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किराए की कोख

 शहर की शोर-शराबे वाली गलियों से दूर, विकास और तन्वी का घर बाहर से जितना शांत दिखता था, अंदर उतनी ही खामोशियां पसरी थीं। शादी के दस साल बीत गए थे, लेकिन आंगन में बच्चों की किलकारियां अभी भी एक सपना ही थीं। तन्वी ने हर मंदिर की सीढ़ियां नापीं, हर डॉक्टर की दहलीज छुई, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। अंत में, उन्होंने सेरोगेसी (Surrogacy) का सहारा लेने का फैसला किया। यहीं से उनकी जिंदगी में माया का प्रवेश हुआ।

माया एक छोटे से गाँव की रहने वाली थी, जिसके सिर पर कर्ज का बोझ और आंखों में अपनी बेटी के भविष्य के सुनहरे सपने थे। वह विकास और तन्वी के बच्चे को अपनी कोख में पालने के लिए तैयार हो गई। शुरुआत में यह केवल एक कानूनी और आर्थिक समझौता था। तन्वी ने माया को अपने ही घर के एक कमरे में रखा ताकि वह उसकी देखभाल कर सके। लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते गए, घर का माहौल बदलने लगा।

तन्वी की सास, सुमित्रा देवी, पुराने ख्यालात की महिला थीं। उनके लिए माया सिर्फ एक जरिया थी, एक 'मशीन' जिससे उनके खानदान का चिराग आने वाला था। वह अक्सर माया को टोकतीं, "देखो, ज्यादा हिलना-डुलना मत, हमारे पोते को कुछ नहीं होना चाहिए। और हाँ, अपने खाने-पीने का ध्यान रखो, वरना पैसे किस बात के दे रहे हैं हम?"

माया चुपचाप सब सह लेती। उसे पता था कि वह यहाँ किस हैसियत से है। लेकिन तन्वी का व्यवहार अलग था। वह माया के पास बैठती, उसके पैर दबाती और उसे अपने हाथों से फल खिलाती। एक दिन, जब सुमित्रा देवी ने माया को उसकी 'औकात' याद दिलाई, तो माया की आँखों में आँसू आ गए। वह अकेले कमरे में रो रही थी।

उसी रात, जब विकास और तन्वी ड्राइंग रूम में बैठे थे, सुमित्रा देवी चाय का कप रखते हुए बोलीं, "तन्वी, तू इस माया का इतना ख्याल क्यों रखती है? आखिर वह है तो पराई ही। कल को बच्चा होगा, हम उसे पैसे देंगे और वह चली जाएगी। इतना लगाव अच्छा नहीं है। अगर इस बहु के मम्मी-पापा होते.. तो शायद कुछ और ही लेना देना होता, तब हमें बाहर से किसी को लाने की जरूरत नहीं पड़ती।"

सुमित्रा देवी का इशारा तन्वी की अनाथ स्थिति की ओर था। तन्वी का इस दुनिया में कोई नहीं था, और शायद इसीलिए वह माया के अकेलेपन और उसके त्याग को गहराई से समझ पा रही थी। तन्वी ने मुस्कुराकर कहा, "माँ जी, रिश्ता केवल खून का नहीं होता। वह हमारे बच्चे को जीवन दे रही है, क्या वह हमारे परिवार का हिस्सा नहीं हुई?"

महीने बीतते गए और प्रसव का समय नजदीक आ गया। माया को अस्पताल ले जाया गया। ऑपरेशन थिएटर के बाहर विकास, तन्वी और सुमित्रा देवी बेचैनी से टहल रहे थे। तभी नर्स बाहर आई और खबर दी कि बेटा हुआ है, लेकिन माया की हालत बहुत नाजुक है। भारी रक्तस्राव के कारण उसे तुरंत खून की जरूरत थी।

संयोग से, माया का ब्लड ग्रुप बहुत दुर्लभ था और वह केवल तन्वी के ब्लड ग्रुप से मेल खाता था। सुमित्रा देवी हिचकिचाईं, "तन्वी, तू अभी कमजोर है, तू खून कैसे देगी?" लेकिन तन्वी ने एक पल भी नहीं सोचा। उसने कहा, "माँ जी, अगर आज वह अपनी जान जोखिम में डालकर मेरे सपने को सच कर रही है, तो क्या मैं उसे अपनी रूह का एक कतरा भी नहीं दे सकती?"

तन्वी ने खून दिया और माया की जान बच गई। जब माया को होश आया और उसने अपने पास तन्वी को बैठे देखा, तो उसकी आँखों से ममता की धार बह निकली। उसने धीरे से बच्चे को तन्वी की गोद में रख दिया और कहा, "दीदी, यह आपका है, लेकिन इसकी रगों में अब आपका भी खून दौड़ रहा है।"

घर लौटने के बाद सुमित्रा देवी का नजरिया पूरी तरह बदल चुका था। उन्होंने देखा कि कैसे दो स्त्रियां, जो एक-दूसरे के लिए बिल्कुल अजनबी थीं, एक गहरे अहसास से जुड़ गई थीं। उन्होंने माया को विदा करते समय केवल तय किए हुए पैसे ही नहीं दिए, बल्कि उसे अपनी बेटी मानकर गहने और कपड़े भी दिए।

माया जब जा रही थी, तो उसने तन्वी के कान में धीरे से कहा, "दीदी, आपने मुझे जो सम्मान दिया, वह किसी भी कीमत से बड़ा है।" तन्वी ने उसे गले लगाया और कहा, "तुम पराई नहीं हो माया, तुम इस बच्चे की दूसरी माँ हो।"

उस दिन सुमित्रा देवी को अपनी गलती का अहसास हुआ। उन्होंने समझ लिया कि परिवार केवल 'लेने-देने' या 'मम्मी-पापा' के होने से नहीं बनता, बल्कि वह उन त्यागों और संवेदनाओं से बनता है जो हम एक-दूसरे के लिए दिखाते हैं। घर की दीवारों पर अब सन्नाटा नहीं था, बल्कि एक नए जीवन की मुस्कान और बदले हुए रिश्तों की महक थी।


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