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खामोशी

 चाय का कप मेज पर रखते हुए सुमेधा ने देखा कि ड्राइंग रूम का माहौल आज कुछ ज्यादा ही गंभीर था। सामने सोफे पर उसकी ननद, राधिका, और सास, विमला देवी, बैठी थीं। पति, आलोक, सिर झुकाए कुछ फाइलों को पलट रहे थे।

"भैया, सीधी सी बात है," राधिका ने अपनी आवाज में थोड़ी सख्ती लाते हुए कहा, "पिताजी के गुजरने के बाद उस पुश्तैनी जमीन पर मेरा भी उतना ही हक है जितना आपका। अब तो कानून भी यही कहता है। मुझे मेरे हिस्से के पच्चीस लाख चाहिए, क्योंकि मुझे अपने बिजनेस में इन्वेस्ट करना है।"

विमला देवी ने तुरंत अपनी बेटी के सिर पर हाथ फेरा और आलोक की तरफ देखते हुए बोलीं, "आलोक, राधिका बिल्कुल सही कह रही है। आजकल बेटा-बेटी में कोई फर्क नहीं होता। उसका हक उसे मिलना ही चाहिए। तू जमीन बेच दे और पैसे आधे-आधे बांट ले।"

आलोक ने एक गहरी सांस ली। वह कुछ बोलने ही वाला था कि सुमेधा बीच में बोल पड़ी, "मांझी, अगर राधिका दीदी को बराबरी का हक चाहिए, तो यह बहुत अच्छी बात है। आखिर बेटियां किसी से कम थोड़ी होती हैं।"

राधिका के चेहरे पर विजयी मुस्कान आ गई। "शुक्रिया भाभी, कम से कम आप तो समझीं।"

"लेकिन," सुमेधा ने अपनी बात जारी रखी, "बराबरी तो फिर हर चीज में होनी चाहिए ना? सिर्फ जायदाद में ही क्यों?"

विमला देवी की त्योरियां चढ़ गईं। "तेरा क्या मतलब है बहू?"

सुमेधा ने आलोक के हाथ से फाइल ली और मेज पर रख दी। "मांझी, पिछले महीने पिताजी के हार्ट ऑपरेशन में पंद्रह लाख का खर्चा आया था। वो पर्सनल लोन आलोक ने लिया था जिसकी ईएमआई हम अगले पांच साल तक चुकाएंगे। और इस घर का रेनोवेशन लोन, जिसमें हम सब रह रहे हैं, उसका दस लाख अभी भी बाकी है। कुल मिलाकर पच्चीस लाख का कर्ज है परिवार पर।"

सुमेधा ने राधिका की आँखों में सीधे देखते हुए कहा, "दीदी, पिताजी की जमीन पचास लाख की है। और पिताजी की बीमारी और घर का कर्ज पच्चीस लाख का है। अगर हम 'संपत्ति' में बराबर के हिस्सेदार हैं, तो 'दायित्व' यानी कर्ज में भी तो बराबर की हिस्सेदारी होनी चाहिए ना?"

कमरे में सन्नाटा छा गया। राधिका की मुस्कान गायब हो गई और वह बगलें झांकने लगी।

विमला देवी एकदम से उखड़ गईं, "बहू! तुझे शर्म नहीं आती? ननद से कर्ज के पैसे मांगेगी? घर की जिम्मेदारियां और कर्ज चुकाना तो बेटे का फर्ज होता है। राधिका तो पराये घर की है, वो कर्ज क्यों चुकाएगी?"

सुमेधा ने शांत स्वर में जवाब दिया, "मांझी, यही तो मैं समझना चाह रही हूँ। जब प्रॉपर्टी बंटने की बात आई, तो राधिका दीदी 'घर की बेटी' और 'बराबर की हकदार' बन गईं। कानून की दुहाई दी जाने लगी। लेकिन जब कर्ज चुकाने की बात आई, तो वो अचानक 'पराये घर' की हो गईं और सारा बोझ बेटे-बहू पर आ गया?"

आलोक ने सुमेधा का हाथ थाम लिया, उसे हिम्मत मिली। सुमेधा ने आगे कहा, "हम जमीन बेचने को तैयार हैं। पचास लाख मिलेंगे। उसमें से पहले पच्चीस लाख का वो कर्ज चुकाया जाएगा जो पिताजी और इस घर पर खर्च हुआ। बाकी बचे पच्चीस लाख। उसमें से साढ़े बारह लाख राधिका दीदी ले लें और साढ़े बारह हम। क्या यह न्याय नहीं है?"

"यह तो सरासर नाइंसाफी है!" राधिका चिल्लाई। "मुझे पूरे पच्चीस लाख चाहिए। भैया का फर्ज है मां और पिता की जिम्मेदारी उठाना।"

सुमेधा ने हंसते हुए कहा, "दीदी, आप 'फर्ज' और 'हक' को अपनी सुविधानुसार नहीं चुन सकतीं। अगर बेटा 'श्रवण कुमार' बनकर सारे दुख और कर्ज ढोए, तो बेटी सिर्फ 'लक्ष्मी' बनकर पैसा लेकर नहीं जा सकती। अगर आप मॉडर्न जमाने की बात करती हैं और कानून का सहारा लेती हैं, तो कानून यह भी कहता है कि वारिस को संपत्ति के साथ-साथ देनदारियां भी विरासत में मिलती हैं।"

विमला देवी ने आलोक की तरफ देखा, "तू चुप क्यों है? जोरू का गुलाम बनकर तमाशा देख रहा है?"

आलोक ने पहली बार नजरें ऊपर उठाईं, "मां, सुमेधा गलत क्या कह रही है? मेरी तनख्वाह का साठ प्रतिशत हिस्सा ईएमआई में जाता है। सुमेधा भी नौकरी करती है, तब जाकर घर चलता है। राधिका को पैसे चाहिए, मुझे दिक्कत नहीं है। लेकिन यह नहीं हो सकता कि मलाई वो खाए और छाछ हम पिएं। हिसाब होगा तो पूरा होगा।"

राधिका ने अपनी मां की तरफ देखा, लेकिन विमला देवी के पास अब कोई जवाब नहीं था। वे जिस दोहरे मापदंड को ढाल बनाकर बैठी थीं, सुमेधा के तर्क ने उसे चकनाचूर कर दिया था।

सुमेधा उठी और चाय के कप ट्रे में रखने लगी। "फैसला आप लोगों का है। या तो सुख-दुख, संपत्ति और कर्ज सब आधा-आधा बंटेगा, या फिर हम पुरानी परंपरा निभाते हैं—भाई सारा कर्ज चुकाएगा, मां-बाप की सेवा करेगा और संपत्ति भी उसी की रहेगी। आप दोनों में से जो भी मॉडल चुनना चाहें, हमें मंजूर है। बस, 'मीठा-मीठा गप और कड़वा-कड़वा थू' अब नहीं चलेगा।"

सुमेधा रसोई में चली गई, पीछे छोड़ गई एक ऐसी खामोशी जो उस घर में बहुत पहले गूंजनी चाहिए थी।

लेखिका : आँचल चौरसिया


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