पंडित जी का संदेशा आ रहा था कि “मुहूर्त में देर मत करना।” और इन सबके बीच सबसे तेज़ चल रहे थे हरिनारायण—गाँव में सब उन्हें “हरि काका” कहते थे, पर घर में वे बस “बाबा” थे।
बाबा की कमर थोड़ी झुक गई थी, पर आज वे बिल्कुल सीधे दिखना चाहते थे। सफेद धोती का पल्ला बार-बार ठीक करते, जेब से पर्ची निकालते और फिर से पढ़ते—“फूल माला… हल्दी… पायल के लिए नथ… जनवासा… मिठाई…।”
अंदर कमरे में उनकी पत्नी गौरी देवी बैठी थीं। एक तरफ गहनों का पुराना लकड़ी का बक्सा खुला था, दूसरी तरफ बेटी प्राची का साज-श्रृंगार का सामान। गौरी देवी के माथे की सिलवटें बता रही थीं कि बक्से में जितना होना चाहिए, उतना नहीं है। वे धीरे से बोलीं, “अब क्या करेंगे जी? बेटा दामाद के लिए जो घड़ी देखी थी, वो तो हाथ से निकल गई। दुकानदार बोला—‘इतने में नहीं हो पाएगी।’”
बाबा ने एक पल को आँखें बंद कीं। फिर ज्यों ही बोले, उनकी आवाज़ में थकान और विवशता दोनों थीं—“गौरी… आजकल लोग उपहार नहीं देखते, दिखावा देखते हैं। पर घर की हालत… तुम समझती हो।”
गौरी देवी ने जैसे कोई अंतिम हथियार निकाल लिया हो, “एक काम करो… मेरे दो चूड़ियाँ… वो जो शादी में मिली थीं… उन्हीं को गिरवी रख देते हैं। बस दो-चार महीने की बात है। धान का पैसा आते ही छुड़ा लेंगे।”
बाबा ने झट से सिर हिला दिया, “नहीं… चूड़ियाँ तुम्हारी निशानी हैं। उन्हें हाथ से कैसे निकाल दूँ? और फिर… घर में और क्या बचा है, गौरी?”
गौरी देवी ने धीरे से बक्से की तरफ देखा। अंदर एक जोड़ी चाँदी के कड़े रखे थे—मोटे नहीं, साधारण… पुराने। वही देखकर बाबा की आँखें ठहर गईं। वे बड़बड़ाए, “ये कड़े…।”
गौरी देवी को बात समझ में आ गई। उन्होंने हल्का सा विरोध किया, “ये तो प्राची के जन्म पर आपकी अम्मा ने दिए थे…”
बाबा ने जैसे खुद को समझाया, “अम्मा ने दिए थे, पर हमारी बेटी के लिए ही तो दिए थे। और बेटी के लिए ही काम आ जाएँ तो इससे बड़ा पुण्य क्या होगा?”
बाबा ने वहीँ बैठकर फैसला कर लिया। “चार कड़ों में से दो दे देंगे। बस… किसी को भनक नहीं लगनी चाहिए। और हाँ, प्राची को भी नहीं।”
गौरी देवी की आँखें भर आईं। वह जानती थीं—कड़े देना सिर्फ गहना देना नहीं था, यह एक पिता का अपना गौरव थोड़ा-सा किनारे रखना था, ताकि बेटी के ससुराल की पहली सीढ़ी पर कोई काँटा न रहे।
दोपहर होते-होते गाँव के चौक में हलचल मच गई। बारात कल सुबह आनी थी, पर आज ही बाज़ार दौड़ना था। बाबा बिना चाय पिए निकल गए। वे भूख के नाम पर बस एक घूँट पानी पी लेते और फिर भागते। दो दिन से यही हाल था—नींद कटी-कटी, खाना आधा-आधा, माथे पर पसीना और आँखों में बेचैनी।
घर के भीतर प्राची तैयारियों में लगी थी। वह अपने कमरे की खिड़की के पास आकर बार-बार बाहर झाँकती। बाबा की पीठ जब उसे दिखती—कभी राशन की बोरी उठाते, कभी हलवाई से बहस करते, कभी टेंट वाले को समझाते—तो उसका गला भर आता। वह दबे पाँव वापस मुड़ जाती, ताकि कोई उसकी नमी देख न ले।
प्राची को बचपन की एक बात याद आती—जब वह छोटी थी तो बाबा उसे कंधे पर बैठाकर मेले में घुमाते थे। तब बाबा की हँसी कितनी खुली होती थी। और आज… आज वही बाबा जैसे हँसना भूल गए थे। प्राची को लग रहा था, विवाह नहीं, किसी ने बाबा से उनकी उम्र की कुछ साँसें उधार ले ली हैं।
शाम को जब बाबा घर लौटे तो उनके हाथ में छोटा-सा थैला था। गौरी देवी ने पूछ लिया, “हो गया?”
