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मायके की दहलीज

 "हाँ बेटा, मैंने लिस्ट में सब कुछ लिख लिया है। दो बनारसी सिल्क की साड़ियां—एक तुम्हारे लिए और एक तुम्हारी सास के लिए। और हाँ, वो जो इम्पोर्टेड ड्राई फ्रूट्स के बड़े वाले डब्बे तुमने बताए थे, वो भी ले लिए हैं। और कुछ छूट तो नहीं गया?" शालिनी फोन पर अपनी बेटी रिया से बात कर रही थी।

"मम्मी, वो ब्रांडेड मेकअप किट और चांदी के सिक्के मत भूलना। इस बार तीज पर मेरे ससुराल में बहुत सारे मेहमान आ रहे हैं। मेरी जेठानी के मायके से तो हमेशा बहुत चढ़ावा आता है, मैं उनके सामने नीचा नहीं देखना चाहती। सब मेरी तरफ भी तो देखेंगे ना!" रिया ने ताकीद करते हुए कहा।

"तू बिल्कुल चिंता मत कर मेरी बच्ची। तेरा मायका अभी इतना भी कमज़ोर नहीं हुआ है कि तुझे किसी के सामने झुकना पड़े। मैं सब सबसे बढ़िया वाला ही भिजवाऊंगी। तू बस अपनी तैयारी कर।" फोन रखते हुए शालिनी के चेहरे पर एक अजीब सा गर्व और एक माँ की संतुष्टि थी। उसे लग रहा था कि वह अपनी बेटी के ससुराल में उसका रुतबा बढ़ाने का हर संभव प्रयास कर रही है।

शालिनी ने एक लंबी-चौड़ी लिस्ट बनाकर अपने पति विकास के हाथों में थमा दी। विकास, जो अभी-अभी ऑफिस से थका-हारा लौटा था और सोफे पर बैठकर चाय पी रहा था, उस लिस्ट को देखकर उसकी आँखें फटी रह गईं।

"शालिनी, यह सब क्या है? पिछले साल तक तो रिया ने कभी इतनी फरमाइशें नहीं कीं। अचानक इतनी लंबी-चौड़ी डिमांड?" विकास ने चश्मा ठीक करते हुए हैरानी से पूछा।

"अरे, आप भी ना, दुनियादारी बिल्कुल नहीं समझते। रिया की जेठानी के मायके वाले बहुत दिखावा करते हैं। अब हमारी बेटी वहां कमतर थोड़ी ना लगेगी? यह तो हमारी भी नाक का सवाल है। आखिर इकलौती बेटी है हमारी, उसके ससुराल में हमारी हैसियत और इज्जत का सवाल है। अगर हम अपनी बेटी का मान नहीं रखेंगे, तो कौन रखेगा?" शालिनी ने बड़ी सहजता और थोड़े गुरूर से अपनी बात रखी।

विकास ने एक गहरी सांस ली। "चलो, मान लिया कि बेटी का मान रखना हमारा फर्ज है। मैं कल ही यह सारा सामान ला दूंगा।" फिर कुछ सोचते हुए विकास ने अपनी चाय का कप टेबल पर रखा और पूछा, "अच्छा शालिनी, यह तो बता दो कि सुमन दीदी के घर कब जाना है? उनके लिए क्या-क्या लिया है तुमने?"

सुमन, विकास की बड़ी बहन थी, जिसकी शादी को लगभग पंद्रह साल हो चुके थे। बाबूजी (विकास के पिता) के निधन के बाद से सुमन दीदी का मायके आना काफी कम हो गया था।

सुमन दीदी का नाम सुनते ही शालिनी का चेहरा थोड़ा तन गया। उसने कुछ झिझकते हुए कहा, "दीदी के यहाँ? अब भला वहां जाने की क्या जरूरत है?"

"क्यों भला?" विकास ने शांत लेकिन गंभीर स्वर में पूछा।

"तीज-त्योहार के शगुन तो बाबूजी दिया करते थे अपनी बेटी को। अब बाबूजी नहीं रहे, तो ये सब रस्में भी खत्म समझिए। और वैसे भी, अब हमारी अपनी बेटी है, उसकी इतनी जिम्मेदारियां हैं, हमारा अपना खर्च इतना बढ़ गया है। दीदी तो अब अपने घर में सेटल हैं, उनके बच्चे बड़े हो गए हैं, उन्हें हमारे शगुन की क्या दरकार है? अपनी बेटी का देन-लेन भी तो हमें ही देखना है ना?" शालिनी ने सब जानते हुए भी अनजान और व्यावहारिक बनने की कोशिश की।

विकास के चेहरे की शांति अचानक एक गहरी मायूसी और पीड़ा में बदल गई। उसने लिस्ट को टेबल पर रखा और शालिनी की आँखों में सीधे देखते हुए बहुत ही ठहरी हुई लेकिन धारदार आवाज़ में कहा, "बाबूजी नहीं रहे, तो क्या इस घर से सुमन दीदी का मायका भी खत्म हो गया शालिनी? मैं तो अभी ज़िंदा हूँ ना? दीदी तब भी इस घर की बेटी थी, और आज भी इस घर की बेटी है।"

शालिनी ने कुछ सफाई देनी चाही, "मेरा वो मतलब नहीं था, मैं तो बस खर्चे की..."

