गोपीनाथ जी ने बालकनी की रेलिंग पर दोनों हाथ टिकाए और सामने वाली बिल्डिंग की तीसरी मंज़िल की ओर आवाज़ लगाई—“अरे… प्रभाकर! ज़रा इधर आना, चाय रखी है। आज तुम्हारी ज़रूरत है।”
कुछ ही देर में प्रभाकर जी अपने हाथ में अख़बार मोड़कर, चप्पल घिसटाते हुए आ गए। दोनों हमउम्र थे, एक ही मोहल्ले में पैंतीस साल से। साथ-साथ नौकरी की, साथ-साथ बच्चों के स्कूलों की फीस भरी, साथ-साथ त्योहारों में जलेबी-पकौड़े लाए। अब रिटायरमेंट के बाद उनकी दोस्ती का नया ठिकाना यही बालकनी थी—जहाँ हवा भी आ जाती थी और दुनिया भी।
गोपीनाथ जी के घर में नीचे ड्रॉइंग रूम में उनकी पत्नी चंद्रकला अक्सर खाँसी, घुटनों के दर्द और “कमज़ोरी” का रोना लेकर लेटी रहतीं। बहू तन्वी सुबह ऑफिस निकलती, लौटकर खाना बनाती, बच्चों का होमवर्क करवाती, और फिर भी सुनती रहती—“घर की बहू होकर भी घर कहाँ देखती है!”
उधर प्रभाकर जी के घर में पत्नी शैलजा और बहू काव्या दोनों नौकरी करती थीं, पर घर का पहिया ऐसे घूमता था जैसे किसी ने चार पहिए लगा दिए हों। प्रभाकर जी सब्ज़ी काट लेते, शैलजा आटा गूंथ देती, बेटा अमितेश बच्चों को ट्यूशन छोड़ आता, बहू काव्या बिल ऑनलाइन भर देती—और कोई यह नहीं कहता था कि “ये मेरा काम” या “वो तुम्हारा काम।”
आज गोपीनाथ जी के माथे पर शिकन साफ़ थी। चाय के कप को हिलाते हुए बोले, “प्रभाकर, एक बात बताओ… तुम्हारे यहाँ ये सब कैसे चलता है? मैं देखता हूँ, तुम्हारे घर में तो बड़ा सुकून रहता है। हमारे यहाँ तो बस हिसाब-किताब, ताने, और शिकायतें…”
प्रभाकर जी ने चाय की चुस्की ली, फिर शांत-सा मुस्कुराए, “कह तो ऐसे रहे हो जैसे तुम्हें वजह पता नहीं।”
“अरे, वजह…?” गोपीनाथ जी झल्ला गए, “बच्चे कमाते हैं, तो घर चलाना उनकी ज़िम्मेदारी नहीं क्या? तन्वी तो काम पर जाती है, ठीक है… पर घर भी तो उसी का है। मेरी पेंशन से कितनी बार खर्च करूँ? मैंने ज़िंदगी भर खटकर सब बना दिया। अब आराम के दिन हैं।”
प्रभाकर जी ने कप नीचे रखा। “आराम के दिन हैं, तो आराम करो। पर घर में शांति भी तो आराम का हिस्सा है, दोस्त।”
गोपीनाथ जी चौंके, “मतलब?”
प्रभाकर जी ने बिना आवाज़ ऊँची किए कहा, “तुम्हें लगता है पेंशन बचाकर तुम कोई खज़ाना बना रहे हो? वो पैसा भी तो इसी घर का है। तुम्हारे पोते-पोतियों की फीस, तुम्हारी बहू की ज़रूरत, बेटे की टेंशन… सब इसी घर का है। तुम जीते-जी घर को सहारा दोगे, तो कल वह सहारा बनकर तुम्हारे लिए लौटेगा।”
गोपीनाथ जी ने तुरंत पलटकर कहा, “पर मैं हर बात में क्यों दूँ? बहू को भी तो सीखना चाहिए… बिल भरना, रसोई, दवाई—सब!”
प्रभाकर जी हल्के-से हँसे। “बिल भरना सीखना है, तो सिखाओ। मदद करना है, तो प्यार से समझाओ। लेकिन ‘मेरे पैसे’ और ‘तेरे पैसे’ की तलवार घर में लटक गई, तो कोई भी चैन से नहीं बैठता।”
गोपीनाथ जी के चेहरे पर असहजता उभर आई। वह कुछ कहने ही वाले थे कि नीचे कमरे से चंद्रकला की आवाज़ आई—“अरे गोपीनाथ! ज़रा पानी तो दे दो… सिर घूम रहा है… और तन्वी को बोल देना, आते वक्त मेरी दवा ले आए।”
गोपीनाथ जी चिढ़कर बोले, “देखो… हर समय यही… बीमारी ही बीमारी।”
प्रभाकर जी ने बहुत ध्यान से गोपीनाथ जी को देखा। “सच बताऊँ? बीमारी कभी-कभी सच होती है… और कभी-कभी आदत। और आदत का इलाज दवा से नहीं, व्यवहार से होता है।”
गोपीनाथ जी ने भौंहें तान लीं। “तुम मेरी चंद्रकला को…?”
