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वक्त की अदालत

 रवि ने जैसे ही घर का दरवाजा खोला, अंदर से बर्तनों के गिरने की तेज आवाज आई। उसके कदम वहीं ठिठक गए। दिन भर ऑफिस की फाइलों और बॉस की फटकार से जूझने के बाद, उसे उम्मीद थी कि घर में दो पल सुकून के मिलेंगे, लेकिन पिछले छह महीनों से 'सुकून' शब्द उसकी डिक्शनरी से जैसे गायब ही हो गया था।


अंदर के कमरे से वंदना की तेज आवाज आ रही थी, "मैं पहले ही कह चुकी हूं, मुझसे ये चिक-चिक नहीं होगी। मेरे पापा ने मुझे रानियों की तरह पाला है, नौकरानी बनने के लिए नहीं भेजा यहाँ। अगर आपके माता-पिता को समय पर खाना चाहिए, तो एक कामवाली बाई का इंतजाम क्यों नहीं करते? या फिर खुद जल्दी आ जाया करो ऑफिस से!"


रवि ने गहरी सांस ली और अंदर दाखिल हुआ। सामने का नजारा वही पुराना था। डाइनिंग टेबल पर खाना बिखरा पड़ा था। रवि की माँ, सुमित्रा जी, एक कोने में कुर्सी पर बैठी अपनी साड़ी के पल्लू से आंसू पोंछ रही थीं और पिताजी, हरिशंकर जी, सिर झुकाए चुपचाप बैठे थे। वंदना कमर पर हाथ रखे, आँखों में अंगारे लिए खड़ी थी।


"क्या हुआ वंदना? अभी तो घर में कदम रखा है, और फिर शुरू हो गई तुम?" रवि ने अपना बैग सोफे पर पटकते हुए कहा। उसकी आवाज में गुस्सा कम और थकान ज्यादा थी।


वंदना तमतमाई हुई रवि की ओर मुड़ी, "हां, तो और क्या करूं? तुम्हारी माँ ने फिर से कह दिया कि सब्जी में नमक कम है। अरे, मैं कोई रसोइया हूं क्या? जो बना दिया, चुपचाप खा लेना चाहिए। ऊपर से मुझे ज्ञान दे रही हैं कि 'बहू, थोड़ा घर का काम मन लगा कर किया करो'। मन कहां से लगेगा रवि? मेरे मायके में मैंने कभी गिलास उठाकर पानी नहीं पिया, और यहाँ पूरे घर का झाड़ू-पोछा, बर्तन... मेरी तो कमर टूट गई है। मेरी उंगलियां देखो, कैसी रूखी हो गई हैं।"


रवि ने बेबसी से माता-पिता की ओर देखा। वह जानता था कि वंदना झूठ बोल रही है। घर में झाड़ू-पोछा करने के लिए सुबह एक बाई आती है। वंदना को सिर्फ दोपहर और रात का खाना बनाना होता है, और वह भी वह अक्सर बाहर से ऑर्डर करने की जिद करती है। लेकिन रवि की सैलरी इतनी नहीं थी कि वह रोज होटल का खाना खिला सके या वंदना के कहे अनुसार 24 घंटे की फुल-टाइम मेड रख सके। घर का लोन, पिताजी की दवाइयां और घर का खर्च—सब कुछ उसे ही देखना होता था।


"वंदना, माँ ने बस इतना कहा होगा कि नमक देख लेना। इसमें इतना बखेड़ा खड़ा करने की क्या जरूरत है? और रही बात काम की, तो तुम जानती हो मेरी हालत। अभी मैं फुल टाइम मेड अफोर्ड नहीं कर सकता," रवि ने समझाने की कोशिश की।


"तो फिर अलग हो जाओ!" वंदना ने चिल्लाकर अपना अंतिम फैसला सुना दिया। "हम अलग घर लेंगे। वहां मैं जो चाहूंगी, जैसे चाहूंगी रहूंगी। इन बुड्ढे-बुढ़ियों की सेवा मुझसे नहीं होगी। वैसे भी ये दोनों दिन भर खट-खट करते रहते हैं, मेरी तो प्राइवेसी ही खत्म हो गई है।"


सुमित्रा जी का दिल धक से रह गया। उन्होंने कांपते हाथों से पानी का गिलास उठाया, लेकिन वंदना ने झपट्टा मारकर गिलास मेज पर पटक दिया। "ड्रामा मत करिये माँजी! ये सब सहानुभूति बटोरने के पुराने तरीके हैं। रवि, मैं साफ कह रही हूँ, या तो ये घर में रहेंगे या मैं। मुझे अपनी जिंदगी अपनी शर्तों पर जीनी है।"


