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नई ज़िंदगी

 “मैं आज ही जा रहा हूँ सीमा को लेने, अब बहुत हो गया,” राजेश ने गुस्से में कुर्सी से उठते हुए कहा, “दो-दो भाई जिंदा बैठे हैं और हमारी बहन इतने सालों से ससुराल में नर्क झेलती रहे? अब नहीं सहने दूँगा उसे।”

मीना ने जल्दी से उसका हाथ पकड़ा,
“ज़रा ठहरिए भी, इतनी गरमी किस बात की है? आपको ज़रा दिमाग से काम लेना चाहिए, सिर्फ़ दिल से नहीं। अगला हफ़्ता देख रहे हैं आप? आदित्य की सगाई है। इतने साल बाद हमारा बेटा सेटल होने जा रहा है। अगर अभी आप कौंधनगर जाकर सीमा को लेकर आ गए, और बात फैल गई कि ‘लड़के की बुआ ससुराल छोड़ मायके आ बैठी है’ तो…? लड़की वाले, रिश्तेदार… सब अपनी-अपनी कहानी बना लेंगे। कहीं कोई बात उछल गई तो रिश्ता टूटते देर नहीं लगेगी।”

“तो क्या करूँ?” राजेश का सीना धड़क रहा था,
“आँख बंद कर लूँ? रोज़-रोज़ सीमा का रोना सुनकर क्या मैं भाई कहलाने लायक हूँ?”

मीना ने गहरी साँस ली, उसकी आवाज़ में ठंडा तर्क था,
“देखिए, मैं ये नहीं कह रही कि सीमा को यूँ ही जलने दीजिए। बस इतना कह रही हूँ कि एक हफ़्ते… सिर्फ़ एक हफ़्ते रुक जाइए। पहले आदित्य की सगाई शांति से हो जाए, फिर हम दोनों चलेंगे सीमा के ससुराल। शांत दिमाग से बात करेंगे। बात बिगाड़कर लाना कोई जीत नहीं होगी, बात संभालकर लाएँगे तो बात बनेगी।”

राजेश कुर्सी पर वापस बैठ गया। माथे की नसें अभी भी तन गई थीं।
“तुम नहीं समझती मीना,” उसकी आवाज़ थोड़ा भर्रा गई,
“हम दोनों भाइयों के बाद, पंद्रह साल के इंतज़ार के बाद आई थी वो… सीमा। घर में जैसे देवी उतर आई हो। मैं तो कॉलेज से सीधा भागकर उसे गोद में लेने आता था, रमेश उसे अपने साइकिल के आगे बिठाकर घुमाता था… और आज उसी बहन की आवाज़ फोन पर इतनी टूटी हुई लगती है कि… लगता है जैसे गला घोंटते-घोंटते बोल रही हो।”

मीना के चेहरे पर भी हल्की नमी उतर आई,
“सब किस्मत का खेल है राजेश जी,” वह धीमे से बोली,
“वरना किसने सोचा था कि इतनी नाज़ुक, इतनी समझदार, संस्कारी लड़की के हिस्से ऐसा घर आएगा। पर अभी… अभी एक गलती से दूसरे की भरपाई मत कीजिए। आदित्य की ज़िंदगी की शुरुआत है, पहले उसे सँभाल लेते हैं… फिर सीमा का हाथ पकड़ते हैं।”

उसी समय ड्राइंग रूम की मेज़ पर रखा मोबाइल बज उठा। स्क्रीन पर “वर्मा जी – मीताली के पापा” लिखा हुआ था।

“नमस्ते भाभीजी,” उधर से मधुर स्त्री आवाज़ आई, “मैं मीताली की माँ बोल रही हूँ। बस ये बताना था कि सगाई की सारी तैयारी हमारी तरफ़ से हो चुकी है। अगर आपकी तरफ़ से कोई और बात जोड़नी हो, तो बता दीजिए। पहली बार घर में इतना बड़ा शुभ अवसर आया है, कुछ कमी न रह जाए, बस यही चाहती हूँ।”

मीना ने आवाज़ संभालकर कहा,
“नहीं–नहीं भाभीजी, सब बिल्कुल ठीक है। हमारी तरफ़ से सौ–डेढ़ सौ लोग होंगे। आपने होटल में ही कार्यक्रम रखा है, वहाँ की तरफ़ से भी सब तय है। हम लोग समय से पहुँच जाएँगे, आप चिंता मत कीजिए।”

फ़ोन रखते ही मीना ने राजेश की तरफ़ देखते हुए कहा,
“देखिए, लड़कीवालों की खुशी सुन रहे हैं आप? उनकी भी पहली बेटी की बात तय हुई है। मैं नहीं चाहती कि किसी की ज़रा-सी लापरवाही से नमन… मेरा मतलब, आदित्य की ज़िंदगी पर दाग लगे। सीमा के लिए जो करना है, करेंगे… पर सही वक्त देखकर।”

राजेश ने चुपचाप सिर झुका दिया।


एक हफ़्ते बाद होटल के चमचमाते हाल में आदित्य और मीताली एक-दूसरे के गले में वरमाला डाल रहे थे। कैमरों की लाइट, डीजे की धीमी धुन, रिश्तेदारों की फुसफुसाहटें — सब एक साथ मिलकर शोर सा बन रहे थे।

सगाई में सीमा भी आई थी। अकेली।

पीले-गुलाबी सिल्क की साड़ी, हल्का मेकअप, आँखों पर पतली–सी काजल की लाइन। जो नहीं जानता था, उसे लगता, सब ठीक है। जो जानते थे, वे उसे ऐसे देख रहे थे जैसे किसी टूटे हुए बर्तन पर नया गोंद लगाया हो — दूर से ठीक दिखता है, पास से दरारें साफ़ नज़र आती हैं।

“अरे सीमा, जीजाजी नहीं आए?” एक मौसी ने बड़ी मासूमियत से पूछा, जबकि उन्हें सब मालूम था।

सीमा ने होंठों पर हल्की मुस्कान खींची,
“जी, ऑफिस में कुछ इमरजेंसी आ गई थी, आने की बहुत चाहत थी, पर… हो नहीं पाया।”

“हूँ,” मौसी ने कुछ ऐसा लहजा बनाया जिसमें हमदर्दी से ज़्यादा तंज था।
पीछे खड़ी दूसरी चाची ने धीरे से फुसफुसाया,
“देखा, अकेली घूम रही है। पता नहीं कब सामान उठाकर हमेशा के लिए आ बैठे। आजकल की लड़कियाँ ससुराल में ज़रा-सी बात सहती नहीं हैं।”

ये सब बातें सीमा के कान में भरती गईं। उसने मुस्कुराहट ज़बर्दस्ती बनाए रखी, दोनों हाथों में रंग-बिरंगे गिफ़्ट बैग थाम रखे थे, पर दिल में बस एक ही विचार घूम रहा था — “क्या सचमुच गलती मेरी ही है?”

नज़र के कोने से उसने अपनी भाभी मीना को देखा, जो लड़कीवालों की खातिरदारी में दौड़ती फिर रही थीं। वह सोचकर रह गई — “क्या मेरे लिए कभी किसी ने इतना दौड़भाग किया होगा…?”

कुछ ही महीनों में आदित्य की शादी भी तय हो गई। उसी मीताली से। बारात निकली, ढोल बजे, पटाखे फूटे। सीमित समारोह था, पर दिलों में पहचान और अपनापन भरपूर।

शादी वाले दिन सीमा के साथ उसका पति नहीं आया। इस बार किसी ने पूछने की ज़हमत भी नहीं उठाई। मानो सबने चुपचाप स्वीकार कर लिया था कि “सीमा का दाम्पत्य जीवन तो अब बस नाम भर को रह गया है।”


नए घर में मीताली दुल्हन बनकर आई, तो सबने उसे खुले दिल से अपनाया। राजेश ने हँसते हुए गले लगाया,
“बहू नहीं, बेटी बनकर आई हो। अपने मायके जैसा ही समझना।”

मीना ने उसे कमरे में ले जाकर कहा,
“देख मीतू, पहले–पहले दिन नए घर की रसोई में जाने के लिए घबराहट होती है। तू आराम से रहना। खाना–पीना मैं और आरती भाभी संभाल लेंगी, तुझे जो आता हो, वही बनाना। धीरे-धीरे सब सीख जाएगी। यह घर अब तेरा ही है, पर तुझे अपने ऊपर कोई बोझ नहीं लेना।”

आदित्य के चाचा मनोज, चाची आरती, और उनके दो बच्चे भी इसी मकान में ऊपर वाले फ्लोर पर रहते थे। बड़ा संयुक्त परिवार था। हँसी–मज़ाक, तकरार–मनुहार — सब कुछ।

सीमा शादी के दो दिन बाद अपने शहर कौंधनगर वापस चली गई। जाते–जाते बस इतना बोली,
“भाई, आदित्य और मीताली खुश रहें। मेरी चिंता मत कीजिए, मैं संभाल लूँगी।”