“नहीं,” प्रभाकर जी ने तुरंत हाथ उठाया, “मैं किसी पर उंगली नहीं उठा रहा। बस इतना कह रहा हूँ—जब घर में एक इंसान लगातार ‘कमज़ोर’ बनकर सबको झुकाता है, तो बाकी लोग अंदर से टूटते हैं। और एक दिन वही टूटन फूटकर बाहर निकलती है।”
गोपीनाथ जी खामोश हो गए। दूर कहीं से बच्चों के खेलने की आवाज़ आ रही थी, और पास में चाय की भाप धीरे-धीरे ठंडी हो रही थी।
प्रभाकर जी ने बात आगे बढ़ाई, “तुम्हारे बेटे रुद्रांश का चेहरा मैंने कई बार देखा है। ऑफिस से लौटते हुए भी वही थकान। और बहू तन्वी… वह सीढ़ियाँ चढ़ते-चढ़ते भी फोन पर मीटिंग की बातें करती है, फिर घर में घुसते ही सब संभालती है। तुम सोचते हो वह ‘बहू’ है, इसलिए सब कर सकती है। पर वह भी इंसान है, दोस्त।”
गोपीनाथ जी की आवाज़ धीमी हो गई, “लेकिन शैलजा… वो तो तुम्हारे घर में इतना सब करती है…”
प्रभाकर जी मुस्कुराए, “शैलजा करती है, क्योंकि मैं उसके साथ खड़ा होता हूँ। मैं बर्तन नहीं मांजता, तो प्लेट उठाकर सिंक तक पहुँचा देता हूँ। मैं झाड़ू नहीं लगाता, तो कम से कम गंदगी नहीं फैलाता। तुम जानते हो, ये छोटे काम… घर को घर बनाते हैं। और सबसे बड़ी बात—हम बोलते नहीं कि ‘मैं कर रहा हूँ’। हम बस कर देते हैं।”
गोपीनाथ जी एक पल के लिए शर्मिंदा-से हुए। “पर चंद्रकला कहती है—बहू का काम है, सास-ससुर क्यों करें…”
प्रभाकर जी के शब्द अब भी शांत थे, पर अर्थ बहुत तीखा। “वही तो फर्क है। तुम ‘काम’ देखते हो, हम ‘रिश्ता’ देखते हैं। रिश्ता निभाने से घर चलता है। काम बाँटने से मन जुड़ता है।”
गोपीनाथ जी ने धीरे-से कहा, “और अगर बहू फिर भी शिकायत करे?”
“तो सुनो,” प्रभाकर जी ने कहा, “नौकरी, घर, बच्चे—तीनों एक साथ किसी एक इंसान के कंधे पर रख दोगे, तो वह शिकायत नहीं—टूट जाएगी। और फिर तुम्हें लगेगा कि वो ‘बदली-बदली’ हो गई। असल में उसका दम घुट रहा होगा।”
गोपीनाथ जी के चेहरे पर पुरानी यादों की परछाईं आ गई। वह बुदबुदाए, “मेरी माँ भी… मेरी पत्नी से यही कहती थी… ‘बेटे की रोटी तुझे बनानी है’… और चंद्रकला रोती थी…”
प्रभाकर जी ने धीरे से सिर हिलाया। “और आज वही बात तुम चंद्रकला के जरिए तन्वी से कहलवा रहे हो। फर्क सिर्फ इतना है—अब दौर बदल गया है। बहू भी बाहर की दुनिया देख रही है। वह चुप नहीं रहेगी।”
गोपीनाथ जी ने चाय का आख़िरी घूंट लिया। “तो क्या करूँ? मैं तो अब बूढ़ा हो गया…”
“बूढ़ा शरीर होता है,” प्रभाकर जी ने कहा, “समझदारी का उम्र से लेना-देना नहीं।”
इतने में नीचे से तेज़ आवाज़ आई। शायद तन्वी अभी-अभी ऑफिस से लौटी थी।
“पापा… मैं आई हूँ,” तन्वी की आवाज़ में थकान थी। “मम्मी जी की दवा ले आई… और ये बिजली का बिल भी है, कल आखिरी तारीख है।”
उधर से चंद्रकला ने लेटे-लेटे कहा, “बिल तो रुद्रांश भरेगा। बहू का काम दवा लाना है, पैसे संभालना नहीं। और सुनो, आज खाने में वो हलवा भी बना देना, मेरा मन कर रहा है।”
तन्वी कुछ पल चुप रही। फिर बहुत धीमी आवाज़ में बोली, “मम्मी जी… मैं अभी बैठ भी नहीं पाई…”
चंद्रकला ने चिड़चिड़ाकर कहा, “तो क्या हुआ? घर की बहू हो, होटल की मेहमान नहीं!”