उस रात घर में चूल्हा नहीं जला। रवि और उसके माता-पिता भूखे सोए, जबकि वंदना ने अपने लिए पिज्जा ऑर्डर किया और बेडरूम का दरवाजा जोर से बंद कर लिया। रवि बाहर ड्राइंग रूम में सोफे पर लेटा छत को घूरता रहा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। वह वंदना से प्यार करता था, लेकिन अपने माता-पिता को इस उम्र में कैसे छोड़ दे? वह पिता जिन्होंने अपनी पीएफ की रकम से उसे इंजीनियरिंग करवाई, वह माँ जिसने अपनी गहने बेचकर उसकी पहली बाइक दिलाई थी। क्या आज वे बोझ बन गए?


अगले कुछ दिन घर का माहौल और भी जहरीला हो गया। वंदना ने अब मौन व्रत तोड़कर 'असहयोग आंदोलन' शुरू कर दिया था। उसने खाना बनाना बंद कर दिया। रवि सुबह उठकर जल्दी-जल्दी चाय और नाश्ता बनाता, माता-पिता को देता और फिर ऑफिस भागता। वंदना अपने कमरे से तभी निकलती जब रवि चला जाता। वह जानबूझकर जोर-जोर से टीवी चलाती जब हरिशंकर जी दोपहर में आराम कर रहे होते।


एक शाम, जब रवि घर लौटा, तो उसने देखा कि पिताजी को अस्थमा का अटैक आया है और वे जोर-जोर से खांस रहे हैं। इनहेलर खत्म हो गया था। सुमित्रा जी घबराई हुई वंदना के कमरे का दरवाजा खटखटा रही थीं, "बहू... ओ बहू... जरा रवि को फोन लगा दे या नीचे से दवा ला दे, इनके पापा की सांस उखड़ रही है।"


अंदर से वंदना की आवाज आई, "माँजी, मैं अभी फेसपैक लगाकर बैठी हूँ, बाहर नहीं जा सकती। आप खुद चली जाइए न, सीढ़ियां ही तो उतरनी हैं।"


यह सुनकर रवि का खून खौल उठा। उसने दौड़कर पिताजी को संभाला, तुरंत केमिस्ट से दवा लाई और उन्हें नेबुलाइजर दिया। जब पिताजी की सांसें स्थिर हुईं, तो रवि गुस्से में वंदना के कमरे में गया।


"तुम इंसान हो या पत्थर?" रवि चिल्लाया। "पिताजी की जान जा सकती थी और तुम्हें अपने फेसपैक की पड़ी थी?"


वंदना ने आईने में खुद को निहारते हुए लापरवाही से कहा, "अरे, तो क्या हुआ? बुढ़ापे में ये सब तो लगा ही रहता है। हर छोटी बात पर पैनिक होने की क्या जरूरत है? और मैंने कहा था न, मुझसे नर्स वाली उम्मीदें मत रखना।"


रवि ने हाथ उठाना चाहा, लेकिन रुक गया। उसने अपनी मुट्ठी भींच ली। "भगवान सब देख रहा है वंदना। इंसान को अपने कर्मों का फल इसी जन्म में मिलता है। याद रखना।"


वंदना जोर से हंसी। "ओहो! अब तुम मुझे प्रवचन दोगे? कर्म-वर्म कुछ नहीं होता। जिसके पास पैसा और पावर है, वही सुखी है। तुम जैसे इमोशनल बेवकूफ ही कर्म के भरोसे बैठते हैं।"


तभी वंदना का फोन बजा। उसके भाई, अमित का फोन था। वंदना ने चहकते हुए फोन उठाया, "हाँ भैया! कैसे हो? कब आ रहे हो मुझे लेने?"


लेकिन दूसरी तरफ से जो आवाज आई, उसने वंदना के चेहरे का रंग उड़ा दिया। अमित की आवाज में घबराहट थी। "वंदना, तू जल्दी घर आजा। माँ बाथरूम में गिर गई हैं। उन्हें काफी चोट आई है। और... और घर में बहुत क्लेश हो रहा है। तू बस आजा।"


वंदना के हाथ-पांव फूल गए। "मैं... मैं अभी आ रही हूँ भैया।" उसने रवि की तरफ देखा। रवि ने बिना कोई सवाल किए गाड़ी की चाबी उठाई। "चलो, मैं छोड़ देता हूँ।"


रास्ते भर वंदना भगवान से प्रार्थना करती रही। उसका दिल अपनी माँ के लिए बैठा जा रहा था। जैसे ही वे वंदना के मायके पहुँचे, वंदना दौड़कर अंदर गई।


