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अपनी भाषा, अपना अभिमान*

 "भाभी, कम से कम हमारे खानदान के रुतबे का तो ख्याल रखा होता! यह लड़की तो हमारी हाई-क्लास सोसाइटी में बैठने के लायक भी नहीं है..."


शहर के सबसे पॉश इलाके में स्थित 'आनंद विला' के एक सजे-धजे कमरे में सुजाता जी की ननद, रितु ने मुँह बनाते हुए कहा। रितु के लहजे में जो कड़वाहट और व्यंग्य था, वह किसी भी इंसान का दिल छलनी करने के लिए काफी था। सुजाता जी के इकलौते बेटे, आर्यन की शादी को अभी मुश्किल से एक हफ्ता ही बीता था। घर में अभी भी मेहमानों की चहल-पहल थी। आज सुजाता जी ने घर में 'सुंदरकांड' के पाठ और एक भव्य प्रीतिभोज का आयोजन रखा था, जिसमें शहर के कई नामी-गिरामी लोग और रईस रिश्तेदार आमंत्रित थे।


सुजाता जी का परिवार शहर के सबसे प्रतिष्ठित और अमीर घरानों में गिना जाता था। उनके यहाँ उठने-बैठने वाले लोग बड़े-बड़े उद्योगपति और अधिकारी थे। ऐसे माहौल में जहाँ लोग अपनी आधी बात अंग्रेज़ी में और आधी हिंदी में करते हों, वहाँ रितु जी की शादी तो एक ऐसे परिवार में हुई थी जो दिखावे और 'वेस्टर्न कल्चर' के नशे में पूरी तरह डूबा हुआ था। रितु जी का मानना था कि जो इंसान फर्राटेदार अंग्रेज़ी नहीं बोल सकता और जो विदेशी ब्रांड्स नहीं पहनता, वह 'गँवार' है।


सुजाता जी ने अपनी ननद की बात सुनकर एक गहरी साँस ली। उन्होंने अपनी नई बहू, श्रुति की तरफ देखा, जो दूर दालान में मेहमानों को बहुत ही शालीनता से दोनों हाथ जोड़कर 'नमस्ते' कर रही थी। श्रुति ने लाल रंग की एक बेहद साधारण लेकिन खूबसूरत बनारसी साड़ी पहनी हुई थी, सिर पर हल्का सा पल्लू था और चेहरे पर एक ऐसी सौम्य मुस्कान थी जो किसी का भी मोह ले। श्रुति के पिता वाराणसी के एक विश्वविद्यालय में हिंदी साहित्य के प्रोफेसर थे और माँ एक साधारण गृहिणी। आर्यन ने श्रुति को एक सेमिनार में देखा था और उसकी सादगी और विचारों पर अपना दिल हार बैठा था। सुजाता जी ने भी श्रुति को पहली ही नज़र में अपनी बहू मान लिया था।


"रितु," सुजाता जी ने शांत लेकिन दृढ़ स्वर में अपनी ननद से कहा, "सोसाइटी में बैठने के लिए महंगे कपड़े और अंग्रेज़ी ज़बान की नहीं, बल्कि अच्छे संस्कारों और तमीज़ की ज़रूरत होती है। मेरी बहू में वो संस्कार कूट-कूट कर भरे हैं। भाषा तो केवल संवाद का एक ज़रिया है, वह किसी की बुद्धिमत्ता या हैसियत तौलने का तराज़ू नहीं है।"


रितु ने आँखों को नचाते हुए एक व्यंग्यात्मक हँसी हँसी, "ओह कम ऑन भाभी! आप भी किन पुरानी बातों को लेकर बैठी हैं। आज शाम को आर्यन के बिज़नेस पार्टनर्स और मेरे एन.आर.आई (NRI) फ्रेंड्स आ रहे हैं। आपकी यह 'संस्कारी बहू' उनके सामने जब अपनी शुद्ध हिंदी बोलेगी न, तो हमारा क्या इम्प्रेशन पड़ेगा? लोग हंसेंगे हम पर!" रितु यह कहकर पैर पटकते हुए बाहर चली गई।


सुजाता जी को रितु की बातों से बुरा तो लगा, लेकिन उन्हें अपनी बहू पर पूरा भरोसा था। शाम ढलते ही 'आनंद विला' का प्रांगण महंगी गाड़ियों और चमकते हुए लिबासों से भर गया। सुंदरकांड का पाठ बहुत ही शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हुआ। श्रुति ने जिस तन्मयता और शुद्ध उच्चारण के साथ पाठ की चौपाइयाँ गाईं, उसे सुनकर कई बुजुर्ग मेहमान गदगद हो गए। लेकिन रितु और उसकी 'किटी पार्टी' वाली सहेलियों के चेहरे पर बोरियत और उपहास साफ झलक रहा था।


पाठ के बाद रात के खाने का आयोजन था। लॉन में हल्की-हल्की विदेशी धुनें बज रही थीं और मेहमान हाथों में जूस और मॉकटेल के ग्लास लिए गपशप कर रहे थे। रितु अपनी सहेलियों के बीच खड़ी होकर जानबूझकर ज़ोर-ज़ोर से अंग्रेज़ी में बातें कर रही थी, ताकि श्रुति को उसकी 'औकात' का अहसास कराया जा सके।


