मौका था कपूर परिवार की इकलौती बहू कृतिका की शादी की पहली सालगिरह का। पूरा घर विदेशी फूलों की महक और मेहमानों की चहल-पहल से भरा हुआ था। कृतिका, जिसने एक बेहद साधारण और मध्यमवर्गीय परिवार से आकर इस रईस खानदान की बहू बनने का सफर तय किया था, आज किसी महारानी से कम नहीं लग रही थी। उसने लाखों रुपये का डिज़ाइनर लहंगा पहना था और उसके गले में चमकता हुआ हीरों का हार उसकी हैसियत की गवाही दे रहा था। शादी के इस एक साल में कृतिका ने खुद को पूरी तरह से बदल लिया था। अब उसे ब्रांडेड कपड़ों, महँगी गाड़ियों और हाई-सोसाइटी पार्टियों की ऐसी आदत पड़ गई थी कि वह अपने मायके के साधारण रहन-सहन को लगभग भूल ही चुकी थी।
पार्टी में शहर के जाने-माने लोग मौजूद थे। कृतिका अपनी अमीर सहेलियों के बीच घिरी हुई थी और ठहाके लगा रही थी। तभी हॉल के मुख्य दरवाज़े से कृतिका के बड़े भाई विकास और उनकी पत्नी रचना अंदर दाखिल हुए। विकास एक प्राइवेट बैंक में मामूली सी नौकरी करते थे और रचना एक बहुत ही सीधी-सादी, घरेलू महिला थी। रचना ने एक साधारण सी सूती सिल्क की साड़ी पहनी हुई थी और उसके गहने भी बहुत सीमित थे। उनके हाथों में एक साधारण सा कपड़े का थैला था। इस चकाचौंध भरी महफ़िल में वे दोनों थोड़े असहज लग रहे थे।
कृतिका की नज़र जैसे ही अपने भैया-भाभी पर पड़ी, उसके चेहरे की मुस्कान थोड़ी फीकी पड़ गई। उसे अपनी सहेलियों के सामने उन्हें गले लगाने में झिझक महसूस हुई, फिर भी वह औपचारिकता निभाने के लिए उनके पास गई।
"हैप्पी एनिवर्सरी कृतिका!" रचना ने बहुत ही प्यार से आगे बढ़कर अपनी ननद के माथे को चूमा और वह कपड़े का थैला उसकी ओर बढ़ा दिया। "ये तेरे लिए है। तेरी पहली सालगिरह का शगुन।"
कृतिका की सहेलियाँ पीछे खड़ी सब देख रही थीं। एक सहेली ने दबी हुई आवाज़ में तंज कसते हुए कहा, "अरे वाह कृतिका, तुम्हारे मायके से तो बड़ा ही 'इको-फ्रेंडली' पैकिंग वाला गिफ्ट आया है।" यह सुनकर बाकी सहेलियाँ भी मुँह छिपाकर हँसने लगीं।
कृतिका का चेहरा शर्म और गुस्से से लाल हो गया। उसने अपनी सहेलियों के सामने अपनी इज़्ज़त बचाने की खातिर झटके से उस थैले को खोला। अंदर कोई महँगे ब्रांड का डिब्बा नहीं था, बल्कि एक हल्के गुलाबी रंग की हाथ की बुनी हुई सूती साड़ी थी। साड़ी पर साधारण सी कढ़ाई की गई थी। उस साड़ी को देखते ही कृतिका का जो थोड़ा बहुत सब्र था, वह भी टूट गया। उसके सिर पर दौलत और दिखावे का भूत सवार हो चुका था।
उसने बिना यह सोचे कि वह किस जगह खड़ी है और सामने कौन है, उस साड़ी को झटके से सोफे पर फेंक दिया।
"ये क्या मज़ाक है भाभी?" कृतिका की आवाज़ में एक अजीब सी कड़वाहट और गुरूर था। "आपको अंदाज़ा भी है कि आप किस घर में खड़ी हैं? यह कपूर परिवार की पार्टी है। यहाँ मेरे ससुराल वाले और मेरे पति के इतने बड़े-बड़े क्लाइंट्स आए हैं। मेरे घर के नौकर भी ऐसी साधारण साड़ियाँ नहीं पहनते जैसी आप मेरे लिए उठाकर ले आई हैं। माना कि आप लोग मिडिल क्लास हैं और भैया की आमदनी कम है, लेकिन कम से कम बड़े घर में लेन-देन का क्या सलीका होता है, यह तो सीख लेना चाहिए था! अगर हैसियत नहीं थी तो खाली हाथ आ जातीं, पर इस तरह मेरे ससुराल वालों और मेरी सहेलियों के सामने मेरा सरेआम मज़ाक उड़ाने की क्या ज़रूरत थी?"