राजेश ने उसका सिर सहलाया,
“जब भी लगे, बस एक फोन कर देना। दरवाज़े हमेशा खुले हैं।”


छह महीने बाद की एक दोपहर थी। आदित्य और मीताली शिमला–मनाली घूमकर लौट रहे थे। दोनों रास्ते भर कभी मोबाइल में तस्वीरें देख रहे थे, कभी अगले महीने की प्लानिंग पर चर्चा कर रहे थे।

घर पहुँचे तो सबसे पहले, उनकी नज़र ड्राइंग रूम पर गई — हमेशा की तरह टीवी की आवाज़, बच्चों की चीख–पुकार, रसोई से आती मसालों की खुशबू… कुछ भी नहीं।

मीना सोफ़े पर बैठी थी, चेहरा थका-थका, आँखों के नीचे हल्के गड्ढे। मनोज चुपचाप अख़बार पर नज़र गड़ाए था, पर एक ही लाइन कई बार पढ़ चुका था। सुशीला देवी — राजेश की माँ — चुपचाप मुँह में दवाइयाँ दबाए खिड़की की तरफ़ देख रही थीं।

“सब ठीक है न?” मीताली ने धीरे से पूछा।

तभी रसोई से आवाज़ आई,
“अरे, आ गए तुम दोनों?”

यह सीमा थी। सूखे चेहरे पर हल्की मुस्कान चिपकाए, पुराना सूट पहने, एप्रन बाँधे हुए। उसके हाथ से आलू–मैश की खुशबू और हल्दी–धनिया की महक मिलकर एक अजीब–सी घरेलू सुगंध फैला रही थी।

“अरे बुआ!” आदित्य ने आगे बढ़कर उसके पैर छुए, “आप कब आईं? हमें तो खबर ही नहीं मिली।”

सीमा ने सिर पर हाथ रखते हुए कहा,
“दो दिन हुए। सोचा मेरे आने–जाने से तुम्हारा हनीमून खराब न हो, इसलिए चुप रही। अब तो तुम दोनों आ गए, सब बताना अपने घूमने–फिरने के बारे में।”

मीताली ने भी झुककर पैर छुए,
“कैसी हैं आप, बुआ जी?”

“ज़रूरत से ज़्यादा ज़िंदा हूँ,” सीमा ने हल्की हँसी में दर्द छुपाते हुए कहा, “बस अब यहीं हूँ। कौंधनगर से हमेशा के लिए छुटकारा मिला है।”

आदित्य ने हैरानी से देखा,
“मतलब… आप वापस नहीं जा रहीं?”

राजेश ने मीताली की तरफ़ देखा, फिर धीमे स्वर में कहा,
“सीमा ने अब अपना ससुराल छोड़ दिया है। वहाँ अब उसके लिए सिर्फ़ गाली–गलौच, मारपीट और अपमान बचा था। उसे वापस भेजना मतलब किसी को जलती भट्ठी में धकेलना होता, सो मैंने इंकार कर दिया। अब वो यहीं रहेगी। हमारा घर है, हमारी ज़िम्मेदारी है।”

आदित्य चुप हो गया। मीताली ने महसूस किया कि कमरे में अचानक घुटन बढ़ गई है।

रात को जब सब सो गए, वह अपने कमरे में जाकर काफी देर तक सोचती रही। उन दो दिनों में उसने देखा था कि कैसे सीमा सुबह पाँच बजे उठकर सबसे पहले चाय बनाती, सुशीला की दवाइयाँ देती, बाबूजी के लिए ग्लूकोज़ का पानी बनाती, बच्चों के टिफ़िन, आदित्य के ऑफिस का डब्बा, मनोज के लिए चाय, मीना के लिए दूध… और जब सबका काम निपट जाता, तब कहीं जाकर वह अपने लिए सूखी सी रोटी पर सब्ज़ी रखकर खाती।

किचन में जब भी वो मदद करने जाती, आरती हँसकर कहती,
“अरे बहू, अभी तुम्हारे घूमने के दिन हैं। बुआ है न, सब संभाल लेगी। वैसे भी उसे कुछ और तो है नहीं करने को।”

सीमा कभी मना नहीं करती।
“मेरे काम आ रहा है न किसी के लिए, बस यही बहुत है,” वह मुस्कुराकर कहती, पर उसकी मुस्कान के पीछे एक गहरा खालीपन झलकता था।


एक दिन सुबह-सुबह, जब घर के बाकी लोग अभी उठने की तैयारी में थे, मीताली पानी लेने किचन गई तो देखा — सीमा अकेली स्टोव के सामने बैठी है, पर गैस बंद है। हाथ में चाय की प्याली, पर चाय ठंडी।

“बुआ जी?” मीताली ने आवाज़ दी।

सीमा चौंकी,
“अरे, तू कब उठ गई? चल, मैं अभी नाश्ता बनाती हूँ।”

“पहले आप बैठिए न,” मीताली ने पास वाली कुर्सी खींच कर कहा, “आज नाश्ता हम दोनों मिलकर बनाएँगे। लेकिन… पहले मैं आपसे कुछ पूछूँ?”

