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वक्त की भट्टी

 मेरे गले में जैसे कोई बड़ा सा कांटा फंस गया था। मैंने एक गहरी सांस ली और अपने कांपते स्वर को छुपाते हुए बहुत ही सामान्य लहज़े में झूठ कहा, "अरे बेटा, तुम घबराओ मत। तुम्हारे पापा का एक छोटा सा एक्सीडेंट हुआ है। उन्हें थोड़ी चोटें आई हैं, इसलिए डॉक्टर ने उन्हें अभी आईसीयू में ऑब्जर्वेशन में रखा है और किसी को मिलने नहीं दे रहे। तुम चिराग को लेकर परेशान मत होना, मैं बस अभी घर आ रही हूँ।"

अस्पताल का वह लंबा और सफेद गलियारा उस दिन मुझे किसी अंतहीन अंधेरी सुरंग जैसा लग रहा था। फिनाइल और दवाओं की तीखी गंध मेरे दिमाग को सुन्न कर रही थी, लेकिन उससे भी ज्यादा सुन्न कर देने वाली थी वह खबर, जिसने चंद मिनटों में एक पूरे परिवार की खुशियों को निगल लिया था। मेरे सामने स्ट्रेचर पर एक सफेद चादर में लिपटी हुई देह रखी थी, जो मेरे मुँहबोले भाई और मेरे पड़ोसी, रमेश जी की थी। एक बेहद मिलनसार, हंसमुख और हमेशा दूसरों की मदद के लिए तैयार रहने वाले रमेश जी अब इस दुनिया में नहीं थे। सुबह अपनी फैक्ट्री जाते समय हाईवे पर उनकी बाइक को एक तेज़ रफ्तार ट्रक ने टक्कर मार दी थी। टक्कर इतनी भयानक थी कि उन्होंने मौके पर ही दम तोड़ दिया था। 


मैं और मेरे पति किसी तरह भागते हुए अस्पताल पहुंचे थे। पुलिस ने उनकी डायरी से नंबर निकालकर हमें फोन किया था। मेरे तो जैसे पैरों तले ज़मीन खिसक गई थी। मैं फूट-फूट कर रोना चाहती थी, चीखना चाहती थी, लेकिन मेरे पति ने मेरे कंधे को सख्ती से पकड़ लिया और रुंधे हुए गले से फुसफुसाए, "सुजाता, खुद को संभालो। अगर तुम यहां इस तरह टूटोगी, तो घर पर उन दोनों बच्चों को कौन संभालेगा? कविता भाभी तो अभी अपने मायके गई हुई हैं, उन्हें आने में कल सुबह तक का वक्त लगेगा।"


पति की बात सुनकर मैंने अपने आंसुओं को जबरन अपनी आँखों के किनारों पर ही रोक लिया। मेरी आँखों के सामने रमेश जी की उन्नीस साल की बेटी मानसी और ग्यारह साल के बेटे चिराग का मासूम चेहरा घूमने लगा। मानसी अपनी सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रही थी और रमेश जी का सबसे बड़ा सपना अपनी बेटी को एक आईएएस अफसर बनते हुए देखना था। 


अचानक मेरे फोन की स्क्रीन चमकी। मानसी का ही फोन था। मेरे हाथ कांपने लगे। मैंने फोन उठाया तो उधर से उसकी घबराई हुई आवाज़ आई, "आंटी, पापा का फोन स्विच ऑफ क्यों आ रहा है? मुझे किसी ने बताया कि उस रोड पर बड़ा एक्सीडेंट हुआ है। पापा ठीक तो हैं ना? आप लोग कहां हैं?"


मेरे गले में जैसे कोई बड़ा सा कांटा फंस गया था। मैंने एक गहरी सांस ली और अपने कांपते स्वर को छुपाते हुए बहुत ही सामान्य लहज़े में झूठ कहा, "अरे बेटा, तुम घबराओ मत। तुम्हारे पापा का एक छोटा सा एक्सीडेंट हुआ है। उन्हें थोड़ी चोटें आई हैं, इसलिए डॉक्टर ने उन्हें अभी आईसीयू में ऑब्जर्वेशन में रखा है और किसी को मिलने नहीं दे रहे। तुम चिराग को लेकर परेशान मत होना, मैं बस अभी घर आ रही हूँ।"


मैंने फोन काट दिया और एक अपराधबोध से भर उठी। कितना मुश्किल होता है किसी के अपने की मौत की खबर को उसी से छुपाना। लेकिन हमारे पास कोई और रास्ता नहीं था। मानसी अभी बहुत छोटी थी और चिराग तो बिल्कुल बच्चा था। कविता भाभी के आने तक उन्हें यह सच बताना उन्हें जीते-जी मार देने जैसा था। 


मैं भारी कदमों से उनके घर पहुंची। मानसी दरवाज़े पर ही खड़ी मेरा इंतज़ार कर रही थी। उसकी आँखें लाल थीं। मुझे देखते ही उसने सवालों की झड़ी लगा दी। मैंने उसे गले लगाया और झूठी तसल्ली दी। उस शाम मैंने रसोई में जाकर दोनों बच्चों के लिए खिचड़ी बनाई। जब मैं उन्हें खाना परोस रही थी, तो खाने का हर निवाला मेरे गले में ज़हर की तरह उतर रहा था। मुझे पता था कि जिस पिता के इंतज़ार में ये बच्चे दरवाज़े की तरफ टकटकी लगाए बैठे हैं, वह पिता अब कभी लौटकर नहीं आएगा। मैंने रात भर मानसी के सिर पर हाथ फेर कर उसे सुलाने की कोशिश की। चिराग तो रोते-रोते थक कर सो गया था, लेकिन मानसी की आँखों में नींद नहीं थी। मेरी भी आँखें जब-तब भर आतीं, लेकिन मैं मुँह फेर कर अपने आंसू पोंछ लेती।


