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सजे हुए कमरे और बेगाना एहसास

 हाथ में पेंट का ब्रश और बालों पर लगा सफेद रंग, मीरा सीढ़ी पर चढ़ी हुई अपने बेडरूम की दीवार पर आखिरी टच दे रही थी। दीवाली आने वाली थी और इस बार मीरा ने पूरे घर को अपने हाथों से सजाने का बीड़ा उठाया था। पिछले पांच सालों में उसने इस घर को सिर्फ ईंट-पत्थर का मकान नहीं, बल्कि अपनी रूह से सींचा था।


सास-ससुर, पति रवि और देवर—सबकी पसंद-नापसंद का ख्याल रखना मीरा अपना धर्म मानती थी। रवि अक्सर कहते, "मीरा, तुम क्यों इतनी मेहनत करती हो? पेंटर बुला लेते हैं ना।"

लेकिन मीरा मुस्कुरा देती, "रवि, अपना घर है। पेंटर वो अपनापन थोड़ी ला पाएगा जो मैं लाऊंगी। मुझे यह दीवार बिल्कुल वैसी चाहिए जैसी मांजी को पसंद है, हल्का क्रीम कलर।"


मीरा ने अपनी नौकरी से मिले बोनस के पूरे पचास हजार रुपये घर के नए परदे, सोफा कवर और सजावट में खर्च कर दिए थे। उसे उम्मीद थी कि जब उसकी ननद, शिखा, इस दीवाली पर अपने बच्चों के साथ आएगी, तो घर देखकर खुश हो जाएगी। शिखा की तारीफ मीरा के लिए मेडल जैसी होती थी, क्योंकि सासू माँ, विमला जी, अक्सर अपनी बेटी की ही बातें मानती थीं।


दो दिन बाद शिखा अपने पति और बच्चों के साथ आ गई। घर में रौनक हो गई। मीरा रसोई से लेकर ड्राइंग रूम तक लट्टू की तरह नाचती रही।

"भाभी, अरे वाह! घर तो एकदम नया लग रहा है। यह झूमर बहुत प्यारा है," शिखा ने ड्राइंग रूम में लगते ही कहा।

मीरा का चेहरा खिल उठा। "दीदी, यह मैंने अपनी पसंद से ऑनलाइन मंगवाया है। आपको पसंद आया, मेरी मेहनत सफल हो गई।"


तभी विमला जी वहां आईं। उन्होंने झूमर को देखा और नाक सिकोड़ी। "हाँ, ठीक ही है। वैसे पुराने वाले में क्या खराबी थी? बेकार में पैसे उड़ाने की आदत है मीरा को। शिखा, तू चल, मैंने तेरे लिए गाजर का हलवा बनाया है।"


मीरा की मुस्कान फीकी पड़ गई। वह चुपचाप रसोई में चाय बनाने चली गई। उसे आदत हो गई थी। वह कितना भी कर ले, विमला जी के लिए वह हमेशा 'बाहरी' ही रहती थी।


शाम को सब लोग हॉल में बैठे थे। शिखा ने अचानक कहा, "माँ, मेरा वाला कमरा तो स्टोर रूम बना दिया है आपने। बच्चे कहाँ सोएंगे?"

विमला जी ने तुरंत कहा, "अरे नहीं बेटा, वो तो बस सामान रखा है। अभी मीरा को बोलती हूँ, सब साफ कर देगी।"


मीरा अभी-अभी सबके लिए पकौड़े तल कर लाई थी। उसके पैरों में सूजन थी। सुबह से उसने एक पल भी आराम नहीं किया था।

"मीरा," विमला जी ने आदेश दिया, "जरा शिखा के कमरे से वो सारे गत्ते और पुराना फर्नीचर हटाकर स्टोर रूम में रखवा दे। और हाँ, नई वाली बेडशीट बिछा देना। दामाद जी को धूल से एलर्जी है, अच्छे से पोंछा लगाना।"


मीरा ने रवि की तरफ देखा। रवि मोबाइल में लगा था। मीरा ने दबी आवाज़ में कहा, "माँ जी, वो संदूक बहुत भारी है। मेरे कमर में दर्द है। कल नौकरानी आएगी तो करवा दूँगी। आज बच्चों को गेस्ट रूम में सुला देते हैं।"


विमला जी का चेहरा तमतमा गया। "गेस्ट रूम? मेरी बेटी अपने ही घर में मेहमान बनकर रहेगी? और कमर दर्द का बहाना मत बना। अभी जवान है तू। शिखा साल में एक बार आती है, इतना भी नहीं कर सकती?"


