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कांच की गुड़िया

 शाम के सात बज रहे थे। शर्मा सदन की रसोई में कुकर की सीटी और बर्तनों की खनक के बीच सुमन की चूड़ियाँ भी खनक रही थीं। पैंतीस वर्षीय सुमन पिछले दस सालों से इस घर की बड़ी बहू थी। उसके माथे पर पसीने की बूँदें चमक रही थीं, लेकिन चेहरे पर थकान की एक लकीर भी नहीं थी। आज घर में खास दावत थी। उसकी सास, निर्मला देवी की छोटी बहू, यानी सुमन की देवरानी अवनि, अपनी कंपनी की तरफ से विदेश यात्रा करके लौटी थी।


ड्राइंग रूम में हंसी-ठिठोली गूंज रही थी। निर्मला देवी का स्वर सबसे ऊंचा था।


"अरे देखो तो मेरी बहू का रंग रूप ही बदल गया है! विलायत की हवा लग गई है मेरी बच्ची को," निर्मला देवी ने अवनि की बलाएं लेते हुए कहा। अवनि सोफे पर शान से बैठी थी, उसके आसपास विदेशी चॉकलेट्स और गिफ्ट्स का ढेर लगा था। उसने एक कीमती शॉल निकालकर निर्मला देवी के कंधों पर रख दी।


"माँ जी, ये पश्मीना है। वहां इसकी बहुत कीमत है, पर आपके लिए तो मैं दुनिया खरीद लाऊँ," अवनि ने चहकते हुए कहा।


निर्मला देवी गदगद हो गईं। "जुग-जुग जियो मेरी लक्ष्मी! भगवान ऐसी बहू सबको दे। जो घर का नाम भी रोशन करे और सास का मान भी बढ़ाए।"


रसोई के दरवाजे की ओट से सुमन यह सब देख रही थी। उसके हाथ में पानी का जग था जो वह बाहर ले जाने ही वाली थी, लेकिन सास के उन शब्दों ने उसके कदमों को जकड़ लिया— *'भगवान ऐसी बहू सबको दे'*। सुमन का दिल एक पल के लिए सिहर उठा। दस साल... पूरे दस साल उसने इस घर को अपने खून-पसीने से सींचा था। निर्मला देवी के घुटनों के दर्द की मालिश से लेकर ससुर जी की शुगर फ्री चाय तक, घर के राशन से लेकर रिश्तेदारों के शगुन तक—सब कुछ तो सुमन ही संभालती थी। लेकिन आज तक उसके लिए निर्मला देवी के मुँह से 'लक्ष्मी' शब्द नहीं निकला था। उसके लिए तो बस यही सुनने को मिलता था— *"अरे सुमन, चाय ठंडी है,"* या *"सुमन, आज सब्जी में नमक कम है।"*


सुमन ने एक गहरी सांस ली, चेहरे पर एक फीकी मुस्कान ओढ़ी और पानी का जग लेकर बाहर आ गई। "अवनि, पानी पी लो," उसने स्नेह से कहा।


अवनि ने फोन से नज़र हटाए बिना गिलास थाम लिया। "थैंक्स दी," उसने रूखा सा जवाब दिया।


निर्मला देवी ने तुरंत टोक दिया, "अरे सुमन, तू अभी तक रसोई में ही है? पकोड़े नहीं बने क्या? अवनि थकी हुई आई है, उसे भूख लगी होगी। और सुन, अवनि के लिए ग्रीन टी बनाना, उसे दूध वाली चाय से एसिडिटी होती है।"


"जी माँ जी, बस ला रही हूँ," सुमन वापस मुड़ गई। उसकी आँखों में नमी थी, पर वह जानती थी कि यहाँ आँसुओं की कोई जगह नहीं है। यहाँ कीमत उसकी है जो नोटों की गड्डी मेज पर रखता है। अवनि एक मल्टीनेशनल कंपनी में एच.आर. हेड थी, लाखों का पैकेज था। और सुमन? सुमन सिर्फ एक बी.ए. पास गृहिणी थी, जिसका काम सिर्फ 'घर संभालना' था—एक ऐसा काम जिसका न कोई वेतन था, न कोई प्रशंसा।


