मैंने उसे अंदर बुलाया, सोफे पर बैठाया और उसके लिए एक गिलास पानी लेकर आई। पानी का गिलास हाथ में लेते ही काव्या फफक-फफक कर रो पड़ी। उसके आंसुओं में महीनों की घुटन छुपी थी। काव्या की शादी को पांच साल हो गए थे। उसने रोते हुए बताया, "आंटी, मेरी सास मुझे दिन-रात ताने मारती हैं कि मेरे घर कोई बच्चा नहीं है। वो मुझे 'बांझ' तक कह देती हैं। राहुल (काव्या का पति) मुझसे बहुत प्यार करता है, लेकिन अपनी माँ के सामने वो हमेशा चुप रह जाता है। मुझे लगता है मैं ये घर छोड़कर चली जाऊं।"
सुबह की हल्की गुलाबी धूप बालकनी में आ चुकी थी। रिटायरमेंट के बाद का जीवन बड़ा शांत होता है, ऐसा लोग कहते हैं। मैं अपनी आरामकुर्सी पर बैठकर अखबार के पन्ने पलट ही रही थी और मेरी अदरक वाली चाय का प्याला अभी होठों तक पहुँचा ही था कि फोन की स्क्रीन जगमगा उठी। स्क्रीन पर मेरी भतीजी निहारिका का नाम फ्लैश हो रहा था।
मैंने फोन उठाया तो उधर से निहारिका की रुंधे हुए गले की आवाज़ आई। वह अपने पति समीर की शिकायतें कर रही थी। दोनों ने तीन साल के लंबे अफेयर के बाद परिवार से लड़कर लव मैरिज की थी। लेकिन अब शादी को साल भर भी नहीं हुआ था और उनके बीच रोज कलह होने लगी थी। निहारिका रोते हुए कह रही थी, "बुआ, वो पहले जैसे रहे ही नहीं। बस अपने ऑफिस के लैपटॉप में घुसे रहते हैं। मेरी तो कोई अहमियत ही नहीं बची है।"
मैंने उसकी पूरी भड़ास निकलने दी। जब वह चुप हुई, तब मैंने बहुत ही शांत स्वर में कहा, "निहारिका बेटा, प्यार और शादी में बहुत फर्क होता है। शादी एक मैराथन है, कोई सौ मीटर की रेस नहीं। अभी तुम दोनों एक-दूसरे की असल आदतों को जान रहे हो। तुम हर बात पर लड़ने क्यों बैठ जाती हो? पुरुष अक्सर अपना तनाव जाहिर नहीं कर पाते और खामोश हो जाते हैं। कुछ दिन उसे उसका स्पेस दो। कभी चुप रहकर देखो, जब तुम शिकायत करना बंद कर दोगी, तो वह खुद तुम्हारे पास आकर पूछेगा कि तुम उदास क्यों हो। हर बात का जवाब तुरंत देना जरूरी नहीं होता।" मेरी बात सुनकर उसका रोना कुछ कम हुआ। उसे मेरी सलाह में वजन लगा। वह मन हल्का करके और एक नई उम्मीद के साथ फोन रख चुकी थी।
मैंने वापस अपनी चाय की तरफ देखा, वह बिल्कुल ठंडी हो चुकी थी। मैंने ठंडी चाय को सिंक में उड़ेला और सोचा कि चलो, अब दोपहर के खाने की तैयारी कर लूं। फ्रिज से सब्जियां निकाल कर मैं डाइनिंग टेबल पर बैठी ही थी कि दरवाजे की घंटी बजी। दरवाजा खोला तो सामने पड़ोस में रहने वाली काव्या खड़ी थी। उसका चेहरा उतरा हुआ था और आँखें सूजी हुई थीं।
मैंने उसे अंदर बुलाया, सोफे पर बैठाया और उसके लिए एक गिलास पानी लेकर आई। पानी का गिलास हाथ में लेते ही काव्या फफक-फफक कर रो पड़ी। उसके आंसुओं में महीनों की घुटन छुपी थी। काव्या की शादी को पांच साल हो गए थे। उसने रोते हुए बताया, "आंटी, मेरी सास मुझे दिन-रात ताने मारती हैं कि मेरे घर कोई बच्चा नहीं है। वो मुझे 'बांझ' तक कह देती हैं। राहुल (काव्या का पति) मुझसे बहुत प्यार करता है, लेकिन अपनी माँ के सामने वो हमेशा चुप रह जाता है। मुझे लगता है मैं ये घर छोड़कर चली जाऊं।"
मैंने काव्या के कांपते हाथों को अपने हाथों में लिया और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, "काव्या, मैं जानती हूँ कि एक औरत के लिए यह सब सुनना कितना तकलीफदेह होता है। लेकिन तुम खुद को क्यों कोस रही हो? माँ बनना या न बनना किसी इंसान के हाथ में नहीं है। तुम लोग किसी अच्छे फर्टिलिटी विशेषज्ञ से मिलकर सलाह क्यों नहीं लेते? और अगर किस्मत में खुद का बच्चा न भी लिखा हो, तो क्या जिंदगी खत्म हो जाती है? गोद लेने का विकल्प तो हमेशा खुला है। और रही बात राहुल की, तो वह तुम्हारा साथ दे तो रहा है। एक बेटे के लिए अपनी माँ और पत्नी के बीच संतुलन बनाना बहुत मुश्किल होता है। तुम बस अपना हौसला मत हारो।"
