रसोई में कुकर की सीटी बजी और उसके साथ ही गायत्री देवी के ख्यालों की तंद्रा टूटी। उन्होंने जल्दी से गैस बंद की और खिड़की से बाहर झांका। आंगन में उनकी बहू, काव्या, अपनी कार की पिछली सीट पर लैपटॉप बैग रख रही थी और उनका बेटा, विवान, उसके हाथ में पानी की बोतल थमा रहा था।
"आराम से जाना, और प्रेजेंटेशन की चिंता मत करना। तुम बेस्ट हो," विवान ने काव्या के माथे को चूमते हुए कहा।
काव्या मुस्कुराई, उसने विवान के गाल को थपथपाया और कार में बैठकर निकल गई। विवान गेट बंद करके वापस अंदर मुड़ा, चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान लिए।
गायत्री देवी यह सब रसोर्इ की जालीदार खिड़की से देख रही थीं। उनके सीने में एक अजीब सी टीस उठी। यह दर्द दिल का नहीं था, यह दर्द उस खालीपन का था जो पिछले पैंतीस सालों से उनके वजूद में घर कर गया था।
"माँ! चाय मिल जाएगी?" विवान ने अंदर आते हुए पूछा।
"हाँ, अभी लाती हूँ," गायत्री देवी ने अपनी आवाज़ को सामान्य करने की कोशिश की।
ड्राइंग रूम में विवान अपने पिता, रमेश बाबू, के साथ बैठकर क्रिकेट मैच की चर्चा करने लगा। रमेश बाबू सोफे पर पसरे हुए थे, अखबार उनके सीने पर रखा था और वह हुक़्म चलाने वाले अंदाज़ में बोले, "गायत्री! चाय के साथ वो मठरी भी ले आना जो कल बनाई थी।"
गायत्री देवी ट्रे लेकर आईं। उन्होंने देखा कि विवान ने तुरंत उठकर उनके हाथ से ट्रे ले ली।
"अरे माँ, आप क्यों लाईं? मुझे आवाज़ दे देतीं," विवान ने कहा और पहले अपने पिता को चाय दी, फिर खुद ली।
रमेश बाबू ने चाय की चुस्की ली और नाक सिकोड़ी। "चीनी कम है। सौ बार कहा है कि मेरी चाय में चीनी ठीक रखा करो। दिन भर करती क्या हो जो एक चाय भी ढंग की नहीं बनती?"
गायत्री देवी कुछ नहीं बोलीं। वह चुपचाप खड़ी रहीं, जैसे पिछले पैंतीस सालों से खड़ी थीं। लेकिन तभी विवान बोल पड़ा।
"पापा, चाय ठीक है। डॉक्टर ने आपको चीनी कम लेने को कहा है। माँ आपकी सेहत का ही ख्याल रख रही हैं।"
रमेश बाबू ने झुंझलाकर अखबार उठाया और मुंह फेर लिया। गायत्री देवी ने विवान की ओर देखा। उनकी आँखों में नमी आ गई। उन्होंने जल्दी से पल्लू से चेहरा पोंछा और वापस रसोई में आ गईं।
वहां सिंक में बर्तनों का ढेर लगा था। गायत्री देवी बर्तन मांजने लगीं, लेकिन उनका दिमाग अतीत के गलियारों में भटक रहा था।
उन्हें याद आया अपना समय। जब वह नई-नई ब्याह कर इस घर में आई थीं। वह भी एम.ए. पास थीं। उन्हें भी कविताएं लिखने का शौक था। लेकिन रमेश बाबू ने शादी के दूसरे ही दिन कह दिया था, "हमारे घर की औरतें बाहर काम नहीं करतीं। घर की इज़्ज़त चारदीवारी के अंदर ही भली लगती है।"
गायत्री देवी ने अपनी कलम तोड़ दी थी और करछुल थाम ली थी। जब वह बीमार पड़ती थीं, तब भी उन्हें ही उठकर सबके लिए रोटियां बनानी पड़ती थीं। रमेश बाबू ने कभी एक गिलास पानी भी खुद लेकर नहीं पिया था। अगर कभी नमक तेज़ हो जाता, तो थाली फेंक दी जाती थी। अगर कभी वह तैयार होकर कहीं जाने की इच्छा जतातीं, तो ताना मिलता—"किसे दिखाने जा रही हो?"
