"वाह माँ! यह बनारसी सूट तो आप पर खूब खिल रहा है। कहाँ से लिया आपने?" रुचिका ने अपनी माँ, सुशीला जी को ऊपर से नीचे निहारते हुए कहा।
सुशीला जी ने अपने दुपट्टे को सलीके से कंधे पर रखते हुए चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान के साथ जवाब दिया, "अरे बेटा, मैं कहाँ इस उम्र में बाज़ार की खाक छानती फिरूँगी। पहले तू ला दिया करती थी, अब तेरी भाभी आस्था ले आती है। सच कहूँ तो उस लड़की की पसंद बहुत उम्दा है। और देख, सिर्फ मेरे लिए ही नहीं, तेरे लिए भी दो खूबसूरत साड़ियाँ खरीद कर रखी हैं उसने। मेरी तो जैसे किस्मत ही खुल गई जो ऐसी समझदार और गुणवान बहू इस घर में आई है। मुझे तो कुछ करने ही नहीं देती, बस सारा दिन 'माँ जी आप आराम करो, माँ जी आप बैठो' करती रहती है।"
अपनी माँ के मुँह से भाभी की इतनी तारीफ रुचिका को कुछ हजम नहीं हो रही थी। वह अपनी जगह से उठी और थोड़ा त्यौरी चढ़ाते हुए बोली, "रहने दो माँ! आपको तो हर चमकती चीज़ सोना ही लगती है। यह सब ना, शुरू-शुरू के चार दिन के नखरे हैं। नई-नई शादी हुई है, तो अपना प्रभाव जमाने की कोशिश कर रही है।"
सुशीला जी ने बेटी को टोकना चाहा, "अरे नहीं बेटा, ऐसा नहीं है। वो दिल की बहुत साफ़ है।"
लेकिन रुचिका कहाँ रुकने वाली थी, उसने अपनी बात जारी रखी, "अभी तो आपके हाथ-पैर सलामत हैं माँ। आप घर के कामों में उसका हाथ बंटा देती हो, सुबह उठकर सब्जियां काट देती हो, तो वो भी आगे-पीछे घूम रही है। असली रंग तो तब पता चलेगा जब आप बिस्तर पकड़ लोगी और उसे आपकी सेवा करनी पड़ेगी। भगवान ना करे आपको कभी किसी की सेवा की मोहताज होना पड़े, हाथ-पैर चलते रहें वही अच्छा है।"
सुशीला जी थोड़ा असहज हो गईं। "बेटा, ऐसे खयाल क्यों ला रही है मन में? और आस्था ऐसी नहीं है।"
रुचिका ने अपनी माँ के करीब आकर धीमी लेकिन चुभने वाली आवाज़ में कहा, "माँ, आप दुनिया नहीं जानतीं। मैं बस इतना कह रही हूँ कि बहू को इतना सिर पर मत चढ़ा लेना। कहीं जज़्बाती होकर घर की तिजोरी और सारे फैसलों की चाबी उसे मत पकड़ा देना। अपना हक़ और अपना पैसा अपने हाथ में ही रखना। वरना कल को जब उसकी सत्ता इस घर में कायम हो जाएगी, तो वही आपको आँखें दिखाएगी और आप कोने में बैठकर आंसू बहाओगी।"
रुचिका तो उस शाम अपने ससुराल लौट गई, लेकिन अपने पीछे वह सुशीला जी के मन में एक शक का बीज बो गई थी। इंसान का मन बड़ा अजीब होता है, जो चीज़ें पहले सामान्य लगती थीं, अब शक की नज़र से देखने पर वे साजिश लगने लगती हैं। अगले दिन से सुशीला जी के व्यवहार में एक अजीब सा बदलाव आ गया। जब आस्था सुबह उनके लिए चाय लेकर आई, तो उन्होंने मुस्कुरा कर जवाब देने के बजाय बस रूखेपन से चाय का कप ले लिया। जब भी आस्था घर के खर्चों या किसी सामान के बारे में पूछती, सुशीला जी चाबियों का गुच्छा अपनी साड़ी के पल्लू में और कसकर बांध लेतीं। उन्हें लगने लगा था कि रुचिका सही कह रही थी, आस्था का यह मीठा व्यवहार शायद घर की चाबियां और अधिकार हथियाने का कोई तरीका है।