काव्या ने अपने आंसू पोंछे। मेरे चंद शब्दों ने जैसे उसके सीने से एक भारी पत्थर हटा दिया था। वह बोली, "आंटी, मुझे कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था, लेकिन आपसे बात करके लगा कि अभी सब कुछ खत्म नहीं हुआ है।" वह एक हल्की सी मुस्कान के साथ अपने घर लौट गई।
मैं अभी ठीक से बैठ भी नहीं पाई थी कि मेरे पुराने स्कूल के एक जूनियर सहकर्मी, प्रकाश जी का कॉल आ गया। वे बहुत हताश लग रहे थे। "मैडम, मैं यह नौकरी छोड़ रहा हूँ," उन्होंने झल्लाहट भरे स्वर में कहा। "प्रिंसिपल सर को सिर्फ वो लोग पसंद हैं जो उनके आगे-पीछे घूमते हैं और उनकी चापलूसी करते हैं। मैं पूरी ईमानदारी से अपना काम करता हूँ, लेकिन मेरा कोई प्रमोशन नहीं हो रहा। मेरा काम किसी को नजर ही नहीं आता।"
मैंने उन्हें बीच में टोकते हुए कहा, "रुकिए प्रकाश जी, जल्दबाजी में कोई फैसला मत लीजिए। आप नौकरी छोड़कर कहाँ जाएंगे? हर ऑफिस में राजनीति होती है और हर जगह ऐसे ही लोग मिलेंगे। आप अपनी जगह से मत भागिए। आप मेहनत करते हैं, यह अच्छी बात है, लेकिन आज के जमाने में सिर्फ काम करना काफी नहीं है; अपने काम को 'दिखाना' भी जरूरी है। स्टाफ मीटिंग्स में बोला कीजिए, अपने आइडियाज शेयर कीजिए। चापलूसी मत कीजिए, लेकिन अपना जनसंपर्क मजबूत रखिए। कुर्सी पर बैठे इंसान को सम्मान देना चापलूसी नहीं, बल्कि प्रोफेशनलिज्म होता है।"
मेरी बात उन्हें समझ आ गई। उनका गुस्सा अब शांत हो चुका था। "आप सही कह रही हैं मैडम। मैं बेवजह ही हार मान रहा था। अब से मैं अपना तरीका बदलूंगा। बहुत-बहुत धन्यवाद आपका।"
प्रकाश जी का फोन रखने के बाद मैंने राहत की सांस ली ही थी कि मेरी सबसे करीबी सहेली सुजाता घर में दाखिल हुई। उसने मुझे थका हुआ देखकर कहा, "क्या बात है सुधा? आज भी कोई अपना दुखड़ा सुनाने आ गया था क्या? यार, मैं हैरान हूँ। तुमने रिटायरमेंट के बाद यह कौन सा मुफ्त का क्लिनिक खोल लिया है? जिसे देखो, अपनी परेशानियां लेकर तुम्हारे पास चला आता है। तुम बोर नहीं होतीं दूसरों का ये रोना-धोना सुनकर? सारा दिन इसी सब में निकाल देती हो।"
मैंने सुजाता की बात पर एक गहरी और संतुष्ट हंसी हंसते हुए कहा, "सुजाता, आजकल लोगों के पास बोलने के लिए सोशल मीडिया है, शिकायतें करने के लिए मंच हैं, लेकिन उनके पास कोई ऐसा इंसान नहीं है जो सिर्फ उन्हें सुन सके। आज के दौर में 'सुनने वाले कान' सबसे महंगे हो गए हैं। तुम्हें पता है, जब हम किसी की बात को पूरी तवज्जो देकर, बिना उसे जज किए सुन लेते हैं, तो उसकी आधी हताशा, उसकी आधी बीमारी तो बस यूँ ही हवा हो जाती है। इंसान को सिर्फ एक ऐसा कंधा चाहिए होता है जो उसे यह यकीन दिला सके कि वह अकेला नहीं है। जुबान से ज्यादा कानों का रिश्ता सीधा इंसान के दिल से होता है।"
मैंने सुजाता का हाथ पकड़ा और उसे किचन की तरफ खींचते हुए शरारत भरे लहजे में कहा, "चलो, अब बहुत हो गया ज्ञान। आज मैंने सुबह से सबकी बातें सुनी हैं और अब मेरे पेट में चूहे कूद रहे हैं। अब तुम मुझे अपने कान दो, मेरी बकबक सुनो और फटाफट कुछ अच्छा सा बनाकर मुझे खिलाओ!"
हम दोनों की खिलखिलाहट से पूरा घर गूंज उठा। सच ही तो है, कभी-कभी किसी की खामोशी को पढ़ लेना और उसके शोर को सुन लेना ही दुनिया का सबसे बड़ा सुकून होता है।
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