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कागज का टुकड़ा

बाल्कनी के कांच के दरवाज़े से शहर की जगमगाती रोशनी साफ़ दिखाई दे रही थी। 25वीं मंजिल के इस पेंटहाउस से नीचे देखने पर गाड़ियां खिलौनों जैसी लगती थीं और लोग तो चींटियों से भी छोटे। सुमित्रा देवी अपनी व्हीलचेयर पर बैठीं, उस कांच के पार की दुनिया को निहार रही थीं।

कमरा वातानुकूलित था, बिस्तर मखमली था, और दीवार पर लगी 65 इंच की टीवी स्क्रीन पर उनकी पसंद का भजन चैनल चल रहा था। देखने वाले को लगेगा कि सुमित्रा देवी स्वर्ग में रह रही हैं। और एक हद तक यह सच भी था। उनका बेटा, अविनाश, शहर का नामी बिल्डर था। घर में नौकरों की फौज थी—खाना बनाने के लिए महाराज, सफाई के लिए मेड, और यहाँ तक कि सुमित्रा देवी को नहलाने-धुलाने के लिए एक विशेष नर्स।

तभी कमरे का दरवाज़ा खुला और अविनाश अंदर आया। हाथ में मोबाइल और कान में ब्लूटूथ।

"माँ, मैंने तुम्हारा क्रेडिट कार्ड लिमिट बढ़वा दिया है," उसने सोफे पर बैठते हुए लापरवाही से कहा। "अब तुम्हें मेडिसिन या कुछ भी ऑनलाइन मंगाना हो, तो ओटीपी की झंझट नहीं होगी। सिमरन (बहू) के फ़ोन पर मैसेज आ जाएगा, वो अप्रूव कर देगी। ठीक है?"

सुमित्रा देवी ने फीकी मुस्कान के साथ सिर हिला दिया। "ठीक है बेटा।"

अविनाश जाने के लिए मुड़ा ही था कि सुमित्रा जी ने संकोच करते हुए उसे रोका। "सुनो अविनाश..."

"हाँ माँ, बोलो? कुछ चाहिए? नया आईपैड? या कमरे में कुछ बदलाव करवाना है?"

"नहीं बेटा," सुमित्रा जी ने अपनी साड़ी के पल्लू को उंगलियों में लपेटा। "वो... परसों 'अमावस्या' है। मुझे अनाथालय में बच्चों को भोजन कराना था। और... वो अपनी पुरानी कामवाली, रजिया की बेटी की शादी है अगले हफ्ते। मैंने सोचा था उसे कुछ शगुन दे देती।"

अविनाश ने माथे पर हाथ मारा। "माँ, तुम भी न! अभी तो कहा कि क्रेडिट कार्ड है। अनाथालय वाले आजकल ऑनलाइन डोनेशन लेते हैं। मैं सिमरन को बोल दूंगा, वो वेबसाइट से पेमेंट कर देगी। और रही बात रजिया की... माँ, वो दस साल पहले हमारे पुराने घर में काम करती थी। अब उसे पैसे देने का क्या तुक है? और अगर देना ही है, तो उसका बैंक अकाउंट नंबर मांग लो, मैं ट्रांसफर करवा दूंगा।"

"बेटा, वो गरीब है, उसके पास कहाँ बैंक अकाउंट होगा। और अनाथालय में जाकर अपने हाथ से खिलाने का जो सुकून है, वो ऑनलाइन बटन दबाने में कहाँ?" सुमित्रा जी ने समझाने की कोशिश की। "मुझे बस... दस-पंद्रह हज़ार नकद चाहिए थे।"

अविनाश के चेहरे पर झुंझलाहट आ गई। "कैश? माँ, तुम्हें पता है न हम घर में कैश नहीं रखते। इनकम टैक्स की रेड का डर रहता है। और फिर तुम्हें कैश हैंडल करना आता भी है अब? पिछली बार पर्स कहीं रखकर भूल गई थीं। तुम सिमरन को बता देना, वो सब मैनेज कर लेगी। प्लीज़ माँ, मुझे कैश के लिए तंग मत किया करो। यह डिजिटल ज़माना है।"

अविनाश चला गया। सुमित्रा देवी की मुट्ठी, जो उम्मीद में बंधी थी, धीरे से खुल गई। खाली हथेली।