और आज... आज वह काव्या को देखती हैं।
शाम को काव्या जब ऑफिस से लौटी, तो वह बहुत थकी हुई लग रही थी। आते ही वह सोफे पर गिर गई।
"उफ्फ! आज तो बहुत काम था," काव्या ने आँखें मूंदते हुए कहा।
गायत्री देवी रसोई में रात के खाने की तैयारी कर रही थीं। उन्होंने सोचा कि अभी रमेश बाबू चिल्लाएंगे कि बहू आ गई है तो चाय क्यों नहीं बना रही।
लेकिन तभी उन्होंने देखा कि विवान रसोई में आया। उसने एप्रन पहना।
"माँ, आप रहने दो। आज काव्या बहुत थकी है और आप भी सुबह से लगी हो। आज डिनर मैं बनाऊंगा। हम पास्ता खाएंगे," विवान ने मुस्कुराते हुए कहा।
"तुझे बनाना आता है?" गायत्री देवी ने आश्चर्य से पूछा।
"हाँ माँ, यूट्यूब जिंदाबाद," विवान हंसा। "आप जाओ, काव्या के पास बैठो।"
गायत्री देवी धीरे-धीरे ड्राइंग रूम में आईं। काव्या अब भी आँखें बंद किए लेटी थी। रमेश बाबू अपने कमरे में टीवी देख रहे थे।
गायत्री देवी काव्या के पास वाले सोफे पर बैठ गईं। काव्या ने आहट पाकर आँखें खोलीं और हड़बड़ा कर उठने लगी। "अरे मम्मी जी, आप? सॉरी, मेरी आँख लग गई थी। मैं अभी चाय बनाती हूँ।"
"बैठो," गायत्री देवी ने सख्ती से कहा।
काव्या सहम गई। उसे लगा शायद सासू माँ नाराज़ हैं।
"विवान खाना बना रहा है," गायत्री देवी ने कहा।
काव्या ने राहत की सांस ली और मुस्कुराई। "वह दुनिया के बेस्ट हज़बैंड हैं मम्मी जी। आज मेरी मीटिंग खराब हो गई थी, मैंने उन्हें फ़ोन करके बहुत फ्रस्ट्रेशन निकाली। उन्होंने मुझे इतना सपोर्ट किया... वरना मैं तो टूट ही जाती।"
गायत्री देवी एकटक काव्या को देखती रहीं। उसका खिला हुआ चेहरा, उसका आत्मविश्वास, और सबसे बड़ी बात—उसका यह भरोसा कि उसका पति उसके साथ खड़ा है।
अचानक गायत्री देवी के मुंह से वो शब्द निकल गए जो वह बरसों से दबाए बैठी थीं।
"काव्या, मुझे तुमसे बहुत ईर्ष्या होती है।"
काव्या का मुँह खुला का खुला रह गया। "क्या? ईर्ष्या? मम्मी जी, मैंने कुछ गलत कर दिया क्या?"
