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छत और छाते का फर्क

 सर्दियों की गुनगुनी धूप में, पार्क की बेंच पर बैठी, रिया अपनी छह साल की बेटी, काव्या, को खेलते हुए देख रही थी। काव्या अपनी हमउम्र बच्चों के साथ दौड़ रही थी, उसकी खिलखिलाहट पार्क में गूंज रही थी। रिया के चेहरे पर एक संतुष्टि की मुस्कान थी। उसने अपनी जैकेट की ज़िप थोड़ी ऊपर चढ़ाई और अपनी किताब में वापस ध्यान लगाने की कोशिश की, लेकिन काव्या की हँसी उसे बार-बार अपनी ओर खींच लेती थी।

रिया एक सफल आर्किटेक्ट थी। उसने कड़ी मेहनत से अपना करियर बनाया था। उसके पास अपना घर, अपनी गाड़ी और एक प्यारी सी बेटी थी। लेकिन उसकी ज़िंदगी में एक खालीपन था। उसका पति, विक्रम, दो साल पहले एक कार दुर्घटना में उसे छोड़कर चला गया था। तब से रिया अकेले ही अपनी दुनिया संवार रही थी। उसने अपने काम में खुद को डुबो दिया था, ताकि विक्रम की यादों का दर्द उसे कम सताए।

अचानक, एक परिचित आवाज़ ने रिया का ध्यान खींचा। "रिया! अरे, तुम यहाँ?"

रिया ने सिर उठाकर देखा। सामने उसकी कॉलेज की दोस्त, सिमरन, खड़ी थी। सिमरन, जो कभी कॉलेज की सबसे चुलबुली और बिंदास लड़की हुआ करती थी, आज कुछ थकी हुई और मुरझाई सी लग रही थी। उसकी आँखों के नीचे हल्के काले घेरे थे और उसके कपड़ों में वो पहले वाली चमक नहीं थी।

"सिमरन! कैसी हो तुम? इतने सालों बाद मिलकर कितना अच्छा लग रहा है!" रिया ने अपनी किताब बंद करते हुए कहा और सिमरन को गले लगा लिया।

"मैं ठीक हूँ, रिया। तुम कैसी हो? और यह प्यारी सी गुड़िया कौन है?" सिमरन ने काव्या की ओर इशारा करते हुए पूछा।

"यह मेरी बेटी है, काव्या। काव्या, आंटी को नमस्ते करो," रिया ने काव्या को पास बुलाते हुए कहा। काव्या ने दौड़ते हुए आकर सिमरन को नमस्ते किया और फिर खेलने चली गई।

"तुम यहाँ कब से हो? क्या कर रही हो आजकल?" रिया ने पूछा।

सिमरन ने एक गहरी साँस ली और बेंच पर रिया के बगल में बैठ गई। "बस, ज़िद्दी चल रही है। एक छोटी सी बुटीक चलाती हूँ। तुम बताओ, तुम तो आर्किटेक्ट बन गई न? मैंने सुना था।"

"हाँ, बस काम चल रहा है। विक्रम के जाने के बाद थोड़ी मुश्किल हुई थी, लेकिन अब सब ठीक है," रिया ने हल्की मुस्कान के साथ कहा।

सिमरन की आँखों में एक अजीब सा भाव आया। उसने रिया का हाथ थाम लिया। "मुझे बहुत अफ़सोस है विक्रम के बारे में सुनकर। वह बहुत अच्छा इंसान था।"

"हाँ, वह बहुत अच्छा था," रिया ने धीरे से कहा। "लेकिन तुम अपनी सुनाओ। शादी की तुमने?"

सिमरन ने नज़रें झुका लीं। "नहीं, शादी नहीं की। बस एक रिश्ते में थी, लेकिन वह भी..." उसने बात अधूरी छोड़ दी।

रिया ने सिमरन के चेहरे पर एक दर्द देखा। उसे याद आया कि कॉलेज के दिनों में सिमरन हमेशा कहती थी कि उसे शादी के बंधन में नहीं बंधना। वह आज़ाद रहना चाहती थी, दुनिया घूमना चाहती थी। उसे लगता था कि शादी एक पिंजरा है जो उसकी आज़ादी को छीन लेगा।

"क्या हुआ सिमरन? तुम तो हमेशा कहती थी कि तुम्हें अपनी शर्तों पर जीना है," रिया ने पूछा।

सिमरन ने एक कड़वी मुस्कान दी। "हाँ, शर्तों पर जीना चाहती थी। लेकिन ज़िंदगी ने अपनी शर्तें रख दीं। मैं एक आदमी से मिली, समीर। वह बहुत अमीर था, चार्मिंग था। मुझे लगा कि मुझे मेरा सपनों का राजकुमार मिल गया। हम दोनों साथ रहने लगे। सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था। हम घूमते थे, पार्टियाँ करते थे। मुझे लगा कि यही ज़िंदगी है। लेकिन फिर..."

