“अरे समधी जी, आप ऐसे क्यों कह रहे हैं? बेटी तो आपकी ही है… और बेटा-बहू तो अपने ही होते हैं।” गिरधारी लाल ने बात संभालने की कोशिश की, पर सामने बैठे महेश्वर प्रसाद के चेहरे पर वर्षों की थकान और दबा हुआ दर्द एक साथ उतर आया था।
“अपने?” महेश्वर जी की आवाज़ में हँसी नहीं, कसक थी। “दो साल से यही समझ रहा हूँ कि मेरे घर में ‘अपने’ सिर्फ मैं और मेरी पत्नी रह गए हैं। बेटा भी जैसे… मेहमान बन गया है। आता है, दो घंटे बैठता है, बच्चों की तरह हड़बड़ी में चाय पीता है और फिर ‘लेट हो रहा है’ कहकर निकल जाता है।”
बैठक के कोने में खड़ी सुलेखा और उनकी बेटी अन्वी—दोनों की नज़रें जमीन पर टिक गईं। अन्वी के हाथ में उसका फोन था, जिसे वह बार-बार उलटती-पलटती रही, मानो स्क्रीन पर कोई जवाब लिखा मिल जाएगा।
महेश्वर जी ने धीरे से साँस ली। “मैं कोई ज़िद्दी बूढ़ा नहीं हूँ, समधी जी। मैं समझता हूँ नौकरी है, जिम्मेदारियाँ हैं। पर क्या रिश्तों की भी कोई छुट्टी होती है? मेरी पत्नी… शैलजा… त्योहार पर सबकी पसंद की मिठाई बनाती है, सोचती है—‘बेटा आएगा तो गरमा-गरम खिलाऊँगी।’ और फिर वह मिठाई अगले दिन डिब्बे में बंद हो जाती है। मैं उसे कुछ कह भी नहीं पाता। वह बस मुस्कुरा देती है—‘कोई बात नहीं, अगली बार आ जाएंगे।’ पर अगली बार… अगली बार ही नहीं आता।”
गिरधारी लाल का चेहरा उतर गया। उन्होंने एक पल पत्नी और बेटी की तरफ देखा, फिर महेश्वर जी की तरफ मुड़े। “माफ कीजिएगा, समधी जी… गलती आपकी नहीं है। गलती हमारी है। बेटी की शादी कर दी, जिम्मेदारी निभा दी—ये सोचकर हम निश्चिंत हो गए। हमने कभी ध्यान ही नहीं दिया कि… वह अपने ससुराल के साथ किस तरह चल रही है।”
अन्वी की पलकें फड़फड़ाईं। जैसे किसी ने उसके मन में चुभती सुई लगा दी हो।
गिरधारी लाल ने पहली बार आवाज़ कड़ी की। “अन्वी!”
अन्वी ने सिर उठाया। उसके चेहरे पर झुंझलाहट भी थी और अपराधबोध भी।
“तुम आज ही अपने ससुराल जाओगी।” गिरधारी लाल ने साफ कहा। “और ये मत समझना कि मैं तुम्हें डाँट रहा हूँ। मैं तुम्हें आईना दिखा रहा हूँ। जिस तरह तुम्हारे मम्मी-पापा तुम्हारे इंतज़ार में दरवाज़े की तरफ देखते हैं, उसी तरह आदित्य के माता-पिता भी तुम्हारा इंतज़ार करते हैं। तुम मायके आती हो, ठीक है। पर दोनों तरफ का संतुलन भी कोई चीज़ होती है। अगर ससुराल में तुम मेहमान बनकर जाओगी, तो याद रखना—फिर मायके में भी तुम्हारा स्वागत मेहमानों की तरह ही होगा।”
सुलेखा ने धीरे से कहा, “इतना सख्त मत बोलिए…”
गिरधारी लाल ने उसे रोक दिया। “सख्ती नहीं है, सुलेखा… यह समय रहते किया गया इलाज है। हम ही ढील देते रहे, इसलिए यह गाँठ इतनी बड़ी हो गई।”
अन्वी कुछ कहना चाहती थी—कि आदित्य भी तो काम में व्यस्त रहता है, कि शहर में ट्रैफिक बहुत है, कि उसकी सहेलियाँ कहती हैं ‘ससुराल में ज्यादा मत घुसो, वरना फँस जाओ’… पर पिता के चेहरे का निर्णय देखकर उसके होंठ सिल गए।
वह बिना बहस किए अंदर गई। कपड़ों की अलमारी खोली। दो सूट, बच्चों के कपड़े, आदित्य की शर्टें, जरूरी दवाइयाँ—सब बैग में रखने लगी। उसके बेटे विहान ने पूछा, “मम्मा… नानी के घर नहीं रुकेंगे?”