“पूछ न बेटा,” सीमा ने प्याली मेज़ पर रख दी।

“आपने शादी से पहले क्या सपना देखा था बुआ?”
मीताली की आवाज़ में एक सच्ची जिज्ञासा थी, कोई दखल नहीं।

सीमा कुछ पल चुप रही। फिर हँसने की कोशिश करते हुए बोली,
“हमारे ज़माने में लड़कियाँ क्या सपना देखती थीं? बस अच्छा पति, अच्छा घर, दो–तीन बच्चे… यही न?”

“नहीं, आप झूठ बोल रही हैं,” मीताली ने हँसकर कहा, “आप जैसी समझदार और क्रिएटिव महिला के सपने इतने छोटे कैसे हो सकते हैं? सच-सच बताइए, आप क्या बनना चाहती थीं?”

सीमा की आँखों में दूर कहीं पुरानी लौ जली,
“मैं… रेडियो जॉकी बनना चाहती थी।”

“क्या?” मीताली सचमुच चौंक गई।

“हाँ,” सीमा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “कॉलेज में मैं एंकरिंग करती थी, डिबेट, पोएट्री–रीसाइटेशन… सब। हमारी हिंदी मैडम कहती थीं — ‘तुम्हारी आवाज़ में मुस्कान सुनाई देती है। रेडियो पर जाए बिना मत रहना।’ उस समय “एफएम रेडियो” में नए-नए RJ का ज़माना शुरू हो रहा था। दो छोटी लोकल स्टेशनों के लिए मैंने वॉलंटियर के तौर पर काम भी शुरू कर दिया था। रिकॉर्डिंग रूम की हल्की अंधेरी में बैठकर जब “नमस्कार श्रोतागण” कहती थी न… तो लगता था बस, यहीं मेरी दुनिया है।”

“फिर?” मीताली की आँखे चमक रही थीं।

“फिर मेरी शादी हो गई,” सीमा ने जैसे खुद को ही याद दिलाया,
“ससुराल वालों को लगा कि ‘माइक पर बोलने वाली’ बहू की आवाज़ सब सुनेंगे तो उनका इमेज खराब हो जाएगा। उन्होंने साफ़ कहा — ‘घूँघट कर, चूल्हा संभाल, रेडियो टेप पर सुन, पर आगे मत बोल।’ पति ने कहा — ‘शादी के बाद भी नौकरी? क्या मैं कमाता नहीं हूँ?’ मैंने भी सोचा, चलो, शायद यही सही है। एक बच्चे की उम्मीद में जीती रही, पर भगवान ने वो भी छीना… और अब… बस, सब खत्म सा है।”

मीताली ने धीरे से पूछा,
“अगर खत्म होता तो आपकी आँखों में ये चमक नहीं होती बुआ। आपके अंदर अभी भी वो RJ बैठी है, जो बोलने को तरस रही है। अगर… बस अगर… आपको फिर से माइक्रोफ़ोन मिल जाए, तो क्या आप वापस बोल पाएँगी? खुद के लिए… दूसरों के लिए नहीं।”

सीमा ने हताश हँसी हँस दी,
“अब मेरी उम्र में? बेटा, RJ बनना तो छोड़, मैं तो किसी लोकल केबल चैनल पर भी बैठ जाऊँ तो लोग कहेंगे — ‘देखो, बुढ़िया पागल हो गई है।’”

“उम्र सिर्फ़ शरीर की होती है बुआ, सपनों की नहीं,” मीताली ने दृढ़ता से कहा,
“और वैसे भी, अब जमाना FM रेडियो से आगे पॉडकास्ट, यूट्यूब, ऑनलाइन चैनलों का है। आवाज़ अच्छी हो, बात सत्य और दिल से हो, तो उम्र कोई मायने नहीं रखती। बस… आपके पास कोई आपका साथ देने वाला होना चाहिए, और वो… मैं हूँ।”

