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रिश्तों में खटास

 सुषमा ने मोबाइल की स्क्रीन बुझाई, जैसे किसी ने भीतर जली आख़िरी बाती पर भी फूँक मार दी हो। हाथ अचानक ढीले पड़ गए, फोन उसके पैरों के पास गिरा और वह वहीं फर्श पर धम्म से बैठ गई।

आँखों से आँसू बह रहे थे, पर आवाज़ गले में अटक कर रह गई थी।

कुछ सेकंड बाद जैसे गला फट गया—
“रीना चली गई… हमेशा के लिए चली गई…”

ड्रॉइंग रूम में बैठा उसका बेटा वरुण उठकर भागता हुआ आया।

“माँ! क्या हुआ? किसका फोन था? आप ऐसे क्यों रो रही हैं?”

पीछे से बहू नेहा भी आ गई, हाथ में कपड़े की टोकरी लिए हुए ही ठिठक गई।

सुषमा ने हथेलियों से चेहरा ढँक लिया। आवाज़ निकल ही नहीं रही थी।

वरुण ने झुंझलाकर, घबराकर एक साथ पूछा—
“माँ, आप बोलेंगी तो सही! कौन था? पापा को फोन करूँ क्या? या डॉक्टर को बुलाऊँ?”

कुछ पल बाद सुषमा ने खुद को संभालते हुए धीरे से कहा—
“रीना… रीना नहीं रही… हार्ट अटैक… अस्पताल पहुँचने से पहले ही…”

वरुण चौंक गया,
“रीना आंटी? पर… हम तो… सालों से…”
आगे के शब्द उसके गले में ही अटक गए।

नेहा ने हल्की फुसफुसाहट में कहा,
“वही आंटी, जिनसे आपकी बात बंद है न, माँजी…”

सुषमा ने तीखे स्वर में उसकी ओर देखा,
“बंद थी, हाँ! पर रिश्ता तो था न!… चार दशक का… बचपन का…”

वह उठने की कोशिश में फिर लड़खड़ा गई।

“नेहा, बैग देना मेरा… सूटकेस… कपड़े रखती हूँ… मुझे जाना है उसके घर… उसके अंतिम दर्शन को तो जाने दो…”

वरुण ने उसके हाथ थाम लिए,
“इतने साल आपने उनसे बात नहीं की माँ… वो भी हमारे कारण ही तो… अब आप अचानक ऐसे भाग के जाएँगी तो… कौन क्या सोचेगा…”

सुषमा के आँसू जैसे गर्म हो उठे।

“यही सोचते रहना तुम लोग—कौन क्या सोचेगा!
मैंने भी तो यही सोचते-सोचते इतने साल निकाल दिए वरुण!
‘पहले वो आएगी… पहले वो माफ़ी माँगेगी… पहले वो फोन करेगी…’
और आज… आज वो ही नहीं रही…”

नेहा आगे बढ़कर बोली,
“पर माँजी, आपको भी तो बहुत दुख हुआ था न शादी के समय… रीना आंटी ने सब रिश्तेदारों के सामने आप पर कितना आरोप लगा दिया था… आप रोते-रोते बेहोश हो गई थीं…”

सुषमा जैसे किसी गहरे कुएँ में झाँकने लगी।

वह दिन उसकी आँखों के सामने तैरने लगा—


बीस साल पुरानी बात थी।
सुषमा और रीना—दोनों की दोस्ती स्कूल से शुरू हुई थी।
गली के आखिर में सुषमा का घर, उस गली के मोड़ पर रीना का।
कितनी गर्मियाँ एक ही छत पर गुज़री थीं—आम की गुठलियाँ चूसते, बासी ठंडी रोटी पर अचार लगाकर खाते हुए।

किसी को चोट लगती तो दूसरी की माँ मलहम ले आती।
किसी के घर शादी होती, दूसरी को अपनी बेटी जैसा मानकर सारा काम सौंपा जाता।

फिर दोनों की शादी अलग-अलग शहरों में हुई।
फिर भी चिट्ठियाँ, फोन, त्योहारों पर मिलना—सब चलता रहा।

कई बरस बाद दोनों फिर एक ही शहर में आ बसे।
अब उनके बच्चे भी दोस्त बन गए थे।

रीना की बेटी आन्या और सुषमा का बेटा वरुण बचपन से एक-दूसरे को जानते थे।
कभी सड़क पर साइकिल चलाते, तो कभी छत पर पतंग लूटते।

सुषमा मज़ाक में कहती,
“देख लेना, ये दोनों बड़े होकर भी साथ रहेंगे, दोस्त बनकर नहीं तो बहू-दामाद बनकर ही सही!”