शिखा ने भी तंज कसा, "रहने दो माँ। भाभी को तकलीफ होगी। हम होटल चले जाते हैं। वैसे भी अब यह घर तो भाभी का है, हम तो पराए हो गए।"


यह सुनना था कि विमला जी ने मीरा के हाथ से पकौड़ों की प्लेट छीनकर मेज पर पटक दी। "खबरदार जो होटल की बात की। यह घर मेरा है और मेरे जीते-जी मेरी बेटी का ही रहेगा। मीरा, अभी के अभी कमरा साफ करो।"


मीरा की आँखों में आंसू आ गए। वह चुपचाप उठी और उस भारी संदूक को खिसकाने चली गई। रवि ने उसे जाते देखा, पर माँ के डर से कुछ नहीं बोला। मीरा ने अकेले पूरा कमरा सेट किया, नई चादरें बिछाईं और अपनी खरीदी हुई महंगी सुगंधित मोमबत्तियाँ वहां सजा दीं।


अगले दिन धनतेरस थी। मीरा ने अपने बोनस के बचे हुए पैसों से विमला जी के लिए एक सोने की अंगूठी खरीदी थी। उसने सोचा था कि शायद यह देखकर माँ जी खुश हो जाएंगी।


शाम को पूजा के बाद मीरा ने वह डिब्बी विमला जी के पैरों में रखी। "माँ जी, यह आपके लिए।"

विमला जी ने डिब्बी खोली, अंगूठी देखी और बेरुखी से रख दी। "हम्म, ठीक है। वैसे भी अब इस उम्र में मैं अंगूठी क्या पहनूंगी। शिखा को दे देती हूँ, उसे पसंद आएगी।"


मीरा सन्न रह गई। "पर माँ जी... यह मैंने आपके नाप की बनवाई थी। शिखा दीदी के लिए तो मैंने अलग से साड़ी ली है।"


"तो क्या हुआ?" विमला जी ने आवाज़ ऊंची की। "मेरी चीज़ है, मैं जिसे चाहूँ दूँ। और तू इतना एहसान क्यों जता रही है? क्या तूने यह घर खरीद लिया है जो हम पर हुक्म चला रही है?"


तभी शिखा अंदर से आई। उसके हाथ में वही झूमर था जो मीरा ने बड़े चाव से लगवाया था।

"माँ, यह झूमर मुझे बहुत पसंद आ रहा है। मेरे नए फ्लैट के हॉल में बहुत जंचेगा। मैं इसे ले जा रही हूँ।"


मीरा का दिल धक से रह गया। उसने वो झूमर अपनी पहली सैलरी के सेविंग्स से, हफ़्तों ढूँढकर खरीदा था।

"दीदी, प्लीज..." मीरा से रहा नहीं गया। "वो... वो मैंने इस घर के लिए लिया था। अभी तो उसे लगे हुए दो दिन भी नहीं हुए। आप दूसरा ले लीजिये ना।"


विमला जी भड़क गईं। "मीरा! तेरी जुबान बहुत चलने लगी है। एक झूमर के लिए तू मेरी बेटी को मना कर रही है? अरे, यह घर शिखा का है। वो जो चाहे ले जा सकती है। तू तो कल आई है, और कल चली जाएगी। लेकिन यह मेरी बेटी है।"


रवि, जो अब तक चुप था, बोला, "माँ, मीरा ने बहुत प्यार से लिया था..."