तभी पार्टी में एक बेहद खास मेहमान का आगमन हुआ—मिस्टर राजदान। मिस्टर राजदान लंदन में बसे एक बहुत बड़े भारतीय उद्योगपति थे, जिनके साथ आर्यन अपनी कंपनी का एक बहुत बड़ा प्रोजेक्ट साइन करने वाला था। मिस्टर राजदान के साथ उनके कुछ ब्रिटिश सहयोगी भी आए हुए थे। आर्यन और सुजाता जी ने आगे बढ़कर उनका स्वागत किया। रितु भी अपने विदेशी लहजे (accent) का प्रदर्शन करने का मौका नहीं छोड़ना चाहती थी, इसलिए वह तुरंत मिस्टर राजदान के पास पहुँच गई और टूटी-फूटी अंग्रेज़ी में उनके सूट और उनके रुतबे की तारीफ करने लगी।


बातों-बातों में मिस्टर राजदान की नज़र लॉन के एक कोने में रखी एक बेहद खूबसूरत और प्राचीन कलाकृति पर पड़ी। उस कलाकृति के नीचे पीतल की प्लेट पर संस्कृत और शुद्ध हिंदी में एक श्लोक और उसका अर्थ उकेरा गया था। मिस्टर राजदान, जो अपनी मिट्टी से बहुत प्यार करते थे, उस कलाकृति को देखकर मंत्रमुग्ध हो गए।


"दिस इज़ ब्यूटीफुल! (यह बहुत सुंदर है!)" मिस्टर राजदान ने कहा। उनके ब्रिटिश सहयोगी ने उत्सुकता से पूछा, "मिस्टर राजदान, व्हाट डज़ इट मीन? (इसका क्या अर्थ है?)"


मिस्टर राजदान ने आर्यन की बुआ, रितु की तरफ देखकर मुस्कुराते हुए कहा, "श्रीमती रितु जी, आप तो भारत में ही रहती हैं। क्या आप मेरे इन विदेशी मित्रों को इस श्लोक और इस हिंदी कविता का सटीक अर्थ अंग्रेज़ी में समझा सकती हैं?"


रितु के चेहरे का रंग उड़ गया। उसने उस प्लेट को पढ़ा, लेकिन शुद्ध हिंदी और संस्कृत के वो भारी-भरकम शब्द उसके सिर के ऊपर से निकल गए। उसने इधर-उधर देखा और घबराहट में हकलाने लगी, "अहह... वेल... इट मीन्स... गॉड इज़ ग्रेट... एंड... नेचर इज़ ब्यूटीफुल।" (मतलब... भगवान महान है... और... प्रकृति सुंदर है।)


मिस्टर राजदान को रितु का यह सतही जवाब सुनकर थोड़ी निराशा हुई। उनके विदेशी सहयोगियों के चेहरे पर भी उलझन थी। रितु पसीने से तर-बतर हो गई और शर्म से ज़मीन में गड़ने लगी। उसे लगा जैसे उसकी सारी 'हाई-क्लास' छवि एक पल में मिट्टी में मिल गई हो।


तभी एक बहुत ही मधुर और आत्मविश्वास से भरी आवाज़ गूंजी। "एक्सक्यूज़ मी, सर। इफ़ यू परमिट, मे आई एक्सप्लेन दिस?" (क्षमा करें सर, अगर आप अनुमति दें, तो क्या मैं इसे समझा सकती हूँ?)


सबने मुड़कर देखा। श्रुति अपनी लाल बनारसी साड़ी में, चेहरे पर एक शांत मुस्कान लिए खड़ी थी। मिस्टर राजदान ने उत्सुकता से हामी भरी।


श्रुति ने पहले मिस्टर राजदान को बहुत ही सम्मानपूर्वक हाथ जोड़कर शुद्ध हिंदी में उस श्लोक का दर्शन समझाया, "सर, यह श्लोक उपनिषदों से लिया गया है। इसका भावार्थ यह है कि मनुष्य चाहे कितनी भी ऊँचाइयों को छू ले, जब तक वह अपनी जड़ों से, अपनी मिट्टी से नहीं जुड़ता, तब तक उसका ज्ञान अधूरा है। असली संपदा बाहरी दिखावे में नहीं, बल्कि भीतर के संतोष और विनम्रता में है।"


श्रुति की शुद्ध, स्पष्ट और मीठी हिंदी सुनकर मिस्टर राजदान का चेहरा खिल उठा। लेकिन श्रुति यहीं नहीं रुकी। वह मिस्टर राजदान के ब्रिटिश सहयोगियों की तरफ मुड़ी और एक ऐसी बेदाग, धाराप्रवाह और उच्च स्तरीय अंग्रेज़ी में उस पूरे फलसफे का अनुवाद किया, जिसे सुनकर वहाँ खड़े हर एक व्यक्ति—विशेषकर रितु और उसकी सहेलियों—के मुँह खुले के खुले रह गए। श्रुति के शब्दों का चयन और उसका आत्मविश्वास किसी ऑक्सफ़ोर्ड के स्कॉलर से कम नहीं लग रहा था।