बाबा ने बस इतना कहा, “हाँ।” और फिर जल्दी से हाथ धोकर फिर बाहर निकलने लगे।
गौरी देवी ने उनके हाथ में रोटी रखनी चाही तो उन्होंने हँसने का अभिनय किया, “अभी कहाँ… कल खाऊँगा।” पर उनके शब्दों में ऐसा सूखापन था कि गौरी देवी समझ गईं—यह भूख नहीं, चिंता है जो उन्हें खा रही है।
रात आई। घर में हल्दी का गीत गूंजा, रिश्तेदार आए, बच्चों ने शोर मचाया। पर बाबा बार-बार किसी न किसी काम का बहाना बनाकर बाहर निकल जाते। कोई कहता, “समधीजी वाले चावल आ गए?” कोई पूछता, “पंडित जी के लिए आसन तैयार है?” कोई बोलता, “जनवासा में पानी का इंतज़ाम?” और बाबा सबमें दौड़ते रहे।
उसी रात प्राची ने एक बार हिम्मत की। वह बाबा के पास आई, उनके हाथ में पानी का गिलास थमाया और धीमे से बोली, “बाबा… आप खाना खा लो… आपकी तबियत…”
बाबा ने जैसे ही बेटी की तरफ देखा, उनकी पलकें काँप गईं। उन्होंने जल्दी से सिर घुमा लिया, “तू भीतर जा… ठंडी हवा लगेगी।” और बोले तो ऐसे जैसे आदेश दे रहे हों, पर उस आदेश के पीछे डर था—कहीं बेटी की आंखों में देखकर उनकी हिम्मत टूट न जाए।
विवाह की सुबह ढोल बजा। बारात आई। शहनाई में जैसे हर घर की धड़कन मिल गई। प्राची का घूंघट हुआ, मंडप सजा, रस्में चलीं। बाबा ने हर काम में खुद को व्यस्त रखा—कहीं किसी ने पूछा नहीं, और उन्होंने किसी को अवसर भी नहीं दिया कि वह उनके चेहरे में छिपा तूफान पढ़ सके।
कन्यादान का समय आया तो पंडित जी ने कहा, “कन्या के पिता आगे आएँ।”
बाबा की हथेलियाँ थरथराईं। उन्होंने प्राची के सिर पर हाथ रखा। प्राची ने पिता की हथेली का स्पर्श महसूस किया—एक पल में जैसे बचपन, किशोरावस्था, सारे डांट-फटकार, सारी सीख, सारे आशीर्वाद… सब एक साथ उसके सिर पर उतर आए।
जल का लोटा उठा तो बाबा की आंखें भर आईं। उन्होंने दांत भींचे, पर आवाज़ फिसल गई। वे सिसक पड़े। वह सिसकी ऐसी थी जैसे किसी पुराने पेड़ की जड़ में कुल्हाड़ी लगी हो—ऊपर से पेड़ खड़ा है, पर भीतर कुछ टूट गया है।
प्राची ने घूंघट में ही पिता की काँपती सांसें सुन लीं। उसका मन चीखा—“बाबा…” पर होंठों से आवाज़ न निकली। मर्यादा का वही अदृश्य नियम, जो पिता-बेटी के बीच अचानक दीवार बना देता है, आज भी वहीं खड़ा था।
रस्में पूरी हुईं। विदाई की घड़ी आई। औरतें रोने लगीं। भाई ने प्राची को गले लगाया। माँ ने माथा चूमा। सखियाँ सिसक पड़ीं। पर प्राची की आँखें बस बाबा को खोज रही थीं। बाबा कहीं नहीं दिखे।
“भैया… बाबा कहाँ हैं?” प्राची ने भर्राई आवाज़ में पूछा।
भाई—मयंक—ने इधर-उधर देखा, फिर जैसे खुद को संभालते हुए बोला, “यहीं कहीं होंगे… तू चल… देर हो रही है।”