यही उनकी ज़िंदगी का सच था। करोड़ों के साम्राज्य की राजमाता होने के बावजूद, उनकी हैसियत एक उस बच्चे जैसी थी जिसे हर टॉफी के लिए माता-पिता की इज़ाज़त लेनी पड़ती है। उनके पास "सुविधाएं" तो थीं, पर "स्वाधीनता" नहीं थी। हर खर्च का हिसाब, हर दान का ऑडिट होता था। अगर वे किसी को सौ रुपये भी देना चाहें, तो उन्हें बहू या बेटे के सामने हाथ फैलाना पड़ता था। और अक्सर जवाब मिलता—"इसकी क्या ज़रूरत है माँ?" या "ये सब बेकार के ढकोसले हैं।"

दो दिन बाद एक पोस्टकार्ड आया। सुमित्रा जी के पुराने शहर वाले घर के पते से रीडायरेक्ट होकर। यह 'साहित्य अकादमी' का पत्र था।

सुमित्रा जी के पति, स्वर्गीय दीनानाथ जी, एक छोटे से लेखक थे। उनकी किताबें बहुत ज़्यादा नहीं बिकी थीं, लेकिन कुछ कहानियां अब भी पाठ्यक्रम में चलती थीं। पत्र में लिखा था कि उनकी एक पुरानी किताब का नया संस्करण छपा है और उसकी रॉयल्टी के रूप में 8,500 रुपये का चेक उनके नाम जारी हुआ है, जिसे वे प्रकाशक के दफ्तर से कलेक्ट कर सकती हैं या डाक से मंगवा सकती हैं।

सुमित्रा जी की आँखों में चमक आ गई। 8,500 रुपये। अविनाश की कमाई के आगे यह रकम ऊंट के मुंह में जीरे के बराबर भी नहीं थी। अविनाश तो एक डिनर पर इससे ज़्यादा उड़ा देता था। लेकिन सुमित्रा जी के लिए यह रकम कुछ और ही थी।

शाम को जब अविनाश घर आया, तो सुमित्रा जी ने उसे वह पत्र दिखाया।

"देखो बेटा, तुम्हारे बाबूजी की रॉयल्टी आई है। मुझे प्रकाशक के दफ्तर जाना है चेक लेने," सुमित्रा जी ने उत्साह से कहा।

अविनाश ने पत्र पर एक सरसरी नज़र डाली और हंस पड़ा। "माँ, कमाल करती हो! साढ़े आठ हज़ार रुपये? इसके लिए तुम शहर के उस कोने में जाओगी? मेरा ड्राइवर का पेट्रोल और गाड़ी का वियर-टीयर (घिसावट) इससे ज़्यादा लग जाएगा। छोड़ो इसे। मैं तुम्हें अभी दस हज़ार ट्रांसफर कर देता हूँ तुम्हारे कार्ड पर। खुश?"

सुमित्रा जी का चेहरा उतर गया। "बात पैसे की नहीं है अविनाश। यह तुम्हारे बाबूजी की मेहनत की कमाई है। उनकी निशानी है। मुझे जाना है।"

"माँ, प्लीज़ ज़िद मत करो," सिमरन भी बीच में आ गई। "वहाँ भीड़-भाड़ होगी, गंदा इलाका है। आपको इन्फेक्शन हो गया तो? डॉक्टर का बिल ही पचास हज़ार आ जाएगा। हम प्रकाशक को मेल कर देते हैं कि चेक डोनेट कर दे।"

सुमित्रा जी उस रात सो नहीं पाईं। उन्हें लगा जैसे उनके पति का अपमान हो रहा है। उनकी मेहनत को 'पेट्रोल के खर्च' से तौला जा रहा है।

अगली सुबह, जब अविनाश और सिमरन अपने गोल्फ क्लब के लिए निकले, सुमित्रा जी ने एक बड़ा फैसला लिया। उन्होंने अपनी पर्सनल नर्स, जो एक समझदार लड़की थी, को बुलाया।

"सुनीता, क्या तुम मेरे साथ चलोगी? मुझे एक जगह जाना है। मैं ड्राइवर को नहीं बुलाना चाहती।"

सुनीता ने मालकिन के चेहरे पर एक अलग ही दृढ़ता देखी। उसने टैक्सी बुक की।

सुमित्रा देवी, जो पिछले दो सालों से सिर्फ लग्जरी कारों में बैठी थीं, आज एक साधारण सी टैक्सी में बैठकर शहर के पुराने बाज़ार की तरफ चल पड़ीं। रास्ता ऊबड़-खाबड़ था, झटके लग रहे थे, लेकिन सुमित्रा जी के चेहरे पर दर्द नहीं, एक अजीब सी शांति थी।