रीना हँसती,
“अरे, तो क्या बुरा है? हमें तो तैयार बहू-बेटा यहीं मिल जाएँगे।”

धीरे-धीरे यह मज़ाक उनके मन के किसी कोने में सच्चाई का बीज बन गया।

जब वरुण की नौकरी लगी, सुषमा ने धीरे से बात छेड़ी,
“रीना, अगर तुम्हें ठीक लगे तो… हम अपनी पुरानी बात को सच कर दें? वरुण और आन्या…”

रीना का चेहरा पहले तो खिल उठा, फिर कुछ पल को गंभीर हो गया।

“मैं तो हमेशा से चाहती थी सुषमा, पर… पहले मुझे आन्या से बात कर लेने दो।”

उस शाम रीना ने अपनी बेटी से पूछा—
“बेटा, अगर हम वरुण का रिश्ता लें तो… तुम्हें कैसा लगेगा?”

आन्या कुछ क्षण चुप रही।
“मम्मी, वरुण भैया मुझे बहुत अच्छे लगते हैं… पर भैया जैसे।
उनसे कभी उस नजर से देखा ही नहीं।
मैं… किसी और को पसंद करती हूँ।”

रीना के लिए यह बात समझना आसान था, मानना कठिन।
उसने फिर भी धीरे-धीरे खुद को संभाला।

“कौन है बेटा?”

आन्या ने बताया—समान ऑफिस में काम करने वाला लड़का, अलग जाति, अलग प्रांत का।
घरवालों के लिए थोड़ा मुश्किल, पर लायक, समझदार और अच्छा इंसान।

रीना के मन में दो मोर्चे खुल गए।

एक तरफ सुषमा के साथ चालीस साल की दोस्ती,
दूसरी तरफ बेटी की खुशी।

कुछ दिनों तक वह दोनों पक्षों को समझाने की कोशिश करती रही।
आन्या से भी, अपने मन से भी।

आखिर तय दिन पर, सुषमा और उसका परिवार रीना के घर आए।
रिश्ते की बात पक्की करने का माहौल था।

सुषमा ने सोच रखा था कि आज बात तय होकर ही उठेगी।
उसने वरुण के लिए अपनी साड़ी का सबसे नया पैकेट निकाला था—
“यही दूँगी उनकी होने वाली बहू को। पहली बार जब आएगी ससुराल…”

रीना ने तब उससे सच कहने की कोशिश की थी…
“देख सुषमा, मैं तुझसे कुछ कहना चाहती थी, पर…”

पर ठीक उसी समय बाहर से किसी ने आवाज लगा दी—
“चाय ले आओ, मेहमान बैठे हैं।”

बात टलती रही।

बैठक में सब जमा हुए।
सुषमा के पति ने मुस्कुराकर कहा—
“तो रीना जी, अब पुरानी डोर को नया नाम दे ही दीजिए।
हम वरुण के लिए आपकी आन्या का हाथ माँगने आए हैं।”

कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।

रीना ने काँपती आवाज़ में कहा,
“भइया… मैं बहुत शर्मिंदा हूँ… पर… आन्या…”

उसी समय अंदर से आन्या निकल आई।
उसने साफ शब्दों में कहा—

“आंटी, मुझे वरुण भैया बहुत अच्छे लगते हैं, लेकिन भाई की तरह।
मैं उनसे शादी नहीं कर सकती।
मैं किसी और को पसंद करती हूँ… और मैं वही शादी करूँगी…”

जमीन जैसे सुषमा के पैरों के नीचे से खिसक गई।

उसे लगा, ये सब उसकी insult के लिए प्लान किया गया है।
इतने वर्षों की दोस्ती, अपनापन, घर-आना-जाना—सब उसकी आँखों के आगे घूम गया।

वह फट पड़ी—
“तो ये तमाशा था? तुमने पहले क्यों नहीं बताया रीना?
मैं अपने बेटे का रिश्ता लेकर तुम्हारे घर भिखारी की तरह खड़ी हूँ?
कह देती न, कि तुम्हारी औकात नहीं हमारी बेटी के लायक!”