गायत्री देवी की आँखों से आंसू बह निकले। उन्होंने काव्या का हाथ अपने खुरदरे हाथों में ले लिया।
"गलत नहीं बेटा... तुमने सब कुछ इतना सही किया है कि मेरी पूरी ज़िंदगी मुझे गलत लगने लगी है।"
"मैं समझी नहीं मम्मी जी," काव्या ने उलझन में पूछा।
गायत्री देवी ने एक गहरी सांस ली। "आज सुबह जब विवान तुम्हें छोड़ने जा रहा था, जब वह तुम्हारी बोतल भर रहा था, जब उसने अभी रसोई में जाकर एप्रन पहना... तो मुझे तुम पर गुस्सा आ रहा था काव्या। मुझे जलन हो रही थी।"
"क्यों?" काव्या ने धीमे से पूछा।
"क्योंकि..." गायत्री देवी की आवाज़ कांपी, "क्योंकि जब मैं तुम्हारी उम्र की थी, तो मेरे पास भी सपने थे। मैं भी थकती थी। मुझे भी कभी-कभी मन करता था कि कोई मेरे लिए भी पानी की बोतल लाए, कोई मेरे माथे को चूमकर कहे कि 'गायत्री, तुम कर सकती हो'। लेकिन मुझे क्या मिला? सिर्फ हुक़्म। सिर्फ ताने। सिर्फ यह अहसास कि मैं इस घर की मशीन हूँ, इंसान नहीं।"
गायत्री देवी ने अपनी कलाई दिखाई। "इन चूड़ियों की खनक ने मेरी आवाज़ दबा दी काव्या। मैं जलती हूँ कि तुम थक सकती हो। तुम्हें थकने का हक़ है। मेरे पास तो बीमार पड़ने का भी हक़ नहीं था। अगर मैं लेट जाती, तो घर भूखा सोता। रमेश बाबू ने कभी मुझसे नहीं पूछा कि मेरा दिन कैसा गया। उन्होंने कभी मेरे सपनों के बारे में नहीं पूछा। और आज जब मैं विवान को देखती हूँ कि वह तुम्हारी थकान को अपनी थकान समझता है, तुम्हारी जीत को अपनी जीत मानता है... तो मुझे लगता है कि मैं ठगी गई हूँ।"
काव्या की आँखों में भी आंसू आ गए। उसने पहली बार अपनी सास को सिर्फ़ एक 'सास' के रूप में नहीं, बल्कि एक 'पीड़ित औरत' के रूप में देखा। एक ऐसी औरत जो पितृसत्ता के पहियों के नीचे कुचल दी गई थी।
"मम्मी जी," काव्या ने उनका हाथ दबाया।
"हाँ काव्या, मैं जलती हूँ," गायत्री देवी सिसकने लगीं। "मैं जलती हूँ कि तुम उस आज़ादी में सांस ले रही हो जिसके लिए मेरा दम घुट गया। मैं जलती हूँ कि तुम्हारे पति को 'पास्ता' बनाना आता है, और मेरे पति को पानी लेना भी अपनी शान के खिलाफ लगता है। यह जलन बुरी है, मैं जानती हूँ। मुझे खुश होना चाहिए कि मेरा बेटा बदल गया है, लेकिन इंसान हूँ न... अपना खालीपन देखकर चीख निकलने को होती है।"
कमरे में सन्नाटा छा गया। रसोई से बर्तनों की आवाज़ और पास्ता की खुशबू आ रही थी।
काव्या उठी और उसने गायत्री देवी को गले लगा लिया। उसने उन्हें वैसे ही भींचा जैसे वह अपनी सगी माँ को भींचती।
"मम्मी जी," काव्या ने उनके कंधे पर सिर रखकर कहा, "आपकी यह जलन जायज़ है। और आप जानती हैं विवान ऐसा क्यों है?"