गाड़ी के पास सब जमा थे। प्राची बैठ गई। उसने आख़िरी बार मुड़कर देखा। तब दूर, पीपल के पेड़ के पास बाबा खड़े थे। सिर से पगड़ी उतारकर वे उसे हाथ में मसल रहे थे, जैसे आँसू छिपाने का कोई उपाय खोज रहे हों। उनकी आँखें लाल थीं, पर वे पास नहीं आ रहे थे।
प्राची समझ गई—बाबा पास आए तो टूट जाएंगे। और टूटे हुए बाबा की तस्वीर प्राची अपने जीवन में नहीं रखना चाहती थी। वह चाहती थी कि उसके मन में बाबा हमेशा वैसे रहें—मजबूत, सीधे, छाँव जैसे।
गाड़ी आगे बढ़ी। प्राची ने देखा, बाबा ने दोनों हाथ उठाकर आशीर्वाद दिया। उनके होंठ हिले—शायद कुछ बोले, पर आवाज़ हवा में घुल गई। फिर उन्होंने अचानक मुँह दूसरी तरफ घुमा लिया।
और उसी क्षण प्राची को लगा—दुनिया का सबसे कठोर आदमी वही नहीं होता जो डांटता है, बल्कि वह होता है जो अपने आँसू अपनी ही पलकों के पीछे कैद कर लेता है ताकि बेटी का आशीर्वाद भारी न पड़ जाए, विदाई हल्की लगे।
रास्ते भर प्राची की आंखें बहती रहीं। ससुराल पहुँचकर जब रस्में हुईं, सबने उसे समझाया, “अब खुश रहो।” पर भीतर कहीं एक हिस्सा बार-बार उसी पीपल के पेड़ के पास लौट जाता—जहाँ एक पिता अपनी बेटी की विदाई में खुद से ही लड़ रहा था।
कुछ दिन बाद प्राची ने पहली बार बाबा को फोन किया। उसने आवाज़ संभालकर कहा, “बाबा… मैं ठीक हूँ।”
उधर से बाबा ने गला साफ किया, “हूँ… ठीक रह… और सुन… चाय पीती रहना… ठंडी मत पीना।”
प्राची हँस पड़ी—आँसुओं के बीच। यही तो बाबा का प्यार था—सीधा “याद आती है” कहने की हिम्मत नहीं, पर “चाय गरम पीना” में पूरी दुनिया समा देना।
फोन रखते ही बाबा ने शायद फिर वही किया होगा—एकांत में पगड़ी उतारकर आंसू पोंछे होंगे। पर प्राची जानती थी—उनके आँसू कमजोरी नहीं, उनकी ताकत थे। क्योंकि वे अपनी बेटी को खुश देखने के लिए अपने मन की सबसे नाज़ुक बातें भी चुपचाप सह लेते थे।
और यही तो जीवन का सच है—बेटी जब तक छोटी होती है, पिता उसे गोद में उठाकर रो भी देता है। पर बेटी बड़ी होते ही, समाज एक रेखा खींच देता है। उस रेखा के इस पार पिता है—जिसे रोना आता है, पर रोने का अधिकार नहीं। और उस रेखा के उस पार बेटी है—जो पिता की नमी देख लेती है, पर उसे पोंछने के लिए आगे नहीं बढ़ सकती।
फिर भी, प्रेम अपना रास्ता ढूंढ ही लेता है—कभी पीपल के पेड़ के पीछे छिपकर, कभी आशीर्वाद में, कभी गरम चाय की नसीहत में।
और प्राची ने अपनी विदाई की उस तस्वीर को दिल में रख लिया—एक पिता दूर खड़ा है… हाथ उठाए है… आंखें भीगी हैं… पर बेटी को टूटे हुए पिता की नहीं, मजबूत पिता की याद दे रहा है।
लेखिका : रमा मिश्रा
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