रीना भी तिलमिला गई—
“तू ये क्या कह रही है सुषमा? अपने ही बच्चे हैं दोनों।
मैं भी असमंजस में थी, पर बेटी की ज़िंदगी का सवाल है…”

पर सुषमा सुनने की स्थिति में नहीं थी।
वह, जो ज़रा सी बात पर आहत हो जाती थी,
जिसके मन में सम्मान सबसे बड़ा था—
उसे लगा सबने मिलकर उसकी बेइज्जती की है।

उस दिन दोनों के बीच जो बातें हुईं,
वे शब्द नहीं, ज़हर के तीर थे।

सुषमा रोती हुई घर लौट आई।
उस रात उसने तय कर लिया—
“आज के बाद न रीना से बात, न उसके घर जाना।
मेरे लिए वो और उसका परिवार खत्म।”

वरुण ने भी अपनी माँ का दुख देखा,
उसे भी लगा—मामा-मौसी नहीं सही,
आंटी ने कम से कम पहले बता सकती थीं।
उसने भी मन में दीवार खड़ी कर ली।

अगले साल आन्या की शादी हो गई।
कार्ड आया, लेकिन सुषमा ने बर्थडे कार्ड समझकर almirah में रख दिया।
न उसने फोन किया, न गई।

दो साल बाद वरुण की शादी हुई।
रीना को पता चला तो उसने फोन किया।

“सुषमा… सुना है वरुण की शादी है… कार्ड नहीं भेजा तूने…”

“जो रिश्ते दिल से हट जाते हैं,
उनके कार्ड डाक से नहीं भेजे जाते रीना,”
सुषमा ने ठंडी आवाज़ में कहा और फोन काट दिया।

उसके बाद कभी फोन नहीं उठाया।
कभी कॉल नहीं किया।
कभी त्योहार पर संदेश नहीं भेजा।

रीना कई बार उसके दरवाज़े तक आई,
पर घर से किसी ने कह दिया—
“मम्मी ठीक नहीं हैं, आराम कर रही हैं।”
या—“अभी बाहर गई हैं।”

धीरे-धीरे रीना ने भी कोशिश छोड़ दी।
अब वो बस दूर से ही उसका हाल किसी पड़ोसी से पूछ लिया करती।

साल दर साल गुजरते रहे।
दोनों की जिद, दोनों का अहंकार,
दोनों के बीच की दूरी को बढ़ाते रहे।


आज अचानक फोन आया था—
“दीदी, मैं रीना की पड़ोसन बोल रही हूँ,
रीना को हार्ट अटैक आया था… अस्पताल ले गए थे… बचा नहीं पाए…”

सुलेखा जैसे पत्थर बन गई थी।

अब, फर्श पर बैठे हुए उसे सिर्फ वही आखिरी झलक याद आ रही थी,
जब एक बार बरसों पहले, बारिश की शाम को रीना उनकी गली के मोड़ पर खड़ी थी,
और उसने कार की खिड़की से उसे साफ-साफ देखा था—
पर कार का शीशा ऊपर कर लिया था,
मानो किसी अजनबी को देख रही हो।

“तुम दोनों के कलह में, मैं भी अपने प्यार को भूल गई थी…”
सुषमा ने भरे गले से कहा।
“मैं भी तो रीना से रूठी रही न, वरुण!
सिर्फ तुम्हारा ईगो नहीं था, मेरा भी था…”

वरुण चुप हो गया।
उसे अपनी मां की आँखों में वह दर्द दिख रहा था,
जो सिर्फ किसी बहुत पुराने रिश्ते के टूटने से आता है।

“माँ, अब आप अकेली कैसे जाएँगी? मैं भी चलता हूँ आपके साथ,”
उसने धीरे से कहा।

नेहा भी आगे बढ़ी,
“मैं भी साथ चलूँ, माँजी? कुछ काम-काज हो तो…”

सुषमा ने पहली बार नेहा के सिर पर हाथ फेरा,
“चल, तू भी चल बेटा… शायद आज मैं तुम्हें भी कुछ सिखा सकूँ,
जो मैंने बहुत देर से सीखा है…”

तीनों तैयार होकर जल्दबाज़ी में रीना के घर पहुँचे।

गली वही थी, मोड़ वही…
बस एक फर्क था—
अब उस मोड़ पर खड़ी वो हँसमुख, खुली बाँहों से मिलने को तैयार लड़की नहीं थी,
जिसका नाम रीना था।

घर के अंदर सफेद चादर बिछी थी।
बीच में रीना शांत पड़ी थी।
चेहरे पर वही सादगी, वही ममता, और अब एक अजीब सा सुकून था।