अगले कुछ दिन घर का माहौल बदला-बदला सा रहा। अवनि के आने की खुशी में घर में रोज नए पकवान बनते, मेहमान आते। सुमन सुबह पांच बजे उठती और रात के बारह बजे तक मशीन की तरह काम करती। अवनि सुबह नौ बजे सोकर उठती, तैयार होकर ऑफिस या दोस्तों से मिलने निकल जाती।


एक दिन की बात है, खाने की मेज पर ससुर जी ने चर्चा छेड़ी। "भाई, घर की मरम्मत की जरूरत है। बरसात आने वाली है, छत टपकने लगती है।"


निर्मला देवी ने तुरंत अवनि की तरफ देखा, "अवनि बेटा, तेरे पापा कह रहे थे मरम्मत के लिए। कुछ पैसों का इंतजाम हो जाता तो..."


अवनि ने फोन पर टाइप करते हुए लापरवाही से कहा, "माँ जी, अभी तो मैंने नई कार बुक की है। ईएमआई बहुत ज्यादा है। अभी तो मुश्किल होगा।"


कमरे में सन्नाटा छा गया। निर्मला देवी का चेहरा उतर गया, पर उन्होंने तुरंत बात संभाली, "कोई बात नहीं बेटा, तू अपनी गाड़ी ले ले। मरम्मत तो होती रहेगी, कौन सा छत गिरी जा रही है।"


सुमन रोटी परोस रही थी। उसने संकोच करते हुए कहा, "माँ जी... मेरे पास कुछ पैसे हैं। वो जो मैं ट्यूशन पढ़ाती थी शादी से पहले, और पापा ने जो एफ.डी. दी थी... अगर आप कहें तो उससे मरम्मत करवा लें?"


निर्मला देवी ने एक तिरछी नज़र सुमन पर डाली और हँस पड़ीं। "अरे रहने दे सुमन। तेरे वो चार पैसे ऊंट के मुंह में जीरे जैसे होंगे। और वैसे भी, वो तेरे पिता ने तुझे दिए थे, हम उनका पैसा क्यों लगाएँ? अवनि तो इस घर की कमाई करती है, उसका हक बनता है। तू रहने दे।"


सुमन को लगा जैसे किसी ने तवे से उतारकर गरम रोटी सीधा उसके कलेजे पर रख दी हो। उसके समर्पण का, उसकी छोटी सी बचत का इतना अपमान? 'मेरे पिता का पैसा' और 'अवनि का पैसा घर का पैसा'—यह भेदभाव क्यों? क्या सुमन इस घर की बेटी नहीं बन पाई थी?


समय का पहिया घूमा। बरसात आई और चली गई, लेकिन रिश्तों की सीलन बढ़ती गई।


दो महीने बाद, निर्मला देवी बाथरूम में पैर फिसलने से गिर पड़ीं। कूल्हे की हड्डी टूट गई थी। डॉक्टर ने साफ कह दिया था कि कम से कम तीन महीने तक पूर्ण विश्राम की जरूरत है और 24 घंटे देखभाल करनी होगी। अस्पताल से घर लाने के बाद असली परीक्षा शुरू हुई।


निर्मला देवी बिस्तर पर लाचार थीं। उन्हें करवट बदलने के लिए भी सहारे की जरूरत थी।


पहले दो दिन तो अवनि ने ऑफिस से छुट्टी ली। वह पास बैठती, बातें करती, फ्रूट्स काट कर देती। लेकिन तीसरे दिन उसने हाथ खड़े कर दिए।


"माँ जी, मेरा बहुत जरूरी प्रोजेक्ट चल रहा है। बॉस का कॉल आ रहा है बार-बार। मुझे जाना होगा," अवनि ने घड़ी देखते हुए कहा।


निर्मला देवी ने उम्मीद भरी नज़रों से देखा, "बेटा, शाम तक तो आ जाएगी ना? मुझे वॉशरूम जाना होता है तो..."