सिमरन की आवाज़ भर्रा गई। "फिर समीर का असली चेहरा सामने आया। वह शादीशुदा था। उसने मुझसे यह बात छिपाई थी। जब मुझे पता चला, तो मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। मैंने उससे सवाल किया, तो उसने साफ़ कह दिया कि वह अपनी पत्नी को नहीं छोड़ सकता। मैं उसके लिए सिर्फ़ एक टाइमपास थी।"

रिया सुन रही थी, उसे सिमरन के लिए बहुत बुरा लग रहा था।

"मैंने उसे छोड़ दिया," सिमरन ने आगे कहा। "लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। मैंने अपना करियर, अपने दोस्तों, अपने परिवार, सबको पीछे छोड़ दिया था। मेरे पास कुछ नहीं बचा था। समीर ने जो सपने दिखाए थे, वो सब झूठे निकले। मैं टूट गई थी, रिया। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूँ।"

"फिर तुमने क्या किया?" रिया ने पूछा।

"मैंने अपने परिवार से संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने मुझे अपनाने से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि मैंने अपनी मर्जी से अपना रास्ता चुना था, अब मुझे ही उसे भुगतना होगा। मैं अकेली पड़ गई थी। फिर मैंने एक छोटी सी बुटीक खोली। धीरे-धीरे अपनी ज़िंदगी को फिर से पटरी पर लाने की कोशिश कर रही हूँ।"

सिमरन की आँखों में आँसू थे। रिया ने उसे गले लगा लिया। "सब ठीक हो जाएगा, सिमरन। तुम मज़बूत हो। तुमने हार नहीं मानी, यही सबसे बड़ी बात है।"

"पता है रिया," सिमरन ने आंसू पोंछते हुए कहा, "तुम हमेशा कहती थी कि शादी एक छत की तरह होती है जो धूप और बारिश से बचाती है। और लिव-इन रिलेशन एक छाते की तरह होता है। मैं तब तुम्हारी बातों पर हँसती थी। मुझे लगता था कि छाता ही काफ़ी है। लेकिन जब तूफ़ान आया, तो मेरा छाता उड़ गया और मैं भीग गई। तुम सही थी, रिया। छत और छाते में बहुत फ़र्क होता है।"

रिया ने सिमरन का हाथ दबाया। "सिमरन, जो हो गया उसे बदला नहीं जा सकता। लेकिन अब तुम अपनी छत खुद बना रही हो। तुम्हारी बुटीक तुम्हारी छत है। तुम्हारी मेहनत तुम्हारी छत है। तुम्हें किसी और के छाते की ज़रूरत नहीं है।"

सिमरन ने मुस्कुराने की कोशिश की। "शायद तुम सही कह रही हो। लेकिन कभी-कभी बहुत अकेलापन महसूस होता है। लगता है काश कोई होता जो मेरा हाथ थामकर कहता कि सब ठीक हो जाएगा।"

"मैं हूँ न," रिया ने कहा। "हम दोस्त हैं, सिमरन। और हमेशा रहेंगे। तुम कभी अकेली नहीं हो।"

तभी काव्या दौड़ती हुई आई। "मम्मा, मुझे भूख लगी है।"

"चलो, हम कुछ खाते हैं," रिया ने कहा। "सिमरन, तुम भी हमारे साथ चलो। आज हम साथ में लंच करेंगे।"

सिमरन ने मना करने की कोशिश की, लेकिन रिया ने उसकी एक न सुनी। वे तीनों पास के एक कैफ़े में गए। वहाँ उन्होंने पुरानी यादें ताज़ा कीं, खूब बातें कीं और हँसे। सिमरन के चेहरे पर सालों बाद एक सच्ची मुस्कान आई थी। उसे लगा कि शायद ज़िंदगी इतनी भी बुरी नहीं है। शायद अभी भी उम्मीद बाकी है।