कृतिका के ये शब्द किसी धारदार तीर की तरह रचना के सीने के आर-पार हो गए। उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस ननद को उसने अपनी छोटी बहन से भी बढ़कर प्यार दिया है, वह दौलत के नशे में इस कदर अंधी हो जाएगी। रचना का गला रुँध गया। उसकी आँखों से आँसुओं की धारा बह निकली। वह कुछ कहना चाहती थी, लेकिन उसके काँपते होंठों से एक भी शब्द नहीं निकला। विकास भी अपनी बहन के इस व्यवहार से स्तब्ध थे। रचना ने अपने आँसू पोंछे, फर्श की तरफ देखा और बिना कोई तमाशा किए, भरे गले के साथ भारी कदमों से उस महफ़िल से बाहर निकल गई। विकास भी निराश होकर उसके पीछे चले गए।
कृतिका अभी भी गुस्से में फुफकार रही थी। तभी कृतिका की सास, सुमित्रा देवी, जो थोड़ी दूरी पर खड़ी यह पूरा तमाशा देख रही थीं, धीरे-धीरे चलकर कृतिका के पास आईं। सुमित्रा देवी एक बहुत ही सुलझी हुई, समझदार और ज़मीन से जुड़ी हुई महिला थीं। रईसी ने कभी उनके संस्कारों को मैला नहीं किया था।
उन्होंने सोफे पर फेंकी गई उस गुलाबी साड़ी को बहुत ही आदर के साथ उठाया, उसकी सिलवटें ठीक कीं और उसे अपने सीने से लगा लिया।
"मम्मी जी, आप इस कबाड़ को क्यों उठा रही हैं? मैंने नौकरानी को बुलाकर इसे बाहर फिकवाने के लिए ही किनारे रखा था," कृतिका ने अभी भी उसी ऐंठ में कहा।
सुमित्रा देवी ने एक गहरी साँस ली। उनकी आँखों में गुस्सा नहीं, बल्कि कृतिका के लिए एक बहुत गहरी निराशा और अफ़सोस था। उन्होंने बहुत ही शांत लेकिन सख्त आवाज़ में कहा, "कृतिका, दौलत ने तुम्हारे शरीर को तो बहुत कीमती और सुंदर कपड़ों से ढक दिया है, लेकिन तुम्हारी सोच को इतना नंगा और दरिद्र कर दिया है, यह मुझे आज पहली बार पता चला।"
कृतिका हैरान रह गई। "मम्मी जी, आप मुझे क्यों डाँट रही हैं? आपने देखा नहीं वो कैसी साड़ी लाई थीं? मेरे मायके वाले हमारी हैसियत का ज़रा भी खयाल नहीं रखते।"
सुमित्रा देवी कृतिका के और करीब आईं और वह गुलाबी साड़ी उसके हाथों में थमा दी। "ज़रा इस साड़ी को गौर से देखो कृतिका। क्या तुम्हें इसमें सिर्फ सूती धागे नज़र आ रहे हैं? कल सुबह जब मेरी तुम्हारी माँ से फोन पर बात हो रही थी, तो उन्होंने बातों-बातों में बताया था कि तुम्हारी इस 'मिडिल क्लास' भाभी को पिछले दो महीने से पीठ में भयंकर दर्द की शिकायत है। डॉक्टर ने उन्हें लगातार बैठने से सख्त मना किया है। लेकिन तुम्हारी इस भाभी ने अपना दर्द सहकर, बेल्ट पहनकर, रात-रात भर जागकर तुम्हारे लिए यह साड़ी अपने हाथों से काढ़ी है। वो चाहती थी कि जब तुम अपनी पहली सालगिरह पर सजकर निकलो, तो बाजार के किसी मशीन से बने कपड़े में नहीं, बल्कि अपनी भाभी के प्यार और आशीर्वाद के धागों में लिपटी हो।"
कृतिका की भृकुटी तन गई, लेकिन सुमित्रा देवी ने उसे बीच में बोलने का कोई मौका नहीं दिया।
"तुम हैसियत और सलीके की बात कर रही हो ना? तो सुनो। ये जो गुलाबी रंग तुम्हें फीका और सस्ता लग रहा है... क्या तुम जानती हो यह कहाँ से आया है? तुम्हारे भाई की नौकरी में पिछले कुछ समय से कटौती चल रही है। उनके पास तुम्हें तुम्हारी सालगिरह पर कोई महँगा तोहफा देने के लिए पैसे नहीं थे। तुम्हारी इसी भाभी ने अपनी शादी की वो इकलौती सोने की चेन, जो उसकी माँ ने उसे दी थी, उसे गिरवी रख दिया ताकि वो रेशम के धागे और यह कपड़ा खरीद सके और तुम्हारी सालगिरह में खाली हाथ न आए। उसने अपना गुरूर, अपनी माँ की कीमती निशानी तुम्हारी इस दिखावे की वेदी पर चढ़ा दी, और आज तुम उसे लेन-देन का 'सलीका' सिखा रही हो?"
