उसके आगे दादी बोल ही नहीं पाईं, क्योंकि फोन की दूसरी तरफ़ से कीर्ति ने कॉल काट दी। दादी ने फिर से नंबर मिलाया… एक बार, दो बार… लेकिन उधर से बस रिंग जाती रही। दादी का गला सूख गया, हाथ काँपने लगे। “कुछ तो हुआ है… मेरे बेटे के साथ कुछ तो हुआ है…” वह अपने आप से बुदबुदाईं और दरवाज़ा खोलते ही पड़ोस में रहने वाली अलका के घर की तरफ़ लगभग भाग पड़ीं।
अलका दरवाज़े पर ही मिल गईं। दादी को ऐसे घबराया देखकर बोलीं, “अरे अम्मा, क्या हुआ? चेहरा क्यों पीला पड़ गया?”
दादी ने काँपती आवाज़ में कहा, “बेटा… मनोहर का एक्सीडेंट… कीर्ति ने कहा… और फोन काट दिया… अब उठा भी नहीं रही…”
“कौन-सा अस्पताल? कुछ बताया?” अलका ने तुरंत पूछा।
“नहीं… मेरा दिमाग़ सुन्न हो गया… मैं पूछ ही नहीं पाई।” दादी की आँखों से आँसू टपक गए।
अलका ने दादी का हाथ पकड़कर उन्हें सोफ़े पर बैठाया। “ठीक है, आप सांस लीजिए। मुझे फोन दीजिए। मैं उसी नंबर पर बात करती हूँ।”
अलका ने कॉल लगाया। कुछ देर बाद उधर किसी ने उठाया—कीर्ति नहीं, शायद किसी रिश्तेदार ने या किसी अस्पताल वाले ने। अलका ने एक-एक करके सवाल किए—कहाँ, कैसे, किस वार्ड में। फिर दादी की ओर देखते हुए बोली, “चलो अम्मा, सिटी केयर हॉस्पिटल। इमरजेंसी के पास है। घबराइए नहीं।”
दादी ने जल्दी से शॉल ओढ़ा। अलका ने जाते-जाते अपनी बहू को आवाज़ दी, “निहारिका, सुनो… मैं और अम्मा अस्पताल जा रहे हैं। बच्चों का स्कूल का समय है। तुम मनोहर के घर की डुप्लीकेट चाबी ले लो और बच्चे आएँ तो उन्हें दे देना। उन्हें अकेला मत छोड़ना।”
निहारिका ने बिना सवाल किए चाबी ले ली, “जी मम्मी, आप चिंता मत कीजिए।”
हॉस्पिटल पहुँचे तो सामने इमरजेंसी की भीड़ थी। दादी की आँखें हर चेहरे में बेटे को ढूँढ रही थीं। अलका ने काउंटर पर जाकर जानकारी ली और दादी को सहारा देती हुई अंदर ले गई।
मनोहर स्ट्रेचर पर नहीं, बेड पर था। सिर पर पट्टी थी और बायाँ हाथ प्लास्टर में जकड़ा हुआ। डॉक्टर ने कहा, “चोट ज्यादा नहीं है। हेलमेट होता तो पट्टी भी न लगती। फ्रैक्चर है, दर्द रहेगा, पर खतरा नहीं।”
दादी ने राहत की सांस ली, फिर भी मन काँप रहा था। “मेरा बेटा… मेरा बेटा…” उन्होंने मनोहर का माथा चूमा। मनोहर ने आँखें खोलीं, “अम्मा… आप आ गईं…” इतना कहकर वह थककर आंखें बंद कर गया।
दादी ने वहीं बैठकर फिर से कीर्ति को फोन लगाया। एक बार, दो बार… कोई जवाब नहीं। उन्होंने फोन नीचे रख दिया। इस बार रोना नहीं आया—बस एक भारी-सी चुप्पी छा गई।
घर पर उसी समय स्कूल से बच्चे लौटे।
बारह साल की पाखी दरवाज़े पर पहुँची तो उसे बाहर निहारिका खड़ी मिली। साथ में छह साल का चिरू भी था, जिसने अपनी छोटी-सी स्कूल बैग उतारी और पूछा, “दादी कहाँ हैं?”