सुषमा के कदम लड़खड़ाए।
वह रीना के पास जाकर बैठ गई,
उसका ठंडा माथा पकड़कर फूट-फूटकर रो पड़ी—

“तू तो कहती थी न,
‘हम तो साथ-साथ बुढ़ापे का टहलना भी साथ करेंगे सुषमा…’
देख, मैं आई तो सही… पर कितनी देर से…”

वह किसी बच्चे की तरह रो रही थी।

पास खड़ी रीना का बेटा—सिद्धांत—उनके पैरों के पास बैठ गया।

“आंटी… माँ अक्सर आपका नाम लिया करती थीं।
हर त्योहार पर लड्डू बनाती थीं और कहती थीं—
‘काश सुषमा होती, तो दो डिब्बे अलग से बना लेती।’
वो आपके लिए नाराज़ कम, उदास ज़्यादा थीं…”

सुषमा के लिए ये शब्द किसी कटघरे जैसा थे।

“कभी फोन कर लेती न बेटा… मैं भी थक गई थी कोशिश करते-करते…”

सिद्धांत ने हल्की उदासी से कहा,
“उन्होंने कई बार आपसे मिलने की कोशिश की आंटी।
पर हर बार आपने, या वरुण भैया ने…
एक दूरी बना कर रखी।
माँ कहती थीं—
‘शायद समय को थोड़ा और वक्त चाहिए…’
पर वक्त ने ही साथ छोड़ दिया।”

वरुण की नज़र झुक गई।

उसे याद आया—
कितनी बार ‘रीना आंटी कॉल कर रही हैं’ स्क्रीन पर दिखता,
और वो हँसी में उड़ा देता—
“मम्मी, आपकी पुरानी ‘बेस्ट फ्रेंड’ का फोन है,
उठाऊँ क्या या फिर रहनें दूँ?”

फिर खुद ही ‘रिजेक्ट’ कर देता।

उसे लगा जैसे उस पल में वो बचपन से आज तक का अपना चेहरा नहीं देख पाया था।

वरुण ने रीना के पार्थिव शरीर के पास जाकर हाथ जोड़ दिए।

“आंटी, आपने मुझे बचपन में जो-जो खिलौने दिए,
जिन्हें मैं लापरवाही से तोड़ देता था…
आप फिर भी नए ले आती थीं।
पर अब आपने एक आखिरी मौका दिया था समझने का,
जिसे मैंने खुद अपने हाथों से तोड़ दिया…”

नेहा खुद को रोने से रोक नहीं पाई।
उसे लगा, रिश्तों के बीच जो खाई बनती है,
वह कभी एकतरफा नहीं होती।

कुछ देर बाद अंतिम यात्रा की तैयारी शुरू हुई।

सुषमा ने धीरे से सिद्धांत से कहा—
“बेटा, अगर तुझे बुरा न लगे तो…
आखिरी बार मैं तेरी माँ के हाथों में चूड़ी पहना दूँ?
जैसे हमने पहली बार उसकी शादी में पहनी थीं…”

सिद्धांत की आँखें भर आईं।
“आंटी, वे पूरा जीवन आपको अपनी बहन मानती रहीं…
आपका ये हक उनसे कैसे छीन सकता हूँ?”

सुषमा ने काँपते हाथों से काँच की हरी चूड़ियाँ रीना की कलाई में पहना दीं।

“याद है, तू कहती थी—
‘सुषमा, तू तो मेरी आधी चूड़ी है,
एक टूटे तो दूसरी संभाल लेगी…’
देख रीना, अब मैं टूटी हूँ,
और तू… तू तो बिल्कुल ही चल दी…”

अंतिम यात्रा में चलते हुए सुषमा के मन में बार-बार एक ही वाक्य घूमता रहा—

“कितना छोटा-सा कारण था हमारी दूरी का…
और कितनी लंबी सज़ा हमने खुद को दे दी…”

शाम को घर लौटते समय कार में गहरा सन्नाटा था।

कुछ देर बाद सुषमा ने धीमे स्वर में कहा—

“वरुण, आज मैंने जो खोया है न,
वो तू समझ भी नहीं पाएगा।
मुझसे बड़ी मूर्ख कोई नहीं,
जिसने एक बात की चोट में
चालीस साल की दोस्ती दाँव पर लगा दी।

