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अपनापन

 मौसीजी अचानक ही दोपहर को आ पहुँचीं। दूर का रिश्ता था, पर अपनापन ऐसा कि दरवाज़ा खोलते ही भीतर आकर बोलीं, “अरे वाह! कितनी ठंडी हवा है घर में… लगता है बहू ने घर को मंदिर बना रखा है।” उनके साथ उनकी आवाज़ भी भीतर चली आई—ठक-ठक, ठस-ठस, और बीच-बीच में हँसी की गुंजाइश छोड़ती हुई।

मैंने पानी दिया, फल रखे, और जैसे ही रसोई में नाश्ता बनाने लगी, वे भी मेरे पीछे-पीछे आकर किचन के दरवाज़े पर टिक गईं। किचन मेरा छोटा-सा संसार था—कटोरी, चम्मच, मसाले, और उन बीच-बीच में उगते मेरे छोटे-छोटे प्रयोग।

“क्या बना रही है?” उन्होंने गर्दन तिरछी कर झाँका।

“मूँग दाल के चीले,” मैंने कहा, “आज हल्का ही कर लेते हैं।”

“चीला… अच्छा! पर इसमें ये क्या मिला रही है?” उन्होंने मेरे हाथ में पकड़ी छोटी डिब्बी देखकर पूछा।

“थोड़ा-सा मेथी का दाना पीसकर,” मैंने मुस्कुराकर कहा, “और ऊपर से तिल। कुरकुरापन बढ़ जाता है।”

मौसीजी की भौंहें ऊपर उठीं। “तिल? चीले में? स्वाद बिगड़ जाएगा।”

“नहीं मौसीजी, आप खाकर देखिएगा। चटनी भी अलग बनाई है।”

वे ऐसे देख रही थीं, जैसे मैंने किसी पुरानी परंपरा को ग़लत तरीके से पकड़ लिया हो। पर जब चीले तैयार हुए—सुनहरी किनारों वाले—और मैंने उन्हें प्लेट में रखकर हरी चटनी के साथ परोसा, तो उनका चेहरा पहले तो “किस्मत आज़मा लेती हूँ” जैसा बना, फिर “अरे!” जैसा, और आखिर में “हूँ…!” जैसा—जो मौसीजी के यहाँ तारीफ का सबसे बड़ा सर्टिफिकेट था।

“सच बता,” उन्होंने दूसरा चीला उठाते हुए कहा, “ये तिल वाला आइडिया किसका है?”

मैंने हँसकर कहा, “यूनिवर्सिटी के कैंटीन में मिलता था। वहीं से सीखा।”

“हँ! आजकल तो सब कुछ बाहर से सीख लेते हैं,” उन्होंने ऐसे कहा जैसे बाहर की दुनिया कोई स्कूल नहीं, सज़ा हो।

पर चीले वाकई हिट थे। मौसीजी ने तीसरा चीला भी उठा लिया और फिर बोलीं, “मेरे छोटे वाले, अंशू, को ये बहुत पसंद आएगा। उसके लिए थोड़ा पैक कर दे।”

मैंने पैक भी कर दिए। जाते-जाते उन्होंने एक और बात जोड़ दी, “देख, ये तिल वाली बात मुझे फिर समझा देना। भूल जाती हूँ।”

मैंने मन में कहा—“आप भूलती नहीं, मौसीजी… आप बस याद रखने की ज़िम्मेदारी दूसरों पर डाल देती हैं।” मगर चेहरा वैसा ही शिष्ट रखा, “जी, मौसीजी।”

उनके जाने के बाद, रसोई में एक अजीब-सी हल्की ख़ामोशी फैल गई। वही बर्तन, वही गैस, पर जैसे हवा में एक बात तैर गई हो—‘आज तुम्हारा छोटा-सा विचार किसी के थैले में चला गया।’