विदेशी मेहमानों ने श्रुति की बात सुनकर तालियाँ बजा दीं। मिस्टर राजदान ने आर्यन के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, "माई बॉय! तुम्हारी पत्नी सिर्फ खूबसूरत ही नहीं, बल्कि बौद्धिक रूप से भी बेहद समृद्ध है। आज के दौर में जहाँ लोग 'कूल' दिखने के चक्कर में अपनी भाषा और संस्कृति को भूल रहे हैं, वहीं तुम्हारी पत्नी ने साबित कर दिया कि असली 'क्लास' अपनी जड़ों से जुड़े रहने में है।"


फिर मिस्टर राजदान ने श्रुति से पूछा, "बेटा, तुम्हारी अंग्रेज़ी इतनी शानदार है, फिर तुम पूरी शाम सबसे हिंदी में ही क्यों बात कर रही थी?"


श्रुति ने एक बहुत ही सौम्य मुस्कान के साथ जवाब दिया, "सर, मैंने अंग्रेज़ी साहित्य में गोल्ड मेडल हासिल किया है। अंग्रेज़ी मेरे लिए दुनिया से जुड़ने का एक माध्यम भर है। लेकिन हिंदी... हिंदी मेरी पहचान है, मेरी मातृभाषा है। अंग्रेज़ी मेरे दिमाग की भाषा हो सकती है, लेकिन हिंदी मेरी आत्मा की आवाज़ है। और मुझे लगता है कि अपनों के बीच आत्मा की आवाज़ ही पहुंचनी चाहिए।"


लॉन में एक पल के लिए पिन-ड्रॉप साइलेंस छा गया। श्रुति के इन चंद शब्दों ने दिखावे और झूठे रुतबे की उस पूरी इमारत को ढहा दिया था, जिसे रितु ने अपनी आधी-अधूरी अंग्रेज़ी के दम पर खड़ा किया था। रितु को अपनी उस ओछी सोच पर भयंकर शर्मिंदगी हो रही थी जो उसने सुबह अपनी भाभी के सामने ज़ाहिर की थी। उसे समझ आ गया था कि ऊँचे दर्जे के कपड़े और विदेशी भाषा किसी को महान नहीं बनाते, महानता इंसान के विचारों और उसकी जड़ों से आती है।


पार्टी के खत्म होने के बाद, जब सब मेहमान चले गए, रितु धीरे-धीरे चलकर श्रुति के पास आई। श्रुति रसोई में बर्तन समेटने में मदद कर रही थी। रितु ने आगे बढ़कर श्रुति के दोनों हाथ पकड़ लिए। उसकी आँखों में पश्चाताप के आँसू थे।


"मुझे माफ कर दे बेटा," रितु का गला रुँधा हुआ था। "मैं उम्र में तुझसे बड़ी ज़रूर हूँ, लेकिन समझ में बहुत छोटी रह गई। मैंने अपनी झूठी शान के चक्कर में तेरी सादगी को तेरा पिछड़ापन समझ लिया था। आज तूने सिर्फ उस विदेशी मेहमान के सामने ही नहीं, बल्कि मेरे अपने अहंकार के सामने भी मेरी आँखें खोल दी हैं।"


श्रुति ने तुरंत झुककर अपनी बुआ सास के पैर छुए और मुस्कुराते हुए बोली, "बुआ जी, आप घर की बड़ी हैं। बड़ों से माफी नहीं, सिर्फ आशीर्वाद लिया जाता है। आप बस मुझे अपना लीजिये, यही मेरे लिए सबसे बड़ा रुतबा है।"


सुजाता जी दूर खड़ी यह सब देख रही थीं। उनकी आँखों से खुशी के आँसू छलक पड़े। आज उनके घर में न सिर्फ एक आदर्श बहू आई थी, बल्कि उस बहू ने अपने संस्कारों से एक ऐसा सबक सिखाया था जो उस रईस खानदान में पीढ़ियों तक याद रखा जाने वाला था। आर्यन ने अपनी माँ के गले लगकर कहा, "देखा माँ, मैंने कहा था न, मेरी पसंद कभी गलत नहीं हो सकती।"


उस रात उस आलीशान बंगले में विदेशी ब्रांड्स की चमक फीकी पड़ गई थी और मातृभाषा तथा संस्कारों की खुशबू हर कोने में महक रही थी।


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एक सवाल आप सभी के लिए: क्या आपको भी लगता है कि हमारे समाज में आज भी अंग्रेज़ी बोलने वालों को बेवजह ज्यादा बुद्धिमान मान लिया जाता है, और अपनी मातृभाषा बोलने वालों को कमतर आंका जाता है? क्या कपड़ों और भाषा से किसी का चरित्र और योग्यता तय की जा सकती है? अपने विचार और अनुभव हमारे साथ ज़रूर साझा करें।


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