विकास ने हाथ के इशारे से उसे रोक दिया। "अपनी बेटी की फरमाइशें पूरी करने को मैंने कहाँ मना किया शालिनी? मैं तो बाप हूँ, अपनी जान भी दे दूँ। पर कम से कम मुझे मेरे एक भाई होने के फर्ज को पूरा करने से तो मत रोको। तुम्हें लगता है कि दीदी को हमारे शगुन के कपड़ों या पैसों की दरकार है? नहीं। एक बेटी को मायके से आने वाले सामान की नहीं, उस याद की, उस सम्मान की दरकार होती है जो उसे यह अहसास दिलाता है कि उसके मायके के दरवाजे आज भी उसके लिए खुले हैं। जब तुम अपनी रिया के ससुराल में उसका सिर ऊंचा करने के लिए अपनी हैसियत से बढ़कर खर्च करने को तैयार हो, तो यह क्यों भूल जाती हो कि मेरी बहन भी तो किसी के घर की बहू है? क्या उसे अपने मायके से आने वाले शगुन का इंतजार नहीं होगा?"

कमरे में एक भारी सन्नाटा छा गया। शालिनी बुत बनकर खड़ी रह गई।

विकास ने आगे कहा, "जितना हक इस घर पर रिया का है, उतना ही सुमन दीदी का भी है। अगर यह घर उन दोनों बेटियों में कोई भेद नहीं करता, तो तुम क्यों कर रही हो शालिनी?" विकास यह कहकर चुपचाप सोफे पर बैठ गया और अपनी आँखें मूंद लीं।

शालिनी के कानों में विकास के शब्द बार-बार गूँज रहे थे। एक-एक शब्द ने शालिनी के मन में जमे स्वार्थ के जालों को काट कर रख दिया था। उसे अपनी सोच पर अचानक बहुत शर्म आने लगी। कसूरवार की तरह उसने अपना सिर झुका लिया। उसे याद आया कि जब वह खुद नई-नई बहू बनकर आई थी, तो सुमन दीदी ने ही उसे इस घर के रंग-ढंग सिखाए थे। बाबूजी के जाने के बाद सुमन दीदी कितनी अकेली पड़ गई थीं, उनका मायका सूना हो गया था, लेकिन शालिनी ने कभी उनकी वह कमी पूरी करने की कोशिश ही नहीं की। एक सगी माँ होने के मोह में वह एक भाभी होने का धर्म और एक औरत होने के नाते दूसरी औरत का दर्द भूल गई थी।

करीब दस मिनट बाद, शालिनी चुपचाप अपनी अलमारी के पास गई। उसने कुछ पैसे और निकाले। उसने अपनी साड़ियों के कलेक्शन में से सबसे सुंदर और नई रेशमी साड़ी निकाली, जो उसने खास अपने लिए रखी थी, और उसे एक खूबसूरत लिफाफे में पैक किया। मिठाइयों और फलों की एक और बड़ी बास्केट का ऑर्डर फोन पर दिया।

उसने अपनी आँखों के कोरों से छलक आए पश्चाताप के आंसुओं को पोंछा। अपना पर्स कंधे पर लटकाया और गाड़ी की चाबी उठाकर विकास के पास आई।

"चलिए उठिए," शालिनी ने चाबी विकास के हाथों में थमाते हुए बहुत ही नरम और भीगी हुई आवाज़ में कहा।

विकास ने हैरानी से उसकी तरफ देखा, "कहाँ चलूँ जरा बताओगी?"

शालिनी का गला रुंधा हुआ था। उसने एक गहरी सांस ली और होठों पर एक सच्ची मुस्कान लाते हुए कहा, "बाज़ार... और फिर इस घर की बेटी... हमारी सुमन दीदी के यहाँ। आखिर उनका मायका अभी भी ज़िंदा है।"

यह सुनते ही विकास के चेहरे पर एक असीम सुकून छा गया। उसने शालिनी के हाथों को थाम लिया और दोनों एक साथ मायके की उस दहलीज का मान रखने निकल पड़े, जो हर बेटी के लिए दुनिया का सबसे सुरक्षित कोना होता है।

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