सीमा ने पहली बार मीताली की तरफ़ ऐसे देखा जैसे सचमुच कोई सहारा हो।

“तू क्या करेगी?” उसने धीमे से पूछा।

“सबसे पहले,” मीताली ने कहा,
“आपको घरवालों की नज़र में ‘मुफ्त की नौकरानी’ से ‘अपनी दुनिया वाली सीमा दीदी’ बनाना होगा। उसके लिए… हमें खुद बात करनी पड़ेगी। शर्माइए मत, आप बस मेरे साथ रहिएगा कमरे में। बोलूँगी मैं, कहानी आपकी होगी।”


उसी शाम, खाने के बाद ड्राइंग रूम में चाय की ट्रे रखकर मीताली ने सबको वहीं बुला लिया।

“क्या बात है बहू, आज मीटिंग बुला रखी है क्या?” मनोज हँसकर बोला।

“कुछ वैसा ही समझ लीजिए चाचा जी,” मीताली ने मुस्कुराकर कहा,
“पर एजेंडा बहुत ज़रूरी है।”

सब बैठे, सिर्फ़ सीमा कुर्सी के कोने पर सिमट–सी गई।

“बा,” मीताली ने सीमा की तरफ़ इशारा करते हुए सुशीला देवी से कहा,
“ये आपकी बेटी हैं, हमारी बुआ हैं, मेरी दोस्त हैं। घर की हर चीज़ में इनका हाथ लगता है। चाय से लेकर दाल तक, बच्चों की कॉपी से लेकर आपकी दवा तक। पर एक बात बताइए — आपने, या हमने, कभी इनसे पूछा कि ‘तुम्हें क्या चाहिए?’”

राजेश ने कुछ कहना चाहा,
“अरे बहू, हम लोग तो उसे यहाँ लाकर उसका जीवन ही बचा रहे हैं…”

“और कौन कह रहा है कि आपने बुरा किया?” मीताली ने सम्मान के साथ कहा,
“आपने जान बचाई, पर जीने का मकसद नहीं दिया। आप सब भाई–बहन, बेटे, बहू, चाचा, चाची… सब सीमा बुआ की पीड़ा को समझते भी हैं, मानते भी हैं। पर हमने मिलकर इन्हें ये समझा दिया है कि ‘तुम्हारी ज़िंदगी अब सिर्फ़ दूसरों की सेवा में कटेगी… तुम्हारी अपनी कोई पहचान नहीं रहेगी।’ क्या ये ठीक है?”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

सुशीला ने धीमे से कहा,
“तो क्या करें बहू? हम तो इतने सालों से यही देखते आए हैं। औरत मायके लौट आए तो या तो पूजा–पाठ में डूब जाए, या घर के काम में।”

“एक तीसरा रास्ता भी तो है न दादी,” मीताली ने उनकी तरफ़ प्यार से देखा,
“अपने पैरों पर खड़ा होना। अपनी आवाज़, अपना हुनर दुनिया के सामने लाना। सीमा बुआ रेडियो पर बोलना चाहती थीं, RJ बनना चाहती थीं। उन्हें मौका नहीं मिला। अब क्यों नहीं दे सकते हम? क्या घर की इज़्ज़त सिर्फ़ बहू–बेटियों को चुप रखकर ही बचेगी?”

मनोज ने भौचक्का होकर कहा,
“मतलब… सीमा RJ बनेगी? इस उम्र में? लोग क्या कहेंगे बहू?”

“लोग तो वैसे भी कह रहे हैं चाचा जी,” मीताली ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
“अभी कहते हैं — ‘देखो, ससुराल से निकाली हुई बहन, भाई के घर बैठी है।’ अगर सीमा बुआ अपनी आवाज़ से नाम कमाएँगी, अपने पैरों पर खड़ी होंगी, तो वही लोग कहेंगे — ‘देखो, किस तरह मुश्किलों से निकलकर इसने अपनी पहचान बनाई।’ लोग तो दोनों तरह से बोलेंगे, फर्क बस इतना होगा कि हमें कौन सा ताना सुनना मंज़ूर है।”

राजेश अचानक जैसे अंदर से जाग गया,
“बहू, तुझसे पहले ये बात मुझे सोचना चाहिए थी। मैं अपनी बहन का दर्द देखता रहा, पर समाधान सोचने की हिम्मत नहीं की। तू आगे बढ़, जो करना है, बता।”

