सुबह के दस बज रहे थे, पर श्रेया का बिस्तर से उठने का मन नहीं था। माँ का फोन लगातार बज रहा था, हर घंटी उसके मन में अपराधबोध की एक नई लहर पैदा कर रही थी। अंततः उसने फोन उठाया।
"हैलो, माँ।"
"श्रेया, तू अभी तक सो रही है? घर में सबके मुंह लटके हुए हैं और तुझे सुध नहीं है। कब तक टालेगी?"
"माँ, यह मेरी पूरी जिंदगी का सवाल है। क्या मैं थोड़ा वक्त भी नहीं मांग सकती?" श्रेया की आवाज़ में खटास थी।
"वक्त? किस लिए? एक विधवा के लिए इससे बेहतर प्रस्ताव क्या आएगा? लड़का सेटल्ड है, घर-बार है। तेरे पिता की इज़्ज़त का सवाल है।"
श्रेया ने फोन काट दिया। वह जानती थी कि यह बहस खत्म नहीं होगी। दो साल पहले पति, आलोक, की एक एक्सीडेंट में मौत के बाद से ही उसकी जिंदगी एक ठहराव पर आ गई थी। ससुराल वालों ने उसे बोझ मानकर मायके भेज दिया था। तब से वह माता-पिता के साथ थी, एक अनचाही जिम्मेदारी की तरह। अब यह रिश्ता आया था - 45 साल का विधुर, दो बच्चों का पिता।
श्रेया खिड़की के पास जा खड़ी हुई। बाहर बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे। उसे याद आया, आलोक के साथ उसने भी तो एक छोटा सा सपना देखा था - अपना एक बुटीक खोलने का। आलोक ने हमेशा उसे प्रोत्साहित किया था। वह सिलाई-कढ़ाई में माहिर थी, उसके डिज़ाइनों की दोस्त-रिश्तेदार खूब तारीफ करते थे। पर आलोक के जाने के बाद, वह सपना भी जैसे दफन हो गया था।
शाम को पिताजी कमरे में आए। उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें गहरी थीं।
"बेटा, कब तक ऐसे बैठी रहोगी? समाज में जीना है तो कोई सहारा चाहिए। यह रिश्ता अच्छा है, बच्चे भी बड़े हैं, तुझे ज्यादा परेशानी नहीं होगी।"
"पापा, क्या मेरा सहारा सिर्फ एक आदमी ही हो सकता है? क्या मैं खुद अपना सहारा नहीं बन सकती?" श्रेया ने पहली बार सीधे नजरें मिलाकर पूछा।
पिताजी चौंक गए। "क्या मतलब?"
"पापा, मैं शादी नहीं करना चाहती। कम से कम अभी तो बिल्कुल नहीं। मैं काम करना चाहती हूँ। अपना बुटीक खोलना चाहती हूँ।"
पिताजी कुछ देर चुप रहे, फिर बोले, "पागल मत बन। औरत जात के लिए अकेले काम-धंधा करना आसान नहीं होता। लोग बातें बनाएंगे। और पैसे कहाँ से आएंगे?"
"मेरे पास आलोक की बीमा की कुछ रकम है। मैं उसी से शुरुआत करूंगी। और रही बात लोगों की, तो वे तो अभी भी बातें बना रहे हैं।"
अगले कुछ दिन घर में तनाव का माहौल रहा। माँ ने खाना-पीना छोड़ दिया, पिताजी ने बात करना बंद कर दिया। पर श्रेया इस बार अडिग थी। उसने शहर के एक बाज़ार में एक छोटी सी दुकान किराये पर ली। अपनी जमापूंजी और कुछ गहने बेचकर सामान जुटाया।
शुरुआत मुश्किल थी। सप्लायर्स से मोलभाव करना, ग्राहकों को समझाना, हिसाब-किताब रखना - सब कुछ नया था। कई बार रात को थककर चूर होकर जब वह घर लौटती, तो माँ के ताने सुनने पड़ते - "देख लिया शौक पूरा करके? अब भी वक्त है, मान जा।" पर श्रेया चुपचाप सुन लेती। उसे पता था कि जवाब जुबान से नहीं, काम से देना होगा।
धीरे-धीरे, उसकी मेहनत रंग लाने लगी। उसके डिज़ाइन पसंद किए जाने लगे। 'श्रेयाज़ क्रिएशन' नाम से उसका बुटीक इलाके में मशहूर होने लगा। वह सुबह जल्दी उठकर दुकान जाती और देर रात तक काम करती। उसे एक अजीब सा सुकून मिलता था - अपनी कमाई का, अपनी पहचान का।
एक साल बीत गया। दिवाली का समय था। दुकान पर अच्छी बिक्री हुई थी। श्रेया ने पहली बार अपने पैसों से पिताजी के लिए एक शॉल और माँ के लिए साड़ी खरीदी।
घर पहुँचकर उसने उपहार उनके सामने रखे। पिताजी शॉल को हाथ में लेकर कुछ पल चुप रहे। उनकी आँखों में नमी थी।
"पापा, यह मेरी कमाई से है," श्रेया ने धीरे से कहा।
पिताजी ने उसे गले लगा लिया। "मुझे माफ़ कर दे बेटा। मैं समाज के डर से तेरी काबिलियत को देख नहीं पाया। तूने साबित कर दिया कि सहारा किसी और का नहीं, खुद के हौसले का होना चाहिए।"
माँ भी पल्लू से आँखें पोंछ रही थीं। "तुझे खुश देखकर लगता है कि आलोक भी जहाँ होगा, खुश होगा।"
श्रेया मुस्कुराई। उसने महसूस किया कि उसने सिर्फ एक बुटीक नहीं, बल्कि अपना आत्मसम्मान वापस पाया है। उसने समाज के बनाए उस सांचे को तोड़ दिया था जिसमें एक अकेली औरत को हमेशा बेचारी समझा जाता है। आज वह न विधवा थी, न बोझ - वह सिर्फ श्रेया थी, एक सफल उद्यमी, जो अपनी शर्तों पर जी रही थी।
छत पर खड़ी होकर उसने आसमान की तरफ देखा। एक तारे की चमक उसे आलोक की याद दिला रही थी। "देख रहे हो न आलोक? तुम्हारा सपना अब मेरा हकीकत है।" ठंडी हवा ने उसके चेहरे को छू लिया, जैसे आलोक ने हौसला बढ़ाया हो। अब उसे किसी सहारे की ज़रूरत नहीं थी, उसके अपने पंख मजबूत थे।
लेखिका : विभा गुप्ता
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