मुंबई के नरीमन पॉइंट स्थित 40वीं मंजिल के आलीशान ऑफिस में बैठे 'मिस्टर समीर मल्होत्रा' का नाम शहर के सबसे अमीर और सफल बिजनेसमैन की सूची में टॉप पर था। कांच की दीवारों से शहर छोटा दिखता था, और समीर को लगता था कि उसने दुनिया अपनी मुट्ठी में कर ली है। उसके पास क्या नहीं था? लग्जरी गाड़ियां, कई बंगले, और नौकरों की फौज। उसका मानना था कि पैसा हर समस्या का समाधान है और हर खुशी की चाबी।
समीर के घर में उसके 75 वर्षीय पिता, 'माधव जी' रहते थे। माधव जी एक रिटायर्ड स्कूल टीचर थे। सादगी पसंद और पुराने ख्यालात के। समीर अपनी व्यस्तता के कारण घर बहुत कम जा पाता था। जब भी जाता, पिता के हाथ में कुछ महंगे तोहफे रख देता—कभी आई-पैड, कभी महंगा शॉल, तो कभी कोई इंपोर्टेड गैजेट।
माधव जी उन तोहफों को देखते, फीकी सी मुस्कान देते और अलमारी में रख देते। उन्हें गैजेट्स नहीं, समीर चाहिए था।
एक रविवार की सुबह, समीर देर से सोकर उठा। नाश्ते की मेज पर माधव जी उसका इंतज़ार कर रहे थे।
"समीर, बेटा आज फुर्सत है क्या?" माधव जी ने झिझकते हुए पूछा।
समीर ने अपनी ब्लैकबेरी पर ईमेल चेक करते हुए बिना सिर उठाए कहा, "नहीं पापा, आज एक जापानी डेलिगेशन आ रहा है। बहुत बड़ी डील है। क्यों? आपको कुछ चाहिए?"
माधव जी ने सिर हिलाया। "नहीं बेटा, कुछ चाहिए नहीं। बस सोच रहा था कि बहुत साल हो गए, हम अपने पुराने गाँव 'रामपुर' नहीं गए। वहां का पुराना मंदिर और वो पीपल का पेड़... मन बहुत कर रहा है एक बार हो आते। बस दो दिन की बात है।"
समीर हंस पड़ा। "पापा! प्लीज। रामपुर? वहां न ढंग की सड़क है, न बिजली। आप बीमार पड़ जाएंगे। आपको घूमना ही है तो बताइये, मैं आपको और मम्मी (समीर की माँ की तस्वीर की ओर इशारा करते हुए जो अब नहीं थीं) की याद में... चलिए मैं आपके लिए 'सिंगापुर' का ट्रिप बुक करवा देता हूँ। फर्स्ट क्लास टिकट। आराम से घूमिये।"
माधव जी चुप हो गए। उन्होंने धीरे से कहा, "बेटा, सिंगापुर में मेरा बचपन नहीं है। मुझे सुकून चाहिए, लग्जरी नहीं।"
लेकिन समीर को देर हो रही थी। उसने चेकबुक निकाली, एक ब्लैंक चेक साइन किया और मेज पर रख दिया।
"पापा, आपको जो ठीक लगे कीजिये। ड्राइवर को ले जाइयेगा। मुझे निकलना है।" और समीर चला गया।
माधव जी उस चेक को देखते रहे। उस चेक में इतनी ताकत थी कि वो पूरा गाँव खरीद सकते थे, लेकिन इतनी ताकत नहीं थी कि वो अपने बेटे का दो दिन का वक्त खरीद सकें।
महीने बीतते गए। समीर अपनी दौलत के पहाड़ को और ऊँचा करने में लगा रहा।
माधव जी का 76वां जन्मदिन आया। समीर ने इस बार कमाल कर दिया। उसने पिता के लिए एक 'रोलेक्स' घड़ी मंगवाई, जिसकी कीमत लाखों में थी।
रात को पार्टी में समीर ने सबके सामने वह घड़ी पिता की कलाई पर बांधी। मेहमान तालियां बजा रहे थे।