अन्वी ने कुछ सेकंड सोचा, फिर विहान के सिर पर हाथ फेरकर बस इतना कहा, “हम दादी के घर भी रहते हैं बेटा… दादी भी तो हमारी है।”
रात को जब वे रवाना हुए तो महेश्वर जी के साथ उनका कोई ज़्यादा संवाद नहीं हुआ। वह चुप थे—पर उनकी चुप्पी में शिकायत नहीं, उम्मीद थी। गिरधारी लाल ने बाहर तक छोड़ते हुए आदित्य से कहा, “बेटा, घर संभालना सिर्फ पैसों से नहीं होता… रिश्तों से होता है। तुम भी अपने मां-बाप से दूर मत रहना। और अपनी पत्नी को भी साथ लेकर चलना।”
आदित्य ने सिर झुकाकर कहा, “जी… समझ गया।”
गाड़ी चली तो अन्वी की आँखें रास्ते की रोशनी में भीगने लगीं। उसे याद आया—शैलजा जी ने उसकी शादी के बाद पहली बार जब उसे रसोई में आते देखा था, कितना प्यार से कहा था, “बहू, चाय मैं बना देती हूँ… तू बैठ जा, सफर से थकी होगी।”
और उसने उस दिन जवाब दिया था—“नहीं-नहीं मम्मी जी, मैं कर लेती हूँ।”
फिर धीरे-धीरे वही “मैं कर लेती हूँ” खत्म हो गया। और उसके साथ खत्म हो गया—वह अपनापन, जो बिना बोले मिल जाता था।
घर की डोरबेल बजी।
शैलजा जी ने दरवाजा खोला तो सामने आदित्य और अन्वी को देखकर उनकी आँखें चमक उठीं। “अरे! तुम लोग… आज?” फिर सहसा उनके चेहरे पर हल्की चिंता आई। “सब ठीक तो है न?”
आदित्य झेंप गया। अन्वी ने नज़र झुका ली।
आदित्य ने माँ को गले लगाते हुए कहा, “माँ… इस बार हम कुछ दिन यहीं रुकेंगे। आपके बिना… मन नहीं लगता था।”
शैलजा जी जैसे एक पल को भरोसा नहीं कर पाईं। फिर जल्दी से बोलीं, “सच? रुको, रुको… मैं अभी आई।”
वह भागती हुई पूजा-घर गईं। थाली में दीपक रखा, अक्षत, कुमकुम, और आरती उतारने लगीं। “मेरे बच्चे… घर आए हैं।” उनकी आवाज़ कांप रही थी, जैसे शब्दों के पीछे दो साल की प्यास छिपी हो।
अन्वी की आँखों से आँसू निकल गए। उसने जल्दी से पल्लू से पोंछे, पर शैलजा जी ने देख लिया। उन्होंने उसे अपने पास खींच लिया, सिर पर हाथ रखा। “रो मत बहू… घर आई है तो बस हँसकर रह।”
इतने में महेश्वर जी भी कमरे से बाहर आए। उन्होंने भी बेटे को देखा, बहू को देखा, पोते को देखा—और उनकी आँखों के कोर भी नम हो गए। पर उन्होंने कुछ कहा नहीं, बस गले में अटकती खुशी को खाँसी के बहाने छुपा लिया।
रात का खाना लगा। शैलजा जी ने वही दाल बनाई थी जो आदित्य को बचपन से पसंद थी। और अन्वी के लिए—बिल्कुल हल्की सब्ज़ी, क्योंकि उसे मसाले कम पसंद थे। वह स्वाद अन्वी के गले से नीचे नहीं उतर रहा था, क्योंकि हर निवाला अपराधबोध की तरह चुभ रहा था।
खाने के बाद अन्वी ने पानी रखने के बहाने रसोई में कदम रखा। शैलजा जी पीछे-पीछे आ गईं। “बहू, सब ठीक है न? अचानक… तुम लोग ऐसे…”
अन्वी के होंठ काँप गए। “मम्मी जी… मैं… मैं आपसे माफी मांगना चाहती हूँ।”
शैलजा जी ने चौंककर कहा, “माफी? किस बात की?”
