सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

गोल्ड चेन

 सुबह से ही घर में एक अजीब-सी खामोशी थी। बाहर धूप निकली हुई थी, पर अंदर माहौल में जैसे बादल घिर आए हों। दिव्या बिस्तर पर बैठी बार-बार मोबाइल देख रही थी—किसी का फोन नहीं, कोई मैसेज नहीं। उसकी आँखें लाल थीं, पर वह रोना भी नहीं चाहती थी। उसे लग रहा था जैसे रोने से भी उसकी “मांग” छोटी नहीं होगी, और मांग पूरी न होने पर उसकी “झुंझलाहट” कम नहीं होगी।

दरअसल आज उसका जन्मदिन था। दिव्या ने कल ही पड़ोसन की पार्टी में देखा था—किस तरह उसकी सहेली को पति ने सोने का ब्रेसलेट गिफ्ट किया, और सबके सामने तारीफ हुई। वही तारीफ दिव्या के कानों में चुभ गई थी। उसे लगा, “मैं ही क्यों पीछे रह जाऊँ? मैं भी तो घर संभालती हूँ। मैं भी तो हक़ रखती हूँ।”

उसने रात को ही पति समीर से कह दिया था, “देखना, इस बार मुझे गोल्ड चैन चाहिए। बड़ी नहीं तो छोटी सही, पर होनी चाहिए।”

समीर ने बस इतना कहा था, “दिव्या, इस महीने स्कूल की फीस, किराया और मां की दवाइयों ने बजट बिगाड़ दिया है। अगले महीने देखेंगे।”

“अगले महीने… अगले महीने…” दिव्या ने ताना मारा था। “तुम्हारे लिए सब ‘अगले महीने’ होता है। मेरे लिए कभी ‘आज’ नहीं होता।”

समीर ने कुछ कहा नहीं। चुपचाप करवट बदलकर सो गया, मगर दिव्या की नींद उड़ चुकी थी। उसे लगा—समीर को उसकी खुशियों की कीमत ही नहीं।

सुबह होते ही दिव्या ने खाना बनाते समय भी बार-बार यही सोचा। सास आशा देवी ने चुपचाप पूजा की, और बहू के चेहरे की सख्ती देखकर भी कुछ नहीं बोलीं। उन्हें पता था—कभी-कभी बहू का गुस्सा असल में अपनी ही उम्मीदों से टूटने का दर्द होता है।

दोपहर तक समीर ऑफिस चला गया। दिव्या ने मन में तय कर लिया—आज वह चुप नहीं बैठेगी। आज वह सबको दिखाएगी कि “उसकी भी जरूरतें हैं।”

शाम ढलने लगी तो घर में बच्चे लौट आए। पंद्रह साल की तन्वी और सात साल का अवी। दोनों स्कूल से आते ही माँ के पास आए।

“मम्मा, हैप्पी बर्थडे!” अवी ने उछलकर कहा।

तन्वी ने चुपचाप माँ के हाथ में एक छोटा-सा कार्ड रखा। कार्ड पर लिखा था—“मम्मा, आप हमारी सबसे प्यारी हो।”

दिव्या के दिल में एक पल को नमी उतरी, पर तुरंत उसकी जिद फिर से सिर उठाने लगी—“कार्ड से क्या होता है? मुझे तो सम्मान चाहिए… और सम्मान के लिए समाज के सामने कुछ दिखाना भी तो पड़ता है।”

इतने में दरवाजे पर घंटी बजी। दिव्या का मन उछल पड़ा—“शायद समीर ने सरप्राइज दिया हो।”

दरवाजा खोला तो सामने पड़ोस की शालिनी खड़ी थी, हाथ में मिठाई का डिब्बा। “जन्मदिन मुबारक, दिव्या!”

दिव्या की उम्मीद टूट गई। उसने जबरदस्ती मुस्कान चिपकाई, मिठाई रखी और शालिनी को बैठा दिया। शालिनी ने बातों-बातों में फिर उसी सहेली के ब्रेसलेट की चर्चा छेड़ दी। दिव्या का चेहरा तमतमा गया।

रात हुई तो समीर घर लौटा। उसके हाथ में बस सब्ज़ी का थैला था और एक छोटा-सा केक।

“दिव्या… हैप्पी बर्थडे,” समीर ने थके स्वर में कहा, “ज्यादा बड़ा केक नहीं ले पाया, पर… तुम्हारे लिए लाया हूँ।”

दिव्या को जैसे किसी ने चुभती सुई लगा दी। उसने केक की तरफ देखा भी नहीं। “बस? यही? तुम्हें पता है शालिनी की सहेली को क्या मिला?”