मीताली ने तुरंत कहा,
“सबसे पहले, हमें सीमा बुआ को एक छोटा–सा कोर्स कराना होगा — वॉइस–ओवर, पॉडकास्टिंग, बेसिक रिकॉर्डिंग। शहर में दो–तीन कम्युनिकेशन इंस्टीट्यूट हैं, उनसे बात करूँगी। दूसरा, हमें इनका एक यूट्यूब चैनल और पॉडकास्ट शुरू करना होगा, जहाँ ये रोज़ 10–15 मिनट बोलें — कहानियाँ, कविताएँ, प्रेरक बातें, या बस… अपनी बात। तीसरा, सबसे ज़रूरी — घर में कोई भी इन्हें ‘बुआ तो बस घर बैठी है’ जैसा जुमला नहीं मारेगा। इनके काम की इज़्ज़त होगी, और इनके समय की भी।”

आरती को जैसे अपनी घरेलू सुविधा खतरे में दिखी,
“पर बहू, अगर सीमा दीदी बाहर–भीतर ये सब करेंगी, तो घर के काम का क्या होगा? सब हम पर आ जाएगा।”

मीताली ने प्यार से कहा,
“भाभी, घर तो हम सबका है न? काम भी सबका होगा। कल तक बुआ अकेली उठकर सबका काम कर रही थीं, तब किसी को तकलीफ़ नहीं था। अब अगर हम सब मिलकर थोड़ा–थोड़ा हाथ बँटा देंगे, तो इनको अपने लिए दो घंटे देना अपराध नहीं होगा। वैसे भी, आपने नहीं कहा था एक दिन — ‘सीमा दीदी सब संभाल लेंगी, मुझे तो बस चाबी पकड़ाकर बाज़ार निकलना है।’ आज से ये चाबी हम सब मिलकर पकड़ेंगे, अकेले सीमा बुआ नहीं।”

सुशीला देवी की आँखों में आँसू आ गए,
“सीमा बेटा, तू तो बचपन से ही ‘बोलने वाली’ थी। स्कूल के फ़ंक्शन में जब तू कविता सुनाती थी न, तो पूरा मोहल्ला खड़ा होकर सुनता था। हम ही तो बड़े–बड़े होकर तुझे चुप कराते रहे। अगर तुझे सच में बोलने से फिर खुशी मिले… तो मैं सबसे पहले तेरे शो की श्रोता बनूँगी।”

सीमा की आँखें भर आईं। उसने झुककर अपनी माँ — सुशीला — के पैर छुए,
“अगर आप मेरे साथ होंगी, तो शायद मैं सच में फिर से बोल पाऊँगी, माँ।”


अगले ही सप्ताह, मीताली ने शहर के एक मीडिया इंस्टीट्यूट में सीमा का नाम लिखवा दिया। तीन महीने का “बेसिक वॉइस मॉड्यूलेशन और पॉडकास्टिंग” का कोर्स था। पहली दिन सीमा ने झिझकते हुए क्लास में कदम रखा। युवा लड़के–लड़कियाँ उसके आस–पास बैठे थे, हँसी–ठिठोली करते, नोट्स बनाते, माइक्रोफोन टेस्ट करते हुए।

“आप…?” ट्रेनर ने मुस्कुराकर कहा।

“जी, सीमा माथुर,” उसने थोड़ा घबराकर कहा, “पहली बार किसी क्लास में आई हूँ… इस तरह की।”

ट्रेनर ने सहजता से कहा,
“आवाज़ की उम्र नहीं होती मैम। बस हिम्मत की उम्र होती है, और वो आपके चेहरे पर साफ दिख रही है।”

धीरे–धीरे सीमा ने रिद्म पकड़ ली। 'हैलो दोस्तों, नमस्कार श्रोतागण, स्वागत है आपका…' जैसे वाक्य उससे ऐसे निकलने लगे मानो वर्षों से गले में अटके हों।

घर में भी बदलाव शुरू हो गया था। अब सुबह यों ही नहीं होता था कि सब कुछ सीमा ही करे। आदित्य खुद चाय बना लेता, युवान (मनोज का बेटा) टिफ़िन पैक करने में मदद करने लगा, मीताली रात को ही सब्ज़ी काट कर रख देती, मीना बर्तन सेट कर देतीं। सुशीला अब दवा के साथ–साथ सीमा की रिकॉर्डिंग टाइमटेबिल भी देखतीं।

तीन महीने बाद, सीमा ने अपना पहला पॉडकास्ट शुरू किया — “सीमा की साँझ” नाम से। शाम के पाँच बजे, रोज़ 15 मिनट।