"तू चुप रह जोरू के गुलाम!" विमला जी चिल्लाईं। "जब से यह आई है, घर का बंटवारा कर रही है। सुन ले मीरा, इस घर की हर चीज़ पर, हर दीवार पर पहला हक़ मेरी बेटी का है। तू बस यहाँ रह रही है, इसका मतलब यह नहीं कि तू मालकिन बन गई। ज्यादा शौक है सजाने का तो अपने बाप के घर जाकर सजा।"


उस पल मीरा के अंदर कुछ टूट गया। कांच की तरह नहीं, बल्कि धागे की तरह... बिना आवाज़ के। वह चुपचाप अपने कमरे में आ गई। उसने दीवार पर किए उस क्रीम कलर के पेंट को देखा। उसने उन परदों को देखा जिन्हें उसने घंटों बाज़ार में घूमकर पसंद किया था।


उसे आज समझ आ गया कि वह इस घर को चाहे अपने खून से भी सींच ले, वह यहाँ सिर्फ एक 'किरायेदार' है। जिसकी हैसियत सिर्फ किराया (सेवा और समर्पण) चुकाने तक है। मालिकाना हक़ तो शिखा का ही रहेगा, जो साल में दो दिन आकर भी इस घर की 'बेटी' है। और मीरा, जो 365 दिन इस घर की धूल साफ करती है, वह सिर्फ एक 'बहू' है—एक काम करने वाली मशीन।


मीरा ने अपने आंसू पोंछे। उसने अलमारी से अपना सूटकेस नहीं निकाला, बल्कि अपने मन से उम्मीदों का बोझ निकाल फेंका।


अगले दिन दीवाली थी। मीरा सुबह जल्दी उठी। उसने पूजा की, नाश्ता बनाया।

शिखा ने देखा कि झूमर उतर चुका है और पैक रखा है। वह खुश हो गई।

"थैंक यू भाभी। आपने पैक भी कर दिया," शिखा ने हंसते हुए कहा।


मीरा मुस्कुराई, लेकिन वह मुस्कान उसकी आँखों तक नहीं पहुँची। "हाँ दीदी, ले जाइये। और वो अंगूठी भी ले लीजियेगा जो मैंने माँ जी को दी थी। उन्हें वो पसंद नहीं आई।"


विमला जी खुश थीं कि बहू 'लाइन पर' आ गई है।

लेकिन उस दिन के बाद, मीरा बदल गई।

अब वह घर में काम करती थी, पर उसमें 'अपनापन' नहीं था। अगर विमला जी कहतीं कि "पर्दे बदल दो", तो मीरा कहती, "पैसे आप दे दीजिये, मैं मंगवा दूँगी।" अगर रवि कहता कि "घर को पेंट करवाना है", तो मीरा कहती, "पेंटर बुला लो, मुझे ऑफिस में काम है।"


घर अब भी साफ़ था, लेकिन उसकी 'रूह' गायब थी। मीरा ने उस घर को सजाना छोड़ दिया था। उसने अपनी सैलरी अब घर की सजावट में नहीं, बल्कि अपने भविष्य के लिए म्यूच्यूअल फंड्स में लगानी शुरू कर दी थी।


एक दिन विमला जी बीमार पड़ीं। मीरा ने उनकी सेवा की, दवाई दी, खाना दिया। पर वह पास बैठकर घंटों सिर नहीं दबाती थी, न ही उनसे बातें करती थी।

विमला जी ने चिढ़कर कहा, "मीरा, तू अब पहले जैसी नहीं रही। पत्थर हो गई है।"


मीरा ने दवाई की शीशी मेज पर रखी और बेहद शांत स्वर में कहा, "माँ जी, पत्थर नहीं, समझदार हो गई हूँ। मैंने सीखा है कि **कुछ रिश्ते किराए के मकान जैसे होते हैं, उन्हें कितना भी सजा लो, वो कभी अपने नहीं होते।** किराए के मकान में इंसान बस रहता है, उसे दिल से नहीं लगाता। मैंने भी अब इस घर में 'रहना' सीख लिया है, 'जीना' छोड़ दिया है।"


विमला जी सन्न रह गईं। उन्होंने मीरा की आँखों में देखा। वहां अब न तो प्यार की भीख थी, न ही स्वीकृति पाने की तड़प। वहां सिर्फ एक शून्य था। और वो शून्य विमला जी के बुढ़ापे को डरा रहा था। क्योंकि किराएदार मकान खाली कर सकता है, लेकिन घर तो अपनों से ही चलता है—और उन्होंने अपने 'अपने' को पराया कर दिया था।


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