समीर ने धीरे से कहा, “मुझे पता है। पर अभी… मेरे बस का नहीं।”

दिव्या का गुस्सा फूट पड़ा। “तुम्हारे बस का क्या है? तुम्हारे बस का सिर्फ तुम्हारी मां है, बच्चे हैं, बिल हैं… मैं क्या हूँ? घर की नौकरानी?”

आशा देवी किचन में थीं। उन्होंने सुन लिया। वह बाहर आईं, पर दिव्या की आवाज़ इतनी ऊँची थी कि माँ भी सहम गईं।

तन्वी ने अपने छोटे भाई को कमरे में भेज दिया, और खुद बाहर आकर बोली, “मम्मा… प्लीज, शांति…”

“तू मुझे मत सिखा!” दिव्या झुंझला गई। “छोटी हो अभी।”

तन्वी की आँखें भर आईं, पर उसने खुद को रोने नहीं दिया। वह अंदर गई और थोड़ी देर बाद अपने हाथ में दो गुल्लक लेकर आई—एक उसकी, एक अवी की। दोनों गुल्लक वह सीधे माँ के सामने रखकर बोली—

“मम्मी, आपको गहने चाहिए ना? ये लो—दो गुल्लक। इन्हें फोड़ लो। जो पैसा निकले, उससे गहना खरीद लेना। मुझे पता है कम होगा… पर वादा करती हूँ, जब मैं कमाने लगूँगी ना, तो आपको गहने दिलवाऊँगी। लेकिन भगवान के लिए, घर में शांति रहने दो। आप हर वक्त पापा के पीछे मत पड़ी रहो।”

दिव्या जैसे पत्थर की हो गई। आज पहली बार उसकी बेटी ने ऊँची आवाज़ में उसे आईना दिखाया था—और वह आईना उसे बहुत बदसूरत लग रहा था।

दिव्या ने गुस्से में कहा, “अच्छा! तो अब तुम्हें मेरे खिलाफ सिखाया जा रहा है? एक औरत अपने पति से जरूरत के लिए नहीं बोलेगी तो किससे बोलेगी? तुम पंद्रह साल की हो गई हो, तुम्हें तमीज नहीं?”

तन्वी का चेहरा लाल हो गया। उसकी आवाज़ काँप रही थी, पर शब्द साफ थे—“तमीज की बात आप मत कीजिए मम्मी। हम रात भर आपकी वजह से परेशान रहे… पर आपको दिखा बस इतना कि गहना नहीं मिला। आपकी सहेलियां क्या करती हैं, उससे हमें मतलब नहीं। आप क्या करती हैं, उससे हमें फर्क पड़ता है। आज पापा कितनी टेंशन में निकले थे… रास्ते में उनका एक्सीडेंट हो गया… और आपको अभी भी गहनों की पड़ी है!”

दिव्या सन्न रह गई। “एक्सीडेंट? कैसे…? मुझे बताया क्यों नहीं?”

तन्वी की आँखों में गुस्सा भी था और दर्द भी। “दादी आपको बार-बार फोन लगा रही थी… आपने एक बार भी फोन उठाकर पूछना ठीक नहीं समझा कि क्यों कॉल कर रही हैं। आपको उठाना भी क्यों था… आपको तो गहने चाहिए। पति से आपको क्या लेना-देना!”

दिव्या के होंठ सूख गए। उसकी सांस तेज हो गई। उसे याद आया—सच में, दोपहर से बहुत मिस्ड कॉल थे… उसने सोचा था, “दादी फिर कोई बात बढ़ा रही होंगी।” और उसने फोन काट दिए थे।

इसी बीच दरवाजा खुला। पड़ोस की शालिनी, और उसके साथ आशा देवी, समीर को सहारा देकर ला रहे थे। समीर के हाथ पर पट्टी थी, माथे पर खरोंच। उसकी चाल धीमी थी, आँखें थकी हुई थीं।

दिव्या दौड़कर उसके पास गई। “आप ठीक तो हैं? ज्यादा चोट तो नहीं आई?”

समीर ने उसकी तरफ देखा तक नहीं। बस माँ से कहा, “अम्मा… मैं आराम करना चाहता हूँ।”

कहकर वह अंदर अपने कमरे में चला गया। शालिनी भी चुपचाप वापस निकल गई। घर में अब सिर्फ सन्नाटा था—लेकिन यह सन्नाटा पहले से अलग था, इसमें शर्म और पछतावा घुला था।

आशा देवी ने दिव्या की ओर देखा। उनकी आँखों में गुस्सा नहीं था, बस दर्द था। वह धीमे-धीमे बोलीं—

“बहू… तुझे पति नहीं, गहने चाहिए ना? ये मकान बेचकर तुझे गहने दिलवा दूंगी। हम किराए पर रह लेंगे, पर मेरे बेटे को चैन से रहने दे। आज वो रोकर घर से गया था… सिर्फ तेरी जिद के कारण। एक बार उसके बिना अपनी जिंदगी सोचकर देख। क्या अकेली ये घर संभाल पाएगी? ऐसा तोहफा किस काम का, जो किसी की जान पर ही बन जाए?”