कुछ दिन बीत गए। फिर किसी शादी के फंक्शन में सब रिश्तेदार जमा थे। बड़े हॉल में कुर्सियाँ, बीच में चाय की ट्रे, और चारों तरफ वही स्थायी संगीत—लोगों की बातचीत। मैं सबसे नमस्ते करते हुए आगे बढ़ी ही थी कि दूर से मौसीजी की आवाज़ कान में पड़ी।

“भई, मैं तो कहती हूँ घर का खाना, घर का नुस्खा! देखो—मेरे पास तो सीक्रेट्स की पूरी किताब है।”

मैं ठिठक गई। “सीक्रेट्स की किताब?” मन में हँसी आई, पर मैं पास चली गई।

वे दो-तीन महिलाओं के बीच बैठी थीं, हाथ में बिस्किट, और आँखों में वो चमक जो किसी शिक्षक के चेहरे पर तब आती है जब उसे पता हो कि अब क्लास में ‘टॉपिक’ उसका है।

“अच्छा देखो,” वे बोल रही थीं, “मूँग दाल के चीले में अगर तुम तिल डाल दो न, ऊपर से—बस थोड़ा-सा—तो कुरकुरापन ऐसा आता है कि बच्चे उँगलियाँ चाटते रह जाएँ।”

एक महिला ने चौंककर पूछा, “सच? चीले में तिल?”

“अरे हाँ!” मौसीजी ने ठुड्डी ऊँची की, “और मेथी के दाने का पाउडर—बस चुटकी भर। ये मेरा किचन सीक्रेट है। अपन तो सबको सिखाते चलते हैं। कौन जाने, किसके कहाँ काम आ जाए।”

फिर उन्होंने ऐसे मेरी तरफ देखा, जैसे मुझे दान दे रही हों। उनके चेहरे पर न शिकन, न संकोच—पूरा विश्वास कि वह जो कह रही हैं, वही सच है और वही उनका है।

मेरे भीतर कुछ हँसना चाहता था, कुछ कहना चाहता था, और कुछ बस चुप रहकर मज़ा लेना चाहता था। मैं मुस्कुराई—वैसी मुस्कान, जिसमें “वाह!” कम और “वाह भई!” ज़्यादा छुपा होता है।

उसी समय बगल में बैठी एक रिश्तेदार—बहुत ही ‘सुधारक’ किस्म की—मुझे देखकर बोलीं, “अच्छा बेटा, मौसीजी से ध्यान से सीखो। तुम्हारी पीढ़ी तो फोन चलाकर हलवे का उपमा और बिरयानी का पुलाव बना देती है। घर की बातें घर से ही सीखनी चाहिए।”

मैंने सिर हिला दिया। हाँ, जैसे सीख की देवी सामने बैठी हों। भीतर से मन में यूनिवर्सिटी कैंटीन के वही चीले घूम गए—जहाँ से मेरा नुस्खा उठा था, और अब मौसीजी के ‘ज्ञान-भंडार’ में जुड़कर अमर हो चुका था।

घर लौटते समय मैं सोचती रही—शायद दुनिया में ‘लाइफ हैक्स’ ऐसे ही रीसाइकल होते होंगे। एक जगह से उठते हैं, दूसरी जगह चमक-पॉलिश होकर पहुँचते हैं, और फिर कोई तीसरा उन्हें “मेरा सीक्रेट” बनाकर आगे बढ़ा देता है। हिसाब कौन रखे कि कौनसा मोती किस समुद्र से आया?

फिर मन थोड़ा नरम पड़ा। सोचने लगी—मौसीजी दिन भर कितनी महिलाओं से बतियाती रहती हैं, किसने क्या कहा, कहाँ से सुन लिया, किसके घर क्या खाया… सबका हिसाब रखना सच में कठिन होगा। शायद उन्हें सच में याद ही न रहा हो कि तिल वाली बात किससे सुनी थी। या याद रहा हो—पर याद रखने से कौनसा पुरस्कार मिलता है?