गायत्री देवी ने प्रश्नवाचक नज़रों से देखा।
"क्योंकि आपने उसे वैसा नहीं बनाया जैसे पापा जी हैं," काव्या ने कहा। "आपने वो सब सहा, लेकिन आपने विवान की परवरिश में वो ज़हर नहीं घुलने दिया। विवान अक्सर बताते हैं कि बचपन में जब पापा जी आप पर चिल्लाते थे, तो आप विवान को कमरे में ले जाकर समझाती थीं कि 'बेटा, कभी किसी औरत की आँख में आंसू मत आने देना'। यह जो पास्ता वह बना रहे हैं न, या जो सपोर्ट वह मुझे करते हैं... यह काव्या का नसीब नहीं है, यह गायत्री देवी की तपस्या का फल है।"
गायत्री देवी सुन रह गईं।
"आपने अपनी आज़ादी की बलि देकर एक ऐसा पुरुष गढ़ा जो अपनी पत्नी को आज़ाद रख सके," काव्या ने आंसू पोंछते हुए मुस्कुराकर कहा। "मैं सिर्फ़ फसल काट रही हूँ मम्मी जी, बीज तो आपने ही बोया था। अगर विवान, पापा जी जैसे होते, तो मैं आज यहाँ नहीं, शायद मायके में बैठी रो रही होती। यह आपकी जीत है, हार नहीं।"
गायत्री देवी को लगा जैसे किसी ने उनके सीने से बरसों पुराना पत्थर हटा दिया हो। क्या वाकई? क्या उनका दुख व्यर्थ नहीं गया?
तभी विवान दो प्लेट पास्ता लेकर आया। "अरे! यहाँ क्या सास-बहू का ड्रामा चल रहा है? और दोनों रो रही हैं? क्या हुआ?"
काव्या ने हंसते हुए अपनी आँखें पोंछीं। "कुछ नहीं, बस मम्मी जी बता रही थीं कि उन्हें तुम्हारी कुकिंग पर कितना गर्व है।"
विवान ने एक प्लेट गायत्री देवी की ओर बढ़ाई। "लो माँ, चखो। पापा तो खाएंगे नहीं यह 'अंग्रेजी खाना', उनके लिए खिचड़ी बना दी है मैंने। लेकिन यह स्पेशल हम तीनों के लिए है।"
गायत्री देवी ने कांपते हाथों से कांटा (fork) उठाया। उन्होंने पास्ता का एक टुकड़ा मुंह में रखा। वह चीज़ी था, मलाईदार था।
"कैसा है?" विवान ने उत्सुकता से पूछा।
"बहुत अच्छा है," गायत्री देवी ने मुस्कुराते हुए कहा। "बिल्कुल वैसा, जैसा आज़ादी का स्वाद होता है।"
विवान को समझ नहीं आया, लेकिन काव्या समझ गई।
उस रात खाने की मेज़ पर रमेश बाबू अपनी खिचड़ी खाते हुए बड़बड़ा रहे थे कि "घर का माहौल बिगड़ गया है, मर्द खाना बना रहे हैं।" लेकिन गायत्री देवी ने पहली बार उनकी बात अनसुनी कर दी।
उन्होंने काव्या की ओर देखा और मन ही मन कहा— "हाँ, मुझे ईर्ष्या थी। लेकिन आज मुझे सुकून है। क्योंकि मेरी अधूरी कहानी, तुम्हारे ज़रिए पूरी हो रही है। मेरी उड़ान तुमने भरी है।"
गायत्री देवी ने अपनी थाली में से एक और चम्मच पास्ता खाया। वह स्वाद अब कड़वा नहीं था। वह जीत का स्वाद था। एक माँ की जीत का, जिसने एक बेटे को 'पति' नहीं, 'साथी' बनना सिखाया था।
उस रात गायत्री देवी ने अपनी पुरानी डायरी निकाली, जिस पर धूल जम गई थी। उन्होंने कलम उठाई और पैंतीस साल बाद पहली पंक्ति लिखी:
"जलन भी कभी-कभी रास्ता दिखाती है, अगर हम समझ जाएं कि रौशनी हमारी ही जलाई हुई मशाल से आ रही है।"
और उस रात, हवेली की वह पुरानी खिड़की खुली रही, जिससे नई हवा अंदर आ रही थी—बिल्कुल ताज़ा और बेखौफ।
लेखिका : रूपम मिश्रा
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