चों का झुंड शोर मचाते हुए बाहर निकलने लगा। बाहर खड़ी माताओं की भीड़ में से अनिरुद्ध की आँखें किसी राडार की तरह सिर्फ एक चेहरे को तलाश रही थीं। अचानक उसकी आँखें एक जगह जाकर ठहर गईं और उसके चेहरे का हर तनाव जैसे पिघल कर बह गया। 


"देख समीर... वो रही मेरी नीलाक्षी," अनिरुद्ध ने बहुत ही धीमी और कांपती हुई आवाज़ में कहा।


मैंने उसकी नज़र की दिशा में देखा। एक साधारण सी सूती साड़ी पहने, बालों का एक बेतरतीब सा जूड़ा बनाए एक महिला अपने दोनों हाथों में दो बच्चों की उंगलियां पकड़े खड़ी थी। वह अब कॉलेज की वो छरहरी और बेफिक्र लड़की नहीं लग रही थी, बल्कि एक पूरी तरह से ज़िम्मेदार और थकी हुई माँ दिख रही थी। वह अपने बेटे के बिखरे हुए बालों को ठीक कर रही थी और बेटी को धूप से बचाने के लिए अपने पल्लू से छाँव कर रही थी। फिर वह बच्चों को लेकर पास ही खड़े एक कुल्फी वाले के पास गई और मोलभाव करने लगी। 


मैंने अनिरुद्ध की तरफ देखा। उसकी आँखों से आँसुओं की दो मोटी बूंदें टूटकर उसके गालों पर बह निकली थीं, लेकिन उसके चेहरे पर दुनिया भर की शांति और खुशी झलक रही थी। वह बिना पलक झपकाए बस उस आम सी ज़िंदगी जी रही औरत को ऐसे देख रहा था जैसे किसी देवी के दर्शन कर रहा हो। 


नीलाक्षी ने बच्चों को कुल्फी दिलाई, एक ई-रिक्शा रुकवाया और उसमें बैठकर धूल के गुबार के बीच कहीं ओझल हो गई। उसने एक बार भी हमारी गाड़ी की तरफ नहीं देखा। उसे भनक तक नहीं थी कि कोई इंसान आज भी उसके लिए किसी तपस्वी की तरह इंतज़ार कर रहा है।


अनिरुद्ध ने एक लंबी और गहरी सांस ली। उसने अपनी आँखें पोंछीं और मेरी तरफ मुड़कर बोला, "चल समीर, अब गाड़ी निकाल। मेरी इस साल की दीवाली और ईद दोनों पूरी हो गईं। अब अगले साल आऊंगा।"


मैं पूरी तरह से स्तब्ध था। मैंने गाड़ी स्टार्ट करते हुए पूछा, "तुझे तकलीफ नहीं होती उसे किसी और के साथ अपना जीवन बिताते देख? तू चाहता तो जाकर उससे मिल सकता था, उसे बता सकता था कि तू आज कितना कामयाब है।"


अनिरुद्ध ने बहुत ही इत्मीनान से जवाब दिया, "तकलीफ कैसी समीर? मैंने तो हमेशा यही दुआ की थी कि वो जहाँ रहे, महफूज़ रहे और खुश रहे। आज उसे अपने बच्चों के साथ हंसते हुए देख लिया, तो मुझे यकीन हो गया कि मेरी दुआ कुबूल हो गई है। अगर मैं उसके सामने जाऊंगा, तो उसके मन में पुराने घाव ताज़ा हो जाएंगे, उसकी बसी-बसाई ज़िंदगी में उलझन पैदा होगी। मुझे उसकी ज़िंदगी में भूचाल नहीं लाना। दूर से उसकी ये छोटी सी खुशी देखकर मेरी रगों में अगले एक साल तक काम करने और ज़िंदा रहने की ऊर्जा भर जाती है।"


मैं गाड़ी चला रहा था, लेकिन मेरी नज़रें सड़क पर कम और अनिरुद्ध पर ज्यादा थीं। मैं उसके इस निस्वार्थ प्रेम के आगे नतमस्तक हो गया था। मैंने चुपचाप एक हाथ स्टीयरिंग से हटाया और अनिरुद्ध के कंधे को थपथपा दिया। मेरी आँखों में भी अब नमी आ चुकी थी। मुझे उस दिन समझ में आ गया कि दुनिया का सबसे ताकतवर और सबसे पवित्र प्यार वो नहीं है जो साथ रहकर जताया जाए, बल्कि वो है जो मीलों दूर से, बिना किसी उम्मीद के, सिर्फ किसी की सलामती की दुआ में खामोशी से बहाया जाए। सच्ची चाहत शायद ऐसी ही होती है!


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