पहला एपिसोड था — “खुद को माफ़ करना सीखिए।”
दूसरा — “जब बेटियाँ लौट आती हैं।”
तीसरा — “रिश्तों से पहले इंसानियत।”

धीरे–धीरे सुनने वालों की संख्या बढ़ने लगी। कुछ दिन में मीताली ने उसके लिए यूट्यूब चैनल भी बना दिया, जहाँ वही ऑडियो सुंदर–सी तस्वीरों के साथ डाला जाने लगा। कुछ लोकल FM वालों ने भी “गेस्ट वॉइस” के तौर पर उसे बुलाया।

एक साल बीत गया।

आदित्य और मीताली की शादी की पहली सालगिरह थी। घर में छोटा–सा कार्यक्रम रखा गया। ड्राइंग रूम फूलों और फ़ेयरी लाइट्स से सजाया गया था। मेज़ पर केक, समोसे, रसगुल्ले — सब सजा था।

सबके बीच, सीमा ने आगे बढ़कर एक छोटा–सा पैकेट मीताली की ओर बढ़ाया।

“ये क्या है, बुआ?” मीताली ने मुस्कुराकर पूछा।

“तुम्हारे लिए… और आदित्य के लिए,” सीमा ने कहा,
“मेरे पहले बड़े शो का पहला मेहनताना है। सोचा था, अपनी पहली कमाई से किसी और की ज़िंदगी में रोशनी लाऊँ। तो ये… तुम्हारे नए घर के लिए छोटा–सा गिफ़्ट।”

मीताली ने पैकेट खोलकर देखा — अंदर दो बहुत ही प्यारी–सी, हाथ से बनाई हुई रेडियो–आकार की नाइट–लैम्प थीं। एक पर लिखा था — “उसने मेरी आवाज़ को पहचान दी,” और दूसरे पर — “उसने मेरे सपनों को नाम दिया।”

आदित्य ने आगे बढ़कर सीमा को गले लगा लिया,
“बुआ, हमें तो हमेशा पता था कि आप स्पेशल हैं, बस हम समझ नहीं पाए कि आपको ये बताने की ज़रूरत थी।”

सुशीला ने गले से रुलाई रोकते हुए कहा,
“आज मेरी बेटी ‘तलाकशुदा’ नहीं, ‘आवाज़ वाली दीदी’ कहलाती है मोहल्ले में। सब पूछते हैं — ‘अरे, सीमा जी का नया एपिसोड आया क्या?’ मुझे लगता है… जैसे मेरी भी पहचान लौट आई।”

राजेश ने मीताली की तरफ़ देखते हुए कहा,
“बहू, तूने बहू बनकर नहीं, बेटी बनकर ये घर बदला है। हम तो बस बहन को छत देने की सोच रहे थे, तूने उसे आसमान दे दिया।”

मीताली ने हँसते हुए सीमा का हाथ थाम लिया,
“आसमान तो बुआ के पास पहले से था, बस हमने पर्दा थोड़ा खोल दिया। आवाज़ उनका अपना है, हिम्मत उनकी अपनी है… हमने तो बस कान खोलकर सुना।”

सीमा ने धीमे से मन ही मन कहा,
“शुक्रिया, भगवान… कि तूने मुझे सिर्फ़ दो भाइयों का घर नहीं, एक बहू–बेटी की दोस्ती भी दी, जिसने मुझे फिर से ‘जीवित’ कर दिया।”

उस शाम, जब केक कटा, मोमबत्ती की लौ हल्की–सी काँपी, लेकिन बुझी नहीं। जैसे सीमा की ज़िंदगी — आँधियों से गुज़री थी, पर अब स्थिर रोशनी बनकर इस घर के हर कोने को, और कितने ही अनजाने घरों को, अपनी आवाज़ से रोशन कर रही थी।