बालकनी में गोपीनाथ जी का चेहरा सख्त हो गया, लेकिन इस बार वह पत्नी पर नहीं—खुद पर। प्रभाकर जी ने उनके कंधे पर हाथ रखा, “अब भी समय है, दोस्त। आज नहीं तो कल, तुम्हें किसी एक तरफ़ खड़ा होना पड़ेगा। या रिश्ते के साथ… या अहंकार के साथ।”
गोपीनाथ जी ने पहली बार बिना झुंझलाहट के कहा, “तुम्हारी बात सही है… पर शुरुआत कैसे करूँ?”
प्रभाकर जी ने मुस्कुराकर कहा, “शुरुआत हमेशा छोटी होती है। नीचे जाओ। तन्वी से कहो—बेटा, बैठ जा। मैं बिल भर देता हूँ। और चंद्रकला से कहो—आज हलवा नहीं, आज हम सब मिलकर सादा खाना खाएँगे। क्योंकि घर में किसी एक की इच्छा नहीं, सबकी थकान भी मायने रखती है।”
गोपीनाथ जी का गला रुंध गया। “चंद्रकला नाराज़ हो जाएगी…”
“नाराज़गी से घर नहीं टूटता,” प्रभाकर जी ने कहा, “अनदेखी से टूटता है।”
गोपीनाथ जी धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतरने लगे। जैसे उनके कदमों के साथ उनके भीतर की जिद भी उतर रही हो। ड्रॉइंग रूम में तन्वी कुर्सी पर बैठी अपने बैग से लैपटॉप निकाल रही थी। आँखें लाल थीं, शायद दिन बहुत भारी रहा था।
गोपीनाथ जी ने पहली बार उसे “बहू” की तरह नहीं, “बेटी” की तरह देखा।
“तन्वी,” उन्होंने धीरे से कहा, “बैठ जा बेटा। पहले पानी पी। मैं बिल भर देता हूँ। और सुन… कल से एक काम करते हैं—रुद्रांश बच्चों का होमवर्क देखेगा, मैं सब्ज़ी ले आऊँगा। तुम… थोड़ी देर अपने लिए भी जिया करो।”
तन्वी को जैसे यकीन नहीं हुआ। वह बस उन्हें देखती रही। फिर आँखों में आँसू आ गए, पर आवाज़ नहीं निकली।
उधर चंद्रकला ने पलंग से उठकर तीखा स्वर में कहा, “ये सब क्या हो रहा है? आप बहू के हाथ से काम छीन रहे हैं?”
गोपीनाथ जी ने पहली बार शांत मगर दृढ़ आवाज़ में कहा, “काम नहीं छीन रहा, चंद्रकला… बोझ बाँट रहा हूँ। बहू से घर चलवाना आसान है, पर घर को घर बनाना… हम सबकी ज़िम्मेदारी है।”
चंद्रकला कुछ बोलने के लिए होंठ खोल ही रही थीं, पर गोपीनाथ जी ने आगे कहा, “और बीमारी का सहारा लेकर किसी को दबाना… ठीक नहीं। अगर सच में दर्द है, तो इलाज करेंगे। लेकिन अगर आदत है, तो आदत बदलेंगे।”
कमरे में एक अजीब-सी चुप्पी फैल गई। जैसे दीवारों ने भी सांस रोक ली हो।
तन्वी ने धीरे से कहा, “पापा… धन्यवाद…”
गोपीनाथ जी ने उसका सिर थपथपाया। “धन्यवाद मत कह बेटा। देर हो गई, यही मेरी गलती थी।”
उसी रात रुद्रांश घर लौटा तो उसे खाना टेबल पर सजा मिला—सादा दाल-चावल, सलाद, और सबसे ऊपर एक छोटी-सी प्लेट में चंद्रकला ने खुद दो रोटियाँ सेंक कर रख दी थीं। शायद गुस्सा अभी बाकी था, पर कहीं भीतर एक डर भी था—कि अगर यह घर टूट गया, तो वह जीतकर भी हार जाएगी।
और जब रुद्रांश ने हैरानी से पूछा, “आज ये सब कैसे?”
तन्वी ने मुस्कुराकर कहा, “आज पापा ने कहा… घर हिसाब से नहीं, साथ से चलता है।”
बालकनी में प्रभाकर जी अपनी खिड़की से यह सब देख रहे थे। शैलजा ने पूछा, “क्या हुआ, आज तुम्हारी दोस्ती सफल हो गई?”
प्रभाकर जी ने धीमे से कहा, “सफलता दोस्ती की नहीं… समझ की होती है। और समझ देर से आए, तब भी आए… तो घर बच जाता है।”
उस रात गोपीनाथ जी ने पहली बार चैन की नींद ली। क्योंकि उन्हें समझ आ गया था—पेंशन, किराया, संपत्ति… ये सब बाद में। पहले घर में दिल की साझेदारी चाहिए। और जिस दिन घर “तेरा-मेरा” से “हमारा” बन जाता है, उसी दिन असली समृद्धि शुरू होती है।
लेखिका : मानसी धर
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