निहारिका ने झुककर कहा, “बेटा, पापा को चोट लगी है। दादी पापा के पास हॉस्पिटल गई हैं। पाखी, तुम बहादुर हो ना? चिरू को संभाल लो।”
“पापा को क्या हुआ?” पाखी का चेहरा डर से भर गया।
“गाड़ी से हल्का एक्सीडेंट। पापा ठीक हैं।” निहारिका ने तुरंत दादी से वीडियो कॉल लगवाई। दादी स्क्रीन पर आईं, “पाखी… बेटा घबराना नहीं। पापा ठीक हैं। शाम तक घर आ जाएंगे। तुम चिरू को खाना खिला देना।”
पाखी की आँखें भर आईं, पर उसने खुद को संभाला। “ठीक है दादी… आप पापा के पास रहो।”
कॉल कटते ही चिरू रो पड़ा, “मुझे पापा चाहिए…”
पाखी ने उसे गले लगा लिया। “पापा आएँगे न… मैं हूँ ना।” फिर वह चिरू को अंदर ले गई, उसे दूध पिलाया, कहानी सुनाई, और कुछ देर में चिरू सो गया—आँसुओं से भीगा हुआ।
शाम ढलते-ढलते दरवाज़े की कुंडी खटकी। उसी समय कीर्ति घर पहुँची। हाथ में एक छोटा बैग था और चेहरे पर नाराज़गी की परछाईं।
घर में दादी नहीं थीं, बच्चे चुप थे। कीर्ति ने तेज़ स्वर में पूछा, “तुम दोनों अकेले घर पर क्यों हो? दादी कहाँ गई? मैंने कहा था मैं मायके जा रही हूँ… फिर भी मुझे इतना फोन क्यों किया?”
पाखी के भीतर दिनभर का डर, चिंता और गुस्सा—सब एक साथ उबल पड़ा। वह अपने कमरे में गई और दो गुल्लक उठा लाई—एक अपना, एक चिरू का। उसने गुल्लक कीर्ति के सामने रख दिए।
“मम्मी… आपको गहने चाहिए ना? ये फोड़ लो। इसमें ज्यादा पैसे नहीं हैं… पर मैं वादा करती हूँ, बड़ी होकर कमाऊँगी तो आपको गहने दिलाऊँगी। बस… प्लीज़… घर में शांति रहने दो। पापा के पीछे हर दिन मत लड़ो।”
कीर्ति को जैसे किसी ने चाँटा मार दिया हो। उसने पहली बार पाखी को इतना तेज़ बोलते देखा था—और वह भी पापा के पक्ष में। उसका गुस्सा और भड़क गया।
“तो ये सब तुम्हें किसने सिखाया? दादी ने? या पड़ोस वाली ने? अपनी माँ से बात करने की तमीज़ नहीं रही?”
पाखी की आँखें लाल हो गईं। “तमीज़ की बात मत कीजिए मम्मी। आपको बस ये दिखा कि पापा ने आपके जन्मदिन पर सोने का सेट नहीं दिया। आपको ये नहीं दिखा कि पापा कितनी टेंशन में घर से निकले। रास्ते में उनका एक्सीडेंट हो गया। और आपने दादी का एक फोन भी नहीं उठाया।”
कीर्ति का चेहरा सफेद पड़ गया। “एक्सीडेंट…? कब…? मुझे बताया क्यों नहीं?”
पाखी ने कड़वी सच्चाई थूक दी, “दादी फोन कर रही थीं… आप उठातीं तो पूछ ही लेतीं। पर आपको तो बस गहनों की पड़ी थी। पति से क्या मतलब?”
कीर्ति की पलकों के कोने नम हो गए, लेकिन शब्द अटक गए।
उसी वक्त दरवाज़ा फिर खुला। दादी और अलका मनोहर को सहारा देकर घर ले आई थीं। मनोहर धीरे चल रहा था। उसके चेहरे पर थकान थी, आँखों में दर्द… और कहीं बहुत भीतर कोई टूटा हुआ विश्वास।
कीर्ति दौड़कर आगे बढ़ी, “आप ठीक तो हैं? ज्यादा चोट तो नहीं आई? मुझे बताना चाहिए था…”
मनोहर ने उसकी तरफ़ देखा—नज़र में शिकायत नहीं थी, बस एक ठंडी उदासी। वह बिना कुछ कहे दादी से बोला, “अम्मा… मैं आराम करना चाहता हूँ।”
और सीधे अपने कमरे में चला गया। कीर्ति वहीं खड़ी रह गई—जैसे शब्दों का सहारा छिन गया हो।
अलका ने दादी की तरफ देखा, दादी की आँखों में वही पुरानी थकान थी। अलका धीमे से बोली, “अम्मा, मैं चलती हूँ। जरूरत हो तो आवाज़ देना।”
अलका के जाते ही दादी ने कीर्ति की ओर देखा। इस बार उनकी आवाज़ में गुस्सा नहीं था, बहुत गहरी चोट थी।
“बहू… तुझे पति नहीं, गहने चाहिए थे ना? बेटा ठीक हो गया है, भगवान का शुक्र। पर सुन… अगर एक दिन ये बेटा चला गया ना… तो तेरे गहने किस काम के? ये घर किस काम का? बच्चे किसके सहारे?”