मैंने बात वहीं छोड़ दी। पर एक छोटा-सा निश्चय मन में उग आया—अगली बार जब मौसीजी आएँगी, तो मैं नाश्ता नहीं बनाऊँगी।

अगली बार का मौका जल्दी ही आ गया। रविवार की सुबह थी। दरवाज़े की घंटी बजी। मैंने झाँका—वही परिचित शॉल, वही चमकती नाक की नथ, वही “मैं तो बस ऐसे ही आ गई” वाला चेहरा।

“अरे! घर में हो?” मौसीजी भीतर आते ही बोलीं।

“जी, मौसीजी,” मैंने मुस्कुराकर कहा, “आइए बैठिए।”

उन्होंने सोफे पर बैठते ही पूछा, “कुछ बना रही है? चाय तो दे।”

“चाय तो अभी देती हूँ,” मैंने कहा, और फिर ऐसे मासूमियत से जोड़ा, “और मौसीजी, आज नाश्ता आप ही बना दीजिए न।”

वे चौंकीं। “मैं? क्यों?”

मैंने बहुत प्यार से कहा, “अरे, आपने तो इतने सारे सीक्रेट्स इकट्ठा कर रखे हैं। मैं तो आपके ‘तिल वाले’ चीले की दीवानी हूँ। वही बना दीजिए। आज आपकी रेसिपी, आपके हाथ—और हम सब आराम से खाएँ।”

मौसीजी ने मुझे देखा, जैसे मैं मज़ाक कर रही हूँ। फिर उन्होंने गला खँखारा। “अरे, मुझे तो… मैं तो बस… मैं तो बताती रहती हूँ, पर…”

“पर?” मैंने आँखें बड़ी करके पूछा।

“पर आज… आज मेरे हाथ में दर्द है,” उन्होंने तुरंत कारण खोज लिया। “और फिर मैं मेहमान हूँ। मेहमानों से कौन बनवाता है?”

मैंने भीतर ही भीतर हँसी दबाई। “अरे मौसीजी, आप तो घर की हैं। आप मेहमान नहीं। और हाथ में दर्द है तो मैं काट दूँगी, आप बस तवा संभाल लेना। वैसे भी बच्चों को आपके हाथ का खाना बहुत पसंद है।”

मेरे पति, जो अब तक चुपचाप अख़बार पढ़ रहे थे, अचानक बोले, “हाँ मौसीजी, आप बना दीजिए न। आप तो ‘किचन गुरु’ हैं। आज हमें भी स्वाद चखाइए।”

मौसीजी का चेहरा पहले चमका—“किचन गुरु”—सुनकर। फिर धीरे से फीका पड़ा, क्योंकि गुरु को अब प्रदर्शन करना था। उन्होंने मजबूरी में उठते हुए कहा, “ठीक है… पर तुम लोग भी क्या… मुझे काम पर लगा देते हो।”

रसोई में वे खड़ी हुईं, और मैं चाय बनाते-बनाते बड़े प्यार से पूछती रही, “मौसीजी, वही तिल… और मेथी का पाउडर… कितना डालना है?”

उन्होंने झेंपते हुए कहा, “अरे, थोड़ा सा… मतलब… अंदाज़ से।”

“अंदाज़ से तो मैं भी डाल देती,” मैंने शरारत छुपाते हुए कहा, “पर आप तो सीक्रेट वाली हो।”

अब मौसीजी की सांस हल्की तेज़ चलने लगी थी। उन्होंने मूँग दाल का घोल बनाया, पर घोल कभी ज्यादा पतला हो रहा था, कभी ज्यादा गाढ़ा। तवा गर्म था, लेकिन चीला उलटते वक्त उनका हाथ काँप गया और एक चीला बीच से टूट गया।