लंच के बाद, रिया ने सिमरन को अपनी गाड़ी में उसके घर छोड़ दिया। सिमरन का घर एक छोटा सा फ्लैट था, लेकिन साफ़-सुथरा और सजा हुआ था।

"यह बहुत प्यारा है, सिमरन," रिया ने कहा।

"हाँ, मेरा अपना है," सिमरन ने गर्व से कहा। "किराए का है, लेकिन मैंने इसे अपने हाथों से सजाया है।"

"यह तुम्हारी छत है, सिमरन," रिया ने कहा। "और यह बहुत मज़बूत है।"

सिमरन ने रिया को गले लगाया। "शुक्रिया, रिया। आज तुमने मुझे बहुत हिम्मत दी है।"

"हम मिलते रहेंगे," रिया ने कहा। "और हाँ, अगर कभी भी ज़रूरत हो, तो बस एक कॉल कर देना।"

रिया वहां से चली गई, लेकिन सिमरन देर तक दरवाजे पर खड़ी उसे देखती रही। उसे आज एक बात समझ आ गई थी। जीवन में चाहे जितनी भी मुश्किलें आएँ, अगर आपके पास सच्चे दोस्त और अपना आत्मसम्मान है, तो आप किसी भी तूफ़ान का सामना कर सकते हैं। उसे अब किसी 'समीर' के छाते की ज़रूरत नहीं थी। वह अपनी छत खुद बना सकती थी, और वह छत उसे हर मौसम में सुरक्षित रखेगी।

कुछ महीनों बाद, सिमरन की बुटीक चल निकली। उसने अपने डिज़ाइन ऑनलाइन बेचने शुरू कर दिए और उसे अच्छा रिस्पॉन्स मिल रहा था। उसने अपने माता-पिता को फिर से संपर्क किया। शुरू में वे नाराज़ थे, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने भी सिमरन की मेहनत और बदलाव को देखा और उसे माफ़ कर दिया। सिमरन अब अक्सर अपने घर जाती थी और त्योहारों पर सबके साथ मिलकर खुशियाँ मनाती थी।

एक दिन, सिमरन ने रिया को फोन किया। "रिया, क्या तुम आज शाम फ्री हो? मैं तुम्हें कुछ दिखाना चाहती हूँ।"

"ज़रूर," रिया ने कहा।

शाम को सिमरन रिया को एक निर्माणाधीन इमारत के पास ले गई।

"यह क्या है?" रिया ने पूछा।

"यह मेरा अपना घर है," सिमरन ने चमकती आँखों से कहा। "मैंने इसे बुक किया है। अभी बन रहा है, लेकिन एक दिन यह मेरी अपनी छत होगी। पक्की छत।"

रिया ने सिमरन को गले लगा लिया। "मुझे तुम पर बहुत गर्व है, सिमरन। तुमने कर दिखाया।"

"यह सब तुम्हारी वजह से है, रिया," सिमरन ने कहा। "उस दिन तुमने मुझे जो समझाया था, उसने मेरी आँखें खोल दीं। छत और छाते का फ़र्क अब मुझे अच्छी तरह समझ आ गया है।"

दोनों सहेलियाँ उस निर्माणाधीन इमारत को देखते हुए खड़ी थीं, जो भविष्य में सिमरन का घर बनने वाली थी। ढलता हुआ सूरज आसमान में नारंगी रंग बिखेर रहा था, जो एक नई सुबह का संकेत दे रहा था। सिमरन जानती थी कि अब चाहे कितनी भी तेज़ बारिश हो या तूफ़ान आए, उसकी छत उसे हमेशा सुरक्षित रखेगी। क्योंकि यह छत उसने किसी और के भरोसे नहीं, बल्कि अपनी मेहनत और आत्मविश्वास की ईंटों से बनाई थी। और यही छत उसे असली सुकून और सुरक्षा देगी, जो कोई भी रंगीन छाता कभी नहीं दे सकता था।

सिमरन ने एक गहरी साँस ली और मुस्कुराई। उसने अपनी ज़िंदगी की एक नई पारी शुरू की थी, जहाँ वह खुद अपनी कहानी की हीरो थी। और इस कहानी में, छत की अहमियत उसे अब हमेशा याद रहने वाली थी।

लेखिका : गरिमा चौधरी


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