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  "बहु अभी तक वापस नहीं आई? सुबह के दस बज रहे हैं और घर में नाश्ते का कोई अता-पता नहीं है। उसे मायके गए हुए दो दिन हो गए, क्या उसे याद नहीं कि उसका एक ससुराल भी है?" दीनानाथ जी ने अखबार को सोफे पर पटकते हुए अपनी पत्नी सरोज से कहा। उनकी आवाज में जो तल्खी थी, वह भूख से ज्यादा अहम की थी। सरोज जी ने रसोई से झांकते हुए दबी जुबान में कहा, "अजी सुनिए, वो कल रात ही आने वाली थी, लेकिन उसकी माँ की तबीयत अचानक ज्यादा खराब हो गई। इसलिए रुक गई। अभी सुमित गया है उसे लेने।" "तबीयत! अरे, यह अमीरों की बीमारियां कभी खत्म नहीं होतीं। जब देखो बीपी, शुगर, घबराहट... यह सब बहाने हैं। असली बात यह है कि उस लड़की का मन इस घर में लगता ही नहीं। उसे अपने बाप के उस आलीशान बंगले की आदत जो पड़ी है," दीनानाथ जी बड़बड़ाए। तभी दरवाजे पर गाड़ी रुकने की आवाज आई। सुमित और उसकी पत्नी, मेधा, घर में दाखिल हुए। मेधा की आँखें सूजी हुई थीं, जैसे वह बहुत रोई हो। सुमित का चेहरा भी गंभीर था। दीनानाथ जी ने मेधा को देखते ही ताना मारा, "आ गई महारानी? चलो शुक्र है, दो दिन बाद ही सही, ससुराल की याद तो ...

गृह प्रवेश

  “मैं मम्मी को नहीं बताऊंगी… मैं खुद ही सामना करूंगी।” यह सोचकर स्नेहा ने अपने आंसू पोंछे। चेहरे पर मजबूती का नकाब चढ़ाया और मां के घर की तरफ निकल गई। पिता के बरसी-पूजन का काम था। रिश्तेदार आए हुए थे, घर में भीड़ थी, और हर चेहरे पर सहानुभूति—लेकिन स्नेहा के भीतर एक और ही उथल-पुथल चल रही थी। पूजा में बैठी वह मंत्र तो सुन रही थी, पर कान बार-बार पिछले दो दिनों की उन बातों पर अटक जाते—जिन्होंने उसे अंदर से तोड़ दिया था। उसकी सास विमला और पति अभिषेक … दोनों ने इतनी सहजता से उसे “अलग” कर दिया था, मानो वह घर की सदस्य नहीं, किसी काम की सुविधा भर हो। दो दिन पहले जब वह मायके जाने लगी थी, तब विमला जी ने ताना कस दिया था— “हर छोटी बात पर मायके भागना तुम्हारी आदत बन गई है, स्नेहा। शादी के बाद भी मां-बाप की छाया नहीं छोड़ पाई?” और अभिषेक… जिसने हमेशा कहा था “मैं तुम्हारे साथ हूं”—वह भी उस दिन बस इतना बोलकर रह गया था— “मां सही कह रही हैं, स्नेहा… तुम हर चीज़ को दिल पर ले लेती हो।” स्नेहा ने बहस नहीं की थी। बस चुपचाप निकल गई थी। क्योंकि उस वक्त बोलने पर शब्द नहीं, आँसू निकलते। और आँसू उसे कमज़ोर...

सात दिन

“पापा… आज फिर बस छूट गई।”  कृतिका ने बैग फर्श पर पटक दिया। अनिकेत घड़ी की तरफ़ देख कर झल्ला उठा, “अब क्या करूँ मैं? स्कूटर उड़ाकर स्कूल छोड़ूँ तुम्हें? तुम्हारी मम्मी को ही समझ नहीं, टाइम पर तैयार क्यों नहीं करती बच्चों को!” किचन से आती हुई भाप में भी सुमेधा की थकान साफ़ दिख रही थी। गैस पर दाल चढ़ी थी, दूसरे बर्नर पर पराठा, तीसरे पर दूध। टिफ़िन खुले पड़े थे, बोतलें आधी भरी… और बीच में खड़ी वो — एक हाथ से सब्ज़ी हिला रही, दूसरे से रसोई का टाइम पे चलने वाला छोटा अलार्म बंद कर रही थी। “अनिकेत, मैंने तो सब रात में ही सेट कर दिया था,” वो धीमे से बोली, “कृतिका खुद टाइम पर नहीं उठी, तीन बार बुलाया था मैंने…” “अरे, अब सब मेरी बेटी की गलती!” अनिकेत ने ऊँची आवाज़ में कहा, “तुम्हें तो बस बहाना चाहिए। टीचर हो गई हो न, बहुत अक्ल है तुम्हें। पर घर चलाने की अक्ल ज़रा भी नहीं।” बरामदे में बैठे हुए बाबूजी ने चश्मा उतारकर इन्हीं आवाज़ों की तरफ़ देखा। माँ — सुशीला — चौके के दरवाज़े पर आकर खड़ी हो गईं। “रोज़-रोज़ झगड़ा… पड़ोसी क्या सोचते होंगे,” सुशीला बड़बड़ाईं, “पहले के ज़माने में औरतें पाँच-पाँच ब...