प्रकाशक का दफ्तर एक पुरानी इमारत की दूसरी मंजिल पर था। सीढ़ियां चढ़ना मुश्किल था। सुनीता और ड्राइवर की मदद से, हाफंतें हुए, वे ऊपर पहुँचीं।

बूढ़े प्रकाशक ने जब सुमित्रा जी को देखा, तो हड़बड़ा कर खड़े हो गए। "अरे भाभी जी! आप? आपने फोन कर दिया होता, मैं खुद घर भिजवा देता।"

"नहीं भाई साहब," सुमित्रा जी ने कुर्सी पर बैठते हुए सांस ली। "दीनानाथ जी कहते थे कि सरस्वती के घर से लक्ष्मी आए, तो उसे लेने खुद जाना चाहिए। उसका आदर करना चाहिए।"

प्रकाशक ने सम्मान के साथ वह चेक सुमित्रा जी के हाथ में थमाया। फिर उन्होंने कैशियर को बुलाकर चेक कैश करवाने में मदद की (क्योंकि वे जानते थे कि बैंक जाने में उन्हें और दिक्कत होगी)।

साढ़े आठ हज़ार रुपये। सौ-सौ और पांच-पांच सौ के नोट।

सुमित्रा जी ने उन नोटों को अपनी मुट्ठी में भींचा। वह स्पर्श... वह कागज़ की खड़खड़ाहट... उसमें एक ऐसी ताकत थी जो अविनाश के 'ब्लैक कार्ड' में कभी नहीं थी। यह पैसा किसी का दिया हुआ 'दान' या 'एहसान' नहीं था। यह उनका अपना था। इस पर कोई ओटीपी नहीं आएगा, कोई मैसेज बहू के फोन पर नहीं बजेगा।

वापसी में सुमित्रा जी ने टैक्सी एक मिठाई की दुकान पर रुकवाई।

उन्होंने एक किलो काजू कतली खरीदी। फिर उन्होंने ड्राइवर को अनाथालय की तरफ चलने को कहा।

अनाथालय के मैनेजर उन्हें पहचानते थे (अविनाश अक्सर वहाँ बड़े चेक भिजवाता था)।

"अरे मिसेज खुराना, आपने कष्ट क्यों किया? सर का फोन आ जाता," मैनेजर ने कहा।

सुमित्रा जी ने मुस्कुराते हुए अपने पर्स से नकद पैसे निकाले। "आज सर का डोनेशन नहीं है। आज यह मेरी तरफ से है। इन पैसों से आज बच्चों को पूरी-सब्जी और खीर खिलाइयेगा।"

मैनेजर ने रसीद बनानी चाही, तो सुमित्रा जी ने रोक दिया। "रसीद की ज़रूरत नहीं है बेटा। यह टैक्स बचाने के लिए नहीं, मन बचाने के लिए है।"

उसके बाद वे रजिया की बस्ती में गईं। रजिया, जो अब बूढ़ी हो चुकी थी, अपनी पुरानी मालकिन को अपनी झोपड़ी के बाहर देखकर रो पड़ी। सुमित्रा जी ने उसके हाथ में 2000 रुपये नकद और मिठाई का डिब्बा रखा।

"बिटिया की शादी में, मेरी तरफ से छोटा सा शगुन," सुमित्रा जी ने कहा।

रजिया ने उनके पैर पकड़ लिए। "मेमसाब, आपने याद रखा, यही मेरे लिए लखटकिया है।"

जब सुमित्रा जी घर लौटीं, तो शाम हो चुकी थी। अविनाश और सिमरन हॉल में परेशान घूम रहे थे। नौकरों से पूछताछ हो रही थी।

जैसे ही सुमित्रा जी अंदर आईं, अविनाश उन पर बरस पड़ा। "माँ! आप कहाँ चली गई थीं? नर्स का फोन भी नहीं लग रहा था। हमें कितनी टेंशन हो गई थी। आपको पता है बाहर हालात कैसे हैं? और आप उस खटारा टैक्सी में गईं?"

सिमरन ने भी सुर में सुर मिलाया, "मम्मी जी, अगर आपको कुछ हो जाता तो? सोसाइटी में लोग क्या कहते कि बिल्डर अविनाश खुराना की माँ टैक्सी में धक्के खा रही हैं?"