दिव्या के शरीर में जैसे बिजली दौड़ गई। उसके सामने समीर का थका चेहरा घूम गया, और उसकी बेटी के गुल्लक—जिनमें बच्चों की छोटी-छोटी खुशियाँ बंद थीं।

दिव्या कुछ बोल नहीं पाई। वह अपने कमरे में गई। समीर बिस्तर पर लेटा था, आँखें बंद। दिव्या धीरे से उसके पास बैठ गई। उसके गले से आवाज़ नहीं निकल रही थी। फिर भी उसने कांपते हाथों से समीर की पट्टी को छुआ और फूट-फूटकर रो पड़ी।

“मुझे कोई गहने नहीं चाहिए…,” उसने हकलाते हुए कहा, “तुम हो, तो सब कुछ है। मुझे माफ कर दो… मैं समझ नहीं पाई।”

समीर ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं। उसने दिव्या के चेहरे पर आँसू देखे तो उसकी सख्ती टूट गई। उसने हल्की-सी मुस्कान के साथ कहा—

“दिव्या… तुमने समझा, वही बहुत है। हम मिडिल क्लास लोगों की एक सीमा होती है। हम जितनी कोशिश कर लें, कभी-कभी उससे आगे नहीं बढ़ पाते। लेकिन… अगर घर में प्यार हो, तो कमी भी सहन हो जाती है।”

दिव्या ने सिर झुका दिया। “मैंने तुम्हें बहुत दुख दिया… बच्चों को भी। आज तन्वी ने जो कहा… वो मेरे लिए तमाचा था।”

समीर ने धीमे से कहा, “कभी-कभी बच्चे हमें बड़ा कर देते हैं।”

दिव्या बाहर आई तो तन्वी और अवी दरवाजे के पास सहमे खड़े थे। दिव्या ने पहली बार अपने बच्चों को इस तरह डरा हुआ देखा। उसने तन्वी को पास बुलाया, उसके दोनों हाथ अपने हाथों में लिए और बोली—

“बेटा… आज तुमने जो कहा, वो कड़वा था… पर सच था। मैं गलत थी। मुझे माफ कर दो।”

तन्वी की आँखों से आँसू बह निकले। “मम्मी… हमें गहने नहीं चाहिए… बस आप हंसती रहो… पापा से लड़ो मत।”

दिव्या ने अवी को गोद में उठा लिया। उसने महसूस किया कि असली सोना तो यह पल है—जिसमें घर बच रहा है।

अगले दिन सुबह दिव्या जल्दी उठी। उसने समीर के लिए हल्का नाश्ता बनाया, माँजी की दवाइयाँ समय पर दीं, और बच्चों के टिफिन में उनके पसंद के पराठे रखे। जाते समय उसने तन्वी के गुल्लक वापस पकड़ा दिए और कहा, “इन्हें कभी मत तोड़ना। ये तुम्हारी मेहनत की इज्जत हैं।”

फिर उसने अपने कमरे में रखी पुरानी पायल निकाली—जो उसकी शादी का तोहफा थी। वह चुपचाप आशा देवी के पास गई और बोली, “मांजी… अगर कभी जरूरत पड़े… तो आप इसे रख लेना। मैं अब समझ गई हूँ—घर की शांति सबसे बड़ा गहना है।”

आशा देवी की आँखें भर आईं। उन्होंने दिव्या के सिर पर हाथ रखा, “बस बहू… अब यही समझदारी तुम्हें हमेशा खुश रखेगी।”

उस दिन घर में केक नहीं कटा, पर घर में पहली बार सच का जश्न जरूर हुआ—जहाँ मांग नहीं, समझ ने जीत हासिल की।

और दिव्या ने मन ही मन तय कर लिया—अब वह समाज के सामने चमकने के लिए गहनों की नहीं, अपने रिश्तों की चमक की रक्षा करेगी। क्योंकि असली गहना वही होता है, जो दिल को भारी नहीं, हल्का करे।