"माँ जी, मैं एक काम करती हूँ, एक फुल टाइम नर्स रख देती हूँ। वो सब कर देगी। मुझसे ये सब... मतलब, बेडपैन वगैरह... आई कांट डू इट (मैं यह नहीं कर सकती)," अवनि ने नाक सिकोड़ते हुए कहा।


निर्मला देवी सन्न रह गईं। जिस बहू के 'मॉडर्न' होने पर वो इतना इतराती थीं, आज उसी बहू को उनकी सेवा करने में घिन आ रही थी।


अवनि चली गई। नर्स आई, लेकिन वह भी कामचोर निकली। वह दिन भर फोन पर लगी रहती। निर्मला देवी प्यास से तड़पती रहतीं, पर नर्स सुनती नहीं।


ऐसे वक्त में सुमन आगे आई। उसने नर्स को हटा दिया।


"माँ जी, मैं हूँ ना," सुमन ने निर्मला देवी का हाथ थामते हुए कहा।


"अरे नहीं सुमन, तुझे तो कमर में दर्द रहता है। तू कैसे उठाएगी मुझे? और रसोई कौन संभालेगा?" निर्मला देवी की आवाज़ कमजोर थी।


"सब हो जाएगा माँ जी। आप बस चिंता मत कीजिये।"


और फिर सुमन ने खुद को समर्पित कर दिया। सुबह उठकर निर्मला देवी को स्पंज करना, कपड़े बदलना, समय पर दवा देना, दलिया बनाना, और फिर उन्हें बच्चे की तरह गोद में उठाकर वॉशरूम ले जाना। सुमन का खुद का शरीर टूट रहा था, लेकिन उसने उफ्फ तक नहीं की।


एक रात, निर्मला देवी दर्द से कराह रही थीं। बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी। बिजली कड़क रही थी। अचानक निर्मला देवी को सांस लेने में दिक्कत होने लगी।


"सुमन... सुमन..." वह हाँफते हुए चिल्लाईं।


सुमन दौड़कर आई। ससुर जी घबराए हुए थे। "अवनि को बुलाओ, गाड़ी निकाले, अस्पताल जाना होगा!"


सुमन अवनि के कमरे की तरफ भागी। दरवाजा खटखटाया। अवनि अंदर से नींद में बड़बड़ाई, "क्या है दी? सोने दो ना। कल मेरी प्रेजेंटेशन है।"


"अवनि, माँ जी की तबीयत बहुत खराब है। गाड़ी निकालो, एम्बुलेंस आने में देर लगेगी," सुमन चिल्लाई।


दरवाजा खुला। अवनि खीझते हुए बाहर आई। "उफ्फ, ये माँ जी भी ना! अभी क्या हो गया? अच्छा रुको, मैं ड्राइवर को कॉल करती हूँ।"


"ड्राइवर नहीं उठा रहा है अवनि! तुम चलो!"


"दी, मुझे नाइट ब्लाइंडनेस है थोड़ा, और इतनी बारिश में मैं गाड़ी नहीं चला सकती। रिस्क है। एम्बुलेंस का वेट करते हैं।" अवनि ने हाथ झाड़ दिए और सोफे पर बैठ गई।


सुमन ने अवनि को अविश्वास से देखा। सामने सास तड़प रही थीं और यहाँ बहू को अपनी नींद और गाड़ी की चिंता थी।


सुमन ने एक पल भी नहीं गंवाया। उसने अपना फोन निकाला और मोहल्ले के ऑटो वाले भैया को फोन किया जो उसे अक्सर सब्जी मंडी ले जाते थे। संयोग से वह पास ही था। सुमन ने भीगते हुए निर्मला देवी को ससुर जी की मदद से ऑटो तक पहुँचाया। खुद साथ बैठी, उनका सिर अपनी गोद में रखा और लगातार उनका सीना मलती रही।


"माँ जी, कुछ नहीं होगा... हम बस पहुँच गए," सुमन रोते हुए, पर हिम्मत बंधाते हुए बोल रही थी।


अस्पताल पहुँचते ही डॉक्टर्स ने निर्मला देवी को आईसीयू में ले लिया। डॉक्टर ने बाहर आकर कहा, "अच्छा हुआ आप समय पर ले आए। माइनर हार्ट अटैक था। थोड़ी भी देर होती तो..."