अन्वी ने गहरी साँस ली। “मैंने आपको… आपको घर में सिर्फ ‘रिस्पॉन्सिबिलिटी’ समझ लिया। रिश्ते समझ नहीं पाई। मुझे लगता था—मैं मायके में रहूँ तो मुझे ‘अपनी’ पहचान मिलेगी। यहाँ आती तो डर लगता था… कि कहीं मैं फँस न जाऊँ, कहीं मेरी आज़ादी कम न हो जाए। सहेलियाँ कहती थीं—‘ससुराल में जितना कम, उतना अच्छा।’ पर आज समझ आ रहा है… ‘कम’ रहने से रिश्ते भी कम हो जाते हैं।”
शैलजा जी ने बहू के हाथ अपने हाथों में ले लिए। “बेटी… डर सबको लगता है। पर घर, घर तभी बनता है जब उसमें प्यार टिके। और प्यार का मतलब सिर्फ हँसना नहीं… एक-दूसरे की चिंता करना भी है।”
अन्वी की आँखें भर आईं। “आपने कभी मुझसे शिकायत क्यों नहीं की?”
शैलजा जी मुस्कुराईं, पर उनकी मुस्कान में थकान थी। “शिकायत करूँगी तो क्या बदलेगा? बेटा बीच में टूटेगा। बहू दूर हो जाएगी। इसलिए मैं चुप रही। और तुम्हारे पापा… बड़े समझदार हैं। उन्होंने आज जो किया, उसी की जरूरत थी।”
अन्वी चौंक गई। “आपको… पता है?”
शैलजा जी ने सिर हिलाया। “महेश जी आज सुबह तुम्हारे पापा के घर गए थे। बस… मुझे सब नहीं बताया। पर उनकी आँखें बता रही थीं कि बात भारी थी।”
उसी रात, महेश्वर जी ने आदित्य को अपने पास बुलाया। “बेटा… मैं नहीं चाहता था कि यह बात तुम्हारी मां के सामने आए। वह अंदर से बहुत जल्दी टूट जाती है।”
आदित्य ने धीरे से कहा, “पापा… गलती हमारी भी थी। मैं खुद भी ‘दो घंटे का बेटा’ बन गया था।”
महेश्वर जी ने बेटे के सिर पर हाथ रखा। “देख… तुम्हारे पास नौकरी है, दौड़ है, दुनिया है। पर एक दिन यही दुनिया धीमी हो जाएगी। तब तुम्हें घर का सहारा चाहिए होगा। और घर तुम्हें तभी मिलेगा जब तुम आज घर को समय दोगे।”
सुबह अन्वी जल्दी उठी। नाश्ता बनाने रसोई में पहुंच गई। शैलजा जी ने चौंककर कहा, “अरे बहू, तू क्यों उठी? मैं कर दूँगी।”
अन्वी ने मुस्कुराकर कहा, “आज आप बैठिए, मम्मी जी। आज मैं करूँगी… पर इसलिए नहीं कि ‘फर्ज’ है। इसलिए कि मन है।”
महेश्वर जी ने अखबार के पीछे से यह दृश्य देखा। उन्होंने धीरे से आँखें पोंछीं और मन ही मन कहा—“बस यही तो चाहिए था… अपनापन।”
दो दिन बाद अन्वी ने खुद आदित्य से कहा, “हम हर महीने एक वीकेंड आपके माता-पिता के साथ रहेंगे। और हर महीने एक वीकेंड मेरे मां-बाप के साथ। बाकी दिनों में भी… कॉल सिर्फ औपचारिक नहीं होगी। बस हालचाल नहीं… बात भी होगी।”
आदित्य ने पहली बार सच में राहत की सांस ली। “मैं भी यही चाहता था, अन्वी। पर तुम नाराज़ न हो जाओ… इसलिए कह नहीं पाता था।”
अन्वी ने उसकी तरफ देखा। “नाराज़गी तब होती है जब दिल में दूरी हो। अब दूरी नहीं रखेंगे।”
कुछ हफ्तों बाद जब अन्वी के मायके से फोन आया, सुलेखा ने पूछा, “बेटा… सब ठीक है?”
अन्वी ने हँसकर कहा, “मम्मा… अब ‘सब’ ठीक नहीं… ‘सब’ अपना लग रहा है।”
और सच यही था—रिश्ते कागज़ पर नहीं, व्यवहार में निभते हैं। मायका भी अपना है, ससुराल भी… फर्क सिर्फ इतना है कि जहाँ प्यार को समय दिया जाए, वहीं घर सच में घर बनता है।
लेखिका : माला गुप्ता
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