दृश्य देखकर वंदना के पैरों तले जमीन खिसक गई।


हॉल में सोफे पर उसकी भाभी, शिखा, आराम से मैगजीन पढ़ रही थी और पास में म्यूजिक सिस्टम पर गाने चल रहे थे। वंदना की माँ, जानकी देवी, जिनके पैर पर प्लास्टर चढ़ा था, फर्श पर बैठी दर्द से कराह रही थीं और कोशिश कर रही थीं कि पास रखे जग से पानी ले सकें। जग उनकी पहुँच से थोड़ा दूर था।


वंदना दौड़कर माँ के पास गई, उन्हें पानी पिलाया और फिर शिखा की तरफ मुड़ी। "भाभी! आपको दिखाई नहीं देता? माँ दर्द से तड़प रही हैं और आप यहाँ गाने सुन रही हैं? एक गिलास पानी नहीं दे सकती थीं?"


शिखा ने मैगजीन नीचे रखी और वंदना को ऊपर से नीचे तक देखा। उसके चेहरे पर वही भाव थे, जो अक्सर वंदना के चेहरे पर होते थे—लापरवाही और अहंकार।


"ओह वंदना! तुम आ गई," शिखा ने च्युइंग गम चबाते हुए कहा। "देखो, ज्यादा चिल्लाने की जरूरत नहीं है। मेरा आज किटी पार्टी का दिन था, जो मैंने कैंसिल किया है तुम्हारी माँ की वजह से। यही बहुत बड़ा एहसान है। और रही बात पानी की, तो मैंने नौकरानी से कहा था रखकर जाने को, अब अगर बुढ़िया... आई मीन, मम्मी जी से खुद नहीं लिया जा रहा तो मैं क्या करूँ? मैं कोई आया (nurse) थोड़ी हूँ?"


वंदना को लगा जैसे किसी ने उसके गाल पर तमाचा मारा हो। ये शब्द... ये तो वही शब्द थे जो उसने कल रात रवि से कहे थे।


"भाभी, ये मेरी माँ हैं! आपकी सास हैं! आप ऐसा कैसे कह सकती हैं?" वंदना की आँखों में आंसू आ गए।


शिखा खड़ी हो गई, उसकी आँखों में तल्खी थी। "वंदना, तुम मुझे मत सिखाओ। जब तुम यहाँ थी, तो तुमने कभी एक तिनका उठाया था? माँ जी ने ही तुम्हें सिर पर चढ़ा रखा था। 'मेरी बेटी, मेरी राजकुमारी' करती थीं। अब वही राजकुमारी अपने ससुराल में क्या कर रही है, मुझे सब पता है। अमित ने बताया था कि तुम अपने सास-ससुर के साथ कैसा बर्ताव करती हो।"


वंदना सन्न रह गई।


शिखा आगे बढ़ी, "तुमने ही तो ट्रेंड सेट किया है न वंदना? 'मॉडर्न बहू' काम नहीं करती, सिर्फ ऑर्डर देती है। तो मैं भी वही कर रही हूँ। मुझे भी अपनी लाइफ जीनी है। मुझे भी इन बुजुर्गों की चिक-चिक नहीं पसंद। अगर तुम्हें अपनी माँ की इतनी चिंता है, तो ले जाओ इन्हें अपने साथ। वैसे भी ये घर मेरे और अमित के नाम होने वाला है।"


तभी वंदना के पिता, जो हमेशा कड़क स्वभाव के थे, कमरे से बाहर आए। उनके कपड़े मैले थे और चेहरा उतरा हुआ। वे वंदना को देखकर रो पड़े। "बेटी, ले जा हमें यहाँ से। यहाँ हमें दो वक्त की रोटी के लिए भी ताने सुनने पड़ते हैं। तेरी भाभी कहती है कि हम बोझ हैं।"


वंदना ने अपने पिता की वह हालत देखी तो उसका कलेजा मुंह को आ गया। ये वही पिता थे जिन्होंने वंदना की हर जिद पूरी की थी, जिन्होंने कभी उसे धूप में नहीं निकलने दिया था। आज वे अपनी ही बहू के सामने गिड़गिड़ा रहे थे।


वंदना शिखा पर चिल्लाना चाहती थी, उसे नोच लेना चाहती थी, लेकिन उसकी आवाज गले में फंस गई। किस मुंह से वह शिखा को गलत ठहराए? शिखा तो बस वंदना का ही प्रतिबिंब (reflection) थी। जो बीज वंदना ने अपने ससुराल में बोया था, उसकी फसल उसके मायके में पक चुकी थी और अब उसे वह कड़वा फल चखना पड़ रहा था।


रवि दरवाजे पर खड़ा सब देख रहा था। उसने कुछ नहीं कहा, बस वंदना के कंधे पर हाथ रखा।