"डैड, यह लिमिटेड एडिशन है। यह आपको बताएगी कि आपका वक्त कितना कीमती है," समीर ने गर्व से कहा।
माधव जी ने घड़ी को देखा और उनकी आँखों में एक अजीब सा दर्द तैर गया। उन्होंने समीर के कान में कहा, "बेटा, यह घड़ी वक्त बता सकती है, पर वक्त दे नहीं सकती। काश तूने घड़ी की जगह मुझे कुछ 'घड़ियाँ' (पल) दी होतीं।"
समीर को लगा पापा बुढ़ापे में भावुक हो रहे हैं। उसने बात टाल दी।
उस पार्टी के ठीक एक हफ्ते बाद, समीर एक बहुत ज़रूरी मीटिंग में था। उसका फोन साइलेंट पर था। स्क्रीन पर बार-बार 'होम' फ्लैश हो रहा था। समीर ने उसे इग्नोर किया। उसे लगा कि शायद नौकर किसी सामान के लिए फोन कर रहा होगा।
मीटिंग खत्म होने के बाद जब उसने फोन उठाया, तो 25 मिस कॉल थे। और एक मैसेज था—"साहब, बाबूजी गिर गए हैं। अस्पताल ले जा रहे हैं।"
समीर के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह अपनी मर्सिडीज़ को हवा की रफ़्तार से दौड़ाता हुआ अस्पताल पहुँचा।
आईसीयू के बाहर डॉक्टर खड़े थे। समीर ने डॉक्टर का कॉलर पकड़ने के अंदाज में कहा, "डॉक्टर! मेरे पिता को कुछ नहीं होना चाहिए। जितना पैसा चाहिए ले लो। विदेश से डॉक्टर बुलाओ, चार्टर्ड प्लेन तैयार है। बस वो ठीक होने चाहिए।"
डॉक्टर ने समीर के हाथ को अपने कंधे से हटाया और बेहद संजीदगी से बोले, "मिस्टर मल्होत्रा, शांत हो जाइये। हमने अपनी पूरी कोशिश की। उनका दिल बहुत कमज़ोर हो चुका था। दरअसल, यह आज का नहीं, बरसों का 'अकेलापन' था जिसने उनके दिल को थका दिया था।"
"पैसा?" समीर चिल्लाया। "मैं इस पूरे अस्पताल को खरीद सकता हूँ। उन्हें बचाओ!"
डॉक्टर ने समीर की आँखों में देखा और वो बात कही जो समीर की दौलत पर भारी पड़ गई।
"मिस्टर समीर, साइंस इंसान की सांसें कुछ पल के लिए मशीन से चला सकती है, पर ज़िंदगी नहीं दे सकती। **दौलत यह बता सकती है कि आपका इलाज कितना महंगा है, पर यह नहीं बता सकती कि आपके पास वक्त कितना बचा है।** आपके पिता के पास अब शायद कुछ मिनट ही हैं। जाइये, उनसे मिल लीजिये। चेकबुक बाहर छोड़कर जाइयेगा, अंदर सिर्फ़ 'बेटे' की ज़रूरत है।"
समीर कांपते कदमों से आईसीयू में गया। माधव जी वेंटिलेटर पर थे। उनकी सांसें उखड़ रही थीं।
समीर घुटनों के बल बैठ गया और पिता का हाथ अपने हाथों में ले लिया। वही हाथ जिस पर उसने लाखों की घड़ी बांधी थी। आज वो कलाई बहुत कमज़ोर लग रही थी।
"पापा..." समीर रो पड़ा। "मुझे माफ़ कर दीजिये। मैं आ गया हूँ। हम रामपुर चलेंगे। मैं सब छोड़ दूंगा। बस आप ठीक हो जाइये।"
माधव जी ने मुश्किल से आँखें खोलीं। धुंधली नज़रों से बेटे को देखा। उनके होठों पर एक हल्की मुस्कान आई। उन्होंने इशारे से समीर का हाथ अपने सीने पर रखा, जैसे कह रहे हों—'अब बहुत देर हो गई बेटा।' और अगली ही पल, मॉनीटर पर सीधी लकीर खिंच गई। 'बीप' की वो आवाज़ समीर के कानों में किसी धमाके जैसी लगी।