आस्था बहुत समझदार लड़की थी। उसे अपनी सास के व्यवहार में आया यह बदलाव महसूस होने लगा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अचानक क्या गलती हो गई, लेकिन उसने कभी पलटकर कोई सवाल नहीं किया। वह उसी लगन और सम्मान के साथ घर के काम करती रही और सुशीला जी की ज़रूरतों का ध्यान रखती रही। सुशीला जी अब बात-बात पर नुक्स निकालने लगी थीं। कभी खाने में नमक कम बता देतीं, तो कभी कहतीं कि कपड़ों में साबुन रह गया है। आस्था हर बात को 'जी माँ जी, आगे से ध्यान रखूँगी' कहकर टाल देती थी।
दिन बीतते गए और सर्दियाँ आ गईं। एक सुबह, सुशीला जी जब बाथरूम से नहाकर निकल रही थीं, तो उनका पैर गीले फर्श पर फिसल गया। एक ज़ोरदार चीख के साथ वे ज़मीन पर गिर पड़ीं। आस्था दौड़कर आई और उन्हें उठाने की कोशिश की, लेकिन सुशीला जी दर्द से कराह रही थीं। डॉक्टर को बुलाया गया, पता चला कि सुशीला जी के कूल्हे की हड्डी में फ्रैक्चर आ गया है और उन्हें कम से कम दो महीने तक पूरी तरह से बिस्तर पर आराम करना होगा।
सुशीला जी के बेटे अनिरुद्ध ने तुरंत अपनी बहन रुचिका को फोन किया और माँ की हालत के बारे में बताया। रुचिका अगले दिन आई। सुशीला जी को लगा कि अब उनकी बेटी उनके पास रुककर उनकी देखभाल करेगी। उन्होंने रुंधे गले से कहा, "रुचिका बेटा, कुछ दिन यहीं रुक जा। मुझे तेरी बहुत ज़रूरत है।"
रुचिका ने घड़ी की तरफ देखते हुए कहा, "माँ, आप जानती तो हो, बच्चों के फाइनल एग्जाम्स सिर पर हैं और मेरे सास-ससुर भी तीर्थ यात्रा से लौट रहे हैं। मेरा यहाँ रुकना कैसे मुमकिन है? आप चिंता मत करो, भैया हैं ना, और भाभी भी तो हैं। अब भाभी का फ़र्ज़ है आपकी सेवा करना। मैं बीच-बीच में चक्कर लगाती रहूँगी।" यह कहकर रुचिका कुछ ही घंटों में वापस लौट गई।
सुशीला जी बिस्तर पर लेटी अपनी बेटी के जाते हुए कदमों को देखती रहीं। जिन बातों और जिस बेटी पर उन्होंने इतना भरोसा किया था, वह मुश्किल वक्त में कुछ मीठे शब्द बोलकर अपना पल्ला झाड़ चुकी थी।
अब शुरू हुआ आस्था का असल इम्तिहान। सुशीला जी पूरी तरह से बिस्तर पर थीं। उनका उठना, बैठना, खाना-पीना, यहाँ तक कि शौच जाना भी दूसरों पर निर्भर हो गया था। आस्था ने बिना एक शब्द कहे यह सारी ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली। वह सुबह जल्दी उठकर अनिरुद्ध का टिफिन बनाती, फिर सुशीला जी को स्पंज बाथ देती, उनके कपड़े बदलती और उन्हें नाश्ता कराती। सुशीला जी का वज़न ज्यादा था, इसलिए उन्हें करवट दिलाना या बिस्तर से उठाना कोई आसान काम नहीं था। आस्था के खुद के हाथों और कमर में दर्द रहने लगा था, लेकिन उसने कभी सुशीला जी के सामने उफ़ तक नहीं की।
एक रात, सुशीला जी को बहुत तेज़ दर्द हो रहा था। रात के दो बज रहे थे। उन्होंने दर्द से कराहते हुए पानी के लिए हाथ बढ़ाया, लेकिन गिलास दूर था। तभी उनके कमरे का दरवाज़ा खुला। आस्था अपनी नींद खराब करके उन्हें देखने आई थी। सुशीला जी की हालत देखकर वह तुरंत उनके पास आई, उन्हें पानी पिलाया और उनके पैरों पर दर्द निवारक तेल की मालिश करने लगी।