“ये तवा ठीक नहीं है,” उन्होंने तुरंत तवे पर दोष डाल दिया।

मैंने तवे को देखा—वही तवा, जिस पर कल पराठे बने थे। “हाँ मौसीजी, तवा तो बहुत बदमाश है,” मैंने गंभीरता से कहा, और फिर धीरे से जोड़ा, “पर आपका अंदाज़ उसे भी काबू कर लेगा।”

आखिर जैसे-तैसे चीले बन गए। कुछ अच्छे, कुछ टूटे, कुछ किनारों से जल गए—पर हर चीला मौसीजी के चेहरे पर अलग-अलग भाव छोड़ रहा था। जब हम सब खाने बैठे, मैंने पहला निवाला लिया और बड़े प्यार से कहा, “वाह मौसीजी! ये तो वही स्वाद है… जो आपने फंक्शन में बताया था।”

मेरे पति ने भी हँसकर कहा, “अब समझ आया, मौसीजी का ज्ञान असल में काम भी करता है।”

मौसीजी थोड़ी राहत में मुस्कुराईं, पर उनकी मुस्कान में अब पहले वाली ‘मैं सब जानती हूँ’ वाली अकड़ नहीं थी। शायद पहली बार उन्हें एहसास हुआ कि नुस्खे बोलना और नुस्खे निभाना दो अलग बातें हैं। और यह भी कि हर ‘सीक्रेट’ का असली स्वाद उस हाथ में होता है जिसने सच में मेहनत की हो—चाहे उसने सीखा कहीं से भी हो।

खाने के बाद चाय पीते हुए मौसीजी अचानक बोल पड़ीं, “वैसे… ये तिल वाला आइडिया… तुमने कहाँ से सीखा था?”

मैंने बहुत सहजता से कहा, “यूनिवर्सिटी कैंटीन से… और फिर घर में ट्राय किया। बस अच्छा लग गया।”

मौसीजी ने धीरे से सिर हिलाया। “अच्छा… हाँ… आजकल बाहर भी अच्छे आइडिया मिल जाते हैं।”

उनकी आवाज़ में पहली बार एक छोटा सा स्वीकार था—कि सीखना कहीं से भी गलत नहीं, पर श्रेय छीनना भी बहुत बड़ी बात नहीं—बस एक आदत है, जो लोगों को ‘बड़ा’ दिखाती है।

मैंने भी बात को हवा में जाने दिया। क्योंकि सच तो यही था—रिश्तों में हर बात की लड़ाई नहीं लड़ी जाती। कुछ बातें हँसकर सिखाई जाती हैं। जैसे आज मैंने मौसीजी को सिखाया—कि ज्ञानगुटका बाँटने से पहले, थोड़ा-सा पकाकर भी दिखा देना चाहिए।

शाम को जाते वक्त मौसीजी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा, “तुम्हारे हाथ में स्वाद है।”

मैंने मुस्कुराकर कहा, “और आपके पास अनुभव।”

वे हँसीं। “चल, अगले महीने फिर आऊँगी… और हाँ… वो तिल वाला चीला… मैं अब सच में सीख गई।”

दरवाज़ा बंद हुआ, तो मैं हँस पड़ी। मन में एक मीठी-सी शांति थी। दुनिया में आइडिया रीसाइकल होते रहेंगे, लोग उन्हें अपना कहकर बेचते रहेंगे—पर कभी-कभी, एक हल्की-सी चालाकी और थोड़ी-सी मुस्कान से हम रिश्तों में सम्मान भी बचा लेते हैं और अपना आत्मसम्मान भी।

और अब अगली बार जब मौसीजी किसी फंक्शन में “मेरा सीक्रेट” कहकर तिल वाले चीले की कहानी सुनाएँगी, तो शायद उनके मन में एक छोटा सा दृश्य जरूर उभरेगा—रसोई का तवा, टूटता चीला, और मेरी वह मुस्कान… जो बिना कुछ कहे भी बहुत कुछ कह गई थी।

लेखिका : रमा मिश्रा


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