वंदना माँ के गले लगकर फूट-फूट कर रोई। उस आंसुओं में सिर्फ माँ के दर्द का दुख नहीं था, बल्कि अपने पापों का प्रायश्चित भी था। उसे सुमित्रा जी का चेहरा याद आया, जिन्हें उसने पानी के लिए तरसाया था। उसे हरिशंकर जी की खांसी याद आई, जिसे उसने ड्रामा कहा था। आज जब उसकी अपनी माँ फर्श पर पड़ी थी, तब उसे समझ आया कि 'बोझ' और 'जिम्मेदारी' में क्या फर्क होता है।


कुछ देर बाद, वंदना उठी। उसने अपने आंसू पोंछे। वह शिखा के पास गई, लेकिन लड़ने के लिए नहीं।


"भाभी," वंदना की आवाज में अब अकड़ नहीं थी, बल्कि एक टूटे हुए इंसान की नरमी थी। "आप सही कह रही हैं। गलती आपकी नहीं है। गलती उस सोच की है जिसे मैंने भी पाला था। आज मुझे समझ आ गया कि जब हम ऊपर थूकते हैं, तो वह हमारे ही चेहरे पर गिरता है।"


उसने रवि की तरफ देखा, "रवि, क्या हम माँ-पापा को कुछ दिन अपने घर ले जा सकते हैं? जब तक ये ठीक न हो जाएं?"


रवि ने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया, "हमारा घर बड़ों का ही है वंदना, चाहे वो मेरे माता-पिता हों या तुम्हारे।"


शिखा और अमित अवाक खड़े थे। उन्हें उम्मीद थी कि वंदना तमाशा करेगी, पुलिस बुलाएगी। लेकिन वंदना की इस खामोश स्वीकारोक्ति ने उन्हें शर्मिंदा कर दिया।


शाम को जब वंदना वापस अपने ससुराल लौटी (मायके वालों को समझाने के बाद कि वह कल से रोज आकर देखभाल करेगी), तो घर का माहौल बदला हुआ था। नहीं, घर वही था, लोग वही थे, बदला था तो बस वंदना का नजरिया।


वह सीधे रसोई में गई। सुमित्रा जी डर गई थीं कि बहू फिर किसी बात पर लड़ेगी। "बहू, मैं अभी चाय बना देती हूँ..."


वंदना ने सुमित्रा जी के हाथ से चायदानी ले ली। "नहीं माँजी, आप बैठिए। आज आपके घुटनों में दर्द है न? मैं तेल मालिश कर दूंगी। और... मुझे माफ कर दीजिए।"


सुमित्रा जी और हरिशंकर जी एक-दूसरे को देखने लगे। क्या यह वही वंदना है?


वंदना ने चाय का कप मेज पर रखा और रवि के पास जाकर धीमे स्वर में बोली, "मुझे माफ करना रवि। मुझे समझने में बहुत देर हो गई कि 'जैसी करनी वैसी भरनी' सिर्फ एक कहावत नहीं, बल्कि जीवन का सच है। मैं नहीं चाहती कि कल मेरा बेटा आरव बड़ा होकर मेरे साथ वही करे जो मैंने आपके माता-पिता के साथ किया, या जो भाभी ने मेरी माँ के साथ किया। मैं इस चक्र को यहीं तोड़ना चाहती हूँ।"


रवि ने वंदना का हाथ थाम लिया। उस रात, उस छोटे से घर में अमीरी तो नहीं आई, लेकिन एक सुकून आया जो करोड़ों खर्च करके भी नहीं मिलता।


वंदना ने सीख लिया था कि रिश्ते शीशे की तरह होते हैं—अगर आप उसमें मुस्कुराहट देखना चाहते हैं, तो आपको भी मुस्कुराना ही पड़ेगा। अगर आप पत्थर मारेंगे, तो सामने से कांच के टुकड़े ही आएंगे जो आपको ही घायल करेंगे।


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**लेखक का संदेश:**

यह कहानी हमें याद दिलाती है कि वक्त का पहिया गोल है। आज हम जो व्यवहार अपने बुजुर्गों के साथ कर रहे हैं, कल हमारी संतान या हमारे अपने वही व्यवहार हमारे साथ दोहराएंगे। कर्म का पता कभी नहीं बदलता, वह लौटकर आता ही है। अपने घर के बड़ों का सम्मान करें, क्योंकि उनकी दुआएं वो कवच हैं जो बड़ी से बड़ी मुसीबत को रोक लेती हैं, और उनकी बद्दुआएं वो आग हैं जो हंसते-खेलते घर को राख कर देती हैं।


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