सुमित्रा देवी की हर एक बात कृतिका के दिल पर हथौड़े की तरह चोट कर रही थी। उसकी आँखें फटी की फटी रह गई थीं।
"बेटी..." सुमित्रा देवी की आवाज़ अब थोड़ी नरम और भावुक हो गई थी, "पैसा तो आज है, कल शायद न रहे। लेकिन ये जो रिश्ते होते हैं ना, ये रेशम के धागों से भी ज़्यादा नाज़ुक होते हैं। दो पल के अहंकार और गुस्से से जब ये धागे टूटते हैं, तो उनकी गाँठ उम्र भर चुभती है। तुम्हारी भाभी ने तुम्हें आज कोई साड़ी नहीं दी थी, उसने अपना कलेजा निकालकर तुम्हारी गोद में रख दिया था, और तुमने उसे अपने अहंकार के जूतों तले बेरहमी से रौंद दिया। आज तुमने सिर्फ एक साड़ी नहीं फेंकी, तुमने अपनी वो जड़ें काट दीं जहाँ से तुम आई हो।"
सुमित्रा देवी साड़ी वहीं छोड़कर कमरे से बाहर की तरफ चली गईं।
कमरे में अब एक अजीब सा सन्नाटा था। बाहर मेहमानों के हँसने की आवाज़ें आ रही थीं, लेकिन कृतिका के कानों में सिर्फ अपनी सास के शब्द गूंज रहे थे। उसके हाथों में अब वो गुलाबी साड़ी थी। जब उसने उस साड़ी की कढ़ाई को करीब से छुआ, तो उसे महसूस हुआ कि हर टांके में कितनी सफाई और कितनी मेहनत थी। उसे अचानक याद आ गया कि बचपन में जब भी वह बीमार पड़ती थी, तो यही रचना भाभी रात-रात भर उसके सिरहाने बैठकर पट्टियाँ रखती थीं। कैसे उसकी हर छोटी-बड़ी ज़िद पूरी करने के लिए विकास भैया अपनी ज़रूरतें मार लेते थे। कैसे इसी भाभी ने अपनी शादी के पहले साल उसे अपने हिस्से के पैसे बचाकर कॉलेज के लिए स्कूटी दिलवाई थी। और आज, उसी भाभी को उसने अपनी सहेलियों के सामने जलील करके घर से निकाल दिया था।
अपराधबोध और पश्चाताप के भारी बोझ से कृतिका का दिल फटने लगा। उसके हाथ काँपने लगे और आँखों से झर-झर आँसू बह निकले। उसने उस साड़ी को अपने चेहरे से लगा लिया। उसमें उसे बाज़ार के किसी महँगे परफ्यूम की नहीं, बल्कि अपने मायके की, अपनी भाभी के आँचल की वो जानी-पहचानी खुशबू आ रही थी।
"मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई... मैं कितनी अंधी हो गई थी दौलत के नशे में..." कृतिका खुद से बुदबुदाते हुए फूट-फूट कर रोने लगी। उसका सारा अहंकार, सारी रईसी की ऐंठ आंसुओं में बह गई थी।
"आई एम साॅरी मम्मी..मैं अभी..." कृतिका ने रुंधे हुए गले से सुमित्रा देवी की ओर देखते हुए कहा और कांपते हाथों से अपना फोन निकाल कर अपनी भाभी का नंबर डायल किया।
फोन की घंटी बज रही थी और कृतिका के दिल की धड़कनें तेज़ होती जा रही थीं। तीसरी घंटी पर फोन उठा।
"हैलो..." उधर से रचना की धीमी और उदास आवाज़ आई।
रचना के 'हैलो' कहते ही कृतिका की रुलाई फूट पड़ी। वह फोन पर जोर-जोर से रोने लगी।
उसका इस तरह फूट-फूट कर रोना सुनकर रचना अपनी सारी बेइज़्ज़ती भूल गई। भाभी का दिल घबरा गया।