सुमन वहीँ बेंच पर ढह गई। ससुर जी की आँखों में आँसू थे। उन्होंने सुमन के सिर पर हाथ रखा। "आज तुमने मेरी निर्मला को बचा लिया बेटा।"


अगले दिन सुबह अवनि अस्पताल आई, हाथ में महंगा गुलदस्ता लिए।


"सॉरी माँ जी, रात को मौसम बहुत खराब था। आप ठीक हैं ना?" उसने मुस्कुराते हुए कहा।


निर्मला देवी अब खतरे से बाहर थीं, लेकिन उनकी आँखों से एक अलग ही पर्दा हट चुका था। उन्होंने अवनि की तरफ देखा, फिर सुमन की तरफ जो कोने में स्टूल पर बैठी ऊंघ रही थी। उसके कपड़े अभी भी थोड़े नम थे, बाल बिखरे हुए थे, चेहरा थका हुआ था।


निर्मला देवी ने हाथ के इशारे से अवनि को रोका और सुमन को पास बुलाया।


"सुमन..."


सुमन हड़बड़ा कर उठी। "जी माँ जी? दर्द हो रहा है? डॉक्टर को बुलाऊँ?"


निर्मला देवी ने कांपते हाथों से सुमन का हाथ पकड़ लिया। उनकी आँखों से आँसू बह निकले।


"नहीं बेटा... दर्द अब नहीं हो रहा। दर्द तो तब हो रहा था जब मैं कांच के टुकड़ों को हीरा समझकर तिजोरी में रख रही थी और असली सोने को मिटटी में मिला रही थी।"


कमरे में सन्नाटा छा गया। अवनि की मुaस्कान गायब हो गई।


निर्मला देवी ने ससुर जी की तरफ देखा। "सुनते हो जी? उस दिन तुम कह रहे थे ना कि घर की मरम्मत करवानी है? सुमन ने अपनी बचत देने को कहा था। वो पैसे ले लो। इस घर की नींव इसी ने बचा रखी है, तो मरम्मत का हक़ भी इसी का है।"


फिर वह अवनि की तरफ मुड़ीं। आवाज़ सख्त थी, "और अवनि, तेरा पैसा, तेरा स्टेटस, तेरी गाड़ी... सब बहुत कीमती होगा दुनिया के लिए। लेकिन मेरे लिए, इस बुढ़ापे में, वो एक गिलास पानी कीमती है जो प्यार से मिले, न कि वो जूस जो एहसान जताकर दिया जाए। तू जा, अपनी प्रेजेंटेशन की तैयारी कर। मेरी सेवा के लिए मेरी 'बेटी' सुमन है।"


सुमन रो पड़ी और सास के गले लग गई। आज उसे 'बहू' नहीं, 'बेटी' का दर्जा मिला था। उसे समझ आ गया था कि भेदभाव की दीवारें ऊंची जरूर होती हैं, लेकिन सेवा और समर्पण की हथौड़ी से उन्हें तोड़ा जा सकता है।


उस दिन शर्मा सदन में एक नई कहानी लिखी गई। वह कहानी जहाँ कद्र पैसे की नहीं, संस्कारों की थी। जहाँ 'बड़ी बहू' और 'छोटी बहू' का फर्क मिट गया था, और रह गया था तो बस माँ और बेटी का रिश्ता।


**समापन:**


दोस्तों, यह कहानी किसी एक घर की नहीं है। हम अक्सर चमक-दमक और बाहरी सफलता के आगे उस मूक त्याग को नजरअंदाज कर देते हैं जो हमारे घर की नींव को थामे रखता है। एक बहू अगर बाहर कमाती है तो वह 'मॉडर्न' है, 'सफल' है, लेकिन जो बहू घर को मंदिर बनाती है, क्या उसकी सफलता कम है? भेदभाव धन का नहीं, मन का होता है। जिस दिन हम अपनी बहुओं को उनकी कमाई से नहीं, उनके व्यवहार और समर्पण से तौलना शुरू कर देंगे, उस दिन हर घर स्वर्ग बन जाएगा।


**एक सवाल आपके लिए:** क्या आपके आसपास या आपके परिवार में भी कभी ऐसा हुआ है कि कमाने वाले सदस्य को ज्यादा अहमियत दी गई हो और घर संभालने वाले को कम? अपने अनुभव कमेंट में जरूर लिखें।


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