सुमित्रा जी ने शांत भाव से अपनी व्हीलचेयर को सोफे की तरफ बढ़ाया और बैठ गईं। उनके चेहरे पर थकान तो थी, लेकिन वह मुरझायापन नहीं था जो अक्सर रहता था। आज उनका चेहरा दमक रहा था।

"मैं अपनी 'आज़ादी' लेने गई थी अविनाश," सुमित्रा जी ने स्पष्ट स्वर में कहा।

अविनाश चौंक गया। "आज़ादी? क्या मतलब?"

सुमित्रा जी ने अपने पर्स से बचे हुए कुछ सौ रुपये निकाले और मेज पर रख दिए।

"बेटा, तूने मुझे सोने के पिंजरे में रखा है। दाना-पानी बहुत अच्छा है, पर उड़ान नहीं है। तेरे क्रेडिट कार्ड और ऑनलाइन पेमेंट ने मुझे अपाहिज बना दिया था। मुझे लगता था कि मैं बस एक 'खर्चा' हूँ जिसे तू मैनेज कर रहा है।"

उन्होंने अविनाश की आँखों में देखा।

"आज जब मैंने तुम्हारे बाबूजी की कमाई के उन चंद रुपयों को अपने हाथ में पकड़ा, तो मुझे लगा कि मेरी रीढ़ की हड्डी वापस आ गई है। मैंने अपनी मर्जी से मिठाई खरीदी, अपनी मर्जी से दान किया, और किसी ने मुझसे यह नहीं पूछा कि 'इसकी क्या ज़रूरत है'। जानते हो अविनाश, बुढ़ापे में इंसान को 'आराम' से ज़्यादा 'अहमियत' की भूख होती है।"

अविनाश चुपचाप खड़ा था। उसे हमेशा लगता था कि माँ को 'सुख' दे रहा है, पर आज समझ आया कि वह सुख के नाम पर 'सन्नाटा' दे रहा था।

"आज के बाद," सुमित्रा जी ने फैसला सुनाते हुए कहा, "तुम्हारे बाबूजी की जितनी भी रॉयल्टी आएगी, या मेरे नाम पर जो पुराना बैंक खाता है, उसका कंट्रोल मेरे पास रहेगा। मुझे हर महीने नकद चाहिए। चाहे वो पांच हज़ार हो या दस हज़ार। मुझे किसी ऐप या ओटीपी का गुलाम नहीं बनना। मुझे मेरा स्वाभिमान चाहिए।"

सिमरन कुछ कहने जा रही थी, पर अविनाश ने उसे हाथ दिखाकर रोक दिया। वह धीरे से माँ के पास गया और उनके घुटनों के पास बैठ गया। उसने मेज पर रखे उन सौ रुपये के नोटों को देखा—मुड़े-तुड़े, पुराने नोट। और फिर अपनी जेब में पड़े प्लैटिनम कार्ड को सोचा।

"आई एम सॉरी माँ," अविनाश ने भारी आवाज़ में कहा। "मुझे लगा था पैसा ही पावर है। मैं भूल गया था कि असली पावर 'चॉइस' (चुनाव) में होती है। अपनी मर्जी से एक रुपया खर्च करने की खुशी, मजबूरी में मिले लाखों से बड़ी होती है।"

उस रात खाने की मेज पर माहौल बदला हुआ था। सुमित्रा जी ने बड़े चाव से खाना खाया। उन्होंने अविनाश से कहा, "अगली बार जब रॉयल्टी का चेक आएगा, तो तू मेरे साथ चलेगा। टैक्सी में नहीं, तेरी बड़ी गाड़ी में। लेकिन चेक मैं ही लूंगी।"

अविनाश मुस्कुराया। "बिलकुल माँ।"

सुमित्रा जी को उस रात बहुत अच्छी नींद आई। उनके तकिए के नीचे, पर्स में, अब भी 500 रुपये का एक नोट बचा हुआ था। वह नोट सिर्फ़ कागज का टुकड़ा नहीं था, वह उनका 'वजूद' था। उन्हें समझ आ गया था कि बेटा चाहे कितना भी बड़ा हो जाए, माँ की मुट्ठी में अगर अपने खुद के चार पैसे हों, तो वह घर में 'याचक' नहीं, 'मालकिन' बनकर जीती है।

वह 8,500 रुपये की रॉयल्टी, करोड़ों के टर्नओवर पर भारी पड़ गई थी।

लेखिका : सावित्री मल्होत्रा

 

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