तू मुझे दोष दे या मत दे…
पर आज मैं तुझे एक बात साफ-साफ कहूँगी—

अगर कल को मेरी और तेरी,
या तेरी और तेरी बहन,
या तेरी और तेरे किसी दोस्त में कभी खटास हो जाए न…
तो इस बारत की तरह इंतज़ार मत करना
कि ‘पहले वो आएगा, पहले वो मानेगा।’

जो याद आए… बस फोन कर देना।
जो अपने हों… उन्हें बचाना होता है,
इंतज़ार नहीं करवाना।”

वरुण की आँखें छलक आईं।

“माँ, मुझसे गलती हुई…
मैंने आपकी चोट को अपना अहंकार बना लिया।
मैंने कभी सोचा ही नहीं कि
मामा-मौसी जैसे रिश्ते सिर्फ खून से नहीं,
समय और अपनापन से बनते हैं।
रीना आंटी ने बचपन में मुझे इतनी बार संभाला,
और बड़े होकर मैंने एक बार भी उन्हें नहीं…”

सुषमा ने बेटे के कंधे पर हाथ रखा।

“अब बस बेटा।
गलती मान लेना ही पहले कदम है।
कम से कम आगे के रिश्तों को बचा ले।
जिनसे खफा है—कॉल कर।
जिनसे दूर है—मिलने जा।
क्योंकि… आज मैं तुझे लिख कर दे सकती हूँ—
दिल पर रखी कड़वाहट,
चिता के धुएँ से भी ज़्यादा जलाती है।”

नेहा धीरे से बोली,
“माँजी, मैं भी… कई बार अपने मायके वालों से,
या आपकी बातों से दिल में गांठ रख लेती हूँ…
शायद वक्त रहते खुल जाएँ…
वरना कहीं देर न हो जाए…”

सुषमा हल्का-सा मुस्कराई।
“हम सब इंसान हैं,
हमसे गलती होगी, गुस्सा होगा,
बहस होगी, मनमुटाव होगा।
पर फैसला ये करना है बेटा,
कि हम मनमुटाव को रिश्तों से बड़ा बनने देंगे,
या रिश्तों को मनमुटाव से ऊपर उठाएँगे।”

रात को अपने कमरे में आकर
सुषमा ने अलमारी से पुराना डिब्बा निकाला।
उसमें बंधी थी पुरानी तस्वीरें—
छत पर बैठी दो लड़कियाँ,
एक ने दूसरे के बालों में तेल लगाया है,
दूसरी उसे आम की फाँक खिलाते हुए हँस रही है।

तस्वीर के पीछे रीना की ही लिखावट थी—
“सोचा था, बुढ़ापे में साथ बैठकर ये फोटो देखेंगे और हँसेंगे।
अगर कभी तू मुझसे नाराज़ हो तो ये तस्वीर देख लेना,
और मुझे कम से कम एक बार ज़रूर फोन करना।
तू न भी करे, तो मैं करूँगी—
क्योंकि तू मेरी आधी चूड़ी है।”

सुलेखा की आँखों से आँसू ताबड़तोड़ बह निकले।

उसने फोटो को सीने से लगा लिया।

धीरे से बुदबुदाई—
“तूने अपनी बात निभाई रे रीना…
आखिरी दिन तक तूने कड़वाहट को खुद से बड़ा नहीं होने दिया।
मैं ही हार गई अपने अहंकार से।”

उसने मोबाइल उठाया।
सबसे पहले अपनी बहन का नंबर मिलाया,
जिससे वह सालों से बात नहीं कर रही थी
सिर्फ इसलिए कि उसने एक बार
उससे सलाह लिए बिना सोने की चेन बेच दी थी।

“हैलो दीदी…”
उधर से हैरानी भरी आवाज आई—
“अरे सुषमा! तू? सब ठीक तो है?”

सुषमा मुस्कराते हुए रो पड़ी,
“आज सब ठीक करना है दीदी…
आज से हम किसी के लिए भी
दिल में कड़वाहट नहीं रखेंगे…
न तू, न मैं…
बस इतना वादा कर।”

बातचीत के बीच ही
उसे लगा जैसे किसी ने अंदर जमा
सालों पुरानी बर्फ पर हल्की सी धूप डाल दी हो।

उसने दिल ही दिल में रीना से कहा—

“तू चली गई,
पर जाते-जाते मुझे जीना सिखा गई।
अब मैं किसी अपने से यूँ रूठकर नहीं बैठूँगी…
क्योंकि प्यार,
झूठे आत्माभिमान से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण है।”

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