"क्या हुआ कृतिका? तू रो क्यों रही है? तेरी सास ने कुछ कहा क्या तुझे मेरी वजह से? साड़ी के लिये तू टेंशन मत ले मेरी बच्ची... तू रो मत, मैं तेरे भैया से कहकर कुछ दिनों में तेरी पसंद की कोई बहुत महँगी साड़ी भिजवा दूँगी। तू प्लीज़ अपना दिन मत खराब कर।" रचना की आवाज़ में कृतिका के लिए चिंता और प्यार छलक रहा था। खुद का अपमान होने के बावजूद उसे सिर्फ अपनी ननद की खुशी की फिक्र थी।
रचना की ये बातें सुनकर कृतिका का रहा-सहा घमंड भी चकनाचूर हो गया। उसे लगा जैसे किसी ने उसे आईना दिखा दिया हो।
"नहीं भाभी... नहीं..." कृतिका ने सुबकते हुए कहा। "मम्मी जी ने मुझे कुछ नहीं कहा। उन्होंने तो आज मेरी आँखें खोल दी हैं। मुझे माफ़ कर दीजिए भाभी। मैं दौलत के नशे में अंधी हो गई थी। आप मेरे लिए दुनिया की सबसे कीमती चीज़ लाई थीं और मैंने उसे ठुकरा दिया। मुझे अपनी वो पुरानी कृतिका वापस चाहिए भाभी, मुझे ये घमंड नहीं चाहिए। प्लीज़ मुझे माफ़ कर दीजिए और भैया को बोलकर वापस आ जाइए। जब तक आप नहीं आएँगी, मैं केक नहीं काटूँगी।"
उधर फोन पर रचना की आँखों में भी खुशी के आँसू आ गए। "पागल लड़की, परिवार में किससे गलतियाँ नहीं होतीं? तू तो मेरी छोटी बहन है। चल, रोना बंद कर, हम आ रहे हैं वापस।"
कुछ ही देर में विकास और रचना वापस आ गए। कृतिका दौड़कर गई और अपनी भाभी के गले लगकर खूब रोई। पार्टी में मौजूद सभी लोग हैरानी से देख रहे थे, लेकिन अब कृतिका को किसी के 'स्टेटस' की कोई परवाह नहीं थी।
कृतिका ने अपने कमरे में जाकर अपना वह लाखों का डिज़ाइनर लहंगा उतारा और रचना की लाई हुई वही गुलाबी सूती साड़ी पहन कर बाहर आई। जब उसकी सहेलियों ने उसे उस साधारण सी साड़ी में देखा और आश्चर्य से पूछा, तो कृतिका ने बहुत ही गर्व और मीठी मुस्कान के साथ अपनी भाभी का हाथ पकड़कर जवाब दिया, "ये कोई मामूली साड़ी नहीं है, यह दुनिया के सबसे महँगे 'ब्रांड' की साड़ी है—इसका ब्रांड मेरी भाभी का प्यार है, जिसकी कीमत इस दुनिया की कोई दौलत नहीं चुका सकती।"
उस दिन कृतिका ने सिर्फ एक साड़ी नहीं पहनी थी, बल्कि उसने रिश्तों की अहमियत का वो गहना पहन लिया था, जो उसे उसकी समझदार सास ने दिया था। दौलत से घर बनते हैं, लेकिन परिवार तो सिर्फ प्यार, सम्मान और एक-दूसरे के प्रति त्याग से ही बनते हैं।
---
**एक छोटा सा सवाल आप सभी से:** क्या आपने भी कभी बाहरी दिखावे या महँगे तोहफों के चक्कर में किसी अपने के सच्चे प्यार और उनकी मेहनत को नज़रअंदाज़ किया है? क्या दौलत सच में रिश्तों से बड़ी हो सकती है? अपने विचार कमेंट में ज़रूर साझा करें।
**अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद**
लेखिका : वर्षा मंडल
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें