यह सुनते ही शशांक की माँ, कल्याणी जी के हाथ का निवाला वहीं रुक गया। उन्होंने थोड़ी हैरानी और हल्के से एतराज के साथ कहा, "बेटा, सावन में तो बहुएं अपनी सहेलियों और मायके वालों के साथ वक्त बिताती हैं। दामाद का इतने दिन वहां जाकर रहना क्या ठीक लगेगा? दस्तूर तो यही है कि तुम सावन खत्म होने पर उसे विदा कराने जाओ। अभी से जाकर वहां डेरा डालना दुनिया वालों की नज़रों में अजीब लगेगा।"
आसमान में घुमड़ते काले घने बादलों ने जैसे पूरे शहर को अपनी आगोश में ले लिया था। खिड़की से आती ठंडी हवाओं के साथ मिट्टी की वह सोंधी-सोंधी महक बता रही थी कि सावन की पहली फुहार बस ज़मीन को चूमने ही वाली है। कमरे के भीतर पल्लवी अपना सूटकेस पैक कर रही थी। शादी के बाद यह उसका पहला सावन था और मायके जाने की खुशी उसके चेहरे पर साफ छलक रही थी। पूरे एक महीने के लिए वह अपनी सखियों के बीच वापस लौटने वाली थी, जहाँ न कोई ज़िम्मेदारी थी और न ही ससुराल की कोई बंदिश। वहाँ वही पुराना झूला था, मेहंदी की रस्में थीं और माँ के हाथों का बना खाना था। लेकिन, अपने कपड़ों की तह बनाते-बनाते अचानक पल्लवी के हाथ ठिठक गए। उसकी नज़र खिड़की के पास खड़े अपने पति, शशांक पर जाकर टिक गई। मायके जाने का उत्साह तो अपनी जगह था, लेकिन सावन के इस सुहावने और रूमानी मौसम में शशांक से पूरे एक महीने तक दूर रहने का खयाल उसके सीने में एक अजीब सी उदासी भी घोल रहा था।
शशांक ने पल्लवी की उस खामोश उदासी को पढ़ लिया। वह मुस्कुराता हुआ उसके पास आया और धीरे से बोला, "कल सुबह तुम्हारा भाई सुमित तुम्हें लेने आ रहा है ना? तुम्हारी पैकिंग तो ऐसे चल रही है जैसे तुम एक महीने के लिए नहीं, बल्कि हमेशा के लिए मायके जाकर बसने वाली हो।"
पल्लवी ने हल्की सी मुस्कान के साथ कहा, "मायके जाने की खुशी तो बहुत है शशांक, लेकिन सच कहूँ तो अभी हमारी शादी को कुछ ही महीने हुए हैं। ऐसे सुहाने मौसम में आपको यहाँ अकेले छोड़कर जाने का मेरा बिल्कुल भी मन नहीं कर रहा। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि आप भी मेरे साथ चलें?"
शशांक ने हँसते हुए पल्लवी के गाल को हल्का सा खींचा और कहा, "अरे पगली, हमारी परंपराओं में पहला सावन लड़कियां अपने मायके में ही बिताती हैं। दामाद तो सिर्फ उन्हें विदा कराने या त्योहार के आखिरी दिन लेने जाते हैं। और वैसे भी, अगर मैं तुम्हारे साथ अभी चला गया, तो माँ-पिताजी क्या सोचेंगे? लोग तो यही कहेंगे कि नया-नवेला दामाद पत्नी के पल्लू से बंध कर मायके पहुँच गया।"
पल्लवी ने मायूस होकर अपना सिर झुका लिया। वह जानती थी कि समाज के कुछ तयशुदा दस्तूर होते हैं, जिन्हें हर हाल में निभाना पड़ता है। लेकिन शशांक के मन में कुछ और ही चल रहा था। वह एक आईटी कंपनी में काम करता था और इन दिनों उसका 'वर्क फ्रॉम होम' चल रहा था। उसे काम के लिए बस अपने लैपटॉप और इंटरनेट की ज़रूरत थी, जो कहीं से भी हो सकता था। उसने मन ही मन एक फैसला कर लिया था और वह अपनी माँ से बात करने के इरादे से बाहर चला गया।
रात के खाने के समय पूरा परिवार डाइनिंग टेबल पर बैठा था। बाहर बारिश की तेज़ बूंदें अब छज्जे पर ताल दे रही थीं। शशांक ने अचानक चुप्पी तोड़ते हुए कहा, "माँ, मैं सोच रहा था कि कल जब पल्लवी मायके जाए, तो मैं भी उसके साथ ही चला जाऊं। मेरा ऑफिस का काम तो घर से ही चल रहा है, तो मुझे वहां से भी काम करने में कोई दिक्कत नहीं आएगी।"
यह सुनते ही शशांक की माँ, कल्याणी जी के हाथ का निवाला वहीं रुक गया। उन्होंने थोड़ी हैरानी और हल्के से एतराज के साथ कहा, "बेटा, सावन में तो बहुएं अपनी सहेलियों और मायके वालों के साथ वक्त बिताती हैं। दामाद का इतने दिन वहां जाकर रहना क्या ठीक लगेगा? दस्तूर तो यही है कि तुम सावन खत्म होने पर उसे विदा कराने जाओ। अभी से जाकर वहां डेरा डालना दुनिया वालों की नज़रों में अजीब लगेगा।"
पल्लवी का दिल बैठ गया। उसे लगा कि अब शशांक का जाना नामुमकिन है। लेकिन तभी शशांक के पिता, रघुनाथ जी ने अपनी चाय का प्याला नीचे रखते हुए एक गहरी और सुकून भरी हंसी हँसी।
"अरे कल्याणी! तुम भी किन पुरानी दुनियादारी की बातों को लेकर बैठ गई," रघुनाथ जी ने अपनी पत्नी को बहुत ही प्यार से समझाते हुए कहा। "ज़माना बहुत बदल गया है। बच्चे अभी नई-नई ज़िंदगी शुरू कर रहे हैं। सावन का यह रिमझिम मौसम, यह खुशियां, यह सब इनके लिए ही तो है। अगर इन पुरानी परंपराओं और दूरियों के कारण इनका मन उदास रहेगा, तो क्या वो दस्तूर किसी काम का है? जब शशांक का काम प्रभावित नहीं हो रहा है, तो उसे अपनी पत्नी के साथ खुशी-खुशी जाने दो। मुझे तो इस बात का गर्व है कि हमारा बेटा अपनी पत्नी की भावनाओं को समझता है और उसका साथ देना चाहता है।"
अपने ससुर की इन बातों को सुनकर पल्लवी की आँखों में खुशी के आंसू तैर गए। कल्याणी जी ने पल्लवी के खिले हुए चेहरे को देखा और उनके होठों पर भी एक प्यारी सी मुस्कान आ गई। "मैं तो बस दुनियादारी की बात कर रही थी। मुझे भला क्या ऐतराज़ होगा? जा बेटा शशांक, अपनी पल्लवी के साथ जा। मैंने पल्लवी की माँ के लिए सावन की कुछ खास मिठाइयां और कपड़े निकाल कर रखे हैं, वो भी कल सुबह अपने साथ लेते जाना।" पल्लवी ने दौड़कर अपनी सास के पैर छुए और उन्हें गले लगा लिया।
अगले दिन सुबह-सुबह पल्लवी का भाई सुमित अपनी बहन को लेने आ गया। घर में चाय-नाश्ते और हंसी-मज़ाक का लंबा दौर चला। जब निकलने का समय हुआ, तो शशांक ने सुमित के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, "सुमित भाई, ऐसा है कि आप अपनी गाड़ी से आराम से घर पहुंचिए। मैं और पल्लवी एक दूसरी गाड़ी से आ रहे हैं। रास्ते में एक-दो बहुत खूबसूरत जगहें हैं, हम वहां मौसम का मज़ा लेते हुए आराम से कल शाम तक पहुंचेंगे।"
सुमित मुस्कुराया और अपनी गाड़ी से निकल गया। शशांक और पल्लवी ने भी अपना सफर शुरू किया। बारिश की फुहारें गाड़ी के शीशे को चूम रही थीं और अंदर उनका पसंदीदा संगीत बज रहा था। उन्होंने रास्ते में एक खूबसूरत हिल रिसॉर्ट में रुककर एक दिन बिताया। हरे-भरे पहाड़, झरनों की आवाज़, भुट्टे का स्वाद और शशांक का प्यार भरा साथ—पल्लवी को लग रहा था जैसे वह कोई बहुत ही खूबसूरत सपना देख रही हो।
अगले दिन शाम को जब वे दोनों पल्लवी के मायके पहुंचे, तो दरवाजे पर पल्लवी के माता-पिता और छोटी बहन उनका बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। शशांक को पल्लवी के साथ देखकर उनके चेहरे की खुशी दोगुनी हो गई। पूरे घर में एक अलग ही रौनक और उत्सव छा गया। रात को जब सब आंगन में बैठे थे और हल्की-हल्की बारिश हो रही थी, तब पल्लवी ने शशांक के कंधे पर सिर रखते हुए धीरे से कहा, "मेरा यह पहला सावन हमेशा के लिए यादगार बन गया। मुझे पुरानी परंपराओं की कोई कमी नहीं खल रही, क्योंकि आपने और आपके परिवार ने आज प्यार और समझदारी की एक नई रीत शुरू कर दी है।"
बारिश की वो बूंदें जैसे उनके इस नए रिश्ते को अपना आशीर्वाद दे रही थीं, और सावन की वह रात उनके जीवन की सबसे हसीन रात बन गई।
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