सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

अधूरी लकीरों का अक्स

 "तुझे अपनी मर्यादा का कोई भान है या नहीं? तू जानती है ना कि हमारे और उनके परिवार के बीच पिछले दस सालों से ज़मीन और वजूद की कैसी खूनी लड़ाई चल रही है? तेरे पिता को अगर ज़रा सी भी भनक लग गई कि उनकी बेटी उस घर के वारिस को अपना दिल दे बैठी है, तो वो इस शहर को आग लगा देंगे!" माँ की आवाज़ में डर और क्रोध का भयानक मिश्रण था। कमरे की खिड़कियाँ बंद थीं, लेकिन माँ की फुसफुसाहट किसी तूफ़ान से कम नहीं लग रही थी। 


नंदिनी ज़मीन पर बैठी, अपने आँसुओं से भीगे दुपट्टे को मुट्ठी में भींचे हुए थी। उसने भारी गले से कहा, "माँ, मुझे खुद नहीं पता चला कि मैं और देवदत्त कब एक-दूसरे के इतने करीब आ गए। हमारा प्रेम इस दुश्मनी से बहुत दूर है माँ..."


"चुप कर जा!" माँ ने तुरंत आगे बढ़कर उसके मुँह पर हाथ रख दिया। "ये बात आज के बाद तेरे होंठों से बाहर नहीं आनी चाहिए। अगर दीवारों ने भी ये बात सुन ली, तो खून की नदियाँ बह जाएंगी। तू आज और अभी इस बात को अपने ज़हन के सबसे गहरे कोने में दफ़न कर देगी।"


नंदिनी ने अपनी माँ की उन काँपती आँखों में देखा, जिनमें एक घर के उजड़ने का खौफ़ साफ़ झलक रहा था। उसने अपने अंदर उठते हुए बवंडर को वहीं रोक लिया और रुंधे हुए गले से बोली, "ठीक है माँ, मैं आपको वचन देती हूँ। आज के बाद मैं कभी उसका नाम नहीं लूँगी।"


उस दिन के बाद नंदिनी और देवदत्त हमेशा के लिए अलग हो गए। कोई शोर नहीं हुआ, कोई बगावत नहीं हुई। उन दोनों के बीच बिना कुछ कहे एक ऐसा अलिखित अनुबंध तय हो गया था जिसे यह दुनिया कभी नहीं समझ सकती थी। उन्होंने दूर रहकर भी एक-दूसरे की यादों के सहारे जीने का करार कर लिया था।


इस घटना को बीते हुए आज बाईस साल हो चुके थे। 


समय के साथ नंदिनी एक बहुत ही शांत और परिपक्व महिला बन चुकी थी। उसके पति एक सीधे-सादे इंसान थे और उसका एक बीस साल का बेटा था, कबीर। कबीर अपनी यूनिवर्सिटी का बहुत होनहार छात्र था। आज उसके कॉलेज में वार्षिक साहित्य और कला महोत्सव का समापन था। कबीर को कविता पाठ में पूरे राज्य में प्रथम पुरस्कार मिला था। शाम को जब कबीर घर लौटा, तो उसके चेहरे पर एक अजीब सी चमक और हैरानी दोनों थी। 


"माँ, आपको पता है आज मुझे पुरस्कार किसने दिया? देश के सबसे मशहूर लेखक और कवि देवदत्त जी ने!" कबीर ने अपनी ट्रॉफी मेज़ पर रखते हुए कहा। फिर उसने अपने मोबाइल में खींची गई एक तस्वीर निकालकर नंदिनी के सामने रख दी। 


जैसे ही नंदिनी की नज़र उस तस्वीर पर पड़ी, उसके हाथों से मोबाइल छूटते-छूटते बचा। तस्वीर में मुख्य अतिथि देवदत्त, कबीर को शील्ड दे रहे थे। लेकिन जो बात किसी को भी हैरान कर सकती थी, वह थी उन दोनों की शक्ल। देवदत्त और कबीर बिल्कुल एक जैसे लग रहे थे। दोनों का माथा, आँखों की गहराई, मुस्कुराने पर गालों पर पड़ने वाला हल्का सा गड्ढा... सब कुछ हूबहू एक था। फ़र्क सिर्फ इतना था कि एक के बालों में सफेदी आ चुकी थी और दूसरा अपनी जवानी की दहलीज़ पर खड़ा था। कोई भी अजनबी उन्हें देखकर यही कहता कि ये बाप-बेटे की जोड़ी है।


कबीर ने आगे कहा, "माँ, जब देवदत्त सर ने मुझे देखा तो वो कुछ पल के लिए एकदम सुन्न रह गए। उन्होंने मुझे गले लगाया और फिर मुझे अपना पर्सनल नंबर देकर कहा कि मैं आपकी बात उनसे करवाऊँ। उन्हें आपसे मेरे विषय में कुछ ज़रूरी बात करनी है।"


नंदिनी के दिल की धड़कनें अचानक बाईस साल पुरानी रफ्तार से धड़कने लगीं। वह समझ गई कि देवदत्त ने आज अपने ही जवानी के अक्स को कबीर में देख लिया है।