कीर्ति की सांस अटक गई।
दादी आगे बोलीं, “आज मेरा बेटा रोकर घर से निकला था। वजह सिर्फ तेरी जिद थी। कभी सोच… तुम्हें अकेले घर चलाना पड़े तो? बच्चों का स्कूल, फीस, दवाई, खाना, किराया—सब? ये जो तुम रोज़ उसकी कमाई को ‘कम’ समझती हो, उसी से यह घर सांस लेता है।”
कीर्ति के होंठ काँपने लगे। दादी ने अंतिम बात बहुत धीमे, पर तीखेपन से कही—“ऐसा तोहफ़ा ही किस काम का, जो किसी की जान पर बन जाए।”
कीर्ति सिहर उठी। उसे सुबह से अब तक की सारी तस्वीरें एक साथ दिखने लगीं—मनोहर का घर से निकलना, दादी का घबराना, बच्चों का रोना, और उसका फोन न उठाना… सिर्फ इसलिए कि वह नाराज़ थी।
वह बिना कुछ कहे कमरे में चली गई। दरवाज़ा बंद किया, और पहली बार उसने खुद को सच में देखा—अपने ही बनाए हुए अहंकार के बीच अकेली।
बेड पर मनोहर लेटा था। वह करवट बदलकर दीवार की तरफ़ देख रहा था। कीर्ति ने आगे बढ़कर उसका हाथ पकड़ना चाहा, पर प्लास्टर देखकर रुक गई। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
“मुझे… माफ कर दो,” वह फूट पड़ी। “मुझे कोई गहने नहीं चाहिए… तुम हो तो सब कुछ है। मैं… मैं आज समझ गई…”
मनोहर ने धीरे से उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में अब भी दर्द था, पर सख्ती नहीं। उसने बहुत धीमे कहा, “कीर्ति… मैं तुमसे कभी ये नहीं कहता कि कुछ मांगो मत। मांगो… पर समझदारी से। हम मिडिल क्लास लोग हैं… हमारी एक सीमा होती है। हम जितना कमा सकते हैं, उतना ही कर सकते हैं। प्यार के ऊपर मांग का बोझ रख दोगी, तो प्यार थक जाता है।”
कीर्ति सिसकते हुए बोली, “मैंने बच्चों के सामने… आपकी इज्जत… सब…”
मनोहर ने आंखें बंद कर लीं, जैसे किसी टूटे हुए हिस्से को जोड़ने की कोशिश कर रहा हो। “बच्चे सब समझते हैं, कीर्ति। उन्हें बस घर में सुकून चाहिए। और मुझे… घर लौटकर शांति चाहिए।”
कीर्ति ने सिर हिलाया। “मैं बदलूँगी… सच में।”
उसी समय पाखी दरवाज़े पर आकर खड़ी हो गई। उसकी आंखें भी भीगी थीं। कीर्ति ने उसे बुलाया नहीं, बस हाथ फैलाया। पाखी थोड़ी देर रुकी, फिर धीरे-धीरे आगे आई और माँ के पास बैठ गई। चिरू भी नींद में करवट बदलता हुआ कमरे में आ गया, आँखें मलता हुआ बोला, “पापा…”
मनोहर ने मुस्कुराकर उसे पास बुलाया। चिरू उसके सीने से लग गया।
दादी दरवाज़े के पास खड़ी यह दृश्य देख रही थीं। उनका दिल भारी भी था और हल्का भी। उन्होंने मन ही मन कहा—“भगवान… आज बचा लिया तूने… वरना यह घर बिखर जाता।”
कीर्ति ने उठकर दादी के पैर छुए। “अम्मा… आज आपने जो कहा… वो मेरे लिए सज़ा नहीं, सच था। मैं… मैं अपना घर नहीं खोना चाहती।”
दादी ने उसे सिर पर हाथ फेरा। “घर बचाना है तो अहंकार छोटा कर, बहू। रिश्ते कीमती हैं। गहने नहीं।”
उस रात घर में पहली बार लंबे समय बाद सन्नाटा नहीं था—एक धीमी-सी राहत थी। जैसे तूफान गुजर गया हो और खिड़की के बाहर हवा फिर से सांस लेने लगी हो।
और पाखी ने मन ही मन अपना गुल्लक वापस अलमारी में रखते हुए सोचा—“काश… बड़े लोग समझ जाएँ कि असली तोहफ़ा सोना नहीं, शांति होती है।”
दादी ने जाते-जाते बस इतना कहा—“कल से नया पन्ना शुरू करते हैं। और इस बार… एक-दूसरे को सुनकर।”
लेखिका : सरिता गुप्ता
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