माधव जी जा चुके थे। दुनिया का सबसे अमीर बेटा अपने पिता को एक और सांस नहीं खरीदवा पाया था।
अंतिम संस्कार के बाद, समीर अपने पिता के कमरे में बैठा था। पूरा घर सन्नाटे में डूबा था। अलमारी खोलते वक्त उसे एक पुरानी डायरी मिली। यह माधव जी की डायरी थी।
समीर ने पन्ने पलटे। डायरी में कोई हिसाब-किताब नहीं था, बल्कि एक अजीब सा 'कर्ज़' लिखा था।
हर पन्ने पर एक तारीख और एक नोट था:
*— "आज समीर का जन्मदिन था। मैंने सोचा था साथ खाना खाएंगे, पर वो मीटिंग में था। मेरा बेटा बहुत बड़ा आदमी बन गया है। (उधार: एक शाम)"*
*— "आज मेरी तबीयत खराब थी। समीर ने डॉक्टर और नर्स को भेज दिया। काश वो खुद आकर सिर पर हाथ फेर देता। (उधार: एक स्पर्श)"*
*— "आज दिवाली है। समीर विदेश में है। घर बहुत बड़ा है, पर खाली है। (उधार: एक त्यौहार)"*
आखिरी पन्ने पर लिखा था:
*"बेटा समीर, मैं जानता हूँ तू मुझे बहुत प्यार करता है। तूने मुझे हर सुख-सुविधा दी। पर बेटा, इंसान यादें लेकर जाता है, सामान नहीं। मेरे पास तेरी दी हुई महंगी घड़ियाँ, कपड़े और गाड़ियां हैं, पर मेरे पास तेरी 'यादें' बहुत कम हैं। मैं जा रहा हूँ, और मेरी वसीयत में मैं तुझे अपनी सारी जमा-पूंजी देकर जा रहा हूँ। लेकिन एक नसीहत भी—दौलत कमाने में इतना गरीब मत हो जाना कि जब अपनों के पास बैठने का वक्त मिले, तो वो अपने ही न रहें। मन से अमीर रहना, क्योंकि धन का क्या है, आता-जाता रहता है, पर वक्त सिर्फ़ जाता है... कभी लौटकर नहीं आता।"*
समीर डायरी सीने से लगाकर फूट-फूट कर रोया। उस रात उसे समझ आया कि वह शहर का सबसे अमीर आदमी होकर भी दुनिया का सबसे गरीब बेटा था। उसके पास बैंक में करोड़ों थे, पर पिता की डायरी में दर्ज़ 'वक्त का कर्ज़' वह कभी नहीं चुका पाया।
अगले दिन से समीर बदल गया। उसने अपने ऑफिस के घंटे कम कर दिए। उसने एक नियम बनाया—शाम 7 बजे के बाद नो मीटिंग, नो कॉल्स। वह अब अनाथालयों और वृद्धाश्रमों में जाता, वहां बुजुर्गों के साथ वक्त बिताता। जब कोई उससे पूछता कि इतना बड़ा बदलाव क्यों?
तो समीर अपनी कलाई पर बंधी पिता की वही पुरानी, साधारण सी घड़ी (जो माधव जी पहनते थे) दिखाकर कहता:
**"क्योंकि अब मैं समझ गया हूँ कि वक्त बता सकता है आपके पास कितनी दौलत है, लेकिन दौलत नहीं बता सकती कि आपके पास कितना वक्त है।"**
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**कहानी के अंत में आपसे एक सवाल:**
क्या आप भी अपनी ज़िंदगी की दौड़ में अपनों को पीछे छोड़ रहे हैं? याद रखिये, माता-पिता आपकी कामयाबी नहीं, आपका साथ चाहते हैं। इससे पहले कि घड़ी की सुइयां रुक जाएं, क्या आप आज ही अपने माता-पिता के पास बैठकर उनसे दो मीठे बोल बोलेंगे?
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