अगले दिन शहर के एक शांत कैफे के बाहरी हिस्से में, नदी के किनारे रखी एक बेंच पर नंदिनी और देवदत्त आमने-सामने बैठे थे। बाईस सालों का अंतराल उनके चेहरों पर झुर्रियों और सफेद बालों के रूप में साफ नजर आ रहा था, लेकिन उन दोनों की आँखों में आज भी वही पुराना, निश्छल और मर्यादित प्रेम जिंदा था। देवदत्त ने सफेद खादी का कुर्ता पहना हुआ था और उनके चेहरे पर एक अजीब सा ठहराव था।


चाय का कुल्हड़ हाथों में लिए देवदत्त ने खामोशी तोड़ी, "नंदिनी... तुम्हारा बेटा कबीर...?" 


देवदत्त का वाक्य पूरा होने से पहले ही नंदिनी ने एक सौम्य मुस्कान के साथ कहा, "हाँ देव, यह कुदरत का एक ऐसा करिश्मा है जिसे विज्ञान शायद कभी न समझ पाए। जब कबीर पैदा हुआ और बड़ा होने लगा, तो मेरे घर वाले और रिश्तेदार अक्सर हैरान होते थे कि इसके नैन-नक्श आखिर किस पर गए हैं? यह न तो मुझ पर गया था और न ही अपने पिता पर। हमारे शास्त्रों में कहते हैं कि एक माँ अपने गर्भकाल के दौरान जिस व्यक्ति के बारे में सबसे ज्यादा सोचती है, जिसे अपने मन की आँखों से दिन-रात देखती है, होने वाले बच्चे पर उसी का अक्स उतर आता है। देव, हम दुनिया की नज़रों में ज़रूर अलग हो गए थे, लेकिन उन नौ महीनों में मैंने सिर्फ तुम्हारी कविताओं को पढ़ा, तुम्हारी तस्वीर को मन में बसाए रखा और तुम्हारी ही यादों में जीती रही। शायद मेरी उसी तपस्या का परिणाम है कबीर।" 


कहते-कहते नंदिनी का ढलता हुआ चेहरा एक अलौकिक चमक से भर गया। उसने बात बदलते हुए पूछा, "खैर, यह सब तो मेरी नियति थी। तुम बताओ, तुम्हारा परिवार कैसा है?"


देवदत्त की आँखों में नमी तैर गई। उसने अपनी कुर्सी को थोड़ा आगे खिसकाया और अपनी जेब से मोबाइल निकालकर एक तस्वीर नंदिनी के सामने कर दी। 


तस्वीर में एक बीस-इक्कीस साल की बेहद खूबसूरत लड़की थी। नंदिनी ने जैसे ही उस तस्वीर को देखा, उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। वह लड़की बिल्कुल वैसी ही दिख रही थी जैसी नंदिनी बाईस साल पहले हुआ करती थी। वही बड़ी-बड़ी आँखें, वैसी ही ठुड्डी और बालों को संवारने का वही अंदाज़।


देवदत्त मुस्कुराया, और उसकी आवाज़ में एक अजीब सी तृप्ति थी, "यह मेरी बेटी है नंदिनी। हम दोनों ने ही एक-दूसरे को अपने भीतर इतनी गहराई तक जज़्ब कर लिया था कि हमारे प्रेम का अक्स हमारी संतानों में ढल गया। मैंने अपनी पत्नी से अपने और तुम्हारे प्रेम के बारे में कभी कुछ नहीं छिपाया था। वह जानती थी कि तुम मेरी रूह में बसती हो। जब वह गर्भवती थी, तो उसने तुम्हारी वो पुरानी तस्वीर, जो मैंने उसे दी थी, अपने पास रखी थी। वह दिन-रात मेरे मुंह से सिर्फ तुम्हारे निस्वार्थ प्रेम के किस्से सुनती थी। उसका मानना था कि अगर उसकी बेटी हो, तो उसमें तुम्हारे जैसी ही पवित्रता और सुंदरता हो। शायद उसकी उसी श्रद्धा का परिणाम है मेरी यह बेटी।"


देवदत्त ने एक पल का विराम लिया और फिर धीमी आवाज़ में कहा, "नंदिनी, मेरी इस बेटी का नाम भी मैंने 'नंदिनी' ही रखा है।"


कैफे के उस शांत किनारे पर अब शब्दों की कोई ज़रूरत नहीं बची थी। दोनों की आँखें प्रेम, कृतज्ञता और एक-दूसरे के प्रति असीम सम्मान से छलक रही थीं। उन्होंने बिना किसी शिकायत के अपनी-अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभाई थीं, लेकिन कुदरत ने उनके उस मौन प्रेम को एक ऐसा अमिट आकार दे दिया था, जिसे दुनिया की कोई भी दुश्मनी नहीं मिटा सकती थी।


अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

विरासत का सौदा और एक बेटे का फर्ज

  "बहु अभी तक वापस नहीं आई? सुबह के दस बज रहे हैं और घर में नाश्ते का कोई अता-पता नहीं है। उसे मायके गए हुए दो दिन हो गए, क्या उसे याद नहीं कि उसका एक ससुराल भी है?" दीनानाथ जी ने अखबार को सोफे पर पटकते हुए अपनी पत्नी सरोज से कहा। उनकी आवाज में जो तल्खी थी, वह भूख से ज्यादा अहम की थी। सरोज जी ने रसोई से झांकते हुए दबी जुबान में कहा, "अजी सुनिए, वो कल रात ही आने वाली थी, लेकिन उसकी माँ की तबीयत अचानक ज्यादा खराब हो गई। इसलिए रुक गई। अभी सुमित गया है उसे लेने।" "तबीयत! अरे, यह अमीरों की बीमारियां कभी खत्म नहीं होतीं। जब देखो बीपी, शुगर, घबराहट... यह सब बहाने हैं। असली बात यह है कि उस लड़की का मन इस घर में लगता ही नहीं। उसे अपने बाप के उस आलीशान बंगले की आदत जो पड़ी है," दीनानाथ जी बड़बड़ाए। तभी दरवाजे पर गाड़ी रुकने की आवाज आई। सुमित और उसकी पत्नी, मेधा, घर में दाखिल हुए। मेधा की आँखें सूजी हुई थीं, जैसे वह बहुत रोई हो। सुमित का चेहरा भी गंभीर था। दीनानाथ जी ने मेधा को देखते ही ताना मारा, "आ गई महारानी? चलो शुक्र है, दो दिन बाद ही सही, ससुराल की याद तो ...

गृह प्रवेश

  “मैं मम्मी को नहीं बताऊंगी… मैं खुद ही सामना करूंगी।” यह सोचकर स्नेहा ने अपने आंसू पोंछे। चेहरे पर मजबूती का नकाब चढ़ाया और मां के घर की तरफ निकल गई। पिता के बरसी-पूजन का काम था। रिश्तेदार आए हुए थे, घर में भीड़ थी, और हर चेहरे पर सहानुभूति—लेकिन स्नेहा के भीतर एक और ही उथल-पुथल चल रही थी। पूजा में बैठी वह मंत्र तो सुन रही थी, पर कान बार-बार पिछले दो दिनों की उन बातों पर अटक जाते—जिन्होंने उसे अंदर से तोड़ दिया था। उसकी सास विमला और पति अभिषेक … दोनों ने इतनी सहजता से उसे “अलग” कर दिया था, मानो वह घर की सदस्य नहीं, किसी काम की सुविधा भर हो। दो दिन पहले जब वह मायके जाने लगी थी, तब विमला जी ने ताना कस दिया था— “हर छोटी बात पर मायके भागना तुम्हारी आदत बन गई है, स्नेहा। शादी के बाद भी मां-बाप की छाया नहीं छोड़ पाई?” और अभिषेक… जिसने हमेशा कहा था “मैं तुम्हारे साथ हूं”—वह भी उस दिन बस इतना बोलकर रह गया था— “मां सही कह रही हैं, स्नेहा… तुम हर चीज़ को दिल पर ले लेती हो।” स्नेहा ने बहस नहीं की थी। बस चुपचाप निकल गई थी। क्योंकि उस वक्त बोलने पर शब्द नहीं, आँसू निकलते। और आँसू उसे कमज़ोर...

स्वाभिमान का स्वाद: मठरी वाली दादी

  "माँ, अगले महीने से मैं तुम्हें जेब खर्च के लिए वो दो हज़ार रुपये नहीं दे पाऊँगा। ईएमआई बढ़ गई है और बच्चों की स्कूल फीस भी। तुम्हें वैसे भी क्या खर्चा है? घर में सब कुछ तो मिलता ही है। खाना, कपड़ा, छत... और क्या चाहिए इस उम्र में?" विकास ने ऑफिस जाने से पहले जूते पहनते हुए बड़ी बेरुखी से अपनी माँ, सावित्री देवी से कहा। पास ही खड़ी उसकी पत्नी, रश्मि, ने भी सुर में सुर मिलाया, "हाँ माँ जी, फालतू में पैसे जमा करके क्या करेंगी? आखिर जाना तो सब यहीं छोड़कर है। दवाई-पानी तो हम ला ही देते हैं।" सावित्री देवी के हाथ में चाय का कप कांप गया। उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस फीकी सी मुस्कान के साथ सिर हिला दिया। विकास और रश्मि चले गए। घर में सन्नाटा पसर गया, लेकिन सावित्री देवी के अंदर एक शोर मचा हुआ था। बात उन दो हज़ार रुपयों की नहीं थी। बात उस 'हक़' की थी, जो धीरे-धीरे 'भीख' में बदलता जा रहा था। सावित्री देवी के पति एक सरकारी क्लर्क थे। उनकी मौत के बाद जो पी.एफ. और ग्रेच्युटी का पैसा मिला था, वह सब उन्होंने विकास के नए फ्लैट की डाउन-पेमेंट में दे दिया था। सोचा था बेटा है...