लेखिका : गरिमा चौधरी


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

विरासत का सौदा और एक बेटे का फर्ज

  "बहु अभी तक वापस नहीं आई? सुबह के दस बज रहे हैं और घर में नाश्ते का कोई अता-पता नहीं है। उसे मायके गए हुए दो दिन हो गए, क्या उसे याद नहीं कि उसका एक ससुराल भी है?" दीनानाथ जी ने अखबार को सोफे पर पटकते हुए अपनी पत्नी सरोज से कहा। उनकी आवाज में जो तल्खी थी, वह भूख से ज्यादा अहम की थी। सरोज जी ने रसोई से झांकते हुए दबी जुबान में कहा, "अजी सुनिए, वो कल रात ही आने वाली थी, लेकिन उसकी माँ की तबीयत अचानक ज्यादा खराब हो गई। इसलिए रुक गई। अभी सुमित गया है उसे लेने।" "तबीयत! अरे, यह अमीरों की बीमारियां कभी खत्म नहीं होतीं। जब देखो बीपी, शुगर, घबराहट... यह सब बहाने हैं। असली बात यह है कि उस लड़की का मन इस घर में लगता ही नहीं। उसे अपने बाप के उस आलीशान बंगले की आदत जो पड़ी है," दीनानाथ जी बड़बड़ाए। तभी दरवाजे पर गाड़ी रुकने की आवाज आई। सुमित और उसकी पत्नी, मेधा, घर में दाखिल हुए। मेधा की आँखें सूजी हुई थीं, जैसे वह बहुत रोई हो। सुमित का चेहरा भी गंभीर था। दीनानाथ जी ने मेधा को देखते ही ताना मारा, "आ गई महारानी? चलो शुक्र है, दो दिन बाद ही सही, ससुराल की याद तो ...

गृह प्रवेश

  “मैं मम्मी को नहीं बताऊंगी… मैं खुद ही सामना करूंगी।” यह सोचकर स्नेहा ने अपने आंसू पोंछे। चेहरे पर मजबूती का नकाब चढ़ाया और मां के घर की तरफ निकल गई। पिता के बरसी-पूजन का काम था। रिश्तेदार आए हुए थे, घर में भीड़ थी, और हर चेहरे पर सहानुभूति—लेकिन स्नेहा के भीतर एक और ही उथल-पुथल चल रही थी। पूजा में बैठी वह मंत्र तो सुन रही थी, पर कान बार-बार पिछले दो दिनों की उन बातों पर अटक जाते—जिन्होंने उसे अंदर से तोड़ दिया था। उसकी सास विमला और पति अभिषेक … दोनों ने इतनी सहजता से उसे “अलग” कर दिया था, मानो वह घर की सदस्य नहीं, किसी काम की सुविधा भर हो। दो दिन पहले जब वह मायके जाने लगी थी, तब विमला जी ने ताना कस दिया था— “हर छोटी बात पर मायके भागना तुम्हारी आदत बन गई है, स्नेहा। शादी के बाद भी मां-बाप की छाया नहीं छोड़ पाई?” और अभिषेक… जिसने हमेशा कहा था “मैं तुम्हारे साथ हूं”—वह भी उस दिन बस इतना बोलकर रह गया था— “मां सही कह रही हैं, स्नेहा… तुम हर चीज़ को दिल पर ले लेती हो।” स्नेहा ने बहस नहीं की थी। बस चुपचाप निकल गई थी। क्योंकि उस वक्त बोलने पर शब्द नहीं, आँसू निकलते। और आँसू उसे कमज़ोर...

सात दिन

“पापा… आज फिर बस छूट गई।”  कृतिका ने बैग फर्श पर पटक दिया। अनिकेत घड़ी की तरफ़ देख कर झल्ला उठा, “अब क्या करूँ मैं? स्कूटर उड़ाकर स्कूल छोड़ूँ तुम्हें? तुम्हारी मम्मी को ही समझ नहीं, टाइम पर तैयार क्यों नहीं करती बच्चों को!” किचन से आती हुई भाप में भी सुमेधा की थकान साफ़ दिख रही थी। गैस पर दाल चढ़ी थी, दूसरे बर्नर पर पराठा, तीसरे पर दूध। टिफ़िन खुले पड़े थे, बोतलें आधी भरी… और बीच में खड़ी वो — एक हाथ से सब्ज़ी हिला रही, दूसरे से रसोई का टाइम पे चलने वाला छोटा अलार्म बंद कर रही थी। “अनिकेत, मैंने तो सब रात में ही सेट कर दिया था,” वो धीमे से बोली, “कृतिका खुद टाइम पर नहीं उठी, तीन बार बुलाया था मैंने…” “अरे, अब सब मेरी बेटी की गलती!” अनिकेत ने ऊँची आवाज़ में कहा, “तुम्हें तो बस बहाना चाहिए। टीचर हो गई हो न, बहुत अक्ल है तुम्हें। पर घर चलाने की अक्ल ज़रा भी नहीं।” बरामदे में बैठे हुए बाबूजी ने चश्मा उतारकर इन्हीं आवाज़ों की तरफ़ देखा। माँ — सुशीला — चौके के दरवाज़े पर आकर खड़ी हो गईं। “रोज़-रोज़ झगड़ा… पड़ोसी क्या सोचते होंगे,” सुशीला बड़बड़ाईं, “पहले के ज़माने में औरतें पाँच-पाँच ब...