कमरे में सिर्फ घड़ी की टिक-टिक की आवाज़ थी और आस्था के हाथों का वह कोमल स्पर्श जो सुशीला जी के दर्द को खींच रहा था। सुशीला जी की आँखों से आँसू बहने लगे। उन्हें रुचिका की वो बातें याद आ गईं—'असली रंग तो तब पता चलेगा जब आप बिस्तर पकड़ लोगी', 'उसे घर की चाबी मत देना'।
सुशीला जी ने कांपते हुए हाथों से आस्था का सिर सहलाया। "मुझे माफ़ कर दे बेटा," सुशीला जी फफक कर रो पड़ीं। "मैंने अपनी ही बेटी की बातों में आकर तुझ पर शक किया। मुझे लगा तू इस घर के पैसों और चाबियों के लिए मेरी सेवा कर रही है। मैंने तुझे कितना ताना मारा, तेरे प्यार को दिखावा समझा। आज जब मैं अपाहिज होकर इस बिस्तर पर पड़ी हूँ, तो मेरी अपनी बेटी मुझे छोड़कर चली गई, और तू, जिसे मैंने बेगाना समझा, वो रातों की नींद खराब करके मेरे पैर दबा रही है।"
आस्था ने सुशीला जी के आँसू पोंछे और मुस्कुराते हुए कहा, "माँ जी, आप ये क्या कह रही हैं? एक माँ अगर अपनी बेटी की बात मान भी ले तो उसमें क्या बुराई है? और रही बात सेवा की, तो आप मेरी भी तो माँ हैं। जब मैं इस घर में आई थी, तो आपने मुझे बेटी की तरह अपनाया था। तो अब जब आपको ज़रूरत है, तो क्या मैं आपका साथ छोड़ दूँगी?"
सुशीला जी ने अपने तकिए के नीचे से वह चाबियों का गुच्छा निकाला, जिसे वह पिछले कई महीनों से अपनी जान से ज्यादा छिपाकर रख रही थीं। उन्होंने वह गुच्छा आस्था के हाथों में रख दिया।
"नहीं माँ जी, इसकी कोई ज़रूरत नहीं है," आस्था ने चाबियाँ वापस करनी चाहीं।
"इसे रख ले मेरी बच्ची," सुशीला जी ने दृढ़ता से कहा। "यह तिजोरी की चाबी नहीं है, यह इस घर की ज़िम्मेदारी है। और तूने आज साबित कर दिया है कि तुझसे बेहतर इस घर को कोई नहीं संभाल सकता। रुचिका ने मुझे घर की चाबी बचाने को कहा था, लेकिन तूने तो अपनी सेवा और निस्वार्थ प्यार से मेरे मन का ताला ही खोल दिया है।"
उस रात सुशीला जी बहुत चैन से सोईं। दो महीने बाद जब सुशीला जी पूरी तरह से ठीक होकर अपने पैरों पर चलने लगीं, तो रुचिका एक बार फिर उनसे मिलने आई। उसने देखा कि आस्था पूरे अधिकार के साथ घर का इंतज़ाम संभाल रही है और सुशीला जी आराम से धूप में बैठकर चाय पी रही हैं।
रुचिका ने पास आकर धीरे से कहा, "माँ, मैंने कहा था ना कि बहू को सिर पर मत चढ़ाना। अब देखो, वो कैसे पूरे घर पर राज कर रही है। आपने उसे चाबियाँ दे दीं?"
सुशीला जी ने इस बार बहुत ही शांत लेकिन कड़क आवाज़ में जवाब दिया, "हाँ बेटा, दे दीं। क्योंकि जो बिना किसी लालच के किसी के बुरे वक्त में उसका साथ दे, असल में वही घर पर राज करने के लायक होता है। तूने मुझे चाबी बचाने की सलाह तो दी, लेकिन जब मुझे तेरी सबसे ज्यादा ज़रूरत थी, तब तूने अपने घर का रास्ता नाप लिया। आस्था ने मुझे अपाहिज होने से बचाया है। और याद रख बेटा, जो इंसान निस्वार्थ भाव से सेवा करता है, उसे किसी चाबी की ज़रूरत नहीं होती, वो दिलों पर राज करता है।"
रुचिका शर्मिंदगी से नज़रें नहीं मिला पा रही थी। उसे समझ आ गया था कि रिश्तों की नींव शक और सलाहों से नहीं, बल्कि समर्पण और प्रेम से मज़बूत होती है।
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