अगली सुबह का सूरज उस घर के लिए एक मनहूस अंधेरा लेकर आया। कविता भाभी सुबह की ट्रेन से घर पहुंचीं। जैसे ही वे घर में दाखिल हुईं, मोहल्ले के कुछ लोग और रमेश जी के ऑफिस के सहकर्मी वहां पहले से मौजूद थे। मेरे पति ने हिम्मत जुटाकर कविता भाभी को वह खौफनाक हकीकत बता दी। 


خبر सुनते ही कविता भाभी के मुँह से एक ऐसी दिल दहला देने वाली चीख निकली, जिसने पूरे मोहल्ले को रुला दिया। वे वहीं ज़मीन पर बेहोश होकर गिर पड़ीं। मानसी जो अब तक उम्मीद लगाए बैठी थी, पत्थर की मूरत बन गई। उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि एक रात में उसकी दुनिया कैसे उजड़ गई। घर में कोहराम मच गया। किसी तरह पानी छिड़क कर भाभी को होश में लाया गया। सभी उन्हें हिम्मत बंधा रहे थे कि अब बच्चों की खातिर उन्हें ही जीना पड़ेगा।


अंतिम संस्कार के बाद रात का समय था। घर में एक अजीब सी खौफनाक शांति छाई हुई थी। मेहमान जा चुके थे और कुछ करीबी रिश्तेदार दूसरे कमरे में सो रहे थे। मैं बरामदे के एक अंधेरे कोने में गुमसुम बैठी थी, तभी मैंने महसूस किया कि कोई मेरे पास आकर बैठ गया है। वह मानसी थी। उसकी आँखें सूजकर लाल हो चुकी थीं और चेहरा बिल्कुल पीला पड़ गया था। उसने बहुत ही खामोशी से मेरा हाथ अपने दोनों हाथों में थाम लिया।


बहुत देर तक वह चुप रही, फिर उसने बहुत ही धीमी और ठहरी हुई आवाज़ में पूछा, "सुजाता आंटी, आपको कल शाम को ही पता चल गया था ना कि पापा अब इस दुनिया में नहीं रहे? फिर भी आपने मुझसे झूठ क्यों बोला?"


उसका यह सवाल सुनकर मेरे शरीर का सारा खून जैसे जम गया। मुझे लगा कि मैं पकड़ी गई हूँ। मुझे समझ नहीं आया कि मैं क्या जवाब दूँ। मैंने थूक गटकते हुए कहा, "बेटा... हम सबने यही तय किया था कि जब तक तुम्हारी मम्मी नहीं आ जातीं, तब तक तुम्हें कुछ नहीं बताएंगे। तुम दोनों अकेले थे, मैं तुम्हें कैसे बता देती कि..." मेरे शब्द गले में ही घुट गए।


मानसी अचानक मेरे गले लग गई और उसके आंसुओं का बांध टूट गया। वह मेरे कंधे पर सिर रखकर फूट-फूट कर रोने लगी। रोते हुए उसने जो कहा, उसने मुझे अंदर तक हिला दिया। 


"मुझे पता था आंटी... कल जब आप मुझे खाना खिला रही थीं, तो आपके हाथ कांप रहे थे और आप बार-बार अपनी आँखें चुरा रही थीं। मुझे अंदेशा हो गया था कि पापा के साथ कुछ बहुत बुरा हुआ है। लेकिन मैंने चिराग के सामने कुछ नहीं कहा, क्योंकि वह बहुत डर जाता। आंटी, आपने उस वक्त जो संयम दिखाया, वह कोई अपना ही कर सकता है। आपने हम दोनों भाई-बहनों को बहुत अच्छे से संभाला और आज मम्मी को भी। आपके होने से हमें लगा कि हम अनाथ नहीं हैं। बहुत शुक्रिया आंटी।"


मानसी ने अपने आंसू पोंछे और मेरी आँखों में आंखें डालकर एक बहुत ही गहरी बात कही, "अब मैं रोऊंगी नहीं आंटी। पापा चाहते थे ना कि मैं एक बड़ी अफसर बनूं? अब मैं दिन-रात एक करके पढ़ाई करूंगी। मैं उनके उस अधूरे सपने को पूरा करूंगी। अब मेरी माँ और मेरे छोटे भाई की सारी ज़िम्मेदारी मेरी है। पापा का साया नहीं है तो क्या हुआ, उनका दिया हौसला मेरे अंदर ज़िंदा है।"


मानसी की इस आत्मविश्वास से भरी बातें सुनकर मेरी आँखें एक बार फिर भीग गईं। मुझे यकीन ही नहीं हो रहा था कि कल तक जो लड़की एक छोटी सी बात पर अपने पापा से ज़िद किया करती थी, आज पिता के जाने के बाद ईश्वर ने उस बेटी के अंदर कितनी आसानी से और कितनी जल्दी एक ज़िम्मेदार इंसान का रूप भर दिया था। उसकी आँखों में चमक रही वह उम्मीद की रोशनी इस बात का सुबूत थी कि लड़कियां घर की रौनक ही नहीं, बल्कि सबसे मज़बूत नींव भी होती हैं।



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